विभंग एवं भ्रंश (Fracture & Fault)

विभंग एवं भ्रंश

विभंग और भ्रंश क्या है ?

विभंग (Fracture)

जब पृथ्वी की सतह पर तनाव के कारण क्षैतिज भू-संचलन होता है, तो उससे पृथ्वी की सतह चटकने लगती है। इससे बिना स्थान परिवर्तन के ऊपरी तल पर दरारें पड़ जाती हैं। इसका प्रभाव सिर्फ ऊपरी सतह तक ही सीमित रहता है। जब तनाव अधिक बढ़ने लगता है तो चट्टानें निश्चित तल के सहारे टूटने लगती हैं। यदि ऐसी चट्टानें अपना स्थना नहीं बदलें तो वहाँ सन्धियाँ (Joints) पड़ जाती हैं। जिस तल के सहारे ऐसी चट्टाने टूटती हैं उसे विभंग तल कहते हैं। चट्टानों में खनिजों की बनावट एवं संरचना की एकरूपता एवं विविधता के आधार पर ही विभंग तल का स्वरूप बनता बदलता है। इसी कारण चूने का पत्थर, ग्रेनाइट, संगमरमर जैसे पत्थरों के विभंग सरल होंगे एवं वहाँ सन्धियाँ लम्बी व समकोण पर होगीं, जबकि बलुआ पत्थर, गेब्रो, कोग्लोमरेट, पेग्मेटाइट जैसी चट्टानों की सन्धियाँ विविध आकृति वाली शंकाभ या अन्य आकार की होंगीं। इनका विभंग तल इसी कारण जटिल बना रहेगा। इस प्रकार संक्षेप में, जब तनाव द्वारा भूतल पर चट्टानों पर प्रभाव तो पड़े, किन्तु उससे चट्टानों का स्थान परिवर्तन न हो, अर्थात् भू-संचलन नहीं होता है तो इसे विभंग कहते हैं, किन्तु जब विभंग तल के सहारे चट्टानों में स्थान परिवर्तन होने लगता है और विभंग एवं चटक या दरार का प्रभाव गहराई तक होता है तब उस क्रिया को भ्रंश या भ्रंशन (Fault of Faulling) कहते हैं।

भ्रंश (Fault)

जब चट्टान में तनाव वृद्धि के कारण फटन के साथ-साथ परिवर्तन भी होने लगता है, अथवा जब तनाव एवं सम्पीडन की तीव्रता के कारण चट्टानें टूटकर दूर तक खिसकती हैं या उनमें विस्थापन (displacement) होता है तो उसे भ्रंश (Fault) कहते हैं। होम्स के अनुसार, “जिस सतह या तल के सहारे भ्रंश होता है उसे भ्रंश या विभंग तल (fault plane) कहते हैं। प्रश तल किसी भी दिशा में एवं किसी भी कोण पर हो सकता है। भ्रंश नति या भ्रंश नमन (fault dip) प्रभावित भूतल के क्षैतिज एवं भ्रंश के बीच कोण को कहते हैं। भ्रंश से सम्बन्धित निम्न शब्दावली का ज्ञान भी भ्रंश को समझने के लिए आवश्यक है-

  1. उत्क्षेपित या ऊपरी खण्ड (Up thrown side) –

    भ्रंश तल से ऊपर की ओर उठे भाग को ऊपरी या उत्प्रेषित खण्ड कहते हैं।

  2. अधः क्षेपित या निचला खण्ड (Down thrown side) –

    भ्रंश तल से नीचे की ओर के भाग को निचला या अधः क्षेपित खण्ड कहते हैं।

  3. पाद भित्ति या निचली दीवार (Foot wall) –

    भ्रंश की ऊपरी दीवार को शीर्ष भित्ति एवं अधःक्षेपित या निचले खण्ड से निचली दीवार को पाद भित्ति या निचली दीवार कहत हैं।

  4. भ्रंश कगार (Fault scrap)-

    भ्रंश के जिस खण्ड में भृगु जैसा या तेज ढालू भाग पाया जाए तो उस खड़े ढाल वाले भाग को भ्रंश कगार कहते हैं। वैसे कगार अपरदन क्रिया से भी कहीं बन सकता है।

भ्रंश के प्रकार (Types of Fault)

भ्रंश मुख्यतः भ्रंश तल की विविधता एवं वहाँ बनी आकृति के अनुसार विशेष नाम से पुकारते जाते हैं। मुख्य प्रकार के भ्रंश निम्नलिखित हैं-

विभंग एवं भ्रंश

  1. सरल या सामान्य भ्रंश (Simple of Normal Fault)-

    किसी क्षेत्र की चट्टान जब भ्रंश तल के सहारे विपरीत दिशा में खिसकती है अथवा एक सामान्य भाग भ्रंश तल के सहारे खिसकता है तो उसे सामान्य भ्रंश कहते हैं। इसमें तल का नमन या तो कगार जैसा या तेज ढालों वाला होता है। ऊपरी भाग को भ्रंश कगार (Fault Scrap) कहते हैं। इसकी ऊँचाई सैकड़ों मीटर तक हो सकती है।

  2. विपरीत या उत्क्रम भ्रंश (Reverse Fault)-

    इसे उत्क्रम या क्षैतिजिक भ्रंश (Thrust fault) भी कहते हैं। इसमें सम्पीडन की क्रिया विशेष महत्वपूर्ण रहती है। इस क्रिया में चट्टान में दरार पड़ने के पश्चात्, दोनों चट्टानी भाग या दोनों खण्ड आमने- सामने खिसकते हुए एक-दूसरे की ओर बढ़ते हैं। इसप प्रकार का एक भाग दूसरे पर छाया हुआ दिखाई देता है। इसमें भ्रंश कगार वास्तव में लटकती दीवार (Hanging Wall) की भांति दिखाई देता है।

  3. समानान्तर या सोपानी भ्रंश (Parallel or step Fault)-

    जब खिंचाव के अतिरिक्त तीव्र सम्पीडन की क्रिया बार-बार प्रभावी हो तो सम्पीड़न की अधिकता से वहाँ थोड़ी-थोड़ी दूरी पर समानान्तर भ्रंश तल पर दरारें पड़ेगी। ऐसे स्थान पर सीढ़ीनुमा भ्रंशों का विकास होगा। ऐसे भ्रंश की क्रिया अपवाद स्वरूप ही होती है। इसमें कगार बहुत छोटे-छोटे होते हैं, क्योंकि भ्रंश तल के मध्य दूरी कम रहती है। पर्वत निर्माण की जटिलता बढ़ने पर ऐसे भ्रंश का विकास हो सकता है।

  4. नमन या नति भ्रंश (Dip Fault)-

    जब किसी भ्रंश की क्रिया के समय चट्टानें नमन की दिशा में, अर्थात् क्षैतिज के सहारे कुछ डिग्री का कोण बनाकर खिसकें तो उसे नमन भ्रंश कहते हैं। ऐसे भ्रंश कायान्तरित या परतदार चट्टानों में अधिक विकसित होते हैं।

  5. नतिलम्ब भ्रंश (Strike Fault)-

    इसमें भ्रंश तल के सहारे क्षैतिज दिशा में ही चट्टानें खिसकती या सरकती हैं, अतः इसमें कगार या तो पाए ही नहीं जाते या नाममात्र के मिलते हैं। अतः ऐसे भ्रंशों के विकास में पृथ्वी की सतह की चट्टानें काफी गहराई तक एक-दूसरे से रगड़ खाती हुई किनारों या भ्रंश तल पर खिसकती हैं, अतः यह भ्रंश की एक विशेष स्थिति भी हैं।

  6. तिर्यक या तिरछे भ्रंश (Oblique or Tear Fault)-

    ऐसे भ्रंशों का विकास भूकम्प एवं ज्वालामुखी प्रभावित क्षेत्रों में अधिक होता हैं। इसमें लम्बवत् एवं क्षैतिज दोनों प्रकार से चट्टानों में भ्रंश तल के सहारे खिसकाव हो सकता है। इसमें भ्रंश तल तिरछा या वक्राकार या विषम रचना वाला रहता है। पर्वतीय घाटियों में भी चट्टानें खिसकने से अंश तल पर ऐसे भ्रंश बन सकते हैं।

  7. अधिक्षेप भ्रंश एवं ग्रीवा खण्ड (Overthrust Fault and Nappe)-

    जब सम्पीडन का दबाव बहुत अधिक बढ़ जाता है तो चट्टानों का एक खण्ड एक ओर से आगे बढ़कर भ्रंश तल को आगे उछालकर आगे की ओर के चट्टानी भाग पर पड़ जाता है तो ऐसे भ्रंश का विकास होता है। इसकी अगली अवस्था ग्रीवा खण्ड का विकास है। इसका वर्णन वलन के प्रकार के साथ भी संक्षेप में दिया गया है।

भ्रंश से बनी स्थलाकृतियाँ

भ्रंश से मुख्यतः ब्लाक या भ्रंशोत्थ पर्वत, दरार घाटी एवं विशेष दशा में अंश कगार का विकास होता है-

  1. ब्लाक या भ्रंशोत्थ पर्वत

    इसे जर्मन भाषा में हॉर्स्ट भी कहते हैं। जब भ्रंश क्रिया के द्वारा या तो दरारों के मध्य का भाग ऊपर उठ जाए अथवा मध्य भाग स्थिर रहे एवं भ्रंश तल के सहारे दोनों ओर की चट्टानें नीचे की ओर खिसक जाएँ तो ब्लाक पर्वत बनता है। इस प्रकार के पर्वत के दो ओर तेज ढाल एवं ऊपरी-तल समतल प्रायः होते हैं। यूरोप में वास्जेज, ब्लैक फोरेस्ट एवं हॉर्स्ट ब्लाक, संयुक्त राज्य अमेरिका में वासाच श्रेणी व सियेरा नेवादा, पाकिस्तान की साल्टरेंज इसके विशेष उदाहरण हैं।

  2. भ्रंश या दरार घाटी (Rift Valley)-

    भ्रंश या दरार घाटी के निर्माण में दो समानान्तर प्रायः भ्रंश काफी दूरी तक विकसित होते हैं। इके बीच का भाग नीचे धंस जाता है। इसी नीचे धंसे भाग को भ्रंश घाटी या दरार घाटी कहते हैं। अधिकांशतः ये घाटियाँ अधिक संकरी एवं पर्याप्त गहरी होती हैं। विश्व की सबसे लम्बी एवं आश्चर्यजनक दरार घाटी इजराइल व जोर्डन से प्रारम्भ होकर लाल सागर होकर पूर्वी अफ्रीका के ऊँचे पठारी भाग की पश्चिमी सीमा पर जाम्बिया तक लगभग 4,500 किमी. लम्बाई में फैली हुई है। इसमें अनेक झीलें एवं लाल सागर फैला है। इसी भाँति राइन नदी की घाटी भी दूसरी प्रसिद्ध भ्रंश घाटी है। यह घाटी 32 किमी. चौड़ी एवं 320 किमी. लम्बी है। जर्मनी में राइन घाटी, संयुक्त राज्य अमेरिका में डेथवेली, जार्डन में मृतसागर, आस्ट्रेलिया में स्पेन्सर की खाड़ी, भारत में नर्मदा व ताप्ती घाटी, जापान में फोसा मेगना, जावा व फिलीपीन्स के गर्त भ्रंश घाटियों के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। ग्रेबन (Graven) भ्रंश घाटी का छोटा रूप होता है। भ्रंश घाटी एवं ग्रेबन महासागरों की गहरी तली में भी खाइयों के रूप में गहरे गर्त के नाम से फैले हैं।

  3. भ्रंश कगार (Fault Scrap)-

    भ्रंश कगारों का निर्माण विशेष दशा में ऊंचे धरातल में एक ओर भ्रंश एवं धंसाव के कारण होता है। भारत में पश्चिमी घाट के किनारे का खड़ा ढाल भाग भ्रंश कगार का ही हिस्सा है, क्योंकि करोडों वर्ष पहले दक्षिण का पठार अधिक चौड़ाई में दूर पश्चिम तक फैला था, किन्तु महाद्वीपीय विस्थापन के समय पश्चिमवर्ती भाग एक विशाल दरार एवं भ्रंश तल के सहारे टूट गया। इसी कारण पश्चिमी घाट के समुद्र की ओर के खड़े ढालों को भ्रंश कगार कहते हैं। ऐसे भ्रंश कगार दक्षिणी अफ्रीका में कारू के सीढ़ीनुमा ढाल के सहारे भी पाए जाते हैं।

भ्रंश घाटियों के विकास सम्बन्धी विचारधाराएँ

भ्रंश घाटियों का निर्माण या विकास विद्वानों के लिए विशेष विचार या चिन्तन का विषय रहा है। इसी कारण इनके निर्माण के बारे में विद्वानों ने अपने विशेष विचार समय-समय पर प्रस्तुत किये हैं।

  1. तनाव पर आधारित विचारधारा-

    यद्धपि यह एक अधूरी एवं अस्पष्ट विचारधारा रही है, अतः वर्तमान में यह मान्य नहीं है। इसके अनुसार जिस प्रकार मेहराब के मध्य का पत्थर (Keystone) तनाव हटाने से वहाँ खड्ड पड़ जाता है, उसी प्रकार पृथ्वी पर तनाव बढ़ने से विशेष प्रभावित भाग में दरार पड़ने या मध्यवर्ती भाग के नीचे धंसने से वहाँ दरार या भ्रंश घाटी बन जाती है। इसे अब निराधार या कल्पित माना जाता है।

  2. सम्पीडन पर आधारित विचारधारा-

    कई विद्वानों, जिनमें स्मिथ, बेलेण्ड, विलिस आदि मुख्य हैं, ने भ्रंश घाटी के निर्माण की नवीन विचारधारा प्रस्तुत की। इसमें तनाव के साथ-साथ तीव्र सम्पीडन एवं दबाव के प्रभाव को विशेष महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसे सम्पीडन से प्रतिवलन (Overthrust) की क्रिया के समय अधिक्षेप भ्रंश के सहारे रिफ्ट ब्लॉक एवं भ्रंशोत्थ ब्लॉक (Rift Block and Horst Block) का निर्माण होता है। ऊपर उठे हिस्से ब्लॉक पर्वत कहलाते हैं एवं नीचे धंसने वाले भाग भ्रंश या दरार घाटी बनाते हैं। बाद में बिलार्ड महोदय ने इसमें सुधार कर अधिक मान्य विचारधारा प्रस्तुत की।

  3. बिलार्ड का मत-

    बिलार्ड ने अपना मत 1934 में प्रस्तुत किया। उसके अनुसार रिफ्ट घाटी का निर्माण कई अवस्थाओं में होता है। इसमें आमने-सामने से क्षैतिज संचलन से बीच भाग संचलित होकर उभार द्वारा ऊपर उठता है। जब सम्पीडन बढ़ता जाता है तो ऐसे उभार में विभंग व दरार पड़ जाती है। इसी से वहाँ दरार घाटी का निर्माण हो जाता है। दरार घाटी की चौड़ाई एवं विस्तार तथा ब्लॉक या भ्रंशोत्थ पर्वत का निर्माण सभी पदार्थों के संकलन एवं उन पर बढ़ते हुए सम्पीडन के सम्मिलित प्रभाव एवं बाद में भू-सन्तुलन के विकास की सम्मिलित क्रिया का परिणाम होते हैं।

बहिजीत शक्तियाँ (Exogenetic Forces)

जहां पूर्व वर्णित अन्तर्जात शक्तियाँ (Endogenetic forces) भूतल पर वलन (मोड़), भ्रंश, उत्थान एवं धंसाव आदि घटनाओं के द्वारा असमानताएँ एवं विषमताओं का विकास करती रही हैं, उसी के साथ-साथ भूतल पर ही बहिर्जात शक्तियाँ (Exogenetic forces) विविध प्रकार से अपक्षय व अपरदन एवं जमाव या निक्षेपण (Deposition or Aggradation) द्वारा ऊपर उठे हुए एवं ऊबड़-खाबड़ भागों का समतलीकरण (gradation) करती रही हैं। इस प्रकार इन दोनों ही शक्तियों का कार्य एक-दूसरे से पूर्णतः विपरीत होते हुए एक-दूसरे का पूरक एवं समन्यकारी हैं, क्योंकि दोनों ही शक्तियाँ समय-समय पर पृथ्वी की सतह पर होने वाली असन्तुलन की स्थिति को भू-सन्तुलन की आदर्श स्थिति के निकट भूतल या उसके क्षेत्र विशेष को लाने का प्रयास करती हैं।

अतः जहाँ अन्तर्जात शक्तियाँ निरन्तर विषमतांए पैदा कर देती हैं, वहीं ऐसे भागों में एवं अन्य बहिर्जात शक्तियाँ अपने कारकों (प्रवाहित जल, पवन, हिमानी आदि) के माध्यम से ऐसी विषमताओं का पुनः समतलीकरण करती रहती हैं।

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