अपरदन चक्र का विकास (Evolution of Erosion cycle)

अपरदन चक्र का विकास

अपरदन चक्र का विकास

यह स्पष्ट है, भू-गर्भिक बलें धरातल को ऊँचा-नीचा करने तथा उसमें कुरूपता उत्पन्न करने में सतत रत रहती हैं और बहिर्जात बलें उसको समतल बनाने एवं संवारने को निरन्तर प्रयास करती हैं। सागरतल से ऊँचा उठते ही भू-भाग पर बहिर्जात बलों का अपरदन प्रारम्भ हो जाता है और कटे-पिटे पदार्थों को निक्षेपण समुद्र तल पर होने लगता है। इस प्रकार दोनों वर्ग के बलों में पारस्परिक संघर्ष और प्रतिद्वन्दिता के फलस्वरूप धरातल के उन्नयन एवं अवतलन का क्रम चलता रहता है। इस प्रकार प्रत्येक स्थलाकृति का एक जीवन क्रम होता है, जिसमें वह अपनी विभिन्न अवस्थाओं को पार करती है। पृथ्वी की उत्पत्ति से आदि पर्यन्त का यह अखण्ड क्रम विकास-चक्र कहलाता है।

यह नामकरण अमरीकी भू-वैज्ञानिक डब्ल्यू. एम. डेविस ने किया है। वास्तव में यह स्थल का जीवन इतिहास है जिस पर अनेक नदियाँ बनती हैं। वारसेस्टर महोदय ने इसको एक अपेक्षित अवधि माना है जिसमें नदियाँ किसी नवनिर्मित स्थलखण्ड को चरम स्तर पर पहुँचा देती हैं। विकास-चक्र सम्बन्धी तथ्यों का क्रमबद्ध विवेचन डेविस महोदय ने प्रस्तुत किया।

डेविस का अपरदन चक्र

सन् 1899 में डेविस महोदय ने अपरदन चक्र के सम्बन्ध में पूर्ण वास्तविकता प्रकट की तथा स्वयं यह बताने की कोशिश की कि “अपरदन चक्र या भौगोलिक चक्र समय की वह अवधि है जिसके द्वारा एक उत्थति भू-खण्ड अपरदन के प्रक्रम द्वारा अपरदित होकर एक आकृतिविहीन समतल मैदान में परिवर्तित हो जाता है।”

इस तरह डेविस महोदय ने ऐतिहासिक परिवेश के आधार पर स्थल रूपों के विकास की चक्रीय पद्धति का निर्माण किया, साथ में यह भी पुष्टि की कि स्थल स्वरूपों के निर्माण तथा विकास पर प्रक्रम-संरचना तथा अवस्था का पूर्ण प्रभाव होता है।

उपर्युक्त तीनों कारक डेविस के निकट सन्तुलन (Trio-Isostasy of Davis) के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन तीनो तत्त्वों का वर्णन निम्न हैं-

  1. संरचना (Structure)-

    संरचना से अभिप्राय समस्त पृथ्वी तल पर निर्मित भू-तात्विक रचना है । अतः इस संरचना के लिए विभिन्न रासायनिक तत्त्वों एवं खनिजों के सहयोग से यह रचनात्मक भू-आकृतियाँ निर्मित होती हैं। इस प्रकार निर्मित भू-आकृतियों में चट्टानें, ऊँची-ऊँची पर्वत श्रेणियाँ, पठार एवं मैदान संरचनात्मक तत्त्वों के भौतिक तथा रासायनिक प्रतिक्रिया का ही फल हैं।

साधारणतः संरचना भू-भाग के किसी भी स्थान की भौतिक एवं रासायनिक स्थिति – ज्ञान के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है। अतः इसके महत्व के लिए “संरचना का निर्माण प्रथम क्रिया तथा भू-आकारों का निर्माण बाद की घटना” अर्थात् संरचना स्थल स्वरूपों के निर्माण की प्रथम निर्माणक स्थिति और उसके विकास की घटना बाद की है।

  1. प्रक्रम (Process)-

    प्रक्रम वह विधि है जिसके द्वारा किसी भू-भाग की मूल आकृति में परिवर्तन लाने की विभिन्न स्थितियाँ रहती हैं। अतः किसी भी भू-भाग के विकास की मुख्य आकृति परिवर्तित स्वरूप प्रक्रम के अधीन रहता है। अतः स्थलस्वरूपों के लिए जितना संरचना का महत्त्व है उससे अधिक कहीं प्रक्रम का है ।

अतः किसी भी प्रदेश में प्रक्रम जिस रूप में कार्यशील होता है, वैसा ही उस प्रदेश में दृश्य भूमि का विकास होता है। उदाहरण के लिए, बाढ़ के मैदान की रचना नदियों द्वारा तथा U-आकार की घाटियाँ हिमानियों द्वारा होती है। अतः इन विभिन्न कारकों द्वारा बनायी गयी विभिन्न भू-आकृतियों में प्रक्रम की स्थिति में गति भी भिन्न रहती है, जैसे- वायु द्वारा अपरदित (Wind Eroded), नदी द्वारा अपक्षय (River Dissected), लहर द्वारा निर्मित (Wave-cut), हिमप्रभावित (Glaciated) आदि। अतः प्रक्रम भू-आकृतियों के लिए एक महत्वपूर्ण कारक भी है। क्योंकि यदि हमें किसी भी स्थलस्वरूप की वास्तविक स्थिति का ज्ञान प्राप्त करना है तो पहले उसके विकास प्रक्रम को समझना बहुत ही आवश्यक है। इसमें प्रक्रमों के प्रकार तथा इनके द्वारा बनी हुई स्थालाकृतियों तथा इनके प्रभावों की पूर्ण जानकारी प्राप्त करना एक जरूरी कार्य होगा, जिससे दृश्य-भूमियों का भली-भाँति अध्ययन किया जा सके।

  1. अवस्था (Stage)-

    किसी स्थलस्वरूप की संरचना प्रक्रम के प्रभावनुसार जिन-जिन स्थितियों व समय में प्राप्त की हो, अवस्था कहलाती है। अर्थात् प्रक्रम के समयानुसार कार्य करने की सीमा ही अवस्था का बोध कराती है। वैसे साधारण रूप में तीन अवस्थाएं होती हैं- युवावस्था (Young stage), परिपक्वावस्था (Mature stage) तथा वृद्धावस्था (Old stage)। इनके अतिरिक्त विद्वानों ने कुछ और अवस्थाएँ भी मानी हैं। अवस्था शब्द का अर्थ स्थलस्वरूपों के विकास में लगे प्रक्रम से है। लेकिन इसमें लगे समय का ज्ञान कराना दुष्कर है, क्योंकि विभिन्न स्थलस्वरूप प्रक्रम के द्वारा देर में भी बनते हैं और कुछ जल्दी भी। यह स्थिति वहाँ के धरातलीय संरचना पर आधारित रहती है। क्योंकि कोई कमजोर संरचना वाले प्रदेश में अपरदन की युवावस्था तथा परिपक्वावस्थाएँ जल्दी समाप्त हो जाती हैं। लेकिन कठोर संरचना वाले प्रदेश में युवावस्था काफी समय तक चलती रहती है।

उत्थान एवं अपरदन (Upliftment and Erosion)

भू-आकृति विज्ञान के क्षेत्र में अपरदन चक्र के सर्वोच्च विचारक डेविस हैं। इसलिए इनको “अपरदन चक्र की विचारधारा का पिता कहा जाता है।”

डेविस महोदय ने बताया कि किसी भी स्थल खण्ड की उत्थान अवधि के बाद अपरदन की क्रिया प्रारम्भ होती है। लेकिन ऐसा कभी नहीं होता कि उत्थान कि अवधि के साथ-साथ अपरदन भी प्रारम्भ हो जाय। अतः उत्थान और अपरदन कभी साथ-साथ प्रारम्भ नहीं होते है। लेकिन विद्वानों ने

करता है। कहा कि डेविस का यह मत भ्रान्तिपूर्ण है। प्रकृति में अपरदन उत्थान की समाप्ति की प्रतीक्षा नहीं करता है।

उत्थान (छोटी अवधि),   अपरदन (लम्बी अवधि) , (चक्र का अन्त)

डेविस के मत की आलोचना

  1. यह बात वास्तविक तथा ठीक है कि अपरदन उत्थान की प्रतीक्षा नहीं करता जैसे ही उत्थान प्रारम्भ हुआ, साथ ही अपरदन की क्रिया चालू हो जाती है। अतः डेविस का यह कथन कि उत्थान के बाद अपरदन होता है, गलत है।
  2. डेविस ने उत्थान की प्रक्रिया को अचानक होने वाला कहा है, जबकि उत्थान एक लम्बे समय में पूर्ण होता है (समय के अनुसार)।
  3. डेविस ने यह भी गलत बताया कि कोई भी स्थल-खण्ड उत्थान के पूर्ण हो जाने पर एक लम्बे अरसे तक स्थिर अवस्था में रहता है।
  4. हैक, स्टन्लर तथा शोर्ले के गतिक सन्तुलन सिद्धान्त ने डेविस के मत को बिल्कुल गलत सिद्ध कर दिया है।
  5. चक्र नामावली को जर्मन विद्वानों ने भ्रमपूर्ण कहा है।
  6. ओमाल महोदय ने डेविस के अपरदन चक्र की मुख्य कमी यह बतलायी है कि उन्होंने उसे आवश्यकता से अधिक साधारण बना दिया है।

उपर्युक्त मतों के अनुसार वर्तमान वैज्ञानिक युग में डेविस महोदय का मत पूर्णरूपेण भ्रामक तथा गलत सिद्ध किया गया है। लेकिन फिर भी उस समय की बनी यह डेविस की चक्रीय संकल्पना भूगोल में एक अमर निधि के रूप में है।

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