राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (National Environmental Policy)

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (National Environmental Policy)

पर्यावरण नीति

पर्यावरणीय नीति में दो पद शामिल हैं- ‘पर्यावरण’ तथा ‘नीति’ । पर्यावरण भौतिक पारिस्थितिकी को संदर्भित करता है तथा यह सामाजिक आयाम (जीवन की गुणवत्ता, स्वास्थ्य) व आर्थिक आयाम (संसाधन प्रबन्ध, जैव विविधता) पर भी विचार करता है। नीति को सरकार, पक्षकार, व्यवसाय या व्यक्ति द्वारा अपनाये गये या प्रस्तावित कार्यवाही या सिद्धान्त के रूप में परिभाषित किया जाता है। इस प्रकार पर्यावरणीय नीति पर्यावरण पर होने वाले मानवीय प्रभाव से उत्पन्न होने वाली समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करती है। पर्यावरणीय नीति में वायु व जल प्रदूषण, क्षय प्रबन्धन, पारिस्थितिकी प्रबन्धन, जैव विविधता संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, वन्यजीव एवं संकटग्रस्त प्रजातियाँ तथा भावी पीढ़ियों हेतु प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण जैसे मुद्दे शामिल होते हैं। पर्यावरणीय नीति मानवीय गतिविधियों की निगरानी पर भी ध्यान लगाती है ताकि जैव भौतिक पर्यावरण एवं प्राकृतिक स्रोतों पर होने वाले हानिकारक प्रभावों को रोका जा सके तथा यह सुनिश्चित किया जा सके कि पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों का मानव प्राणियों पर हानिकारक प्रभाव न पड़ें।

पर्यावरण नीति के सिद्धान्त (Theory of Environment Policy)

पर्यावरण से हमारा तात्पर्य उस आवरण से है जो हमारे चारों ओर विद्यमान है। वर्तमान समय में प्रत्येक देश इस प्रकार की नीतियों का निर्माण कर रहा है, जिनसे पर्यावरण में आयी गिरावट को कम करने में सहायता प्राप्त हो। इन नीतियों का प्रमुख उद्देश्य नागरिकों को स्वच्छ तथा स्वस्थ पर्यावरण उपलब्ध करना है। पर्यावरण नीति के अंतर्गत उन आर्थिक तथा सामाजिक क्रियाकलापों का अध्ययन किया जाता है जो पर्यावरण को प्रभावित करते हैं। पर्यावरण नीति के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

  1. आर्थिक नीति के साथ समन्वय-

    पर्यावरण की नीति इस प्रकार की हो जो आर्थिक नीति के साथ समन्वय स्थापित कर सके। अतः पर्यावरण की नीति का निर्माण करते समय यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इनका आर्थिक क्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

  2. संसाधनों का सीमित व पूर्ण दोहन-

    नीति निर्माण में इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि अनत्यीकरण साधनों का प्रयोग न्यूनतम किया जाये तथा उनका पूर्ण रूप से विदोहन किया जाये जिससे उनका अप्रत्यय कम से कम हो ।

  3. नियमों का मानवीय क्रिया-कलापों से समन्वय –

    नीतियों का निर्माण इस प्रकार किया जाना चाहिए कि सामान्य जनता उसके साथ समन्वय स्थापित कर सके। सामाजिक क्रिया-कलापों से मेल खाने वाले सिद्धान्त प्रायः अधिक प्रभावशील होंगे।

पर्यावरणीय नीति : मुद्दे तथा संभावित समाधान

(Environmental Ethics: Issues and Possible Solutions)

मानव का पर्यावरण से अविछिन्न सम्बन्ध है। अगर पर्यावरण के सन्तुलन में अधिक परिवर्तन आता है और निरन्तर दूषित होने के कारण उसका अधिक ह्रास होता है तो निश्चित ही अनेकानेक अन्य जीवधारियों के साथ-साथ मनुष्य का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। बड़े-बड़े शहरों में प्रदूषण इतना बढ़ता जा रहा है कि वहाँ श्वसन के लिए साफ हवा, पीने के लिए शुद्ध जल और खाने के लिए शुद्ध खाद्य-पदार्थों का मिलना दुश्वार हो गया है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित बीस शहरों की सूची में भारत के तीन मेट्रोपोलिटन शहर – दिल्ली, कोलकाता और बम्बई के नाम प्रथम दस में ही आ जाते हैं। आजकल दिल्ली देश का सबसे अधिक प्रदूषित शहर बन गया है।

मनुष्य ने बिना पारिस्थिति के सन्तुलन की चिन्ता किये अपनी जरूरतों को पूरा करने व विलासी जीवन के उपक्रम जुटाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक दोहन किया है और उसे प्रदूषित किया है। इस विवेकहीन अभियान से उसने धरती, जल, वायु और आकाश किसी को नहीं बख्शा है। आज प्रदूषण पहाड़ों की चोटियों, समुद्रों की गहराइयों, धरती के कोनों-कोनों तथा वायुमण्डल के ऊपर अन्तरिक्ष के विस्तार तक पहुँच गया है। इसका सीधा प्रभाव पारिस्थितिकी पर पड़ा है। प्रकृति में विभिन्न जीवदायिनी क्रियाओं प्रक्रियाओं के चक्र चलते रहते हैं, जिनका मूल प्रयोजन विभिन्न स्तरों पर जीवधारियों अर्थात वनस्पतियों और प्राणियों को अपनी गतिविधियों को संचालित करने के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराना है। ऊर्जा का यह प्रवाह जीवों में खाद्य शृंखला पर आधारित है, परन्तु इसके लिए उन्हें वातावरण में पदार्थों के निरन्तर आदान-प्रदान पर निर्भर होना पड़ता है। यह सब अजैव घटकों के बीच विभिन्न भौतिक कारकों के माध्यम से पूरा हो पाता है। अगर प्रकृति में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड इत्यादि के चक्र पूरे नहीं हों अथवा अपेक्षित स्तर के नहीं हो तो निश्चित ही जीव जगत का सन्तुलन डगमगा जायेगा। इसी तरह जैवमंडल के विभिन्न स्तरों की संरचना, परिमाणं, विविधता तथा उनके बीच स्थापित सामंजस्य गड़बड़ हो जाएँ तो अजैव घटकों के बीच संचालित होने वाली प्रक्रियाओं तथा उनके चक्रों में भी विघ पड़ जायेगा और सभी पारिस्थितिकी में असन्तुलन के आसार नजर आने लगेंगे। अगर वृक्षों की अधिक कटाई होती है और नये वृक्षों द्वारा उनकी पूर्ति नहीं होती है तो सबसे पहले कार्बन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन के चक्र प्रभावित होंगे। उनका प्रभाव समस्त जैविक जगत पर पड़ेगा।

विकसित देशों में प्रदूषण से होने वाले खतरों के प्रति चिन्ता दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही होने लगी थी, किन्तु उसे रोकने के अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास आठवें दशक के आरम्भ में हुए। जून 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में मानव पर्यावरण पर प्रथम विश्व-सम्मेलन हुआ। इसमें भारत ने सक्रिय रूप से भाग लिया था तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने देश का प्रतिनिधित्व किया। उसी समय से ही हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। समय-समय पर आवश्यक नियम बनाये गये हैं। इसी दौरान हमारी राष्ट्रीय पर्यावरण नीति का भी निर्माण हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि विकास के कार्यक्रमों को इस तरह नियोजित किया जाये कि उनसे पर्यावरण की अपूरणीय क्षति नहीं हो तथा विकास ऐसा हो, जिसका क्रम चलता रहे अर्थात वह अनुरक्षणीय हो। हमारी राष्ट्रीय पर्यावरण नीति संयुक्त राष्ट्र संघ में परिलक्षित संपोषणीय विकास को विश्व नीति पर ही आधारित है। बढ़ती हुई जनसंख्या, विलास प्रवृत्ति तथा अनुशासनहीनता के अतिरिक्त पर्यावरण के समक्ष सबसे बड़ी समस्या विकास कार्यक्रमों के दौरान उत्पन्न दुष्प्रभावों के कारण आती है। ये दुष्प्रभाव कई प्रकार के होते हैं, जैसे- प्राकृतिक सम्पदा का बड़े पैमाने पर वन विनाश, अपशिष्ट उत्पादों व अवशिष्टों का गलत विसर्जन, अन्धाधुन्ध निर्माण, आवासीय गतिविधियों का फैलाव इत्यादि। इन दुष्प्रभावों से पर्यावरण को यथासम्भव बचाने की ओर सरकार का ध्यान चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान गया। इस समस्या की गहराई में जाने तथा पर्यावरण सुरक्षा और संरक्षण के प्रभावी उपाय सुझाने हेतु सन् 1972 में पर्यावरण समन्वय’ पर एक कमेटी बनाई गई। विभिन्न विभागों के विकास सम्बन्धी कार्य एवं अन्य गतिविधियों के केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच बँटी हुई जिम्मेदारियों और अधिकार प्राप्ति ने काफी कठिनाइयाँ उपस्थित की और आज भी कर रहे हैं। इन स्थितियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए केन्द्र में प्रधानमंत्री की देख-रेख में सन् 1980 में पर्यावरण विभाग की स्थापना की गई तथा 1985 में स्वतन्त्र मंत्रालय ही बना दिया गया। सन् 1972 से अब तक अनेक नियम बनाये जा चुके हैं तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएँ प्रयत्नशील हैं। सन् 1988 में नयी पर्यावरण नीति की घोषणा की गई, जिसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  • पारिस्थितिक सन्तुलन को बनाये रखना,
  • जैव विविधता का संरक्षण,
  • मृदा और जल प्रबन्धन,
  • पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए उत्पादकता में वृद्धि,
  • ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र की जनसंख्या की आवश्यकता पूर्ति,
  • वनीय उत्पादों का समुचित प्रयोग,
  • लकड़ी के विकल्पों की खोज,
  • उपरोक्त कार्यक्रमों में जन सामान्य की सहभागिता सुनिश्चित करना।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006

राष्ट्रीय पर्यावरणीय नीतियाँ कई बार बनायी गयी है। इन नीतियों ने पर्यावरणीय चुनौतियों तथा पोषणीय विकास की ओर ध्यान दिया है। राष्ट्रीय पर्यावरणीय नीति, 2006 बनाए जाने से पूर्व बनायी गयी कुछ पर्यावरण एवं पोषणीय विकास सम्बन्धी नीतियाँ निम्नलिखित हैं

  • राष्ट्रीय वन नीति, 1988
  • पर्यावरण एवं विकास पर राष्ट्रीय संरक्षण नीति तथा नीतिगत विवरण, 1992
  • प्रदूषण के समापन पर नीतिगत विवरण पत्र, 1992
  • राष्ट्रीय कृषि नीति, 2000
  • राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000
  • राष्ट्रीय जल नीति, 2002

चूँकि आर्थिक विकास की प्रक्रिया में प्राकृतिक संसाधनों की माँग बढ़ती है इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि प्राकृतिक संसाधनों का न्यायिक तरीके से इपयोग किया जाय जिससे ये संसाधन अल्पकाल में ही न समाप्त हो जाए तथा भावी पीढ़ियों को भी इनका लाभ मिल सके। एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 20% बीमारियाँ पर्यावरणीय घटकों के कारण इत्पन्न होती हैं।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के लक्षण

राष्ट्रीय पर्यावरणीय नीति, 2006 स्वच्छ पर्यावरण तथा अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। इस नीति के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. इरा नीति का प्रमुख तथ्य यह है कि पर्यावरणीय संसाधनों की सुरक्षा, जीविका तथा लोगों के संरक्षण के लिए आवश्यक है। इसलिए संसाधनों के अवनयन को बचाया जाय।
  2. राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 पर्यावरणीय प्रबन्धन के लिए विभिन्न स्टेकधारकों जैसे- सार्वजनिक एजेन्सियों, स्थानीय समुदायों, शैक्षिक एवं वैज्ञानिक संस्थानों एवं निवेश समुदायों तथा अन्तर्राष्ट्रीय विकास के भागीदारों के मध्य संयोग को प्रेरित करती है ताकि संसाधनों को बनाए रखा जा सके।
  3. पर्यावरण नीति, 2006 में पंचायती राज्य संस्थानों एवं शहरी स्थानीय निकायों को भी पर्यावरण संरक्षण में शामिल किया गया है।
  4. यह नीति तटीय विनियम क्षेत्र अधिसूचना पर दृष्टिपात करते हुए तटीय पर्यावरणीय विनियम के माध्यम से तटीय पारिस्थितिक प्रणालियों में सुधार पर ध्यान देती है।
  5. राष्ट्रीय पर्यावरणीय नीति, 2006 पर्यावरणीय प्रभाव निर्धारण को नयी परियोजनाओं के लिए वांछनीय बनाती है।
  6. नीति में यह जोर दिया गया है कि पोषणीय विकास प्राप्त करने के लिए पर्यावरणीय संरक्षण को विकास प्रक्रिया का एकीकृत भाग बनाया जाय !

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 के उद्देश्य

(Objectives of National Environment Policy 2006)

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1. महत्वपूर्ण पारिस्थितिक प्रणालियों एवं स्रोतों का संरक्षण करना।
  2. पर्यावरणीय संसाधनों तक साम्यपूर्ण पहुँच को सुनिश्चित करना ताकि समाज के सभी वर्गों की पहुँच हो।
  3. वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पर्यावरणीय संसाधन का न्यायपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना।
  4. पर्यावरणीय सरोकारों को आर्थिक तथा सामाजिक विकास की नीतियों, योजनाओं, कार्यक्रमों एवं परियोजनाओं के साथ एकीकृत करना ।
  5. आर्थिक इत्पाद की प्रति इकाई में पर्यावरणीय संसाधनों के प्रभावशाली इपयोग को सुनिश्चित करना ताकि प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव रोका जा सके।
  6. अच्छे अधिशासन के सिद्धान्तों जैसे पारदर्शिता, विवेकशीलता, उत्तरदायित्व समय एवं लागत में कमी, भागीदारी एवं विनियामक स्वतंत्रता को पर्यावरणीय संसाधनों के प्रबन्धन एवं विनियमन में अपनाना ।
  7. स्थानीय समुदायों, सार्वजनिक एजेन्सियों, शैक्षिक एवं शोध समुदायों, विनियोजकों एवं बहुपक्षीय व द्विपक्षीय विकास भागीदारों के बीच परस्पर लाभकारी बहुस्टेकधारक भागीदारी के माध्यम से पर्यावरणीय संरक्षण के लिए वित्त, प्रौद्योगिकी, प्रबन्धकीय दक्षता, परम्परागत ज्ञान एवं सामाजिक पूँजी सहित बेहतर संसाधन प्रवाह को सुनिश्चित करना।

राष्ट्रीय जल नीति, 2012 (National Water Policy, 2012)

राष्ट्रीय जल नीति 2012 की मुख्य अवधारणा जल को आर्थिक वस्तु मानती है। इस जल नीति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. राष्ट्रीय जल रूपरेखा विधि का समर्थन करना;
  2. शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जल आपूर्ति की विषमताओं को दूर करना;
  3. जल वितरण तंत्र के व्यवस्थापन के लिए जल इपयोगकर्ता संगठनों को वैधानिक शक्ति देना;
  4. परियोजना से लाभान्वित होने वाले परिवारों द्वारा परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की लागत वहन करना;
  5. जल नियामक प्राधिकरण बनाना;
  6. कृषि सम्बन्धी विद्युत इपयोगकर्ताओं के लिए छूट में कमी करना ।

भारत में वन नीति (Forest Policy in India)

वैसे तो भारत में 1894 से वन नीति लागू है, फिर भी काफी लम्बे समय से भारतीय वनों के विकास एवं संरक्षण हेतु कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार द्वारा भारतीय वनों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सन 1950 में ‘केन्द्रीय वन मण्डल’ की स्थापना की गई। तत्पश्चात् सन् 1952 में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय वन नीति घोषित की गयी। इस वन नीति के अनुसार भारत के कुल भू-भाग के औसतन 33 प्रतिशत भाग में वन लगाने का लक्ष्य रखा गया। इस नीति के अन्तर्गत सरकार ने वनों को दो भागों में विभाजित किया –

(i) संरक्षित वनं (ii) ग्रामीण वन

इस नीति के दो प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • वन-संसाधनों के दीर्घकालीन विकास की व्यवस्था करना,
  • निकट भविष्य में इमारती लकड़ी की बढ़ती हुई माँग की पूर्ति करना ।

इस वन नीति के अन्तर्गत निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान दिया गया है –

  • प्राकृतिक तथा जलवायु सम्बन्धी स्थिति में सुधार लाने के लिये एवं जनकल्याण में वृद्धि करने के लिये यथा सम्भव नये वन लगाना चाहिए।
  • रेगिस्तान तथा भू-क्षरण को रोकने के लिये नये वन लगाना।
  • उद्योग, परिवहन एवं सुरक्षा आदि के लिये लकड़ी तथा अन्य वन-पदार्थों की पूर्ति हेतु स्थायी प्रबन्ध करना।
  • पशुओं के लिये चरागाह, खेती के लिये औजारों तथा ईंधन की पूर्ति के लिये लकड़ी की व्यवस्था करना।
  • निजी वनों पर सरकारी नियन्त्रण तथा उनकी कार्य प्रणाली के क्षेत्र में सुधार के लिये सरकार द्वारा निर्देशन जिससे कि राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर वनों से अधिकतम लाभ अर्जित किये जा सकें।

इस वन नीति को ध्यान में रखते हुए पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत वन विकास के अनेको महत्वपूर्ण प्रयत्न किये गये जिससे योजनाकाल में कुछ सफलता प्राप्त हुई। फलस्वरूप 1951-85 की अवधि में लगभग 60 लाख हेक्टेअर क्षेत्र में वन लगाए गये। नये बीज सूत्रीय कार्यक्रम में वन विकास पर विशेष जोर दिया गया। वन क्षेत्र को गैर-वन कार्य में लाने से रोकने के लिये सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम, 1980 लागू किया। इस अधिनियम के अनुसार सरकार की पूर्व अनुमति के बगैर वन क्षेत्र किसी भी गैर-वन कार्य के लिये प्रयोग में नहीं लाया जाएगा।

सन् 1988 में सरकार ने 1952 की वन नीति में संशोधन किया। इस संशोधित वन नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • बढ़ते हुए रेगिस्तान एवं भूमि कटाव पर नियन्त्रण करना।
  • प्रकृति की विरासत की सुरक्षा करना।
  • सामाजिक वानिकी तथा बड़ी मात्रा में नये पौधे लगाकर वनों को बढ़ाना।
  • पारिस्थितिकी सन्तुलन की सुरक्षा द्वारा वातावरण सन्तुलन बनाए रखना।
  • वन उत्पादों के कुशलतापूर्वक उपयोग तथा लकड़ी के अनुकूलतम प्रतिस्थापन को प्रोत्साहन देना।
  • ग्रामीण एवं आदिवासी जनसंख्या की ईंधन तथा पशुओं के चारे की आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में कदम उठाना।
  • राष्ट्रीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वनों की उत्पादकता को बढ़ाना।

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