निःशस्त्रीकरण के सिद्धांत

निःशस्त्रीकरण के सिद्धान्त

(Principles of Disarmament)

निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र-नियन्त्रण दोनों ऐसे प्रभावशाली साधन हैं जिनके द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा को पर्याप्त सीमा तक निश्चित बनाया जा सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा के मार्ग में उस भय को जो राष्ट्रों के बीच शस्त्रों की अनियन्त्रित तथा अन्धी होड़ के कारण गम्भीर रूप से विकसित हो गया है, समाप्त करने के लिए निःशस्त्रीकरण को तात्कालिक सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध साधन समझा जाता है। बहुत भारी मात्रा में इतने शस्त्रों के उत्पादन के बाद भी, जो विश्व में लोगों में TNT के 15 टन प्रति व्यक्ति के हिसाब से हिस्से आते हैं तथा जो सारे विश्व को कई बार नष्ट कर सकते हैं, शस्त्रों की अन्धी होड़ आज भी जारी है। आज मानव यह सोचने पर विवश हो गया है कि उसके जीवन तथा संस्कृति को बचाये रखने के लिए ऐसे सभी तत्त्वों को समाप्त करने की आवश्यकता है जिन्होंने धरती पर जीवन को गम्भीर खतरा पैदा कर दिया है। दोनों विश्व युद्धों में भारी क्षति उठाने के बाद तथा पूर्ण विध्वंसक तृतीय युद्ध की सम्भावना से जो पूर्ण विध्वंसकारी आधुनिकतम शस्त्रों से लड़ा जायेगा, मानव उन साधनों के बारे में सोचने के लिए बाध्य हो गया है जिनसे वह युद्ध को समाप्त कर सके या युद्ध से बच सकें। इस दिशा में एक लोकप्रिय विचार यह है : “क्योंकि शस्त्र-युद्ध मानवीय साधनों की व्यर्थ बरबादी करते हैं तथा मानवता को अनैतिक कार्यों की ओर ले जाते हैं इसलिए निःशस्त्रीकरण एक ऐसा साधन है जो शान्ति, सुरक्षा, समृद्धि तथा आत्म-सुरक्षा की स्थिति उत्पन्न कर सकता है।” यह व्यापक रूप से विश्वास किया जाता है कि वर्तमान परिस्थितियों में निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र-नियन्त्रण और भी अधिक आवश्यक हो गये हैं क्योंकि केवल ऐसे उपायों से ही वर्तमान पागलपन की परिस्थिति को शान्ति की स्थिति में बदला जा सकता है जिसमें समृद्धि के लिए विशिष्ट प्रयल किए जा सकते हैं।

निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र-नियन्त्रण की वकालत करने वाले निम्नलिखित कुछ या सभी सिद्धान्तों के द्वारा अपने दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं :

(A) निःशस्त्रीकरण का शांति सिद्धान्त

(Peace Theory of Disarmament)

  1. शस्त्रीकरण युद्ध तथा निःशस्त्रीकरण शांति की ओर ले जा सकता है-

    विश्व के बहुत से लोग जो शांति चाहते हैं वे यह विश्वास करते हैं कि शस्त्र-युद्ध की ओर ले जाते हैं तथा इसलिए निःशस्त्रीकरण शांति की ओर ले जाएगा। शस्त्र दौड़ की ओर ले जाते हैं तथा शस्त्र-होड़ युद्ध की ओर ले जाती है। इसलिए शस्त्र, युद्ध का कारण बनते हैं तथा निःशस्त्रीकरण द्वारा इस कारण को समाप्त करके युद्ध को समाप्त किया जा सकता है। इसलिए निःशस्त्रीकरण शान्ति का प्रत्यक्ष साधन है तथा इस सम्बन्ध में, यह सामूहिक सुरक्षा की भावना की अपेक्षा अधिक विकसित अवधारणा है। जहां सामूहिक सुरक्षा में युद्ध छिड़ने के बाद सभी राष्ट्रों के सामूहिक प्रयलों द्वारा इसे सीमित करने के प्रयत्न किए जाते हैं वहाँ निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र-नियन्त्रण युद्ध के स्थान पर अधिक विकसित उपाय प्रस्तुत करते हैं। कोहीन के शब्दों में, “शस्त्र, राष्ट्रों के बीच तनाव तथा भय को बढ़ावा देते हैं। तनाव तथा भय को समाप्त करके निःशस्त्रीकरण का उद्देश्य शांतिपूर्ण निपटारे की प्रक्रिया को सुविधाजनक तथा सुदृढ़ बनाना है।”

  2. शस्त्रीकरण पहले सैन्यवाद तथा फिर युद्ध की ओर ले जाता है-

    इस विचार के पीछे यह तर्क है कि शस्त्र न केवल युद्ध को भौतिक रूप से सम्भव बनाते हैं बल्कि राजनीतिक रूप से सम्भव बनाते हैं। सैन्यवाद को प्रोत्साहित करते हैं तथा सैन्यवाद, तनाव तथा युद्धों को जन्म देता है। सुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए शस्त्र, अपने अन्तिम रूप में हमेशा असुरक्षा की भावना को ही बढ़ावा देते हैं परस्पर शत्रुता तथा ईर्ष्या पैदा करते हैं तथा इस तरह स्थिति इतनी तनावपूर्ण बना देते हैं कि राष्ट्र प्रायः युद्ध तथा सशस्त्र मुठभेड़ में लिप्त हो जाते हैं। पाकिस्तान का शस्त्रों के प्रति प्रेम ही भारत पर इसके आक्रमण का तथा साथ ही पाकिस्तान में सैन्यवाद तथा सैनिक तानाशाही की उपस्थिति का मुख्य कारण रहे हैं। निःशस्त्रीकरण से अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में युद्ध- प्रियता को समाप्त किया जा सकता है। निःशस्त्रीकरण से विश्वास उत्पन्न होगा तथा सभी झगड़ों के शान्तिपूर्ण निपटारे को प्रोत्साहन मिलेगा। युद्ध के उपकरणों को समाप्त करके, निःशस्त्रीकरण युद्ध को समाप्त कर सकता है। केवल यही राष्ट्रों के बीच विद्यमान तनावों, खिंचावों तथा विरोधों को कम कर सकता है। निश्चिय रूप में यह अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में बढ़ते युद्ध के उन्माद को नियन्त्रित कर सकता है |INF तथा START सन्धियों के उदाहरण हमारे सामने हैं। मार्गेन्थो के शब्दों में, “यह विश्वास किया जाता है कि अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच पर शक्ति संघर्ष की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति (शस्त्र-होड़) से छुटकारा पाकर, अन्तर्राष्ट्रीय अव्यवस्था तथा युद्ध के लिए किए जा रहे संघर्ष के विशिष्ट प्रयलों से छुटकारा पाया जा सकता है।” निःशस्त्रीकरण के शान्ति-सिद्दान्त का सार देते हुए कोलोम्बिस तथा वुल्फ लिखते हैं, “शस्त्र तथा शस्त्र-होड़ अपने आप खूनी तथा महंगे युद्ध का कारण बन सकती हैं। शस्त्रों के होने से यह सम्भावना भी बढ़ जाती है कि इनका प्रयोग भी होगा। परिणामस्वरूप शस्त्र-होड़, आक्रमण के स्थान पर सुरक्षा की भावना सुदृढ़ करने की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक रूप से राष्ट्रों के बीच असुरक्षा की भावना पैदा कर देती है।”

निःशस्त्रीकरण के शान्ति सिद्धान्त का मूल्यांकन

(Evaluation of the Peace Theory of Disarmament)

निःशस्त्रीकरण के पक्ष में शांति सिद्धान्त के विरुद्ध निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

  1. शस्त्र नहीं बल्कि राजनीतिक झगड़े युद्ध का कारण हैं-

    आलोचक शान्ति सिद्दान्त के तर्क को नहीं मानते। वे यह तर्क देते हैं कि यह कहना गलत है कि शस्त्र युद्ध की ओर ले जाते हैं। वास्तविकता कुछ और ही है। राजनीतिक विरोध तथा शत्रुता मानसिक युद्ध का कारण बनते हैं जो बदले में युद्ध-सामग्री को जन्म देते हैं। रॉबर्ट स्ट्रॉज-ह्युप तथा एस.एम. पॉसोनी के शब्दों में, “एक उपकरण, केवल एक उपकरण होता है तथा कोई भी तर्क आज तक प्रमाणित नहीं कर सका कि हथियारों के कारण युद्ध होता है तथा इसके विपरीत न ही यह प्रमाणित कर सका है कि केवल युद्ध या युद्ध का खतरा ही शस्त्रों को जन्म देता है।”

  2. शस्त्र युद्ध निवारक होते हैं-

    इस सिद्धान्त के बहुत-से दूसरे आलोचक इस बात को मानते हैं कि शस्त्र युद्ध निवारक के रूप में कार्य करते हैं। यह बात विशेषतया आधुनिक युग में कुछ ठीक लगती है क्योंकि परमाणु तथा दूसरे शस्त्रों के कारण राष्ट्र अपने झगड़ों या विरोधों का निपटारा करने के लिए युद्ध का खतरा मोल लेने से डरते हैं। क्विंसी राइट यह सलाह देते हैं कि निःशस्त्रीकरण शायद युद्ध के बार-बार होने में वृद्धि कर देगा। युद्ध से बचने का प्रभावशाली साधन, युद्ध के लिए तैयार होना है तथा निःशस्त्र होने का अर्थ है युद्ध को या आक्रमण को निमन्त्रण देना।

  3. शस्त्र नहीं बल्कि युद्ध की इच्छा युद्ध की ओर ले जाती है-

    इस सिद्धान्त के विरोध में तीसरा तर्क यह है कि शस्त्रों के कारण नहीं बल्कि की इच्छा से युद्ध होते हैं। जब लोग युद्ध करने का निर्णय कर लेते हैं तो वे युद्ध करने के लिए चाकू, लाठियां, पत्थर, कील, तीर तथा कई दूसरे अदृश्य शस्त्रों तथा उपलब्ध वस्तुओं का प्रयोग कर लेते हैं। इसलिए गम्भीर बात यह है कि, “युद्ध के साधनों को समाप्त करने का तर्क इस सच्चाई से विमुख है कि पूर्ण निःशस्त्रीकरण अंडे को तो समाप्त कर देगा परन्तु मुर्गी को नहीं।” प्रेक्षपास्त्रों तथा परमाणु बमों का तो उन्मूलन किया जा सकता है परन्तु जब तक युद्ध में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों के निर्माण के लिए तकनीकी ज्ञान, कारखाने तथा सामग्री हैं, तब तक इनके और बन जाने की सम्भावना है। एक अन्य तर्क जो आलोचक पेश करते हैं वह यह है कि यह आवश्यक नहीं युद्ध का कारण हमेशा शस्त्र-होड़ ही हो या युद्ध शस्त्र-होड़ के कारण ही होता है। 19वीं शताब्दी में एंग्लो-फ्रेंच जल सेना होड़ युद्ध का कारण नहीं बनी थी। इतिहास कोई ऐसा निर्णायक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता कि शस्त्र-होड़ ने हमेशा युद्ध को जन्म दिया हो।

  4. निःशस्त्रीकरण से शांति नहीं हो सकती है-

    इसके अतिरिक्त आलोचक यह कह देते हैं कि निःशस्त्रीकरण एक प्रकार से शांति तथा सुरक्षा का प्रत्यक्ष साधन नहीं हो सकता। जब तक परस्पर शत्रुता, विरोध तथा युद्ध करने की कामना (लड़ने की प्रवृत्ति) अन्तर्राष्ट्रीय समाज में विद्यमान है, अन्तर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा तनावपूर्ण तथा समस्यात्मक बनी रहेगी।

  5. अन्तर्राष्ट्रीय सामंजस्य केवल साधन है, निःशस्त्रीकरण की उपज नहीं-

    अन्त में आलोचक यह तर्क देते हैं कि निःशस्त्रीकरण के सिद्धान्त निर्माताओं का यह विचार गलत है कि इसके अन्तर्राष्ट्रीय सामंजस्य पैदा होगा। इसके विपरीत सच्चाई यह है कि केवल अन्तर्राष्ट्रीय सामंजस्य से ही निःशस्त्रीकरण हो सकेगा। इसलिए निःशस्त्रीकरण के लिए काम करने की अपेक्षा हमें राष्ट्रों के बीच सम्बन्धों के विभिन्न क्षेत्रों में पहले से अधिक अन्तर्राष्ट्रीय मित्रता, सहयोग तथा सहकारिता द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय सामंजस्य पैदा करने के लिए काम करना होगा।

निष्कर्ष- समर्थकों तथा आलोचकों, दोनों के तर्कों में सत्यता है। अतः हमें यह कहना ही होगा कि केवल निःशस्त्रीकरण से ही शांति की स्थापना नहीं की जा सकती। फिर भी यदि राष्ट्रीय युद्ध सामग्री में दृढ़ता से कटौती या बहिष्कार किया जा सके और एक प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय नियन्त्रण स्थापित किया जा सके तो हो सकता है कि अन्तर्राष्ट्रीय समाज पर इसका प्रभाव हितकारी हो।

(B) निःशस्त्रीकरण का आर्थिक सिद्धान्त

(Economic Theory of Disarmament)

निःशस्त्रीकरण के पक्ष में एक सुदृढ़ तथा शक्तिशाली तर्क यह है कि निःशस्त्रीकरण द्वारा राष्ट्रों को भयंकर शस्त्रों के उत्पादन पर व्यर्थ में खर्च की जा रही बड़ी भारी धनराशि मिल जाएगी, जिसका प्रयोग मानव-कल्याण तथा विकास के लिए किया जा सकेगा। निःशस्त्रीकरण के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में आर्थिक साधन प्राप्त होंगे जिन्हें लोगों की विकास सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रयोग किया जा सकेगा। इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विश्व का औद्योगिकीकरण हो सकेगा तथा पहले से अधिक अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग किया जा सकेगा। वुल्फ तथा कोलोम्बिस के शब्दों में, “राष्ट्रों द्वारा शस्त्रों में कटौती करने से बड़ी संख्या में धन मिल जायेगा जिसे राष्ट्र के नागरिकों की सामान्य भलाई के कार्यक्रमों में परिणत किया जा सकेगा।“ “बन्दूक या मक्खन’’ इन दोनों में चुनाव की निरन्तर दुविधा में शस्त्रों में कटौती करने की वकालत करने वाले ‘मक्खन’ को अधिमान देते हैं। ‘शांति-दौड़’ न कि ‘शस्त्र-होड़’ वास्तव में मानवता यही चाहती है। यह निश्चय ही दुर्भाग्य की बात है कि जब दुनिया के विभिन्न भागों में लाखों लोग भूख तथा बीमारी के कारण मर रहे हैं और बहुत से राष्ट्र अपनी आय तथा साधनों का बहुत बड़ा भाग युद्ध-सामग्री के उत्पादन में खर्च कर रहे हैं। भूतपूर्व अमरीकन राष्ट्रपति आईजनहावर के शब्दों में, ‘प्रत्येक बन्दूक जिसे बनाया जाता है, प्रत्येक युद्ध-पोत जिसका जलावतरण किया जाता है, प्रत्येक राकेट जिसे छोड़ा जाता है, अन्तिम रूप से उन लोगों के प्रति जो भूखे रहते हैं और जिन्हें खाना नहीं खिलाया जाता, जो ठिठुरते हैं और वस्त्र नहीं दिये जाते, एक चोरी का प्रतीक है।‘’ वह आगे कहते हैं: “शस्त्रों की यह दुनिया केवल पैसा ही व्यय नहीं कर रही, यह अपने श्रमिकों का पसीना, अपने वैज्ञानिकों की प्रतिभा तथा अपने बच्चों की आशाएं भी खर्च रही है।‘’ युद्ध-पोतों तथा हवाई जहाजों पर किए जाने वाले व्यय की, अस्पताल बनाने, खाद्य सामग्री तथा फैक्टरियों को बढ़ाने के लिए खर्च करना अधिक लाभकारी तथा हितकारी है। विभिन्न राष्ट्रों के बड़े भारी तथा निरन्तर बढ़ते रहने वाले प्रतिरक्षा बजट की निःशस्त्रीकरण द्वारा बहिष्करण तथा उससे विकास के लिए धन प्राप्त करने की आवश्यकता है।

निःशस्त्रीकरण के आर्थिक सिद्धान्त का मूल्यांकन

(Evaluation of the Economic Theory of Disarmament)

निःशस्त्रीकरण के आर्थिक सिद्धान्त के आलोचक इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में चार मुख्य तर्क देते हैं : (i) निःशस्त्रीकरण से इतना धन बचेगा कि आर्थिक बाजार में आर्थिक मन्दी आ जाएगी तथा इससे आर्थिक लाभ या तो होंगे ही नहीं अगर होंगे तो बहुत कम होंगे। (ii) निःशस्त्रीकरण से वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान कुंठित हो जायेगा। वैज्ञानिक शोध तथा अधिक से अधिक विकसित तकनीक की आधुनिक प्रवृत्ति को राष्ट्र की सुरक्षा के लिए शस्त्रास्त्रों के उत्पादन के उद्देश्य से बहुत प्रोत्साहन मिलता है। (iii) तीसरा तर्क यह है कि इसकी भी कोई गारण्टी नहीं कि निःशस्त्रीकरण के परिणामस्वरूप प्राप्त धन कोष को केवल विकास कार्यों पर ही खर्च किया जाएगा। (iv) समृद्धि की अपेक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य है क्योंकि समृद्धि तो केवल सुरक्षा के वातावरण में ही सम्भव है तथा सुरक्षा की प्राप्ति शस्त्रास्त्रों से ही हो सकती है। धन-सम्पत्ति से सुरक्षा अधिक आवश्यकता है। विकास की अपेक्षा जीवन अधिक महत्वपूर्ण है।

इन आधारों पर आलोचक निःशस्त्रीकरण के आर्थिक सिद्धान्त की आलोचना करते हैं। परन्तु, आलोचकों के इन तर्कों में बहुत कम सच्चाई है तथा इसके साथ-साथ ये सभी तथ्य नकारात्मक तथा पक्षपातपूर्ण विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। (i) विशेष तथा सामयिक उपायों द्वारा तथा आर्थिक योजनाओं द्वारा विकास करके हम आर्थिक मंदी के खतरों को दूर कर सकते हैं। (ii) शांति-शोध और शांति तकनीक का विकास करके हम वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ावा दे सकते हैं तथा (iii) निःशस्त्रीकरण से होने वाले लाभ को विश्वसनीय तथा वास्तविक लाभ बना सकते हैं। निःशस्त्रीकरण के बाद विश्व जनमत को विकास के पक्ष में प्रेरित करके हम अतिरिक्त धनराशि को विकासकारी कार्यों पर लगा सकते हैं। सुरक्षा तो

एक भावना तथा रवैया है। यह कहना गलत है कि केवल शस्त्रास्त्र ही सुरक्षा पैदा करते हैं। समृद्धि के बिना सुरक्षा वास्तव में प्राणों के बिना मानवीय जीवन की प्रतीक है। असैनिक तकनीक का विकास करके हम अनिवार्य तथा महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आर्नोल्ड टॉयनबी जैसे प्रसिद्ध समाजशास्त्री निःशस्त्रीकरण की प्राप्ति के बाद शांतिपूर्ण विकास द्वारा सामाजिक परिवर्तन का पूर्ण समर्थन करते हैं।

इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि वास्तविक आर्थिक समृद्धि केवल निःशस्त्रीकरण के बाद ही हो सकती है, जब राष्ट्र नैतिक तकनीक को पूर्णरूप से स्वीकार कर लेते हैं तथा एक-दूसरे के कार्यों का संचालन करके अपने साधनों को व्यर्थ गंवाने का प्रयत्न नहीं करते। इसके अतिरिक्त निःशस्त्रीकरणके बाद, प्रतिरक्षा व्यय को कम करके ही, राष्ट्र अतिरिक्त साधनों को विकास के कार्यों के लिए प्रयोग करने की वास्तविक स्थिति में होते हैं। निःशस्त्रीकरणोपरान्त सामंजस्य स्थापित करने से ही वास्तविक रूप से ऐसे आर्थिक तथा विकास के काम हो सकते हैं जो निःशस्त्रीकरण के समर्थक प्राप्त करने की आशा रखते हैं।

(C) निःशस्त्रीकरण का नैतिक सिद्धान्त

(Moral Theory of Disarmament)

निःशस्त्रीकरण के पक्ष में तीसरा तथा दार्शनिक रूप से सबसे अधिक प्रभावशाली तर्क नैतिक तर्क है। इसके अनुसार युद्ध नैतिक रूप से अनुचित है तथा बहिर्वेशन रूप से यही अवस्था युद्ध की तैयारी की है। युद्ध एक बुराई तथा अनैतिकता है। इसलिए युद्ध के स्थान के रूप में शस्त्रास्त्र भी एक बुराई हैं। वास्तव में शस्त्रास्त्रों का उत्पादन ही युद्ध की अनैतिक प्रक्रिया की शुरूआत है। बुराई को जड़ से ही समाप्त कर देना हमेशा ही तर्कसंगत तथा नैतिक समझा जाता रहा है। युद्ध के बहिष्करण के साथ-साथ शस्त्रों तथा शस्त्रास्त्रों की होड़ का बहिष्करण करना होगा।

यह तर्क अप्रत्यक्ष रूप से, शान्ति तर्क का ही विस्तृत रूप है जहाँ शान्ति-सिद्धान्त युद्ध के उपकरण के रूप में शस्त्रास्त्रों की समाप्ति की वकालत करता है वहां नैतिक सिद्धान्त, अनैतिक युद्ध के अनैतिक साधनों के रूप में शस्त्रास्त्रों की समाप्ति की वकालत करता है।

इस सिद्धान्त के आलोचकों का विचार है कि आत्म-रक्षा के लिए युद्ध सदैव नैतिक होता है, इसलिए शस्त्रास्त्रों के उत्पादन द्वारा आत्म-रक्षा के लिए तैयार रहना हमेशा नैतिक होता है। “आत्म-रक्षा तथा इसके लिए तैयारी करना न केवल नैतिक रूप से उचित है बल्कि ऐसा प्राकृतिक सार्वजनिक कानून नैतिकता के प्रति उत्तरदायित्व भी है।” आलोचक आगे इस सिद्धान्त की व्यावहारिक सीमाओं की ओर संकेत करते हैं। नैतिक सिद्दान्त के अनुसार निःशस्त्रीकरण की प्राप्ति अन्तिम साधन तात्कालिक तथा एकपक्षीय निःशस्त्रीकरण है। क्योंकि युद्ध तथा शस्त्रास्त्र अनैतिक हैं, किसी भी राष्ट्र को इन्हें अपने पास नहीं रखना चाहिये। चूंकि एकपक्षीय निःशस्त्रीकरण निश्चित तथा उचित रूप से तब तक निःशस्त्रीकरण का एक अव्यावहारिक साधन माना जायेगा जब तक लोगों की सुरक्षा राज्यों का सर्वोच्च कर्तव्य नहीं माना जायेगा। एक-पक्षीय निःशस्त्रीकरण किसी भी राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय-आत्महत्या सिद्ध हो सकता है क्योंकि इससे शत्रु तथा प्रतिद्वन्द्वी इस पर कभी भी आक्रमण कर सकते हैं।

इस तरह निःशस्त्रीकरण के पक्ष में नैतिक तर्क निःसन्देह दार्शनिक रूप में उचित है परन्तु व्यावहारिक रूप से यह अनुचित तथा अव्यावहारिक है। वास्तविक व्यवहार में इसका मात्र लाभ यही हो सकता है कि यह आने वाले समय के लिए राष्ट्रों को सामान्य तथा विस्तृत निःशस्त्रीकरण के लिए तैयार कर सकता है।

(D) व्यावहारिक तर्क

(Practical Argument)

निःशस्त्रीकरण के पक्ष में सबसे अधिक व्यावहारिक तर्क यह है कि शस्त्रास्त्रों के लिए दौड़ केवल वर्तमान पूर्ण पारस्परिक विनाश के पागलपन की स्थिति को और बढ़ा रही है तथा मानव जाति को मशीनों पर विशेषरूप से कम्प्यूटरों पर निर्भर बना रही है । यह मान्य तथ्य है कि जब मशीनें मानव पर शासन करना शुरू कर देती हैं, जैसा कि निकट भविष्य में होने वाला है, वे नियन्त्रण से बाहर हो जाती हैं तथा उच्छृखल हो जाती हैं। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के बढ़ते खतरे ने मानव जाति के लिए एक ऐसा खतरा खड़ा कर दिया है जिसमें युद्ध अचानक शुरू होकर सम्पूर्ण विध्वंसक युद्ध में बदल सकता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र-नियन्त्रण के पक्ष में समय रहते कोई कार्यवाही की जाए तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में तेजी से बढ़ते पागलपन की स्थिति से मानव जाति को बचाया जाए।

अन्तिम निर्णय

उपर्युक्त चार तर्कों की समीक्षा करने के बाद हम कह सकते हैं कि ये सभी मिलकर, न कि अकेले-अकेले निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र-नियन्त्रण के पक्ष में दृढ़ धारणा का निर्माण करते हैं। ये सभी तर्क अन्तः सम्बन्धित तथा अन्तः निर्भर हैं तथा ये सभी मिलकर अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में निःशस्त्रीकरण के लिए एक ठोस आधार प्रस्तुत करते हैं। आज विश्व जनमत इसकी आवश्यकता का अनुभव कर रहा है। सभी राजनेता, दार्शनिक, विधिवेत्ता, विद्वान् तथा वैज्ञानिक अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शस्त्रास्त्रों की होड़ को सीमित करने तथा शस्त्रों के परित्याग या शस्त्रों में कम-से-कम कटौती करने की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं। शस्त्रास्त्र ही युद्ध का एकमात्र कारण नहीं होते तथा निःशस्त्रीकरण से भी पूर्ण तथा चिरस्थायी अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा स्थापित नहीं की जी सकती। फिर भी इस बात से कोई भी इन्कार नहीं करता कि शस्त्रास्त्रों की दौड़ युद्ध का कारण है तथा निःशस्त्रीकरण एवं शस्त्र-नियन्त्रण, “युद्ध के समाधान की तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के शान्तिपूर्ण विकास की आवश्यक शर्त है।” शीत युद्ध की समाप्ति यूरोपीय देशों में बढ़ते हुए सहयोग की उत्पत्ति साम्यवादी गुट के विघटन के बाद, उपनिवेशवाद की समाप्ति तथा विश्वस्तर पर आर्थिक सुधारों तथा विकास के लक्ष्य को स्वीकृत तथा शांति एवं सुरक्षा के लक्ष्य के पक्ष में दृढ़ विश्व जनमत की उत्पत्ति के बाद शस्त्र-होड़ के लिये कोई स्थान नहीं रहना चाहिए। निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र-नियन्त्रण ही अब हमारा लक्ष्य होना चाहिए। INF तथा START सन्धियों के बाद निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र-नियन्त्रण की ओर प्रगति ही की जानी चाहिए।

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