अपक्षय (Weathering)

अपक्षय (Weathering)- परिभाषा, प्रकार, परिणाम एवं महत्व

अन्तर्जात बल के द्वारा जो भू-भाग समुद्रतल से ऊपर उठता है, बहिर्जात बल उसकी काट-छाँट प्रारम्भ कर देता है। इस प्रकार वह भू-भाग धीरे-धीरे समतल हो जाता है। “स्थल मंडल पर वे सभी प्रक्रम जिनके फलस्वरूप धरातल सामान्य तल पर पहुँचता है, अनाच्छादन कहलाता है।” अनाच्छादन में दो प्रक्रियाएँ होती हैं। (1) स्थैतिक (Static) तथा (2) गतिक (Dynamic)। स्थैतिक क्रिया से तात्पर्य चट्टानों की अपने स्थान पर टूट-फूट से है, जिसे अपक्षय (Weathering) कहते हैं।

गतिक प्रक्रिया में टूटी हुई चट्टाने एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जायी जाती हैं। अपक्षयित पदार्थ ले जाये जाते समय धरातल को खुरचता है तथा स्वंय भी टूट-फूट कर बारीक बन जाता हैं। इस खुरचने के कार्य को अपरदन (Erosion) कहते हैं।

अपक्षय (Weathering)

अपक्षय वह क्रिया है जिसके द्वारा शैलों का विखण्डन एक निश्चित स्थान पर सक्रिय रहता है। यह एक स्थिर प्रक्रम है तथा इसमें पदार्थ का वाहन या स्थानान्तरण नहीं होता है।

अपक्षय (Weathering) के द्वारा केवल शैलों की टूट-फूट ही नहीं होती, बल्कि विभिन्न धरातलीय रूपों की रचना की होती है।

अपक्षय को प्रभावित करने वाले तत्त्व

शैलों के अपक्षय में मुख्य रूप से चार तत्त्व प्रभाव डालते हैं-

  1. शैलों की संरचना-

    चट्टानों की रचना मुख्य रूप से अपक्षय को प्रभावित करती है। अपक्षय शीघ्र ही क्रियाशील होता है। इसके विपरीत कठोर संरचना वाले क्षेत्रों में अपक्षय अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहता है। जिन चट्टानों में जोड़ अधिक रहते हैं, उनमें अपक्षय की क्रिया अधिक होती है।

  2. जलवायु-

    विभिन्न जलवायु वाले क्षेत्रों में तापक्रम तथा वर्षा की विषमता से अपक्षय की मात्रा में अन्तर पाया जाता है। मरुस्थलीय भागों में यांत्रिक अपक्षय तथा कटिबन्धीय क्षेत्रों में रासायनिक अपक्षय मुख्य स्थान रखते हैं। शीत प्रदेशों में जैविक तथा रासायनिक अपक्षय प्रभाव, डालता है।

  3. धरातलीय ढाल-

    धरातल अधिक ढाल युक्त होने पर अपक्षय क्रिया अधिक होती है। अधिक ढाल होने पर यदि यांत्रिक अपक्षय सक्रिय रहा तो चट्टानों में ढीलापन आने से वे एकाएक नीचे को खिसकने लगती हैं।

  4. वनस्पति-

    वनस्पति को अपक्षय का मूलक तथा नाशक दोनों कहा गया है। वनस्पति की जड़े जब भूमि के अन्दर प्रविष्ट होती हैं तो चट्टानें ढीली हो जाती हैं जिससे अपक्षय- क्रिया सक्रिय, हो जाती है।

अपक्षय में भाग लेने वाले कारकों को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है- (1) भौतिक कारक, (2) रासायनिक कारक तथा (3) जैविक कारक। इस प्रकार इन कारकों के आधार पर अपक्षय कार्य को तीन भागों में बाँटा जाता है।

  1. यांत्रिक या भौतिक अपक्षय-

    वायु, तुषार, तापक्रम एवं वर्षा की विभिन्नताओं के फलस्वरूप चट्टानों का जो विघटन होता है, वह भौतिक अपक्षय कहलाता है। इन तत्त्वों के द्वारा चट्टानों के कण विस्तृत एवं संकुचित होते रहते हैं तथा जब यह क्रिया लगातार होती है तो चट्टानों की पर्तें टूट जाती हैं। भौतिक अपक्षय के निम्नलिखित कारक हैं-

  • सूर्य ताप (Insolation)-

    दिन में सूर्य ताप से चट्टानें फैलती हैं तथा रात्रि के समय ठण्ड के कारण चट्टानें सिकुड़ती हैं। इस प्रकार प्रतिदिन प्रसार तथा संकुचन होते रहने से चट्टानों का संगठन निर्बल होता जाता है जिससे उसमें स्तर-भ्रंश तथा दरारें पड़ने लगती हैं और उनमें टूट-फूट होने लगती है। अधिक तापान्तर वाले भागों में सूर्य ताप से अपक्षय कार्य अधिक होता है। राजस्थान के मरुस्थल में यह क्रिया दृष्टिगोचर होती है।

  • तुषार या पाला (Frost) –

    ठण्डे देशों में रात को तापमान कम हो जाने से चट्टानों की भ्रंशों में पड़ा हुआ पानी बर्फ के रूप में जम जाता है। बर्फ का आयतन पानी से अधिक होने के कारण यह भ्रंशों को चौड़ा करता है। दिन को बर्फ पिघल जाती है और पुनः रात को जम जाती है। यह कार्य निरन्तर होने से चट्टानों में टूट-फूट होने लगती है।

  • वर्षा (Rainfall)-

    उष्ण-आर्द्र प्रदेशों में वर्षा अधिक होती है तथा गर्मी भी काफी पड़ती है, जिससे सूर्य ताप से गर्म हुई चट्टानों पर वर्षा का जल पड़ने से चट्टानें टूटने लगती हैं तथा अपक्षय कार्य क्रियाशील हो जाता है।

  • पवन (Wind)-

    पवन भी अपक्षय में भाग लेता है। शुष्क प्रदेशों में पवन कार्य बहुत प्रभावशाली होता है। वहाँ हवाएँ बहुत वेग से चलती हैं- वे मोटे-मोटे रेत के कणों से लदी होती हैं- ऐसे पवनों के थपेड़ों से चट्टानों की परत उड़ने लगती हैं।

  1. रासायनिक अपक्षय-

    जब वायुमंडल की गैसें या वर्षा का जल रासायनिक क्रियाओं द्वारा भू-रचना में परिवर्तन कर डालते हैं तो उसे रासायनिक अपक्षय कहते हैं। ऑक्सीजन, कार्बन डाई-ऑक्साइड, हाइड्रोजन इत्यादि गैसों के प्रभाव से चट्टानों में रासायनिक परिवर्तन होते हैं। भौतिक अपक्षय की अपेक्षा रासायनिक अपक्षय अधिक प्रभावशाली होते हैं, परन्तु मरुस्थलीय भागों में रासायनिक अपक्षय की अपेक्षा भौतिक अपक्षय मुख्य स्थान रखता है। रासायनिक तत्त्वों के अपक्षय की क्रिया निम्न प्रकार से होती है-

  • ऑक्सीकरण (Oxidation)-

    जिन चट्टानों में लोहें का अंश होता है, उन पर ऑक्सीजन का प्रभाव शीघ्र पड़ता है, क्योंकि ऑक्सीजन के प्रभाव से चट्टानों में लोहे के ऑक्साइड बन जाते हैं। जिनसे चट्टानों में ढीलापन आ जाता है और उनका अपक्षय आसान हो जाता है। यह क्रिया आद्र प्रदेशों में विशाल रूप से होती है।

  • कार्बनीकरण (Carbonation) –

    कार्बन डाई-ऑक्साइड के प्रभाव से चट्टानों में विभिन्न प्रकार के कार्बोनेट बन जाते हैं। ये कार्बोनेट पानी में बहुत घुलनशील होते हैं। अतः इनके बन जाने से चट्टानें पानी में घुलकर बहने लग जाती हैं। कार्बनिक अम्ल चूना मिश्रित शैलों को बड़ी सुविधा से घुला डालता हैं।

  • जलयोजन (Hydration)-

    जब पानी या वर्षा का जल चट्टनों के अन्दर प्रविष्ट होता है तो चट्टानें जल को सोख लेती हैं जो जलयोजन कहलाती है, जिसके फलस्वरूप शैलों का आयतन बढ़ जाता है। फलस्वरूप चट्टानों के खनिज चूर्ण-चूर्ण होने लग जाते हैं। जल सूखने पर चट्टानों में टूट-फूट होने लग जाता है। जलयोजन का प्रभाव फेल्सपार धातु पर सर्वाधिक पड़ता है। जलयोजन से फेल्सपार धातु केओलिन मिट्टी में परिवर्तित हो जाती है।

  • सिलिका का पृथक्कीकरण (Destlication)-

    अनेक शैलों में सिलिका की मात्रा होती है। ग्रेनाइट में सिलिका की सबसे अधिक मात्रा होती है। रासायनिक क्रियाओं से शैलों से सिलिका पृथक् हो जाती है और वह जल में घुलकर बह जाती है। इस प्रकार यह क्रिया अपक्षय में सहायक होती है। इसे घोल (Solution) भी कहते हैं।

  1. जैविक अपक्षय (Biological Weathering)-

    जीव-जन्तुओं के द्वारा होने वाले अपक्षय को जैविक अपक्षय कहते हैं। इसके कारण निम्नलिखित हैं-

  • जीवजन्तु

    अनेक ऐसे जीव जन्तु हैं, जो भूमि में बिल बनाकर रहते हैं। बिल खोदने से शैलें निर्बल हो जाती हैं और उनमें टूट-फूट होने लगती है।

  • पेड़पौधे

    भूमि में पेड़-पौधों की जड़ों के प्रवेश से चट्टानों में दरारें तथा भ्रंश पड़ जाती हैं और चट्टानें निर्बल हो जाती हैं, जिससे उन चट्टानों में टूट-फूट शुरू हो जाता है।

  • मनुष्य

    मनुष्य भू-तल पर अनेक आर्थिक कार्यकलाप करता है। वह खान खोदता है, सुरंग बनाता है, भूमि पर खाई-खंदकें खोदता है तथा भूमि जोतता है जिससे चट्टानें निर्बल हो जाती हैं और उनमें अपक्षय कार्य आसान हो जाता है। अतः मनुष्य के कार्य भी अपक्षय में सहायता करते हैं।

अपक्षय के परिणाम या अपक्षय का महत्त्व

अपक्षय से होने वाले परिणामों में कुछ तो मनुष्य के लिए हितकर होते हैं तथा कुछ अहितकर भी होते हैं।

  1. अपक्षय का मुख्य परिणाम मिट्टी की रचना है।
  2. अपक्षय से शैल चूर्ण प्राप्त होता है जिसे वर्षा का जल तथा नदियाँ बहा कर ले जाती हैं और उसे बारीक करके अन्यत्र बिछा देती हैं, जिससे भूमि समतल हो जाती है।
  3. शैलों की टूट-फूट से बहुत से खनिज तत्त्व एक जगह एकत्र हो जाते हैं, जिन्हें प्राप्त करके मनुष्य अपने काम में लाता है।
  4. पहाड़ी भागों में अपक्षय से शैलों के बड़े-बड़े खण्ड स्खलित होकर नदियों के मार्ग में आ पड़ते हैं और उनके प्रवाह को रोक देते हैं। इस प्रकार झीलें बन जाती हैं।
  5. ठण्डे देशों के उच्च पर्वतीय भागों से हिम के बड़े-बड़े पिण्ड फिसल कर समुद्र में आ जाते हैं, जो जलयानों के मार्ग में बाधक होते हैं।

अतः अपक्षय का उपर्युक्त विवरण के अनुसार विशेष महत्त्व है।

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