अपवाह तंत्र (Drainage System)

अपवाह तंत्र (अपवाह प्रतिरूप)

अपवाह तंत्र (अपवाह प्रतिरूप)

वर्षा के जल के एकत्र होने से ही छोटी-छोटी धाराएँ मिलकर नदी बनती हैं, उससे घाटी का निर्माण प्रारम्भ होता है और घाटी का रूप एवं आकार समय से अनुसार बदलता जाता है। धरातलीय बनावट के अनुसार नदी तथा उसकी घाटी, जिसमें समस्त नदी घाटी तथा उसकी सहायक नदियों के प्रवाह-क्रम का स्वरूप होता है, अपवाह तंत्र कहते हैं।

अपवाह तंत्र का विकास (Development of Drainage system)

विभिन्न धरातलीय बनावट पर भिन्न-भिन्न प्रकार का अपवाह तंत्र विकसित होते हैं। परन्तु समान धरातल पर समान अपवाह तन्त्र का विकसित ही होना सम्भव होता है। अपवाह-तन्त्र के विकास में भूमि की बनावट तथा जलवायु का बहुत प्रभाव पड़ता है।

अपवाह तंत्र के विकास में कई परिस्थितियों का सहयोग रहता हैं, जैसे- (क) छोटी-छोटी जलधाराओं के रूप में अपवाह का श्रीगणेश (ख) तथा उनकी सहायक नदियों का विकास, (ग) सहायक नदियों शाखाओं तथा उपधाराओं के विकास से अपवाह-तन्त्र का प्रसार, (घ) नदी में अभिशीर्ष अपरदन। (ङ) नदी क्रम के विस्तार में कमी तथा नवी अपहरण प्रक्रिया।

  1. अनुवर्ती अपवाह-

    अनुवर्ती अपवाह का समुद्र के गर्भ के ऊपर उठे हुए धरातल से एक नियमित सम्बन्ध होता है। ऐसे धरातल पर सबसे पहले जो अपवाह-तन्त्र विकसित होता है वह मूलतः धरातल के ढाल के अनुरूप होता है, अर्थात् मुख्य नदियाँ क्षेत्र के ढाल के समान्तर बहती हैं। ऐसी नदियों को अनुवर्ती नदियाँ कहते हैं, क्योंकि इनका प्रवाह -पथ घरातल की प्रारम्भिक दशाओं का अनुगमन करता है। भारतीय प्रायद्वीप का अपवाह तन्त्र इसी कोटि का है। इस प्रकार की घाटी की कल्पना पावेल महोदय ने (सन् 1975) में की थी।

  2. परवर्ती अपवाह-

    वर्षा के कारण नालियाँ बन जाती हैं, जिनसे होकर निकटवर्ती क्षेत्र का जल मुख्य नदी में आता है। यही नालियाँ नदी के दोनों ओर की दिशाओं में धीरे-धीरे सहायक नदियों के रूप में बहने लगती हैं। ये सहायक नदियाँ अपने जल-विभाजकों को पीछे की ओर काटती हैं तथा मुख्य नदी की दिशा में तिरछी बहती हैं। ये सहायक नदियाँ परवर्ती नदियाँ कहलाती हैं। ये परवर्ती नदियाँ इसलिए कहलाती हैं क्योंकि इनका आगमन बाद में होता है। यमुना तथा रामगंगा नदियाँ गंगा नदी की परवर्ती नदियाँ हैं।

  3. नवानुवर्ती अपवाह-

    सहायक नदियाँ नियमित आकार और रूपरेखा की होती हैं। मोड़दार शैलों के क्षेत्र में अनुवर्ती नदियों (Syncline) से होकर तथा परवर्ती सहायक नदियाँ अपनति (Anticline) से होकर बहती हैं। अतः अनुवर्ती नदियों की घाटियाँ लम्बी तथा परवर्ती नदियों की घाटियाँ तिरछी होती हैं। फलतः परवर्ती नदियाँ अधिक ढाल होने के कारण अपनी घाटी गहरी बनाती हैं। कभी-कभी इनकी तलहटी अभिनति से नीचे हो जाती है जिनके फलस्वरूप कालान्तर में अभिनति श्रेणियाँ की भाँति ऊँची रहती हैं तथा अपनति ही नीची घाटी बन जाती है। ऐसी दशा में यदि मोड़दार शैलों के नीचे कठोर शैलों की तह रहती है तो गहरा कटाव सरलता से नहीं होता और परवर्ती नदियाँ अपनति के पाश्वों पर से बहती रहती हैं और अभिनति श्रेणियों के नष्ट हो जाने पर सहायक नदियाँ भी अनुवर्ती नदियों की घाटियों में होकर बहने लगती हैं, इस प्रकार की नदियों को नवानुवर्ती नदी कहते हैं।

  4. प्रत्यानुवर्ती अपवाह-

    इस अपवाह की वे नदियाँ हैं जो परवर्ती नदियों की सहायक हैं तथा उनसे बाद की बनी होती हैं। उनका प्रवाह अनुवर्ती नदियों के समान्तर और विपरीत दिशा में होता है। जिस प्रकार परवर्ती नदियाँ अनुवर्ती नदियों से कुछ आड़ी या समकोण पर मिलती हैं उसी प्रकार प्रत्यानुवर्ती नदियाँ परवर्ती नदियों के साथ दोनों पार्थी अनुवर्ती, परवर्ती तथा प्रत्यानुवर्ती अपवाह से आकर मिलती हैं, जैसा कि चित्र से ज्ञात होता है। ऐसी दशा में उसका प्रवाह अनुवर्ती नदियों के ठीक विपरीत होता है। इसलिए ये नदियाँ प्रत्यावर्ती अपवाह बनाती हैं। ऐसी प्रणाली तटीय मैदानों में अधिकतर देखने में आती है। परवर्ती, नवानुवर्ती तथा प्रत्यानुवर्ती घाटियों की कल्पना डेविस ने की थी।

  5. पूर्ववर्ती अपवाह-

    कुछ तन्त्र ऐसे होते हैं जिनकी व्यवस्था तथा विकास का सम्बन्ध उस क्षेत्र के धरातल की बनावट के ढाल के अनुसार नहीं होता। कई बार अपवाह तन्त्र से स्थापित होने के पश्चात् उस क्षेत्र में भू-भाग ऊँचा उठने लगता है, किन्तु भूमि के ऊँचे उठने की गति नदी की तलहटी को गहरा करने की गति से भी अधिक धीमी होती है और उसका प्रदेश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

कभी-कभी नदियाँ उठाव के साथ-साथ अपने पूर्व रूप में बहती रहती हैं। भारत में सिन्धु, ब्रह्मपुत्र, सतलज नदी तथा उत्तरी अमरीका में कोलम्बिया नदी में इस प्रकार के अपवाह ज्वलन्त उदाहरण हैं। इस प्रकार की नदियों को समझने के लिए यह ध्यान रखना चाहिए कि जब धरातलीय हलचल के कारण उनके मार्ग में पर्वतीय रुकावट आती है तो उसके यकायक आने पर मार्ग का पूर्ववत् बना रहना सम्भव नहीं होता। यह तभी सम्भव है जब पर्वत धीरे-धीरे उठे, ताकि उनका उठाव तथा नदी द्वारा अपने प्रवाह को कायम रखने के लिए गहरा कटाव समान रूप से होता रहें। इस प्रकार धीरे-धीरे पर्वतीय उठाव के द्वारा नदी के प्रवाह में कोई रुकावट नहीं होती। सिन्धु, ब्रह्मपुत्र एवं सतलज नदियाँ इसी प्रकार की मानी जाती हैं, क्योंकि हिमालय पर्वत की दक्षिणी श्रेणियों के बनाने के पूर्व ये नदियां उत्तरी श्रेणी से निकल कर दक्षिण को प्रवाहित होती थीं, परन्तु बाद में जैसे-जैसे दक्षिणी श्रेणियाँ उनके मार्ग में आती गयीं, ये नदियाँ गहरे कटाव के द्वारा अपना प्रवाह पूर्ववत् बनाये थी, क्योंकि इन श्रेणियों का उठाव बहुत धीरे-धीरे हजारों वर्षों में हुआ जिसे गहरे कटाव के द्वारा नदियों को अपना मार्ग पूर्ववत् रखने में सुविधा हुई। ऐसी नदियों में इस प्रकार के बाधक स्थानों पर महाखण्ड पाये जाते हैं। जहाँ उनके पार्श्व बहुत खड़े रहते हैं। इस घाटी का नामकरण पावेल महोदय ने किया है।

  1. ध्यारोपित अपवाह-

    इस प्रकार की अवस्था के अन्तर्गत वे नदियाँ आती है जो निक्षेपण द्वारा पूर्णरूपेण दब जाती हैं और पुनः निक्षेप के ऊपर नये प्रवाह के रूप में नई बहने लगती हैं। ऐसी नदियाँ अध्यारोपित नदियाँ कहलाती हैं। ये पुरानी नदी के ऊपर स्थापित होती हैं। अध्यारोपण कई प्रकार से होता है। यदि नदियाँ किसी काल में आग्नेय क्रिया के निकले हुए लावा से दब जाती हैं और लाल-निक्षेप के ऊपर नयी नदियाँ बहने लगती हैं तो उनका प्रवाह दबी हुई नदी के ऊपर से ही होता है। ऐसे सागरीय या हिमोढ़ निक्षेपों में भी अध्यारोपण होता है। चम्बल तथा बनास नदियों का अपवाह इसी प्रकार का है। इसकी भी कल्पना पावेल महोदय ने की है।

  2. द्रुमाकृतिक अपवाह (1988)-

    एक ही प्रकार की शैलों से निर्मित क्षेत्र में नदियों के प्रवाह भाग में उनकी बनावट से कोई बाधा नहीं उपस्थिति होती। ऐसे क्षेत्रों में मुख्य नदी तथा उसकी सहायक एवं उपसहायक नदियाँ वृक्ष के आकार की आकृति प्रस्तुत करती हैं। इस अपवाह तन्त्र में सहायक नदियाँ कई दिशाओं से न्यून कोण पर मिलती हैं। प्रायः यह तन्त्र क्षैतिज शैलों का स्थूल आग्नेय शैलों पर मिलता है। ग्रीक भाषा में ‘डेण्ड्रोज’ शब्द का अर्थ वृक्ष होता है। मुख्य नदी वृक्ष के तने की भांति तथा सहायक एवं उपसहायक नदियाँ वृक्षकी शाखाओं एवं उपशाखाओं की भांति ज्ञात होती हैं। ऐसी अपवाह व्यवस्था प्राकृतिक अपवाह कहलाती है। इस अपवाह को अक्रमवर्ती अपवाह भी (In sequent drainage) कहते हैं। ब्रह्मपुत्र की सहायक दिवांग एवं लोहित नदियाँ अक्रमवर्ती अपवाह-तन्त्र का उदाहरण हैं। लंका में यह अपवाह-तन्त्र देखने को मिलता है।

  3. जालायित अपवाह (1988)-

    इस प्रकार के अपवाह का विकास उन क्षेत्रों में होता है, जहाँ शैलों की बनावट भिन्न-भिन्न होती हैं। नदियाँ कमजोर भागों को काट देती हैं और कठोर भाग ऊपर उठा रह जाता है। इन कठोर भागों के कारण दो नदियाँ तथा उनकी सहायक नदियाँ अलग-अलग बँट जाती हैं। इन नदियों की घाटियां लगभग समान्तर तथा सीधी होती हैं। ऐसे प्रदेशों में मुख्य नदी, उनकी सहायक नदियों तथा शाखाओं का प्रवाह चतुर्भुजाकार होता है। सहायक नदियाँ मुख्य नदी के साथ समकोण बनाते हुए मिलती हैं ऐसे दशा में सम्पूर्ण अपवाह चतुर्भुजाकार प्रतीत होता है। अतः इस प्रकार के अपवाह को जालायित अपवाह कहते हैं। इस तन्त्र की रचना भ्रंशन की फलस्वरूप अधिक होती है।

  4. वलयाकार अपवाह-

    इस अपवाह में विच्छिन्न गुम्बद के चारों ओर (गुम्बद पर) कठोर एवं मृदुल शैलों की श्रेणियाँ रहती हैं और जल प्रवाह मोड़दार होता है। वास्तव में यह जालायित अपवाह तन्त्र का एक विशिष्ट रूप होता है। न्यूमेक्सिको के टर्की पर्वत पर ऐसा अपवाह मिलता है।

  5. आरीय अपवाह-

    ऐसी जल-प्रवाह व्यवस्था ऐसे प्रदेशों की होती है, जहाँ की भूमि की बनावट गुम्बदाकार या शंक्वाकार होती है। ऐसी दशा में जल-प्रवाह केन्द्रीय उच्च भागों से चारों ओर वृत्त के अर्द्धव्यास अथवा पहिए की तिल्लियों की भाँति प्रसारित होता है। ग्रेट-ब्रिटेन के लेक डिस्ट्रिक्ट की अपवाह व्यवस्था इसी प्रकार की है। भारत में अमरकंटक पर्वत की भी ऐसी अपवाह व्यवस्था है।

  6. अन्तःस्थलीय अपवाह-

    इसके अन्तर्गत वे नदियाँ होती हैं, जो समुद्र तक पहुँचने में असमर्थ होती हैं तथा वे ऐसी झीलों में गिरती हैं जिनका किसी सागर से सम्बन्ध नहीं होता।

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