प्रकृतिवाद को जन्म देने वाले कारक

प्रकृतिवाद को जन्म देने वाले कारण एवं आर्थिक विचारधारा में इसका योगदान

प्रकृतिवाद को जन्म देने वाले कारण

वाणिकवाद के कुप्रभावों के अतिरिक्त प्रकृतिवाद को जन्म देने वाले मुख्य कारण निम्नलिखित है-

  1. राजदरबार का अपव्यय –

    चौदहवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक फ्रांस में लुई वंश का शासन अत्याचारों की एक लम्बी गाथा बन गया था, राजा जनता का शोषण करके विलासिता का जीवन जी रहा था, “मैं ही राज्य हूँ (I am the state) राजदरबार का प्रत्येक व्यक्ति जनता के लिए राजा था। राजदरबारी अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए राजकोष से मनमाना धन खर्च करने लगे थे। परिणामतः एक ओर राजकोष की वृद्धि के लिए जनता पर मनमाने कर लगाये जा रहे थे तो दूसरी ओर राजकोष का उपयोग निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया जा रहा था। राजा हमेशा सुरा- सुन्दरी की तलाश में रहता था। उसे जनता की चिन्ता नहीं थी। राज्य पर ऋण-भार दिन पर दिन बढ़ने लगा था। ऐसी विषम परिस्थितियों ने नवीन विचारों के विकास के लिए नया आधार प्रस्तुत कर दिया ।

  2. अनावश्यक करारोपण-

    राजदरबार के भारी खर्चों की पूर्ति के लिए देश के निर्धनों पर अत्यधिक करारोपण किया जाने लगा। धनी वर्ग पर कर नहीं लगाया जाता था। भूमि पर पादरियों, सामन्तों व बड़े-बड़े धनिकों का स्वामित्व हो चुका था। छोटी जोतों पर गरीब किसान अपनी दर-गुजर कर रहे थे। करारोपण का पूरा भार किसानों पर ही था। नोबुलों को करों से मुक्त रखा गया था। दक्षिणी फ्रॉस में भूमि तथा मकानों पर (Taille) नामक प्रत्यक्ष कर लगाया था।

व्यापारियों और किसानों से उनकी आय का 50 प्रतिशत भाग करों के रूप में वसूल कर लिया जाता था। यहाँ तक कि घटिया नमक पर भी कर लगाया था। किसानों की उपज के दाम काफी घट गये थे। वे उस अनाज को विदेशों में भी नहीं बेच पाते थे, क्योंकि निर्यात करों ने विदेशों में भी अनाज के दाम बढ़ा दिये थे।

  1. वणिकवादी नीति-

    फ्राँस में वणिकवाद को कॉलबर्टवाद’ (Colbertism) के नाम से पुकारा जाता था। सम्पूर्ण फ्रांस वित्तमन्त्री कॉलबर्ट के आर्थिक नियन्त्रणों से त्रस्त हो चुका था। वहाँ व्यक्तिगत आर्थिक स्वतन्त्रता का गला घोट दिया गया, आन्तरिक व्यापार की अपेक्षा विदेशी व्यापार को सर्वाधिक महत्व दिया गया। मजदूरों व किसानों का शोषण करके देश में सोने-चाँदी के संग्रह को बढ़ाया गया था।

फ्रांस के नये विचारकों ने व्यापार की अपेक्षा कृषि को तथा व्यापारी की अपेक्षा किसान को सम्मान दिया और बताया कि वास्तविक बचत कृषि से है। आयात-निर्यात पर लगे कड़े प्रतिबन्धों को तोड़ा जाने लगा। अनाज के प्रतिबन्धित व्यापार को स्वतंत्र व्यापार के रूप मे विकसित किया गया। उन्होंने व्यापार की अपेक्षा कृषि को बढ़ाया और बताया कि वास्तविक बचत कृषि से ही सम्भव होती है। उनके विचारों ने लोगों को कृषि कार्य की ओर आकर्षित किया।

  1. इंगलैण्ड की कृषि-क्रान्ति –

    प्रकृतिवाद के जन्म के समय इंग्लैण्ड में भूमि सुधार कार्यक्रम बड़ी तेजी से लागू किया जा रहा था। वहाँ कृषि का उत्पादन बढ़ने लगा और किसानों की दशा में आमूलचूल परिवर्तन होने लगे थे। इंग्लैण्ड की कृषि क्रान्ति ने फ्रांस के विचारकों को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती। केने स्वयं एक किसान था। उसके द्वारा अपने देश में इंग्लैण्ड के ही समान कृषि कार्यक्रमों को लागू करना प्रारम्भ किया जाने लगा। फलत: फ्रांस में किसानों की दशा दिन प्रति दिन सुधरती गयी। इस व्यवस्था का प्रभाव यूरोप के अन्य देशों पर भी पड़ा और धीरे-धीरे लोग इस नयी व्यवस्था का स्वागत करने लगे।

आत्मगत शक्तियाँ का प्रभाव

प्रकृतिवाद को जन्म देने वाली उपर्युक्त परिस्थितियों के अतिरिक्त फ्रांस में अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध घोर प्रतिक्रिया प्रारम्भ हो गयी थी। नये विचारक राजा के ईश्वरीय अधिकारों को चुनौती देने लगे थे और अब वे प्राकृतिक अन्याय के सिद्धान्तों पर आधारित सरल एवं विवेकपूर्ण नियमों की खोज में जुट चुके थे। प्रकृतिवाद को इस राजनीतिक चेतना से बड़ी शक्ति मिली और वह तेजी से विकसित होने लगी।

कुछ विद्वानों का मत है कि आर्थिक विचारों के इतिहास में प्रकृतिवादियों का स्थान काफी विवादग्रस्त रहा है परन्तु कुछ विद्वान प्रकृतिवादियों को अर्थशास्त्रियों के सम्प्रदाय का प्रतिनिधि मानते हैं। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि एडम स्मिथ को अर्थशास्त्र का जनक न कह कर प्रकृतिवादियों को अर्थशास्त्र का संस्थापक कहा जाना चाहिए। जीड एवं रिस्ट के अनुसार, ‘प्रकृतिवादयों की मौलिकता तथा उनके उत्साह को ध्यान में रखते हुए भी वे केवल नये विज्ञान के अग्रदूत ही कहे जा सकते हैं।’ अब यह एकमत होकर स्वीकार किया जाता है कि एडम स्मिथ उनके सच्चे संस्थापक हैं।

जीड एवं रिस्ट प्रकृतिवादियों के महत्व के बारे में लिखते हैं कि प्रकृतिवादयों ने उस मार्ग का निर्माण किया है जिस पर एडम स्मिथ तथा उनके पश्चात् सौ वर्षों तक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री चले थे। फिर भी वे उन्हें अर्थशास्त्र के संस्थापक मानने को तैयार नहीं हैं। उनके अनुसार, उनकी सबसे बड़ी कमी थी उन्हें मूल्य के विचार का अपूर्ण ज्ञान।

अलेक्जेण्डर ग्रे ने प्रकृतिवादियों को अर्थ-विज्ञान का वास्तविक संस्थापक माना है। न्यूमैन ने इसी बात का समर्थन किया है। प्रकृतिवादियों का दष्टिकोण काफी व्यापक था। उन्होंने आर्थिक जीवन की एक ऐसी प्रणाली को जन्म दिया जिसमें सभी सामाजिक तथ्य एक ढाँचे में समा गये थे। उनका विश्वास था कि सम्पूर्ण आर्थिक प्रणाली का संचालन प्राकृतिक नियमों के द्वारा किया जाता है। यही प्रकृतिवादियों की ‘प्राकृतिक व्यवस्था’ है। उनके इन्हीं विचारों के कारण उन्हें हम ‘अर्थ-विज्ञान संस्थापक’ के रूप में रखने लगे हैं। एडम स्मिथ के अनुसार, “यह प्रणाली अनेक त्रुटियों के होते हुए भी राजनीतिक अर्थशास्त्र विषय पर अभी तक प्रकाशित होने वाले विचारों में शायद सत्य के सबसे अधिक समीप है।”

अन्त में हम इतना अवश्य कह सकते हैं कि भले ही अर्थशास्त्र का संस्थापक कोई भी हो, इतना अवश्य है कि उस संस्थापक को चोटी पर पहुॅचाने के लिए जिस मार्ग की आवश्यकता थी, वह मार्ग प्रकृतिवादियों ने ही दिखाया था।

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