संवलन व वलन (Warping & Folds)

संवलन और वलन (Warping & Folds)

संवलन और वलन (Warping & Folds)

संवलन (Warping )

जब दो या दो से अधिक क्षैतिजिक शक्तियाँ एक-दूसरे के आसमे-सामने क्रियाशील होती हैं। तो धरातल पर मोड़ (वलन) पड़ जाते हैं। यह मोड़ भी दो प्रकार से पड़ते हैं- एक वलन (folds), द्वितीय संवलन (warp)। संवलन के प्रभाव से धरातल के विस्तृत क्षेत्र में परिवर्तन होता है तथा धरातल का विस्तृत क्षेत्र लहर के समान ऊपर नीचे हो जाता है। इस परिवर्तन में धरातल का बड़ा भाग या तो ऊपर उठ जाए या नीचे धंस जाए। कभी-कभी इन क्षैतिजिक शक्तियों में धरातल का कोई भाग गुम्बद के आकार में ऊपर उठ जाता है, जिसका निर्माण उत्संवलन (upwarps) कहलाता है। संवलन के ऊपर उठे हुए भाग को भू-अपनति (geo-anticline) भी कहते हैं। कभी-कभी इसके द्वारा धरातलीय भाग नीचे की ओर भी धंस जाता है, जिससे गड्ढा या बेसिन बन जाता है। इसे अवसंलन (down warps) नाम दिया है। संवलन के नीचे धंसे हुए भाग को भू-अभिनति (geo-syncline) भी कहते हैं। जब संवलन क्रिया काफी बड़े क्षेत्र में होती है, उसे वृहद संवलन से सम्बोधित किया जाता है। ऐसी स्थिति में दोनों ही लक्षणों के ढाल धीमे रहते हैं।

वलन (Folds)

वलन पृथ्वी की आन्तरिक शक्ति द्वारा उत्पन्न क्षैतिजिक संचलन और सम्पीडन का परिणाम है। चट्टानों में सुविकसित लहरदार मोड़ ही वलन कहलाते हैं। भूतल के जिन-जिन भागों पर अवसादी शैलें बिछी हुई हैं वे प्रायः समतल स्तर में होती हैं। किन्तु भू-गर्भ की आन्तरिक शक्तियों के प्रभाव द्वारा उनमें सम्पीडन होने लगता है। अतः विपरीत दिशा में पड़ने वाले दबाव के कारण उनमें सिकुड़ने तथा मोड़ पड़ जाते हैं। फिच के अनुसार, “समतल परतदार शैलों के अधिक मात्रा में मुड़ जाने को ही वलन (Folds) कहा गया है।’ वलन के द्वारा शैलों का कुछ भाग ऊपर तथा कुछ भाग नीचे धंस जाता है।

वलन की संरचना (Structure of fold)

  • वलन की भुजा (Limb of the fold)-

    वलन के दोनों ओर के मुड़े हुए भाग वलन की भुजा कहलाते हैं।

  • वलन की अक्ष (Axis of the fold)-

    वलन की भुजाओं के मध्य अपनति के उच्चतम तथा अभिनति के निम्नतम भाग से गुजरने वाली कल्पित रेखा को वलन का अक्ष कहते हैं।

  • अपनति अक्ष तथा अभिनति अक्ष (Axis of anticline and syncline)-

    ये अपनति व अभिनति के आधार पर स्थित वलन अक्ष होते हैं।

  • अक्षीय तल (Axial Plane)-

    अभिनति व अपनति के मध्य स्थित कल्पित तल को अक्षीय तल कहते हैं।

धरातल के किसी भी भाग की संरचना को ज्ञात करने हेतु दो शब्दों का अर्थ समझना अति आवश्यक है। प्रथम नति अथवा नमन (Dip), द्वितीय नतिलम्ब अथवा अनुदैर्ध्य (Strike) ।

  • नति (Dip) –

    जब रूपान्तरण या परतदार शैलों का स्तर किसी क्षैतिजिक तल के सहारे कुछ अंश का कोण बनाते हुए पाए जाते हैं तो इस कोणीय झुकाव को नति कहते हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी शैल स्तर के क्षैतिजिक तल के सहारे 60° के कोण का झुकाव है और ढाल की दिशा दक्षिण या पश्चिम है तो शैल स्तर के नति को 60° दक्षिण या पश्चिम अंकित कर प्रदर्शित किया जा सकता है।

  • नति लम्ब (Strike)-

    नति लम्ब हमेशा नति के साथ 90° का कोण के साथ समकोण बनाने वाली रेखा उस झुके हुए स्तर की नति लम्ब रेखा कहलाती है।

  • अपनति (Anticlines)-

    भू-गर्भ के आन्तरिक बल क्षैतिजिक संचालन व शक्तियों द्वारा शैलों की सिकुड़न से उत्पन्न वलन के ऊपरी या उठे हुए भाग को अपनति कहा जाता है। अपनति में दोनों भुजाओं में चट्टानों के स्तरों का झुकाव विपरीत दिशा में रहता है। अत्यधिक दबाव या सम्पीडन से वलन इतना झुक जाता है कि इसका नति कोण अधिक कोण भी हो सकता है। अपनति के दोनों ढाल जब बराबर होते हैं तो उसे सममित अपनति (Symmetrical Anticline) और जब अपनति के दोनों ढाल असमान होते हैं तो उसे असममित अपनति (Asymmetrical Anticline) कहते हैं।

  • अभिनति (Syncline)-

    सम्पीडन के कारण जब चट्टानों के भाग नीचे की ओर मुड़ जाते हैं तो उसे अभिनति वलन कहते हैं। अभिनति के सिरे एक-दूसरे की ओर मुड़े हुए होते हैं, जो आपस में मिल भी जाते हैं। यदि अभिनति का मुड़ाव अधिक हो जाता है। तो उनकी आकृति डोंगी (canoe) जैसी हो जाती है।

  • अमपनति (Anticlinorium)-

    इस प्रकार की आकृति मुड़ावदार पर्वतीय भागों में पायी जाती है। इस आकृति के अन्तर्गत छोटी-छोटी अपनतियाँ पाई जाती हैं। इस क्षेत्र में क्षैतिजिक संचालन बिल्कुल नहीं होता। अनेक प्रकार के सम्पीडनों से यह आकृति बन जाती है। ये वलन पंखानुमा (Fan folds) होते हैं।

  • समभिनति (Synclionrium)-

    किसी विशाल अभिनति के मध्य असमान सम्पीडन के द्वारा छोटी-छोटी अपनतियाँ निर्मित हो जाती हैं, तो उस आकृति को समभिनति कहते हैं। इस समभिनति आकृति को पंखाकार वलन के अतिरिक्त व्यंजनाकार वलन भी कहते हैं।

वलन के प्रकार (Types of fold)

सम्पीडन की तीव्रता और शैलों की संरचना के आधार पर भूपटल पर कई प्रकार के वलन पड़ जाते हैं।

मुख्य वलन निम्नांकित प्रकार के होते हैं।

  1. सममित या सुडौल वलन (Symmetrical folds)-

    जब किसी वलन की दोनों भुजाओं का झुकाव या कोण एक समान हो तो उसे सममित वलन कहते हैं। इसकी भुजाएँ अक्ष रेखा पर लम्बवत् होती हैं। ऐसे वलन खुले हुए तथा सीधे होते हैं।

  2. असममित या बेडौल वलन (Asymmetrical folds)-

    जब किसी वलन की दोनों भुजाओं की लम्बाई व झुकाव का कोण समान नहीं होता तो उसे अससमित, अर्थात् बेडौल वलन कहते हैं। इसमें लम्बी भुजा का ढाल धीमा एवं छोटी भुजा का ढाल तेज होता है। इस प्रकार इनकी भुजाओं के झुकाव में स्पष्ट अन्तर बना रहता है।

  3. एकनत वलन (Monoclinal folds) –

    इसमें एक भुजा का झुकाव कम या ढाल धीमा होता है, जबकि दूसरी भुजा का झुकाव अधिक या प्रायः लम्बवत् (खड़ा) बना रहता है। ऐसे वलन की उत्पत्ति के समय सम्पीडन का वेग एक दिशा में ही बना रहा होगा। यदि यह वेग और भी तेज़ रहता है तो वलन की भुजा परिवलन का रूप ले सकती थी। इसे एकमति या एकदिग्नत वलन भी कहते हैं।

  4. समनत वलन (Isoclinal folds)-

    यदि वलन के विकास के समय दबाव आमने-सामने से, अर्थात् दोनों ओर से समान रहा हो तो ऐसे में वलन की दोनों भुजाओं के झुकाव का स्वरूप एक दिशा में रहेगा, अर्थात् दोनों ही भुजाएँ एक ही दिशा में झुककर प्रायः सामानान्तर हो जाती है। इन्हें ही समनत वलन कहते हैं।

  5. परिवलित वलन (Recumbent folds)-

    अधिक सम्पीडन के कारण जब वलन एक ही दिशा में तीव्र गति से रहते हैं, तो दोनों भुजाएँ बहुत अधिक झुककर धरातल से प्रायः समानान्तर या क्षैतिज दिशा में झुकी नजर आती हैं। ऐसे वलन को परिवलन वलन (बहुत अधिक झुकाव वाला मोड़) कहते हैं। ऐसी स्थिति विशेष दशा में ही कही-कहीं विकसित हो जाती है। इसे शयन वलन भी कहते हैं।

  6. पंखाकार वलन (Fan folds)-

    जब बहुत तीव्र सम्पीडन लम्बे समय तक चलता रहे एवं ऐसे में संकुचित हुए वलन एक साथ मेहराब की भाँति ऊपर उठ जाएँ तो ऐसे में पंखाकार वलन का विकास होता है। इसमें वलन अधिक संकुचित होने पर चटक सकते हैं या उनमें भ्रंश भी पड़ सकते हैं। इस प्रकार पंखाकार वलन विशेष मोड़ों का मेहराबदार मिश्रित ऐसा स्वरूप है जहाँ वलन एवं भ्रंश दोनों क्रियाएँ एक साथ होती हैं। कभी-कभी क्रमिक रूप से समपनित व समभिनति का विकास होने से दोहरे पंखाकार वलन या जटिल पंखाकार वलन बन जाते हैं।

  7. खुले वलन (Open folds)-

    वलन के विकास के समय दोनों भुजाओं के बीच का अभिनति तल पर कोण 90° से अधिक एवं 180° से कम हो तो उसे खुला वलन कहते हैं। प्रायः सुडौल या सममित वलन ऐसे ही होते हैं।

  8. बन्द वलन (Closed folds)-

    वलन के विकास के समय जब सम्पीडन अधिक होने से मोड़ अधिक पास-पास बनते हैं एवं भुजाओं का ढाल भी तीव्र रहता है। ऐसी स्थिति में वलन के बीच की भुजाओं का कोण 900 से कम या न्यूनकोण का होता है। इसे ही बन्द वलन कहते हैं।

  9. प्रति वलन (Over thrust folds)-

    जब वलन के विकास के समय सम्पीडन का दबाव इतना अधिक रहता है कि भुजाएँ झुकने के पश्चात् भी सम्पीडन को सह नहीं पातीं। इससे वलन की एक भुजा भ्रंशित होकर (टूटकर) क्षैतिज भुजा पर उलट कर छा जाती हैं। इस प्रकार इसमें वलन व भ्रंश दोनों ही प्रभावी होते हैं। इसे अधिक्षिप्त वलन भी कहते है।

  10. अवनमन वलन (Plunging folds)-

    ऐसे वलन विषम परिस्थितियों में ही विकसित हो पाते हैं, क्योंकि मोड़ की अक्ष, (axis) क्षैतिज के समान्तर नहीं होती। ऐसे वलन क्षैतिज तल से कोण अवश्य बनाते हैं, इसलिए इसे अवनमन वलन कहते हैं।

ग्रीवा खण्ड (Nappes) –

इसे नेपेस या ग्रीवा खण्ड कहते हैं। इसका विकास अत्यधिक सम्पीडन के साथ-साथ विशेष भ्रंश की सम्मिलित क्रिया से होता है। परिवलन में मोड़ की भुजाएँ क्षैतिज होकर प्रायः समानान्तर हो जाती हैं। प्रतिवलन में सीमित भ्रंश में मोड़ एक-दूसरे पर छा जाते हैं, किन्तु इसमें मोड़ की चट्टानें विपरीत दिशा में परिवलित वलन से भी आगे खिसककर दूसरे खण्ड पर फैल जाती हैं। इस प्रकार यह अवस्था प्रतिवलन की ही अगली अवस्था है। इसमें भ्रंश के प्रभाव से चट्टानें खिसकने से ग्रीवा खण्ड की चट्टानों की संरचना अपने नीचे की चट्टानों से पूर्णतः भिन्न होती हैं, क्योंकि इसमें ऊपरी चट्टानें कई किमी. दूर तक आगे बढ़ जाती हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी कार्डिलेरा पर्वत, स्विस आल्पस एवं मध्यवर्ती महाहिमालय में ऐसे ग्रीवा खण्डों के अनेक उदाहरण पाए जाते हैं।

सन्धियाँ (Joints)

किसी क्षेत्र में स्थानीय तनाव एवं सिकुड़ने के सम्मिलित प्रभाव से कभी-कभी कमजोर शैलें चटक जाती हैं, किन्तु शैलों का विस्थापन नहीं होता। इस प्रकार शैलों में पड़ी दरारों को सन्धियाँ (Joints) कहते हैं। सन्धियों के कारण शैलों पर अपक्षय का प्रभाव शीघ्र पड़ता है।

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