जे. एस. मिल के परम्परावादी विचार

मिल के परम्परावादी विचार

जे. एस. मिल के परम्परावादी विचार

मिल के संस्थापित या परम्परावादी सम्प्रदाय का अन्तिम विचार स्वीकार किया जाता है। उसने न केवल परम्परावादी सिद्धान्तों (Classical Theories) को स्वीकार किया बल्कि उनकी कमियों को दूर करके उन्हें वैज्ञानिक रूप प्रदान किया है। मिल ने संस्थापित अर्थशास्त्र के जिन सिद्धान्तों को स्वीकार किया है। उनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं-

  1. माँग एवं पूर्ति का सिद्धान्त –

    संस्थापित अर्थशास्त्रियों ने मूल्य निर्धारण सम्बन्धी अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत किये थे जिनमें माँग एवं पूर्ति सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। माँग एवं पूर्ति के इस सिद्धान्त को मिल ने वैज्ञानिक रूप प्रदान करने के लिए इस सिद्धान्त में कुछ आवश्यक संशोधन किये। संस्थापित अर्थशास्त्रियों ने केवल इतना ही बताया कि किसी वस्तु का मूल्य उसकी माँग एवं पूर्ति द्वारा निर्धारित होता है, उन्होंने यह नहीं बताया कि मूल्य किस स्थान पर निर्धारित होता है? इस कमी को दूर करते हुए मिल ने बताया कि वस्तु का मूल्य उस स्थान पर निर्धारित होगा जहाँ पर वस्तु की माँग एवं पूर्ति समान हो जाती है। यह स्थान साम्य बिन्दु कहलाता है और इस बिन्दु पर जो मूल्य निर्धारित होता है उसे साम्य मूल्य (Equilibrium Price) कहते हैं। मिल के मूल्य को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया है-

सामान्य मूल्य (Normal price) और बाजार मूल्य (Market price) – मिल का सामान्य मूल्य से तात्पर्य उत्पादन लागत से था और बाजार मूल्य से तात्पर्य उस मूल्य से था जिस पर बाजार में वस्तुएँ बेची जाती हैं। मिल ने यह भी बताया कि सामान्य मूल्य स्थिर रहता है, जबकि बाजार मूल्य सामान्य मूल्य से कम या ज्यादा हो सकता है।

  1. मजदूरी का सिद्धान्त –

    मिल का मजदूरी का यह सिद्धान्त मजदूरी के कोष सिद्धान्त (Wages fund theory) के नाम से विख्यात है। यद्यपि मिल के पूर्व एडम स्मिथ एवं रिकार्डों ने इस सिद्धान्त की ओर इशारा किया था परन्तु वे इस सिद्धान्त को वैज्ञानिक रूप प्रदान न कर सके। मिल ने माँग एवं पूर्ति के नियम को ही मजदूरी के निर्धारण में भी लागू किया है। उनका विचार है कि अस्थायी मजदूरी श्रम की माँग एवं पूर्ति द्वारा दीर्घकालीन मजदूरी जीवन निर्वाह व्यय द्वारा निर्धारित होती है। मिल के अनुसार श्रमिकों की पूर्ति जनसंख्या के आकार पर निर्भर करती है जबकि श्रमिकों की माँग उस कोष के आकार पर निर्भर करती है जो श्रमिकों को पुरस्कार देने के लिए मालिकों द्वारा रखा जाता है। यदि श्रमिकों की पूर्ति स्थिर है तो मजदूरी कोष के आकार में परिवर्तन के अनुसार मजदूरी में भी परिवर्तन हो जाता है अर्थात् कोष बढ़ने पर मजदूरी बढ़ जाती है और कम होने पर मजदूरी घट जाती है। इस समीकरण को निम्नलिखित समीकरण द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता है –

मजदूरी = मजदूरी कोष / जनसंख्या
  1. लगान का सिद्धान्त-

    मिल ने रिकार्डों के लगान सिद्धान्त का समर्थन किया और इसे अधिक व्यापक बनाया। रिकार्डों के अनुसार यदि विभिन्न उर्वरा शक्ति के भूमि के दो टुकड़ों पर समान लागत लगायी जाती है तो अच्छे टुकड़े के उत्पादन में आधिक्य होता है। वही अच्छी भूमि का लगान होता है और कम अच्छी भूमि का मूल्य उसके उत्पादन लागत के बराबर होता है। इस बात को मिल ने स्वीकार किया तथा साथ ही उसने यह भी बताया कि यह विशेषता केवल भूमि में ही नहीं, वरन् श्रम और प्रबन्ध में भी यह प्राकृतिक योग्यता विद्यमान है। इस प्रकार मिल ने रिकार्डों के लगान सिद्धान्त में योग्यता तत्त्व जोड़ दिया। मिल का विचार है कि जिस प्रकार विभिन्न भूखण्डों की उर्वराशक्ति में अन्तर होता है, उसी प्रकार व्यवस्थापकों की कार्यकुशलता में भी अन्तर होता है। अधिक कुशल व्यवस्थापक अपेक्षाकृत कम कुशल व्यवस्थापक से अधिक बचत प्राप्त कर सकता है, क्योंकि कुशल व्यवस्थापक कम कुशल उत्पादक के उत्पादन मात्रा अपेक्षाकृत कम लागत पर प्राप्त कर सकता है। अपने इसी विचार को मिल ने इस प्रकार व्यक्त किया है, “अतिरिक्त लाभ जिसे कोई उत्पादक या व्यवसायी अपनी व्यवसाय सम्बन्धी विशेष योग्यताओं या उत्तम व्यवस्थाओं के कारण प्राप्त करता है।” रिकार्डों के लगान सिद्धान्त में मिल ने कुछ महत्त्वपूर्ण विचारों का समावेश किया है। मिल ने लिखा है कि “भूमि के स्वामी लगान इसलिए प्राप्त करते हैं कि भूमि एक वस्तु है जिसे बहुत से व्यक्ति चाहते हैं परन्तु इसे केवल भूमि के स्वामियों से ही प्राप्त किया जा सकता है।”

  2. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का सिद्धान्त –

    एडम स्मिथ तथा रिकार्डो के समान जे.एस. मिल भी स्वतन्त्र अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का समर्थक था। रिकार्डों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के तुलनात्मक लागत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। मिल ने रिकार्डों के तुलनात्मक लागत सिद्धान्त में कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार किये हैं। प्रथम मिल ने लागत व्यय को हटाकर उसके स्थान पर आयात की गई वस्तुओं के मूल्य और निर्यात की गयी वस्तुओं के मूल्य की तुलना को महत्त्व दिया है। दूसरे मिल ने तुलनात्मक लागत सिद्धान्त के आधार पर की है जो अधिक स्पष्ट है। तीसरे रिकार्डों ने केवल यह स्पष्ट किया था कि वस्तुओं के विनिमय की सीमाएँ क्या हैं? वह इस बात को निश्चित न कर सके कि उच्चतम और न्यूनतम सीमाओं के मध्य विनिमय दर किस बिन्दु पर निर्धारित होगी। मिल ने स्पष्ट कर दिया कि दोनों देशों के मध्य विनिमय दर उच्चतम एवं न्यूनतम निर्धारित विनिमय दरों के औसत के बराबर होगा। चौथे, सन्तुलन विनिमय दर पर दोनों देशों की एक दूसरे के वस्तु के लिए परस्पर माँग समान होनी चाहिए अर्थात् विनिमय दर दोनों देशों का भुगतान सन्तुलन अनुकूल रहना चाहिए।

  3. स्वहित का सिद्धान्त-

    इस सिद्धान्त का प्रतिपादन अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ ने किया था। स्मिथ का मत है कि मनुष्य अपना हित स्वयं जानता है और अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए वह उन सभी कार्यों को करता है जो उसके हित की पूर्ति करते हैं। इस प्रकार से मनुष्य की आर्थिक क्रियाएँ स्वहित से संचालित होती हैं। एडम स्मिथ के इस विचारधारा का कुछ आलोचकों ने विरोध करते हुए बताया कि स्वहित स्वार्थपरता को जन्म देती है। व्यक्तिगत और सामाजिक हित एक दूसरे के पूरक नहीं बल्कि विरोधी हैं। अतः सामाजिक कल्याण में वृद्धि व्यक्तिगत हितों को त्यागे बिना सम्भव नहीं है। मिल ने इन आलोचकों का विरोध किया और बताया कि यह आवश्यक नहीं कि व्यक्तिगत हित की पूर्ति करने से सामाजिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। यदि कोई व्यक्ति अपना हित करता है तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वह दूसरों का अहित कर रहा है। मिल ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिवाद किसी भी प्रकार से सहानुभूति को पृथक नहीं करता। उसने यह भी बताया कि सम्पूर्ण त्याग द्वार दूसरों का हित चिन्तन करना भी न्यायसंगत नहीं है।

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