नव-माल्थसवाद के प्रमुख आर्थिक विचार

नव-माल्थसवाद- अर्थ, प्रमुख आर्थिक विचार

नव-माल्थसवाद

नव-माल्थसवाद का जन्म, माल्थस के जनसंख्या सम्बन्धी विचारों के प्रत्युत्तर में हुआ था। माल्थस के अनुसार जनसंख्या खाद्यान्नों की तुलना में अधिक बढ़ती है। जब जनसंख्या व खाद्यान्नों का सह-सम्बन्ध भंग हो जाता है तब प्राकृतिक प्रकोप, जैसे बीमारी, महामारी, भुखमरी तथा बेरोजगारी के द्वारा ही जनसंख्या रोकी जा सकती है। प्रकृति स्वयं अपनी शक्तियों का प्रयोग करके ऐसा करती है। माल्थस ने इसे प्राकृतिक अवरोध कहा है। जब इन प्राकृतिक अवरोधों से जनसंख्या का संहार होता है तब इससे मानव समाज हा-हाकार कर उठता है और उसे असहनीय पीड़ा होती है। अतः माल्थस ने सुझाव दिया था कि प्राकृतिक कष्टों से व्यक्ति बच सकता है बशर्ते वह अपने स्वैच्छिक उपायों से जनसंख्या की रोकथाम करे। इन स्वैच्छिक उपायों को उसने ‘प्रतिबन्धक अवरोध’ कहा था। प्रतिबन्धक अवरोधों के अन्तर्गत संयम ब्रह्मचर्य धर्म का पालन तथा देर से विवाह करना आदि बाते हैं। जहाँ तक जनसंख्या की बाढ़ रोकने के लिए कृत्रिम उपायों – जैसे गर्भपात, नसबन्दी आदि उपायों का प्रश्न है, उनके बारे में माल्थस ने नैतिकता को ध्यान में रखते हुए ऐसे साधनों को न अपनाने की सलाह दी थी।

नव-माल्थसवादियों के विचार

नव-माल्थसवादी वह विचारधारा है जो स्वयं को माल्थस का उत्तराधिकारी मानती है। नव-माल्थसवादी कहते हैं कि हम ही माल्थस के विचारों के निकट हैं। नव-माल्थसवाद की प्रमुख लेखिकाएँ थीं – श्रीमती मेरी स्टोप्स (Marie Stopes) इंग्लैण्ड में, तथा श्रीमती मार्गरेट सेंगर (Margaret Sanger) अमरीका में इन्होंने जनसंख्या की बाढ़ को रोकने के लिए अपने स्तर पर अनेक कार्य किये। सन्तति-विवाह (Birth control) के लिए नव-माल्थसवादियों ने एक ऐसा आन्दोलन खड़ा कर दिया जिसने विश्व के अनेक देशों के राजनीतिज्ञों, विचारकों, बुद्धिजीवियों, शासकों, चिकित्सकों व समाजवादी विचारकों को प्रभावित किया। यहाँ तक कि नव-माल्थसवादियों के विचारों से प्रभावित होकर अनेक देशों की सरकारों ने उनके आन्दोलन को सहयोग प्रदान किया।

नव-माल्थसवादियों का विचार है कि कामेच्छा और सन्तानेच्छा में अन्तर है। उनका यह विचार माल्थस के विचार से मेल नहीं खाता है, क्योंकि माल्थस ने कामेच्छा का सम्बन्ध सन्तानोत्पत्ति से स्थापित किया था। नव-माल्थसवादियों के अनुसार, कामेच्छा एक प्राकृतिक इच्छा है और सभी प्राणियों में देखी जाती है; किन्तु संतान पैदा करने की इच्छा धार्मिक एवं सामाजिक है तथा यह सब प्राणियों में समान रूप से नहीं पायी जाती। इस सन्दर्भ में जीड़ एवं रिस्ट ने लिखा है कि “कामवासना जीवधारियों की एण्क प्राकृतिक इच्छा है जो सभी व्यक्तियों में पायी जाती है, जबकि सन्तान पैदा करने की इच्छा का उदय विभिन्न स्थानों व समयों में सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के अनुसार होता है।”

सन्तानोत्पत्ति के लिए सामाजिक एवं धार्मिक कारण

अनेक धार्मिक एवं सामाजिक कारण ऐसे हैं जो व्यक्ति में सन्तान पैदा करने की इच्छा जाग्रत करते हैं। इनमें से कुछ सामाजिक एवं धार्मिक कारण निम्नलिखित हैं:

  1. हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ, विशेषकर मनुस्मृति में यह लिखा है कि प्रत्येक व्यक्ति का कम से कम एक पुत्र होना चाहिए। उसके अनुसार, पुत्र पिता को नरक से मुक्त करता है। इसी प्रकार, यदि कोई हिन्दू अपनी लड़की का विवाह नहीं करता, तो वह नरक का भागी है।
  2. मूसा (सूदों) तथा कनफ्यूशियस के मतानुसार जिस व्यक्ति की अन्तिम क्रिया उसके पुत्र द्वारा नहीं होती, उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता।
  3. कुछ देशों में ऐसी जातियाँ भी हैं जो अपने सैनिक बेड़े को मजबूत बनाने के लिए जनसंख्या को बढ़ाना चाहती हैं।
  4. लोगों के मतानुसार अपनी वंश-परम्परा तथा अपनी कला व संस्कृति को जीवित रखने तथा उसके विकास के लिए जनसंख्या का बढ़ाना उपयुक्त है।
  5. धनी वर्ग सन्तान की इच्छा अधिक रखता है, ताकि उसकी मृत्यु के बाद उसकी सन्तान सम्पत्ति का सुख भोग कर सके।
  6. निर्धन वर्ग भी सन्तान की इच्छा अधिक रखता है ताकि उसके अधिक बच्चे छोटा-मोटा काम करके परिवार के लिए कुछ धन कमा सकें।

सन्तानोत्पत्ति के अवरोधक तत्व

कुछ विशेष कारण ऐसे हैं जो सन्तानोत्पत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं। इनमें से प्रमुख कारणों को नीचे दिया गया है:

  1. अनेक व्यक्ति अपने उत्तरदायित्वों से बचने के लिए विवाह नहीं करना चाहते हैं, भले ही वे अपनी कामवासना की पूर्ति अन्यत्र कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में सन्तान उत्पन्न नहीं हो सकती।
  2. अनेक स्त्रियाँ प्रसव-काल की पीड़ा से बचने के लिए सन्तान पैदा नहीं करना चाहती हैं।
  3. कुछ पति-पत्नी अपने दाम्पत्य जीवन को भार से मुक्त रखने के लिए सन्तान पैदा नहीं करना चाहते।
  4. कुछ आधुनिक महिलाएँ अपने शारीरिक सौन्दर्य एवं आकर्षण को बनाये रखने के लिए सन्तान उत्पन्न करना नहीं चाहती।
  5. कुछ महिलाएँ इस कारण से भी विवाह नहीं करती है कि उनकी स्वतन्त्रता पर अंकुश लग जायेगा।

नव-माल्थसवादी माल्थस की इस बात से सहमत थे कि प्रजनन-शक्ति को अनियन्त्रित रखने से जनसंख्या बड़ी तीव्र गति से बढ़ती है। परिणामतः अकाल मृत्यु, भुखमरी, महामारी जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। परन्तु वे माल्थस की इस बात से सहमत नहीं थे कि जनसंख्या को आत्मसंयम (Self-restraint) से रोका जा सकता है। नव-माल्थसवादी जनसंख्या को रोकने के लिए कृत्रिम उपायों को अधिक महत्व देते थे। कृत्रिम उपायों के पक्ष में उन्होंने निम्न तर्क प्रस्तुत किये हैं :

  1. अविवाहित स्त्रियों व पुरुषों के दुराचार छिप सकते हैं;
  2. विवाहित जीवन सुखी हो सकता है;
  3. वेश्यागमन आदि बुराइयों से बचा जा सकता है;
  4. समाज की आर्थिक विषमताएँ दूर की जा सकती हैं, तथा
  5. राष्ट्र की उन्नति होती है।

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