ए. सी. पीगू के आर्थिक विचार

ए. सी. पीगू के आर्थिक विचार

आर्थर सेसिल पीगू (ए.सी. पीगू) के आर्थिक विचार

पीगू कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे तथा प्रो. मार्शल के उत्तराधिकारी थे। मार्शल के बाद वह नव परम्परावादी अर्थशास्त्रियों के प्रधान बन गये। पीगू कल्याणकारी अर्थशास्त्र के संस्थापक हैं। पीगू की पुस्तक Economics of Welfare (1920) में कल्याणाकारी विचार मिलते हैं। पीगू ने तीन बातों का वर्णन किया है :

(1) आर्थिक कल्याण की परिभाषा (2) उन दशाओं का वर्णन जिनके अन्तर्गत कल्याण अधिकतम होता है और (3) कल्याण को बढ़ाने के लिए नीतिगत सुझावों का निर्णय।

पीगू ने बताया कि व्यक्तिगत कल्याण वस्तुओं और सेवाओं के उपयोग से प्राप्त संतुष्टियों का योग होता है। सामाजिक कल्याण समाज मे सभी व्यक्तिगत कल्याण का योगदान होता है। पीगू ने आर्थिक कल्याण को समाज कल्याण के उस भाग के रूप में परिभाषित किया जो “प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मुद्रा के मापदण्ड से स्थापित किया जा सकता है।”

पीगू आर्थिक कल्याण और राष्ट्रीय आय को समान मानता था। उसने कल्याण के अधिकतम के लिए निम्न दो शर्तें बताई –

  1. रुचि और आय वितरण स्थिर रहने पर राष्ट्रीय आय में वृद्धि कल्याण में वृद्धि को प्रदर्शित करती है।
  2. अधिकतम कल्याण के लिए राष्ट्रीय आय का वितरण समान रूप से महत्वपूर्ण है।

प्रो. पीगू के पास समाज कल्याण में वृद्धि के लिए द्वैत कसौटी है – (1) पहली उसमें समाज के आर्थिक कल्याण को मुद्रा के रूप में मापा, इस प्रकार संसाधनों की पूर्ति दी होने पर राष्ट्रीय अंश में वृद्धि का अर्थ समाज कल्याण में वृद्धि है। द्वितीय पीगू आय समानता नीति का समर्थक था।

पीगू ने निजी और सामाजिक लागतों के बीच अंतर किया। एक वस्तु की निजी सीमान्त लागत एक अतिरिक्त इकाई को उत्पन्न करने की लागत है। सामाजिक सीमान्त लागत उस वस्तु को उत्पन्न करने के फलस्वरूप समाज को हानि या व्यय है। आर्थिक क्रिया के सामाजिक और निजी मूल्यकरण के बीच भेद करके उसने सामाजिक कल्याण अर्थशास्त्र में बाह्य प्रभावों या बहिर्भाव के विश्लेषण के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

पीगू के अनुसार सामाजिक शुद्ध उत्पाद, राष्ट्रीय अंश में कुल योगदान है और निजी शुद्ध उत्पाद योगदान के रूप में बेचा जा सके तथा जिसकी प्राप्तियाँ निवेश करने वाले व्यक्ति के अर्जनों में सम्मिलित की जा सके। दो उत्पादों के बीच विचलन, उत्पाद की सीमान्त वृद्धि के साथ उत्पादन के बाह्य प्रभाव के सम्बन्ध को दर्शाता है। कुछ स्थितियों में सामाजिक शुद्ध उत्पाद, निजी उत्पाद की अपेक्षा अधिक होता है, जबकि अन्य में निजी उत्पाद सामाजिक उत्पाद से अधिक होता है।

पीगू का विचार था कि राज्य निजी शुद्ध उत्पाद को सामाजिक शुद्ध उत्पाद के बराबर करे। अगर एक उद्योग में जहाँ निजी शुद्ध उत्पाद अधिक है वहाँ करारोपण किया जाना चाहिए। अगर दूसरे उद्योग में निजी शुद्ध उत्पाद कम दिखायी देता है तो उसे सब्सिडी दें। उनका मानना था कि निजी शुद्ध उत्पाद और सामाजिक शुद्ध उत्पाद के बीच विचलन की गणना नहीं की जा सकती है और इसे मुद्रा के सन्दर्भ में मापा नहीं जा सकता है।

प्रो. पीगू ने सामाजिक इष्टतम की शर्तों को बताने का पहली बार प्रयास किया, जिसे उसने समस्त आर्थिक प्रणाली का ‘आदर्श उत्पाद’ कहा। सामाजिक इष्टतम तब होता है जब सभी उद्योगों सीमान्त सामाजिक उत्पाद बराबर है। इस प्रकार वास्तविक धन का उत्पादन अधिकतम होता है।

पीगू के कल्याण की शर्तें निम्न मान्यताओं पर आधारित हैं –

  1. प्रत्येक व्यक्ति उपभोक्ता के रूप में अपनी संतुष्टि को अधिकतम करने के लिए तार्किक रूप से कार्य करता है।
  2. उपयोगिता गणना के रूप में (cardinally) मापने योग्य नहीं है, किन्तु परस्पर और अन्तः व्यक्तिगत उपयोगिता की तुलना संभव है जिससे जाना जा सकता है कि क्या कल्याण में वृद्धि हुयी है या कमी।
  3. पीगू ने आधारभूत मान्यता को रखा कि एक मनुष्य संतुष्टि के लिए समान क्षमता रखता जब वह समान परिस्थितियों में रखा जाता है।
  4. पीगू का मत था कि मौद्रिक आय बढ़ने से मौद्रिक आय की सीमान्त उपयोगिता घटती है।

अतः एक निर्धन मनुष्य की आय में बढ़ोत्तरी से प्राप्त सीमान्त उपयोगिता एक धनी मनुष्य की समान मात्रा से आय में हानि की तुलना में उपयोगिता में कमी सापेक्षतः अधिक होती है।

मूल्यांकन 

पीगू ने कल्याण अर्थशास्त्र को पहली बार क्रमबद्ध सैद्धान्तिक आधार प्रदान किया और आदर्शवादी समस्याओं का यथार्थवाद से एकीकरण किया। उसने राज्य हस्तक्षेप के लिए तर्क प्रदान किया, जहाँ निजी और सामाजिक शुद्ध उत्पाद भिन्न होता है, किन्तु उसके सभी नीतिगत सुझाव मूल्य पर आधारित थे। इस प्रकार उसका अध्ययन सैद्धान्तिक की अपेक्ष आदर्शवादी अधिक था।

यद्यपि पीगू का कल्याणवादी अर्थशास्त्र, कल्याणकारी अर्थशास्त्र का प्रथम स्पष्ट विश्लेषण था, फिर भी पीगू की कल्याण की शर्तों की निम्न आधार पर आलोचना की जाती है –

  1. पीगू ने अधिकतम करने पर बल दिया, किन्तु वह इस धारणा को स्पष्ट नहीं कर सका
  2. पीगू की संतुष्टि के लिए समान क्षमता की मान्यता वैज्ञानिक रूप से अमान्य है।
  3. पीगू के कल्याणकारी अर्थशास्त्र के साथ दूसरी समस्या निजी और सामाजिक उत्पादों के बीच अन्तर में दृढ़ता और क्रियात्मक सार की कमी है।
  4. सामान्य कल्याण का आर्थिक और गैर-आर्थिक कल्याण में वर्गीकरण कल्याण विश्लेषण के आधार को बहुत अवास्तविक बना देता है।
  5. पीगू के कल्याण अर्थशास्त्र की सबसे अधिक आलोचना, सामाजिक कल्याणकारी फल प्राप्त करने के लिए व्यक्तिगत उपयोगिता फलनों के गणनात्मक योग की अवास्तविक मान्यता है।
  6. पीगू की कल्याण की शर्तें राष्ट्रीय आय से सम्बन्धित है, किन्तु राष्ट्रीय आय को निर्धारित करना आसान नहीं है।
  7. कल्याणकारी अर्थशास्त्र नीतिशास्त्र से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं, किन्तु पीगू ने इसे स्पष्ट नहीं किया।

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