अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण की समस्या और समाधान

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अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय समस्या

प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय समस्या (Major International Enviornmental Problem)

भूमि पर उपस्थित सभी प्राकृतिक संसाधन वस्तुतः पर्यावरणीय संसाधन हैं तथा प्रकृति से प्रदान किए गये अमूल्य उपहार है। इसके अन्तर्गत किसी स्थान की स्थिति, खनिजयुक्त भूगर्भित संरचना, जल स्रोत, खनिज राशियाँ, जलवायु, उपजाऊ मृदा, वन एवं जैव विविधता आदि हैं। जिनके उपयोग से मानव प्राणी अपना जीवन स्वस्थ्य सुदृढ़ बनाता है। नई तकनीक के प्रयोग से यह संसाधन और महत्वपूर्ण हो जाते हैं, यथा – समतल मैदानी भाग में तीव्र परिवहन के साधन। उच्च तकनीकी, उच्च जीवन स्तर और अधिक जनसंख्या वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव दिख रहा है। इसलिए विश्व भर में पर्यावरण सम्बन्धी समस्याएँ बढ़ी है। वन, जल, खनिज, ऊर्जा तथा भूमि, खाद्य संसाधनों का विगत शताब्दी में विभिन्न आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु अति दोहन हुआ है। जिससे इनकी उपलब्धता में कमी आयी जो कि समस्या का मुद्दा बन गया है इन संसाधनों से सम्बन्धित समस्याएँ बढ़ रही है।

इस बात से कोई भी व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता कि पर्यावरण लगातार बदल रहा है। जैसे-जैसे पर्यावरण परिवर्तन होते जा रहे हैं वैसे-वैसे यह आवश्यक होता जा रहा है कि पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति अधिक जागरूक हुआ जाय क्योंकि पर्यावरणीय समस्याओं के मानव पर विपरीत प्रभाव पड़ते हैं। विश्व भर में विद्यमान प्रमुख पर्यावरणीय समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

  1. प्रदूषण (Pollution) –

    विश्व की तीन मुख्य समस्याएँ हैं।

(i) जनसंख्या, (ii) गरीबी (iii) प्रदूषण ।

जिसमें प्रदूषण सबसे जटिल समस्याओं में से एक है जिससे मानवीय जीवन भी खतरे में हैं। विज्ञान के युग ने जहाँ मानव को अनेक सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं, वहीं दूसरी ओर प्रदूषण का एक विशिष्ट अभिशाप दिया है। पर्यावरण प्रदूषण का विष सभी जगह व्याप्त हो चुका है, जिसके फलस्वरूप हवा, पानी, खाद्य पदार्थ आदि सब प्रदूषित हो गये हैं। प्रकृति अपने प्राकृतिक क्रियाकलापों से पर्यावरण को स्वच्छ करने का प्रयत्न करती है, लेकिन मानव अपनी जरूरतों व स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करता है, तो पृथ्वी पर प्राकृतिक संतुलन भंग जाता है, जोकि प्रदूषण को जन्म देता है। वनों की जगह ईंटों, कंक्रीट के जंगलों (बिल्डिगो) का निर्माण हुआ है।) जीवाश्म ईंधन, कोयला, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम का अनियंत्रित दोहन होने लगा। औद्योगिक कल-कारखानों और मानव गतिविधियों से निकले विषैले, हानिकारक पदार्थ विश्वभर में भूमि जल और वायु को प्रदूषित कर रहे हैं।

  1. वैश्विक तापक्रम में वृद्धि (Increase in Global Warming)-

    जलवायु परिवर्तन एवं वैश्विक तापक्रम में वृद्धि आदि मानवीय क्रियाओं जैसे -ग्रीन हाउस गैसों का अधिक उत्सर्जन किए जाने का परिणाम है। वैश्विक तापक्रम वृद्धि के परिणामस्वरूप महासागरों एवं भूमि तल के तापमान में वृद्धि होती है जिससे ध्रुवों की पर्वत चोटियाँ पिघलती है। समुद्री जल का स्तर ऊपर उठता है तथा कभी-कभी अत्यधिक बर्फवारी की समस्या उत्पन्न होती हैं।

  2. अत्यधिक आबादी (Over Population) –

    जनसंख्या तथा पर्यावरण में गहरा सम्बन्ध होता है। जनसंख्या घनत्व अधिक होने से पर्यावरण भी अधिक प्रदूषित रहेगा। पर्यावरण के अनेक घटक जैसे- जल, मिट्टी, वायु वन, तापमान आदि जनसंख्या से ही प्रभावित होते हैं, बढ़ती हुई जनसंख्या द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ऊर्जा सम्बन्धी प्रोतों का अतिदोहन कर लिया जाता है तथा परमाणु ऊर्जा का भी उपयोग करना होता है, जिससे प्राप्त विभिन्न प्रकार के विकिरण से पर्यावरण विशेष रूप से प्रभावित होता है। बढ़ती हुई जनसंख्या विद्यमान संसाधन एवं उपभोक्ताओं के अनुपात की स्थिति को बिगाड़ देती है तथा अनेक दुष्परिणाम व समस्याओं को उत्पन्न करती है जो निम्वत् हैं

  • खाद्यान्नों की कमी
  • निम्न-जीवन स्तर
  • अशिक्षा,
  • बेरोजगारी या भुखमरी
  • स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ
  • गरीबी आदि हैं।
  • आवास की कमी,

जनसंख्या वृद्धि जीवन की गुणवत्ता को कम करके पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव डालती है। वर्ष 1972 में स्टाकहोम (स्वीडन) में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित मानव पर्यावरण पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था कि, “अधिक जनसंख्या गरीबी को बुलावा देती है और गरीबी प्रदूषण को जन्म देती है।”

प्रसिद्ध दार्शनिक बर्टर्ड रसेल के शब्दों में, “विश्व में कोई सरकार तब तक टिकाऊ नहीं हो सकती जब तक उस देश में स्थिर जनसंख्या नहीं रहती।”

  1. प्राकृतिक संसाधनों का अंति दोहन (Natural Resource over Exploitaion) –

    जनसंख्या में वृद्धि के कारण उपभोक्ता वस्तुओं की माँग में भी वृद्धि हुई है। औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् उद्योगपतियों के लाभ में वृद्धि के साथ-साथ व्यक्तियों की क्रयशक्ति में भी तीव्र वृद्धि हुई है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा बनाए गए मानव विकास सूचकांक के अनुसार जहाँ वर्ष 1990 में विश्व का कुल उपभोग 1.5 ट्रिलियन डॉलर था, वह बढ़कर वर्ष 1950 में 4.0 ट्रिलियन डॉलर एवं वर्ष 2000 में 25 ट्रिलियन डॉलर) 1 ट्रिलियन 100 बिलियन) गया था। इस प्रकार, बढ़ते हुए उपभोग स्तर को पूरा करने हेतु प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहरा हुआ। पुनर्उत्पादनीय संसाधनों की विशेष समस्या नहीं है, परन्तु गैर पुनर्उत्पादनीय संसाधनों के अति दोहन से विश्व के विद्यमान साधनों की स्थिति दयनीय हो सकती है।

  2. अपशिष्ट निस्तारण (Waste Disposal) –

    संसाधनों के अत्यधिक उपभोग एवं प्लास्टिक की बहुत अधिक वस्तुओं के निर्माण एवं उपभोग ने अपशिष्ट निस्तारण का वैश्विक संकट खड़ा कर दिया है। बहुत से देश ऐसे अपशिष्ट पदार्थों को महासागरों में डाल देते हैं। न्यूक्लियर अपशिष्ट निस्तारण प्रक्रिया स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त खतरनाक होती है। प्लास्टिक, फास्ट फूड पैकेजिंग एवं सस्ते इलेक्ट्रानिक अपशिष्ट पदार्थों ने मानव के जीवन के लिए खतरे खड़े किए है। अपशिष्ट निस्तारक वर्तमान पर्यावरणीय समस्याओं में से एक प्रमुख समस्या है।

  3. वनोन्मूलन (Deforestation) –

    विश्व भर में आबादी के दबाव के परिणामस्वरूप वनोन्मूलन हो रहा है। उद्योगों, सड़कों तथा रेल मार्गों व मानवीय बस्तियों को बसाने हेतु वनों को काटा जा रहा है। वनों की अन्धाधुन्ध कटाई से वन-क्षेत्र का विस्तार कम होता जा रहा है। विभिन्न देशों में भू-गर्भ जल की कमी होती जा रही है। वन तथा मृदा का आपस में गहरा सम्बन्ध होता है। भूमि की उर्वरता के कारण ऊपरी मृदा पर ही कृषि व अन्य वनस्पतियाँ उत्पन्न होती है तथा इसके नष्ट हो जाने पर वनस्पतियों पर बहुत अधिक बुरा प्रभाव पड़ता है। भूमि की एक इंच की ऊपरी मृदा, जो कि एक बार नष्ट हो जाती है, तो फिर उसे बनने में लगभग कई वर्षों का समय लगता है।

यदि वनोन्मूलन को रोका नहीं गया तो भविष्य में इसके दुष्परिणाम घातक होगे । जैसे मरुस्थल का फैलाव होगा, उपजाऊ भूमि बंजर भूमि में परिवर्तित हो जाएगी। जहाँ वनस्पतियाँ कम होगी और वायु-वेग तथा ज्वार-भाटे अनियंत्रित हो जायेंगे। इन सब कारणों से पर्यावरण असंतुलित हो जायेगा।

  1. जलवायु परिवर्तन (Climate Change) –

    जलवायु परिवर्तन की समस्या विगत तीन दशकों से बढ़ रही है इसका प्रमुख कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि है। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप ऋतुएँ बदलती है, नई बीमारी उत्पन्न होती है, बार-बार बाढ़े आती हैं तथा सम्पूर्ण मौसमी परिदृश्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

  2. जैव-विविधता की हानि (Loss of Biodiversity) –

    मानवीय गतिविधियों के कारण विभिन्न प्रजातियों एवं वास की क्षति हो रही है। पारिस्थितिक तन्त्र जिसे सुधरने में लाखों वर्ष लगते हैं, खतरे में हैं। प्राकृतिक प्रक्रियाओं का संतुलन बिगड़ता है।

  3. ओजोन पर्त का क्षय (Ozone Depletion) –

    ओजोन परत अदृश्य पर्त से पृथ्वी पर रहने वाले जीवों व पेड़-पौधों की सूर्य की हानिकारक किरणों से सुरक्षा होती है। वातावरण महत्वपूर्ण ओजोन परत को क्षति पहुँचने पर पर्यावरण के लिए खतरा बना हुआ है।

  4. जल प्रदूषण (Water Pollution) –

    विश्व के कई बड़े गाँवों एवं शहरों में शुद्ध जल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। औद्योगिक जल-स्राव, घरेलू मल-जल, वर्षा के जल के साथ आने वाली गन्दगी, भू-जल का अति दोहन आदि अनेक ऐसे कारण हैं जिनसे पानी के स्रोत एवं भू-गर्भ जल भण्डार प्रदूषित हुए हैं। दूषित जल से मानव स्वास्थ्य को क्षति होती है।

  5. महासागरों का तेजाबीकरण (Acidification of Oceans)-

    कार्बन डाईआक्साइड के अत्यधिक उत्सर्जन के परिणामस्वरूप महासागरों में तेजाब की मात्रा बढ़ रही है। मानव द्वारा कुल कार्बन-डाइ आक्साइड का 25% उत्सर्जित किया जाता है। विगत 250 वषों से महासागरीय तेजाब बढ़ा है तथा संभावना है कि वर्ष 2100 तक यह बढ़कर 150% तक हो जायेगा। इसका प्रमुख प्रभाव शंख मीन तथा प्लवक पर होगा तथा यह मानवीय अस्थि सुथिरता को भी प्रभावित करेगा।

  6. तेजाबी वर्षा (Acid Rain) –

    वातावरण में अधिक प्रदूषकों की उपस्थिति के कारण तेजाबी वर्षा होती है। तेजाबी वर्षा का मुख्य कारण जैविक ईंधन, वनस्पतियों का सड़ना आदि है। सल्फर डाईआक्साइड तथा नाइट्रोजन आक्साइड के वातावरण से मिलने पर तेजाबी वर्षा होती है। तेजाबी वर्षा एक जानी-मानी पर्यावरणीय समस्या है जिसका मानव स्वास्थ्य, जंगली जीवों व जलीय जीव जन्तुओं पर गम्भीर प्रभाव पड़ता है।

  7. नगरीय प्रसार (Urban Sprawl) –

    नगरीय प्रसार का आशय यह है कि बहुत अधिक घने बसे नगरीय क्षेत्रों से आबादी का प्रवास कम घने बसे हुए ग्रामीण क्षेत्रों की ओर होने लगता हैं। इसके परिणामस्वरूप ग्रामीण भूमि पर भी शहर बम्मने लगते है। ऐसे नगरीय प्रसार के कारण भूमि अवनमन, ट्रैफिक में वृद्धि, पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न होती है।

  8. सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ (Public Health Problem) –

    वर्तमान पर्यावरणीय समस्याओं ने मानवीय एवं जानवरों के स्वास्थ्य के लिए बहुत से खतरे उत्पन्न किए हैं। अस्वच्छ जल विश्व भर की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सम्बन्धी जोखिम है जिसने जीवन की गुणवत्ता एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरे में डाला है। नदियों में भी रासायनिक पदार्थ एवं बीमारियाँ उत्पन्न करने वाले तत्व प्रवाहित हो रहे है। प्रदूषकों के कारण श्वसन सम्बन्धी बीमारियाँ जैसे अस्थमा आदि उत्पन्न हो रही है।

  9. आनुवांशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) –

    जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करके भोज्य पदार्थों का आनुवांशिक संसाधन किया जाना आनुवंशिकीय इंजीनियरिंग कहलाता है। भोज्य पदार्थों में किए जाने वाले आनुवंशिकीय सुधारों से ट्रॉक्सिन एवं जीन सम्बन्धी बीमारियाँ बढ़ती हैं। आनुवंशिकी रूप से संशोधित फसले गम्भीर पर्यावरणीय समस्या उत्पन्न कर सकती है। क्योकि अभियान्त्रिक किए गये जीन जंगली जीवों को जहरीला बना सकते हैं।

इस प्रकार, विश्व भर की जीवन शैली को बदलने की आवश्यकता है ताकि अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण समस्याओं का उन्मूलन किया जा सके।

अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय मुद्दों के उत्पन्न होने के सम्बन्ध में उत्तरदायी घटक

(Factors Responsible for the Emergence of the Environment as a Global Issue)

ये घटक निम्नलिखित हैं –

  1. पर्यावरणीय समस्याओं की बहुसंख्यक्ता एवं गहराना

    विश्व की आबादी में अत्यधिक वृद्धि तथा इसके द्वारा संसाधनों का अत्यधिक दोहन किए जाने के कारण पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। वनोन्मूलन, वायु प्रदूषण, तेजाबी वर्षा, ओजोन क्षय आदि पर्यावरणीय समस्याएँ विद्यमान हैं। बहुत से लोग यह अनुभव करते हैं कि पर्यावरण मानवीय क्रियाओं ने प्रभाव डाला है। उदाहरण के तौर पर, लव कैनाल, न्यूयार्क में जहरीले अपशिष्ट पदार्थ एकत्र हो गए हैं।

  2. वैज्ञानिक शोध में वृद्धि

    पर्यावरणीय समस्याओं में वैज्ञानिक शोध में वृद्धि होने से कई पर्यावरणीय समस्याओं की जानकारी हुई हैं। रचेल कार्लसन ने डी.डी.टी पर कार्य करके रसायनों के परिणामों की जानकारी जनता को दी है।

  3. पर्यावरणीय विध्वंस के बारे में सूचनाओं का प्रभावी प्रसारण

    रेडियों, टेलीविजन, ई-मेल, वेब, पुस्तक प्रकाशन एवं वायु परिवहन आदि के कारण पर्यावरणीय समस्याओं के बारे में शीघ्र जानकारी मिल जाती है।

  4. आधारभूत पर्यावरणीय संगठनों की स्थापना

    त्यानीय पर्यावरणीय समस्याएँ जो जहरीले अपशिष्ट पदार्थों के जमा होने, नभिकीय संयन्त्र स्थापित होने, पेड़-पौधों आदि की सुरक्षा में प्रयुक्त होने वाले रसायनों के उपयोग से उत्पन्न होती है, के समाधान के लिए स्थानीय स्तर पर बने पर्यावरणीय संगठन जागरूक करते हैं।

  5. राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय राजनैतिक (हरित) संगठन

    बहुत से देशों में पर्यावरण वाद एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बन गया है। इसलिए वहाँ पर हरित आन्दोलन एवं हरित राजनीतिक दल पर्यावरणीय प्रबन्धन नीतियों में सुधार करवाना चाहते हैं। जर्मनी, ब्राजील, जापान, कनाडा आदि में इस तरह के प्रयास हो रहे हैं। हरित दलों के प्रत्याशी स्विट्जरलैण्ड, फिनलैण्ड, बेल्जियम, पुर्तगाल, आस्टिया, इटली आदि देशों की संसद में पहुँचे है।

  6. आर्थिक क्रिया एवं पर्यावरण के बीच सम्बन्ध

    पर्यावरणीय मुद्दों पर शोध पर वृद्धि हुई है तथा शोध के परिणामों के प्रभावी प्रसार के कारण लोगों में आर्थिक क्रियाओं एवं पर्यावरणीय समस्याओं के मध्य सम्बन्ध होने की जानकारी बढ़ी है।

पर्यावरणीय प्रबन्ध के सम्बन्ध में अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास

(International Efforts on Environmental Management )

ये घटक निम्नलिखित हैं-

  1. 1972 का स्टॉकहोम का अधिवेशन (1972 Stock holm’s Conference) –

    विश्व के नेताओं ने मानवीय पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में स्टॉकहोम (स्वीडन) में सभा की । इस अधिवेशन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरणीय कार्यक्रम पर सहमति बनी। इसमें यह तय हुआ कि देशों के बीच पर्यावरणीय मुद्दों पर बातचीत करके संन्धियाँ की जाय तथा उनका क्रियान्वयन किया जाय।

विश्व में होने वाली अनेक प्राकृतिक एवं औद्योगिक दुर्घटनाओं के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस समस्या को सामूहिक रूप से विश्व हित में समाधान करने हेतु प्रयत्न किए है। वर्ष 1972 में मानव पर्यावरण पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन स्टाकहोम (स्वीडन) में किया गया। इस सम्मेलन में 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर 26 सूत्री ‘महाधिकार पत्र’ घोषित किया।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मानव पर आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन (5-16 जून, 1972) सम्मेलन में पर्यावरणीय सुधार एवं सुरक्षा हेतु निम्नलिखित मुख्य घोषणाएँ की गई –

  • जनसंख्या वृद्धि कम करने के लिए उचित योजनाएँ तथा उपाय क्रियान्वित करने चाहिए।
  • पर्यावरण की सुरक्षा तथा सुधार पूरे विश्व के लोगों के हित में किया जाय।
  • विकासशील देश अपने विकास के प्रयासों को लोगों की जरूरतों की प्राथमिकताओं व पर्यावरण सुधार को ध्यान में रखते हुए नियंत्रित करें।
  • पर्यावरणीय लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु नागरिकों तथा समुदायों व सभी संस्थाओं और संस्थाओं द्वारा सार्वजनिक प्रयासों में न्यायसंगत भागीदारी के उत्तरदायित्व को मान्यता मिले।
  • प्रकृतिदत्त एवं मानवकृत पर्यावरण मनुष्य के स्वयं के रख-रखाव, मानव अधिकार और स्वयं के जीवन अधिकार के उपभोग हेतु आवश्यक होता है।
  • पर्यावरण में परिवर्तन करने की योग्यता रखने वाले व्यक्ति पर्यावरण का उपयोग अपनी बृद्धिमता से करके लोगों का विकास के लाभ एवं जीवन में गुणवत्ता की वृद्धि के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
  1. पर्यावरण एवं विकास पर रियो सम्मेलन (Rio Conference on Environment and Development)-

    ब्राजील के रियो डी जेनिरो शहर में 3 से 14 जून, 1992 तक संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘पर्यावरण और विकास सम्मेलन का आयोजन हुआ। जिसे ‘पृथ्वी सम्मेलन’ कहा जाता है। इस सम्मेलन में विश्व के 170 देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में विभिन्न परम्परागत समस्याओं जैसे- बढ़ती जनसंख्या, ईंधन की कमी, वन क्षेत्र की निरन्तर कमी, ग्रीन हाउस का बढ़ता प्रभाव, ओजोन परत का विघटन, शीत उपकरणों में क्लोरो कार्बन्स के स्थान पर नई टेक्नोलॉजी, प्रदूषण की रोकथाम आदि पर गहन चर्चा हुई। इसके साथ ही जैव विविधता तथा स्वच्छ टेक्नोलॉजी के हस्तान्तरण पर भी विशेष जोर दिया गया। इस सम्मेलन में एजेण्डा -21 एक प्रमुख दस्तावेज था जो 21वीं सदी की मुख्य कार्य योजना थी। इसका महत्वूपर्ण मुद्रा यह था कि विकसित देश अपनी आय 0.7% ‘पर्यावरण कोष’ में जमा कराएँ जिससे अन्य देश अपने देश को पर्यावरणीय समस्याओं से बचाने में होने वाले व्यय की पूर्ति कर सकें।

  2. पर्यावरण पर जोहान्सबर्ग सम्मेलन (2002) (Johannesburg’s Conference on the Environment (2002) –

    पर्यावरण पर होने वाला यह तीसरा अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन था। इस सम्मेलन का आयोजन वर्ष 2002 की गर्मियों में जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में आयोजित किया गया है।

अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय ठहरावों की सीमाएँ

(Limitation of International Environmental Agreements)

ये निम्नलिखित है –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय सन्धियाँ केवल उन राज्यों को बाध्य करती है जो उनके अनुपालन की सहमति देते है।
  2. ऐसा कोई अन्तर्राष्ट्रीय पुलिस बल नहीं है जो ठहरावों एवं सन्धियों के प्रावधानों के अनुपालन के लिए बाध्य करता हो। अनुपालन के सम्बन्ध में किसी पुरस्कार या दण्ड की व्यवस्था नहीं
  3. धनी एवं निर्धन देशों के नेता पर्यावरणीय समस्याओं की प्रकृति पर अलग-अलग विचारधारा रखते हैं तथा इनमें बहुधा परस्पर असहमति बनी रहती है।
  4. विभिन्न देशों के नेताओं द्वारा उठायी जाने वाली पर्यावरणीय समस्याएँ एवं समाधान अपने-अपने देशों की राजनीति के अनुसार व्यक्त किये जाते हैं।
  5. स्थानीय पर्यावरणीय मुद्दों की राजनीति तथा अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय मुद्दों की राजनीति तथा टकराव बना रहता है।
  6. वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति देशों के दृष्टिकोण में अन्तर है तथा अलग-अलग देश अपने परिस्थितियों के अनुरूप ही ध्यान देते हैं।
  7. धनी एवं निर्धन देशों में से कोई भी देश पर्यावरणीय समस्याओं का उत्तरदायित्व लेने के लिए तैयार नहीं है तथा इस बात पर भी सहमति नहीं है कि पर्यावरणीय समस्याओं की लागत कौन सहन करे।

पर्यावरण के प्रति धनी शक्तिशाली देशों तथा निर्धन विकासशील देशों के उत्तरदायित्व

(Responsibilities of Rich Powerful Countries towards Environment) –

धनी शक्तिशाली देशों के पास पर्यावरणीय समस्याओं एवं समाधानों के सम्बन्ध में ज्यादा अनुभव है। गहन शोधों ने पर्यावरणीय समस्याओं की गम्भीरता को प्रकट दिया है। दूरदर्शन, रेडियो, प्रेस, व अत्याधुनिक संचार माध्यमों ने पर्यावरणीय समस्याओं के प्रसारण को सुनिश्चित किया है। धनी देशों के पास पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान हेतु अधिक साधन है। धनी देशों में पर्यावरणीय क्रियात्मकता अधिक विकसित है। यहाँ गठित किए गये पर्यावरणीय हित समूह पर्यावरण सुधार हेतु कार्य करते है। इसलिए विकसित देश पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान हेतु अधिक कार्य करने में सक्षम हैं।

पर्यावरण के प्रति निर्धन विकासशील देशों के उत्तरदायित्व

(Responsibilities of Poor Developing Countries Towards Environment)-

निर्धन देशों के नेता वैश्विक पर्यावरणीय अधिशासन के प्रति कम उत्साहित हैं। क्योंकि :

  1. यहाँ आर्थिक विकास को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है तथा पर्यावरण संरक्षण को कम।
  2. निर्धन विकासशील देशों का विचार है कि धनी देशों ने पर्यावरणीय समस्याएँ बढ़ाने में ज्यादा योगदान दिया है।
  3. निर्धन देशों के पास पर्यावरण सुधार हेतु बहुत न्यून संसाधन हैं तथा तकनीक स्तर भी अत्यन्त नीचा है।
  4. विकाशील देश भारी विदेशी ऋण, कमजोर बाजार, आदि के दबाव के कारण अपने वनों एवं प्राकृतिक संसाधनों का अधिक दोहन करने के लिए बाध्य हैं।
  5. विकासशील निर्धन देशों की तेजी से बढ़ती हुई आबादी, संसाधनों के विदोहन को आवश्यक करती है, इससे पर्यावरणीय अवनयन और ज्यादा गहरा होता जा रहा है।

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