डेविड माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत

माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत

जैसा कि हम जानते हैं कि वणिकवादियों तथा प्रकृतिवादियों का यही विचार था कि धनी जनसंख्या राष्ट्र के लिए लाभदायक होती है। उन्हें जनसंख्या की बहुलता का कोई भय नहीं था क्योंकि वे समझते थे कि जनसंख्या तो अपने आप ही जीवन निर्वाह के साधनों से नियन्त्रित हो जायेगी। गॉडविन आशावादिता की चरम सीमा था। इसलिए उसने घोषित किया था कि “सरकार अपनी अति उत्तम अवस्था में भी एक बुराई है।” उसने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जिसमें मनुष्य सम्पत्ति, विवाह, सम्भोग जैसे इच्छाओं के बन्धनों को तोड़कर केवल आधे दिन काम करने भर से ही प्रसन्नता से जीवन व्यतीत करेगा। इसके विचार से माल्थस के पिता सहमत थे। परन्तु माल्थस उनसे सहमत नहीं था। पिता और पुत्र के बीच इस विषय पर काफी वार्तालाप हुआ और उसी के परिणामस्वरूप 1798 में Principles of Population नामक निबन्ध का पहला संस्करण बिना नाम के प्रकाशित हुआ।

माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत

(Population Theory of Malthus)

माल्थस के `Principles of Population‘ नामक निबन्ध की बहुत आलोचना हुई। गॉडविन ने लिखा था, “मानव समाज में एक नियम है जिसके द्वारा जनसंख्या निरन्तर जीवन-निर्वाह के साधनों की सीमा के अन्दर रहती है। अतः अमेरिका और एशिया की खानबदोश जातियों में भी हम नहीं पाते कि इतने युगों के बाद भी जनसंख्या इतनी बढ़ गयी है कि पृथ्वी पर खेती करने की आवश्यकता अनुभव हुई हो।” इसके विरुद्ध माल्थस ने व्यंग्यपूर्वक कहा, “यह सिद्धान्त जिसे मिस्टर गॉडविन ने इस प्रकार एक रहस्यमयी या जादुई साधन समझकर सम्बोधित किया है. दुःख, दुःख का भय तथा आवश्यकता को पीसने वाला नियम ही सिद्ध होगा। माल्थस ने यह निष्कर्ष दो बातों के आधार पर निकाला था –

  1. मनुष्य के जीवन के लिए भोजन आवश्यक होता है, और
  2. स्त्री और पुरुषों में सम्भोग इच्छा होना स्वाभाविक है और लगभग अपनी वर्तमान अवस्था में ही रहेगा। इसलिए वह इस परिणाम पर पहुँचा था कि “जनसंख्या की शक्ति अनिश्चित रूप से भूमि की मनुष्य के लिए निर्वाह उत्पन्न करने की शक्ति की अपेक्षा अधिक होती है। जब जनसंख्या अनियन्त्रित होती है तो गुणोत्तर अनुपात (Geometrical Ratio) से बढ़ती है। निर्वाह केवल अंकगणितीय अनुपात (Arithmetical Ratio) से बढ़ता है। इसके बाद उसने उन शक्तियों का वर्णन किया है जो जनसंख्या को नियन्त्रण में रखती है। यह थीं- व्यभिचार और दुःख। ऐसे हालात में एक सुखी समाज की आशा कभी भी नहीं की जा सकती।

विभिन्न आलोचनाओं का उत्तर देते हुए उसने निबन्ध का दूसरा संस्करण, 1803 में प्रकाशित किया था। इस संस्करण में सम्पूर्ण विवेचन अधिक तर्कपूर्ण था। पहले संस्करण में उसने जनसंख्या को नियन्त्रित करने वाली केवल दो शक्तियों की चर्चा की थी, परन्तु इस संस्करण में एक नयी रुकावट को बताया – नैतिक संयम। जनसंख्या का जो चित्र उसने पहले दिया था वह अत्यन्त ही भयंकर था किन्तु अब उसके विचार में उतनी कठोरता नहीं थी।

उसने अपने सिद्धान्त को तीन बातों में संक्षिप्त किया है :

  1. जनसंख्या आवश्यक रूप से जीवन निर्वाह के साधनों से नियन्त्रित होती है।
  2. जनसंख्या नित्य रूप से जीवन निर्वाह के साधनों की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ती है जब तक कोई शक्तिशाली अवरोध उसे नहीं रोकते ।
  3. ये अवरोध तथा वे अवरोध जो जनसंख्या की श्रेष्ठ शक्ति को दबाये रखते हैं और उसको जीवन-निर्वाह के साधनों तक सीमित रखते हैं, नैतिक संयम, व्यभिचार और दुःख में विभाजित किये जा सकते हैं।

पहली बात के सम्बन्ध में माल्थस ने कहा कि जनसंख्या प्रत्येक पच्चीस वर्षों में बढ़कर दुगुनी हो जाती है अथवा गुणोत्तर अनुपात से बढ़ती है। दूसरे के विषय में उसने लिखा है कि जीवन-निर्वाह के साधनों को अंकगणित अनुपात से अधिक तीव्र गति से बढ़ाना सम्भव नहीं होता।

यह स्पष्ट है कि माल्थस ने काम-प्रवृत्ति की शक्तियों का बहुत अधिक सहारा लिया है और उसका विश्वास था कि ये शक्तियाँ निरन्तर कार्य करती रहती है। उसने कहा, “जिस कारण की ओर मैं संकेत करता हूँ वह सभी प्राणियों में उनके लिए तैयार की गयी खाद्य सामग्री की अपेक्षा अधिक बढ़ जाने की प्रवृत्ति है।” इस प्रकार माल्थस अनुसार जीवन निर्वाह के साधनों अर्थात् भोजन द्वारा सीमा के अन्दर रखी जाती है। उसके सिद्धान्त का सार केवल एक ही वाक्य में दिया जा सकता है; सभी प्राणियों में, उसके लिए तैयार की गयी खाद्य सामग्री की अपेक्षा, अधिक तेजी से निरन्तर बढ़ने की प्रवृत्ति है।

माल्थस ने केवल जनसंख्या की उस एक प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकर्षित किया है और वह है- अनियन्त्रित अवस्था में जनसंख्या निरन्तर बढ़ती जाती है। वह केवल यह बताना चाहता था कि जनसंख्या की स्वाभाविक प्रवृत्ति गुणोत्तर अनुपात में बढ़ने की होती है। इसी प्रकार उसने यह भी बताया कि खाद्य सामग्री केवल अंकगणितीय अनुपात से अधिक नहीं बढ़ायी जा सकती जिसका अर्थ यह है कि भूमि पर उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होता है। माल्थस कहा था कि, “जिन लोगों को कृषि विषयों का तनिक भी ज्ञान है उनको यह स्पष्ट होना चाहिए कि जिस अनुपात में जोत बढ़ायी जाती है, उसके फलस्वरूप पिछली औसत उत्पत्ति में होने वाली वार्षिक वृद्धियाँ धीरे-धीरे नियमित रूप से घटती जाती है। परन्तु माल्थस ने इस नियम की स्पष्ट व्याख्या नहीं की।

निष्कर्ष

माल्थस वास्तव में ऐसा विचारक था जिसने जनसंख्या नियन्त्रण पर ऐसा अचूक दृष्टिकोण दिया जिस पर अमल कर इच्छित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। माल्थस ने अपने नवीन दृष्टिकोण से समस्त विद्वानों को प्रभावित किया। माल्थस के बाद जितने अर्थशास्त्री आये उन सभी ने माल्थस के विचारों को ही नये कलेवर में प्रस्तुत किया।

नव-माल्थसवादियों ने अपने सिद्धान्तों में नवीन विचारों को महत्व तो दिया परन्तु माल्थस के विचारों से ऊपर नहीं उठ पाये अत• अपने समय के बाद भी माल्थस अपने कृतित्वों के साथ जीवित है।

जनसंख्या सिद्धान्त की आलोचना

(Criticism of Population Theory)

माल्थस के सिद्धान्त की कई प्रकार से आलोचना की गयी है। कुछ आलोचकों के अनुसार माल्थस का यह कथन उचित नहीं है कि जनसंख्या गुणोत्तर अनुपात में बढ़ती है और 25 वर्ष में दुगुनी हो जाती है। कुछ लोगों के अनुसार माल्थस के सिद्धान्त की आलोचना इस आधार पर की गयी है कि निर्वाह के साधनों की वृद्धि अंकगणिती अनुपात में नहीं होती। इन लोगों के अनुसार माल्थस ने निर्वाह के साधनों की वृद्धि दर का निर्धारण मनमाने ढंग से किया है क्योंकि पौधों और पशुओं की वृद्धि दर मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक होती है। इसके अतिरिक्त पौधों और पशुओं को भी उचित प्रकार से भरण-पोषण नहीं हो पाने के कारण उनमें सदैव ही अपने को जीवित रखने के लिए एक संघर्ष करना पड़ता है। खाद्य सामग्री की वृद्धि अंकगणितीय अनुपात में होती है। इस बात को तथ्यों की सहायता से नहीं सिद्ध किया जा सकता है। नैसर्गिक अवरोधों के सम्बन्ध में भी माल्थस की आलोचना की गयी है।

उसका विचार था कि जब जनसंख्या, निर्वाह के साधनों से अधिक हो जाती है तो आधिक्य जनसंख्या भूखमरी के कारण मर जायेगी। वास्तव में वह बताना चाहता था कि भोजन की कमी के कारण विपत्ति, मृत्यु, बीमारियाँ, सूखा, अकाल इत्यादि प्राकृतिक संकट उत्पन्न होते हैं जिनसे जनसंख्या का वह भाग जो निर्वाह के साधनों से अधिक है, नष्ट हो जाता है। परन्तु सच यह है कि भोजन की कमी, उत्पादन न कर पाने की अयोग्यता के कारण होती है, न कि जनसंख्या के आधिक्य के कारण। निवारक अवरोधों से माल्थस का अभिप्राय नैतिक संयम से था, परन्तु आलोचकों ने इसका अर्थ यह लगाया कि मनुष्य विवाहकाल में तीन बच्चों की उत्पत्ति के बाद अपने-आपको मैथुन क्रिया से वंचित रखे। परन्तु माल्थस ने ऐसा कभी नहीं कहा। नैतिक संयम का अर्थ माल्थस ने ऐसे विवाहित जीवन से लिया है जिसमें अनियमित रूप से भोग-विलास न किया जा सके। इन आलोचनाओं के बाद भी कहना होगा कि माल्थस का सिद्धान्त अपने स्थान पर अटल है।

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