पवन द्वारा निर्मित प्रकृतियाँ

वायु द्वारा निर्मित प्रकृतियाँ

वायु द्वारा निर्मित प्रकृतियाँ

  1. क्षत्रक-

    मरुस्थली प्रदेशों में वायु के क्रियाकलाप से बहुत-सी शैल ‘क्षत्रक’ नामक पौधे की भांति प्रतीत होने लगती हैं। शैलों के इस प्रकार की बनावट को छत्रक (Mushroom) कहते हैं। जोधपुर (राजस्थान) के पास ग्रेनाइट का एक छत्रक है, इन्हें सहारा मरुस्थल में नाटा (Gore) कहते हैं। ये प्राकृतिक वायुं के खुरचाव, नाली निर्माण तथा अवखनन (Downcutting) से बनती हैं। इसके आधार पर स्थित एक पतले स्तम्भ पर एक सपाट चट्टानी खण्ड स्थित रहती है। यह प्राकृतिक बनावट श्रृंग भी कहलाती है।

  2. ज्युगेन-

    जहाँ मुलायम परतों के ऊपर कड़ी परत का आवरण होता है और जब ऊपर की कड़ी परत वायु के अनवरत झोकों से कट जाती है तो नीचें की मुलायम शैल शीघ्रता से कट जाती हैं। कभी-कभी चट्टानी आधार कटकर नष्ट हो जाता है और सम्पूर्ण शैल टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है। इस कटकों को ज्युगेन (Zeugen) कहते हैं।

  3. यारडांग (1980)-

    जब वायु एक ही दिशा में सदैव चलती है और कठोर एवं मृदुल शैलों की पट्टियाँ प्रवाहित वायु के समानान्तर स्थित होती हैं तो दृश्यभूमि का आकर तथा रूप विचित्र हो जाता है और सपाट चट्टानी खण्ड का रूप कटक एवं खांच-सा (ridge and furrow) अनियमित बन जाता है और कालान्तर में सम्पूर्ण प्रदेश चट्टानी पसलियों की भाँति प्रतीत होता है। खम्भों की भाँति अधिक कटे तथा असमान आकार के खड़े किनारे मध्य एशिया के मरुस्थल में यारडांग कहलाते हैं। इनकी ऊँचाई 16 मीटर तक होती है, किन्तु चौड़ाई कई सौ मीटर तक हो सकती है और ये संकरे अन्तराल द्वारा, (जिनसे होकर तीव्र वायु बहती है), एक-दूसरे से अलग हो जातें हैं।

  4. द्वीपाभ गिरि-

    वायु एवं जल के सामूहिक कार्य से शैलों के आधार पर समतल मैदान उपस्थित हो जाते हैं और धरातल पर नालियाँ बन जाती हैं। ऐसे प्रदेशों में यत्र-तत्र शैलें टीले की तरफ खड़ी रह जाती हैं, ये आकृतियाँ दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, युगांडा आदि देशों में अधिक दृष्टिगोचर होती हैं। राजस्थान की मरुस्थल में अधिक पाये जाते हैं, इनकों द्वीपाभ गिरि (Inselberg) कहते हैं। ये मरुस्थल में छोटी-छोटी तीव्र ढाल की पहाड़ियाँ हैं, जिनका आकार पिरामिड तथा गुम्बद की तरह होता है। ये प्रायः ग्रेनाइट शैलों में बनती हैं। भारत में रायपुर (मध्य प्रदेश) के पास कूपघाट में ये पहाड़ी द्वीप मिलते हैं। अपरदन के पश्चात् द्वीपाभ गिरि की आकृति विचित्र हो जाती है।

  5. त्रिकोटिका-

    मरुस्थलों में पड़े हुए चट्टानी टुकड़ों का ऊपरी भाग वायु के प्रहार से घिसकर चिकना हो जाता है या उनमें खरोचें पड़ जाती हैं। ये चट्टानी टुकड़े उलट जाते हैं या वायु की दिशा बदल जाने पर तीव्र नुकीले किनारेदार नगीने के पहल बन जाते हैं। इन पर विभिन्न प्रकार की नक्काशी मिलती है ये प्रायः तीन पार्श्व वाले शिलाखण्ड होते हैं। इस प्रकार की चट्टानी टुकड़ों को त्रिकोटिका (Dreinkanter ) अथवा तिपहल (Ventifacets) कहते हैं। ये प्रायः सहारा में पाये जाते हैं।

  6. भू-स्तम्भ-

    वायु तथा जल के संयुक्त प्रभाव से शैल-स्तम्भ (Earth pillars) भी बन जाते हैं, जिनके शिखर पर गोलाकार शैल स्थित रहती है। इन्हें भू-स्तम्भ (Hoods या domolsillers) कहते हैं।

  7. शिला-जालक-

    वायु में उड़ते हुए धूलि कणों के प्रहार से मार्ग में स्थित कोमल एवं कठोर शैलों के कोमल भाग कटकर उड़ जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वह शिला जालीदार सी हो जाती है। इसे शिला- जालक (Stone lattice) कहते हैं। राकी पर्वत में बालुआ स्तर की जालीदार शिलाएँ मिलती हैं। बलुआ पत्थर के विस्तृत क्षेत्र का वायु द्वारा तीव्र अपरदन के कारण शिला-चूर्ण बिखर जाता है और चट्टानी टुकड़ों का पथरीला मरुस्थल बन जाता है।

वायु का परिवहन

वायु द्वारा धरातल से ढीले-ढाले कणों का परिवहन होता है। रेत या कण एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़ाकर ले जाये जाते हैं। हल्के एवं सूक्ष्म कण वायु में लटके रहते हैं और उनका परिवहन इसी दशा (वायु की) में होता है। बड़े आकार के भारी कण धरातल पर लुढ़कते जाते हैं, किन्तु मध्यम आकार एवं भार के कण कभी वायु में उड़ते हुए तथा कभी लुढ़कते हुए परिवहित होते हैं। ये क्रियाएँ वायु के वेग पर निर्भर करती हैं।

बारीक धूलि के कण वायु द्वारा मरुस्थली सीमा के बाहर, अपनयित किये जाते हैं और लोएस (Loeses) के रूप में निक्षिप्त किये जाते हैं। सहारा की लाल रेत उत्तरी इटली में पहुँच जाती है और जब वर्षा के साथ धरातल पर गिरती है तो यह रक्त वर्षा (Blood rain) कहलाती है। वायु की परिवहन शक्ति नदी से अनेक गुनी अधिक होती है। वायु अपवाहन (Deflation) की क्रिया जोते हुए खेतों तथा कछारी मैदानों में बहुत होती है। समुद्र-तटीय भागों में निम्न ज्वार के समय वायु द्वारा सूखे कण स्थल की ओर बहा लिये जाते हैं। वायु अपवाहन से निर्मित गड्ढे जब जलसंयुक्त शैल तक पहुँच जाते हैं तो दलदल या मरुद्धान (Oasis) पैदा हो जाते हैं।

वायु द्वारा निक्षेपण के कार्य

वायु द्वारा उड़ाये गये रेत या धूलि के कण वायु के मन्द होने पर धरातल पर एकत्र हो जाते हैं। वायु के मार्ग में अवरोध उपस्थित होने पर निक्षेपण होता है। कभी-कभी यह निक्षेपण अस्थायी होता है जो वायु के झोकों द्वारा दूर हटा दिया जाता है। किन्तु अधिकतर निक्षेपण स्थायी होते हैं। इन्हें

बातोढ़ निक्षेप (Acolian deposits) कहते हैं। वायु देव एयोलस के नाम पर यह नामकरण हुआ है। ये निक्षेप शैलों के कणों के आकार एवं भार के अनुसार क्रमबद्ध होते हैं। भारी कण निकट और हल्के कण दूर तक परिवहित होते हैं। जिन प्रदेशों में अपरदन अधिक होता है, वहाँ पथरीले मरुस्थल बन जाते हैं और जहाँ निक्षेपण अधिक होता है वहाँ बालू तथा लोएस के मरुस्थल बन जाते है। इनकी बनावट पैतृक शैल की बनावट तथा निक्षेप्य पदार्थों की क्रमिक व्यवस्था पर निर्भर करती है।

बालू टिब्बा

बालू के एकत्र होने से बालुका-टिब्बा का निर्माण होता है। इनकी रचना के लिये बालू की प्रुचुरता, बालू संचयन के लिए स्थान, वायु का तीव्र वेग तथा वायु-मार्ग में अवरोध आवश्यक होते हैं। बालू की अनन्त रासि मरुस्थलों, नदी तलों तथा सागरीय तटों पर मिलती हैं, इसलिए इन्हीं प्रदेशों में बालुका स्तूपों की भरमार रहती है।

बालू की प्रचुरता धरातल की शैलों की बनावट पर निर्भर करती है। शुष्क प्रदेशों में बालुका-स्तर की अधिकता होती है। जहाँ चूने की शैलें अधिक हैं अथवा जहाँ शैल पत्थर का बाहुल्य रहता है वहाँ बालू-कणों की कमी से बालुका टिब्बों का अभाव होता है। इसी कारण नेवादा राज्य (स. रा. अमरिका) में शुष्क जलवायु होते हुए भी बालुका टिब्बा नहीं हैं।

झाड़ियाँ, इमारत तथा प्रक्षिप्त शैलें अवरोध का कार्य करती हैं। अवरोध की प्रकृति के अनुसार बालुका टिब्बा की रचना समै अथवा विषम होती है। इनका रूप बालू की मात्रा एवं वायु-वेग पर निर्भर करता हैं।

जब बालुका-टिब्बा का धरातल अव्यवस्थित होता है तो इन्हें बालू-टिब्बा (Sand hills) कहते हैं। मरुस्थलों में 30 मीटर से 90 मीटर ऊँचाई के बालुका-टिब्बा पाये जाते हैं। प्रत्येक मरुस्थल का एक-तिहाई से लेकर एक-चौथाई तक का क्षेत्र बालुका-टिब्बों में आच्छादित रहता है। संसार में सबसे अधिक बालुका टिब्बा वाला देश अरब है, जहाँ धरातल के एक-तिहाई भाग में बालुका-टिब्बा है। सहारा मरुस्थल के नवें भाग पर ही बालुका राशि है और शेष भाग पर शिला-खण्ड, वायु विरचित पाषाण-खण्ड तथा आधार शैल बिखरे पड़े हैं।

बनावट की दृष्टि से विचार करने पर बालुका-टिब्बा में पवनाभिमुख (Windward ride) की ओर लम्बा तथा उत्तल मन्द ढाल और पवन-विमुख दिशा (Leeward side) की ओर खड़ा तथा अवतल अधिक ढालू रहता है। इसमें पवन-विमुख दिशा में पवन भँवर (Wind edby) से बालू राशि में गुफा सी बन जाती है जो सर्पण सतह (Ship face) भी कहलाती है। पवनभिमुख ढाल पर बालू के कण वायु द्वारा शीर्ष की ओर सरका दिये जाते हैं जो पवन-विमुख ढाल पर अधिक कोणिका झुकाव के साथ एकत्र हो जाते हैं। बालू के कण पवन-विमुख ढाल पर जिस कोण पर रुकते हैं, वह घर्षण कोण (Angle of repose) कहलाता है। यह झुकाव 200 से 400 होता है। पवन-विमुख ढाल पर बालू की हल्की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ दृष्टोगोचर होती हैं और धीरे-धीरे इसका विस्तार तथा आकार बढ़ता जाता है, क्योंकि इनके पवन-विमुख ढाल पर वायु के भंवर से बालू के कण शीर्ष के दोनों ओर फैल जाते हैं और बालूका-टिब्बों का आकार अर्द्ध-चन्द्राकार तथा लम्बा हो जाता है। यदि वायु चारों ओर से चलती है तो टीले का आकार गोल बन जाता है। इस प्रकार विभिन्न परिस्थितियों में बालुका-टिब्बों का आकार कहीं गोल, कहीं नवचन्द्राकार और कहीं चपटा होता है।

समुद्र तट पर भी बालू के टीले पाये जाते हैं। फ्रांस में विस्के की खाड़ी के तट पर ये लैण्डीज (Landes) कहलाते हैं। भारत में बालेश्वर तथा पुरी के दक्षिणी भाग में भी तटीय बालू के टीले पाये जाते हैं। आकर के आधार पर बालुका-टिब्बा तीन प्रकार के होते हैं।

  1. अनुदैर्ध्य बालुका-टिब्बा-

    ये टीले मरुस्थली तथा आर्द्र दोनों प्रकार के क्षेत्रों में बनते हैं। इनकी उत्पत्ति बालू की महान राशि तथा वनस्पति के अभाव से होती है। इसमें बालू के कणों का एकत्रीकरण श्रेणी की भाँति लम्बवत् होता है। ये श्रेणियाँ प्रायः समान्तर होती हैं और दाँत का आकार प्रस्तुत करती हैं। सहारा के मरुस्थल में सीफ कहलाती हैं। भारत की मानसूनी वायु द्वारा समुद्री तटों पर भी इस प्रकार के टिब्बे बनते हैं। इस प्रकार के बालुका-टिब्बे का निर्माण वायु की दिशा के अनुकूल होता है। इसमें वायु प्रबल होती है। इनका अस्तित्व टेढ़े-मेढ़े तथा भिन्न बालुका-टिब्बों के संशोधन से ही सम्भव होता है।

  2. अनुप्रस्थ बालुका-टिब्बा-

    इनका विस्तारं वायु की दिशा के लम्बवत् होता है। इनकी रचना गहरे बालूमय देश में हल्की वायु द्वारा होती है। नदी और झील के तटों पर भी ये बहुधा मिलते हैं। टिब्बों के समान्तर कतारों के मध्य एक छोटी पट्टी होती है, जिसमें वायु के हल्के भंवर पैदा हो जाते हैं जो बारीक बालू को उड़ाकर मध्य भाग को गहरा करते रहते हैं। इनका मन्द ढाल वायु की दिशा में और खड़ा ढाल प्रतिपाती दिशा में होता है। विशाल बालुका राशि के उड़ने से प्रायः पूरी वनस्पति नष्ट हो जाती है। दो बालुका-टिब्बों के मध्य की पतली-पट्टियों में थोड़ी वनस्पति मिलती है। जहाँ पर बालुका टीला अकेला होता है, वहाँ निरन्तर एक दिशा से बहाने वाली हवा टीले के दोनों पानी को टीले के नुकीले और लम्बे दो सिरे बना देती हैं। इसका ढालु पवनाभिमुख की ओर उत्तल और पवन-विमुख की ओर अवतल होता है। ऐसे टीले चापाकार टिब्बा (Barchan) कहलाते हैं। ये धन्वाकार होते हैं। ये वृहत् लहरों की भाँति आगे बढ़ते हैं। ये मध्यम कोटि के टिब्बे हैं। ‘बर-कान’ अरबी भाषा का शब्द हैं, जिसका अर्थ अर्द्ध-चन्द्राकार होता है। वास्तव में दिब्बे अनुदैर्ध्य तथा अनुप्रस्थ टिब्बे की मुख्य विशेषता रखते हैं।

  3. परवलयिक बालू-टिब्बा-

    हाक महोदय ने परवलयिक बालू-टिब्बा (Parabolic sand dunes) को भी अलग प्रकार का माना है। इस प्रकार के बालू-टिब्बों में पवनाभिमुख ढाल पर मन्द ढाल होता है या घर्षण के फलस्वरूप इस पर गड्ढे बन जाते हैं। पवना – पवनाभिमुख ढाल तीव्र होता है जहाँ बालू कणों का निक्षेप होत है। समुद्रतटीय भागों के वातग टिब्बे इसके उदाहरण हैं। ये टिब्बे (Blow out dunes) स्थल की ओर खिसकते हैं। इनके ऊपरी भाग में अपवाहन से तश्तरीनुमा गड्ढे बन जाते हैं और रेत का निक्षेप कगार की तरह होता है।

वायु परिवहन के लक्षण

वायु द्वारा परिवहन कुछ किमी. से लेकर कई हजार किमी. दूर तक हो सकता है। वायु परिवहन में निम्नलिखित लक्षण देखने को मिलते हैं-

  1. वायु परिवहन भू-सतह पर अधिक सक्रिय रहता है। साथ ही वायुमंडल के निम्न स्तर में भी वायु परिवहन सम्पन्न होता रहता है।
  2. वायु परिवहन की दिशा अनिश्चित होती है।
  3. बड़े-बड़े टुकड़ों का परिवहन धीरे-धीरे होता है, जबकि महीन कणों का परिवहन एक ही बार में अपेक्षाकृत अधिक दूर तक हो जाता है।
  4. वायु द्वार परिवहन अन्य कारकों की अपेक्षा अधिक दूरी तक सम्भव होता है।

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