संधारणीय विकास एवं असंपोषणीय विकास

संपोषणीय विकास

संपोषणीय विकास (Sustainable Development)

संपोषणीय विकास का प्रयोग सर्वप्रथम 1970 में पर्यावरण और विकास पर कोकोयाक घोषणा के समय पर किया गया था। संपोषणीय विकास से हमारा तात्पर्य उस विकास से है जो भावी पीढ़ियाँ ‘अपनी योग्यताओं को पूरा करने की योग्यता को बिना जोखिम में डाले वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकता को पूरी करती हैं। पर्यावरण अवनयन का सबसे बड़ा कारक प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षण की तरफ बिना कोई ध्यान दिये ही अनियंत्रित और अनियमितता क्रियाकलाप है, परन्तु इससे यह अभिप्रेत नहीं है कि औद्योगिक और धार्मिक विकास किया जाये। यदि ऐसा किया गया तो इसके परिणाम मानव जाति के लिए भयंकर तथा विनाशकारी होंगे, विशेषकर विकासशील देशों के लिए। विश्व संरक्षण युक्ति का यह स्पष्टीकरण है कि विकास और संरक्षण दोनों ही हमारे जीवन को बनाये रखने के लिये समान रूप से आवश्यक हैं।

‘पर्यावरण तथा आर्थिक संवृद्धि में हम लोगों ने देखा है कि तीव्र आर्थिक संवृद्धि से बहुत अधिक तथा गम्भीर रूप में पर्यावरण का क्षरण होता है और यह क्षरण अपोषणीय हो सकता है क्योंकि पर्यावरण आर्थिक संवृद्धि को बनाये रखने में बहुत लम्बी अवधि तक मददगार नहीं हो सकता है। यदि इचित नीतियाँ नहीं अपनायी गयी तो भावी पीढ़ी तक मानव जीवन को एक निश्चित निर्वाह के स्तर पर बनाये रखने के लिए आवश्यक परिस्थितिकी कायम नहीं रह सकेगी। 1987 में प्रकाशित बुंडलैण्ड आयोग की रिपोर्ट के पश्चात् पर्यावरणीय विवेचन में सबसे प्रचलित प्रश्न वर्तमान स्थिति में पोषणीयता तथा विश्व अर्थव्यवस्था में हो रही विकास की दर का रहा है। ‘पोषणीयता’ शब्द पहली बार महत्व में तब आया जब International Union for Conservation of Nature and Natural Resources द्वारा 1986 में वर्ल्ड कन्जरवेशन स्ट्रैटेजी प्रस्तुत की गयी पर इसे अधिक प्रयोग तब से लाया जाने लगा।

‘पोषणीय विकास’ विकास का वह स्तर है जो वर्तमान की आवश्यकताओं की, भावी पीढ़ी की अपनी आवश्यकताओं की सन्तुष्ट करने की क्षमता से समझौता किए बगैर सन्तुष्टं करता है।

प्रो. पिनाकी चक्रवर्ती के अनुसार पोषणीयता की समस्या मुख्यतया लोचशीलता के महत्व तथा प्रकृति की समाहित करने की क्षमता के विरुद्ध प्रकृति को हानि पहुँचाने वाली आर्थिक क्रियाओं के वृहद पैमाने पर संचयी दबाव के कारण इत्पन्न होती है। पारितंत्र की लोचशीलता में झटकों तथा अवरोधों को निरस्त करने की क्षमता होती है जबकि पारितंत्र की संवहनीय क्षमता वह अधिकतम दबाव है जो वह अवशोषित कर सकती हैं। यदि प्रदूषण की मात्रा इससे अधिक हुयी तो विकास पोषणीय नहीं होगा।

असंपोषणीय विकास (Non-sustainable Development) 

असंपोषणीय विकास से हमारा तात्पर्य उस विकास से है जो भावी पीढ़ियों को अपनी योग्यताओं को पूरा करने की योग्यता को जोखिम में डालकर वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकता को पूरा करती है। वास्तव में यह उसके प्रकृति अथवा पर्यावरण उपयोग की कहानी है, क्योंकि आदिम व्यवस्था से वर्तमान समय तक हम पर्यावरण का उपयोग कर प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं और भविष्यवाणी प्रगति भी इसी पर निर्भर करती है। विकास के प्रारम्भ में मानव तथा पर्यावरण में सामंजस्य था, अतः वह निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता रहा। यद्यपि इसके कारण सीमित जनसंख्या सीमित आवश्यकताएँ एवं तकनीकी ज्ञान की कमी भी नहीं है किन्तु जैसे-जैसे औद्योगिक एवं तकनीकी प्रगति होती गई वैसे-वैसे प्रकृति के शोषण में वृद्धि होने लगी तो दूसरी ओर उसका प्रभाव अथवा प्रकोप भी प्रारम्भ हो गया। यद्यपि इसका प्रारम्भ औद्योगिक एवं परिवहन क्रान्ति से ही हो गया था, किन्तु विकास की दौड़ में सम्भवतः मनुष्य के पास यह सोचने का समय नहीं था कि अनियमित एवं अनियंत्रित पर्यावरण शोषण विकास के स्थान पर कुछ इस प्रकार की समस्याओं को जन्म देगा जो उसके स्वयं के अस्तित्व के लिए संकट का कारण बन जायेगी। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ऐसा विकास जिससे मानव के लिए संकट उत्पन्न हो जाये असंपोषणीय विकास है।

सततीय विकास की कूटनीति

(Strategy of Sustainable Development)

सततीय विकास का अर्थ है टिकाऊ विकास। इस दृष्टिकोण से यह दीर्घकाल तक रहने वाला विकास है। इसका प्रयोग पर्यावरण विकास के सन्दर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आर्थिक विकास का आधार पर्यावरण से प्राप्त विभिन्न संसाधनों पर टिका है। इसलिए इसे पारिस्थितिकीय शाश्वत विकास (ecological sustainable development) या पर्यावरण प्रबन्धन के एक उपागम के रूप में भी प्रयुक्त किया जाता है। विकास के सम्बन्ध में पर्यावरण की शाश्वता का तात्पर्य अनवरत रूप से दीर्घकाल तक बने रहना है अर्थात् ऐसा आर्थिक विकास जो दीर्घकाल तक पृथ्वी पर बना रहे। दूसरे शब्दों में यह सामाजिक-आर्थिक विकास की ऐसी प्रक्रिया है जिसके परिणाम विद्यमान पीढ़ी व भावी पीढ़ी के लिए सुखद रूप से उपलब्ध होते हैं।

भारत में पर्यावरण को बचाने के लिए अनेकों कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। जनसंख्या को रोकना, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग, संसाधनों को बचाने के उपाय, खाने की समस्या को खत्म करने, स्वस्थ जीवन जीने तथा अन्य ऐसे कार्य जिनसे मनुष्य अपने जीवन को ठीक तरह से चला सके, भारत सरकार ने इस विकास हेतु पर्यावरणीय नियोजन एवं समन्वयन की राष्ट्रीय समिति का निर्माण किया गया है।

सततीय विकास के लिए युक्तियाँ

सततीय विकास के लिए निम्नलिखित युक्तियों को अपना सकते हैं –

  1. क्षेत्रीय अनुकूलन के अनुसार, अच्छी तकनीकों के सहारे संसाधनों का अधिक प्रयोग तथा कम बेकार करना।
  2. 3-R को अपनाना (Reduce, Reuse, Recycle approach) कम करना, पुनः प्रयोग करना, पुनः बनाना। इस प्रकार संसाधनों को कम प्रयोग करें, पुनः प्रयोग करें तथा पुनः निर्माण की सोच भी सततीय विकास में अग्रसर होगी।
  3. पृथ्वी के बारे में, पर्यावरण के विषय में समाज को शिक्षा तथा जानकारी देना, आजकल के मानव क्रियाकलापों से पृथ्वी तथा पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को बताना, स्कूल, कालेजों में पर्यावरण की आवश्यक रूप से शिक्षा देना।
  4. अपनी क्षमताओं के अनुसार संसाधनों का निर्माण तथा संसाधनों को प्रयोग करने तथा उसके बाद संसाधनों के प्रयोगों की जानकारी तथा पर्यावरण से संसाधनों के सम्बन्ध को बनाये रखना भी सततीय विकास का एक रास्ता है।

सतत विकास को प्राप्त करने में पर्यावरणीय नीति

सतत विकास को प्राप्त करने में पर्यावरणीय नीति विशेष रूप से सहायक रही है क्योंकि पर्यावरणीय नीति की सहायता से सतत विकास को प्राप्त किया जा सकता है तथा सतत विकास के माध्यम से वर्तमान के साथ-साथ भविष्य की पर्यावरणीय समस्याओं को संकलित किया जाता है। मानव ने अपनी सुविधाओं के लिए अपने भविष्य को पर्यावरणीय व्याधियों से अन्धकारमय करना प्रारम्भ कर दिया है। जैसे – औद्योगिक विकास, शहरीकरण, तीव्र जनसंख्या वृद्धि, वनों की कटाई तथा प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन आदि। ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों के अविनेकपूर्ण दोहन से भविष्य में ऊर्जा संकट की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। इस प्रकार आज विकास को आधार बनाकर पर्यावरण के साथ घोर अन्याय एवं अत्याचार किया जा रहा है। मानव की इन क्रियाओं को प्रकृति लम्बे समय तक सहन नहीं कर सकती है क्योंकि उसकी भी सहने की एक सीमा होती है। जब प्रकृति की सहनशीलता समाप्त हो जाती है, तो वह अपने ऊपर अन्याग व अत्याचार करने वाला को दण्डित करती है। मानव द्वारा किये जाने वाले प्राकृतिक विदोहन से सन्तुलित पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है। जिसे पर्यावरणीय नीतियों द्वारा ही सन्तुलित किया जा सकता है। सतत् विकास के अन्तर्गत पर्यावरण एवं समाज के हितों के अनुकूल विकास के कार्यक्रमों को योजनाबद्ध रूप में निर्मित कर क्रियान्वित किया जाता है।

अतः संतत विकास को प्राप्त करने के लिए पर्यावरणीय नीतियों का सहारा लिया जाता है। इसके माध्यम से पर्यावरण प्रदूषण व संसाधनों का संकट आदि के दुष्परिणामों को ध्यान में रखकर विकास की प्रक्रिया को जारी रखा जाता है क्योंकि पर्यावरणीय समस्याओं के कारण विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता है, तो पर्यावरण ह्रास के कारण समस्त जीव जगत पर बढ़ते संकट की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती है। पर्यावरणीय समस्याओं का निदान करने के लिए सतत विकास की आवश्यकता है। सतत विकास से आशय ऐसे विकास से है जो पर्यावरण को हानि पहुँचाए बिना जीवन की गुणवत्ता जारी रख सके।

भारत में सतत विकास को प्राप्त करने में पर्यावरणीय नीतियों के कुछ ऐसे उपायों को अचानक जाना चाहिए, जो पर्यावरण की रक्षा में कारगर सिद्ध हों। भारत में पर्यावरण संरक्षण व सतत विकास को प्राप्त करने हेतु अनेक उपाय किये गये। जैसे – पर्यावरण संगोष्ठियों का निर्माण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डो का गठन, पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी कानूनों का निर्माण वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीवन अभयारण्यों की स्थापना तथा ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का विकास आदि ।

‘उपरोक्त विवेचन के आधार पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि सतत विकास को प्राप्त करने में पर्यावरणीय नीति अत्यन्त सहायक हुई है।

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