व्यावसायिक निर्देशन- आवश्यकता एवं उद्देश्य

्यावसायिक निर्देशन- आवश्यकता एवं उद्देश्य

व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता (Needs for Vocational Guidance)

वैयक्तिक भिन्नताओं एवं व्यावसायों को विविधता के कारण व्यावसायिक निर्देशन की प्रक्रिया का उपयोग करना अत्यन्त आवश्यक होता है। मानवीय व्यक्तित्व की जटिलता तथा व्यावसायिक कार्यक्षेत्रों में होने वाले तीव्रगामी परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए व्यवसायिक निर्देशन की आवश्यकता और भी अधिक अनुभूति की जाने लगी है। इस प्रक्रिया की महत्ता, केवल किसी व्यवसाय में प्रवेश करने की दृष्टि से ही नहीं, वरन् व्यवसाय में प्रविष्ट होकर वृत्तिक सन्तोष की दृष्टि से भी यह सहायक हैं संक्षेप में व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता को निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है।

  1. वैयक्तिक भिन्नताओं की दृष्टि से,
  2. व्यावसायिक भिन्नता की दृष्टि से,
  3. समाज की परिवर्तित दशाएं
  4. मानवीय क्षमताओं का वांछित उपयोग करने हेतु
  5. व्यावसायिक प्रगति हेतु
  6. स्वास्थ्य को बनाएँ रखने की दृष्टि से, तथा
  7. पारिवारिक एवं व्यावसायिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करने की दृष्टि से।

उपरोक्त आवश्यताओं का वर्णन इस प्रकार हैं-

  1. वैयक्तिक भिन्नताओं की दृष्टि से (From the Standpoint of Individual Differences)- वैयक्तिक भिन्नता के सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में निहित योग्यताएँ, क्षमताएँ, रूचि, अभिरूचि, आदि भिन्न-भिन्न होती हैं। किसी न किसी रूप में, प्रत्येक व्यक्ति एक है दूसरे से भिन्न होता ही है। इस विभिन्नता की समुचित जानकारी प्राप्त किए बिना यह सम्भव नहीं है कि व्यक्ति की अभिरूचि, भावी प्रगति अथवा व्यावसायिक अनुकूलता के सम्बन्ध में निश्चित कथन दिया जा सके। किसी भी व्यवसाय के लिए अनुकूल व्यक्तियों का चयन करने से पूर्व वैयक्तिक विभिन्नताओं के स्तर एवं स्वरूप की जानकारी आवश्यक होती है, क्योंकि प्रत्येक व्यवसाय के लिए कुछ विशेष योग्यताओं वाले व्यक्ति की आवश्यकता होती है। निर्देशन के द्वारा इस सन्दर्भ में विभिन्न माध्यमों से पर्याप्त सूचनाएं एकत्र की जा सकती है।
  2. व्यावसायिक भिन्नता की दृष्टि से (From the Standpoint of Vocational Difference)- प्राचीन समय में देश की अधिकांश जनता कृषि व्यवसाय के माध्यम से ही अपनी जीविकोपार्जन की समस्या का समाधान कर लेती थी। समाज की आवश्यताएं भी उस समय सीमित थी तथा जनसंख्या का धनत्व अपेक्षाकृत कम था। संयुक्त परिवार प्रथा के कारण एक परिवार के सदस्यों को एक ही स्थान पर रहकर अधिकाधिक अर्थोपार्जन का अवसर सुलभ रहता था। परन्तु जनसंख्या की तीव्रगति से होती हुई वृद्धि आवश्यकताओं में वृद्धि, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण आदि के फलस्वरूप अनेक नवीन प्रकार के उद्योगों, व्यवसायों की आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा।
  3. समाज की परिवर्तित दशाएं (Changing Conditions of Society)- समाज की पारिवारिक, आर्थिक, धार्मिक आदि विभिन्न दशाओं में आज पर्याप्त अन्तर हो चुका है। एक समय था जब व्यक्ति की योग्यताओं, व्यक्ति के अस्तित्व एवं परोपकार की दृष्टि से किए जाने वाले कार्यों को महत्व दिया जाता था वर्तमान समाज की स्थितियाँ सर्वथा भिन्न हैं। आज व्यक्ति के स्तर, धन, भौतिक साधनों को अधिक महत्व दिया जाता है। अपने पड़ोस, सम्बन्धियों एवं परिचितगणों से सम्मान प्राप्त करने के लिए आज यह आवश्यक है कि व्यक्ति का रहन-सहन का स्तर संतोषजनक हों। व्यक्ति के सम्मान एवं सामाजिक मान्यता प्राप्त करने का आज यहीं आधार है।
  4. मानवीय क्षमताओं का वांछित उपयोग करने हेतु (To Utilise the Efficiency of Human being Adequately)- समाज अथवा राष्ट्र की प्रगति के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि मानवीय क्षमताओं का समुचित प्रयोग किया जाए। प्रगति की दौड़ में आज जितने भी राष्ट्र अग्रणीय है, उनकी सफलता का एक प्रमुख रहस्य यह भी है कि उन देशों में व्यक्ति की क्षमताओं का समुचित उपयोग किया जाता है। हमारे यहाँ व्यक्ति की योग्यता का सही मूल्यांकन प्रायः नहीं हो पाता है। योग्यता एवं व्यावसायिक अवसर में अन्तर इस सीमा तक है कि जिन व्यक्तियों को मात्र एक लिपिक के रूप में कार्य करना चाहिए था वह अफसर बना दिए गए है और जो अधिकारी होने चाहिए थे वह मात्र लिपिक के रूप में ही जीविकोपार्जन कर रहे हैं। रिश्वत, सिफारिश, जातिवाद, वर्गवाद, मूल्यांकन की अनुचित कसौटियां आदि अनेक कारक इस प्रकार की दुरावस्था के लिए उत्तरदायी है।
  5. व्यावसायिक प्रगति हेतु आवश्यक (Essential for Vocational Progress)- व्यावसायिक निर्देशन का महत्व केवल किसी व्यवसाय में प्रविष्ट होने की दृष्टि में ही नहीं है, वरन् व्यवसाय में निरन्तर प्रगति करने की दृष्टि से भी है। व्यावसायिक प्रगति एवं व्यावसायिक प्रगति के आधार पर उपलब्ध वृत्तिक सन्तोष क्षमताओं एवं कौशलों का निरन्तर विकास किया जाता रहा। व्यावसायिक निर्देशन के द्वारा यह जानकारी प्रदान की जा सकती है कि अपनी कार्य क्षमता का विस्तार किस प्रकार किया जाएं ? किसी व्यवसाय में सफल होने के लिए किस प्रकार के व्यक्तित्व की आवश्यकता है तथा इस प्रकार के व्यक्तित्व का निर्माण किस प्रकार किया जा सकता है। इस प्रकार, किसी व्यवसाय से सम्बन्धित जानकारी एवं कौशलों के विकास में सहायक व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्रो आदि से सम्बन्धित सूचनाएं प्रदान की जा सकती हैं।

उद्देश्य (Objectives of Vocational Guidance)

व्यवसायिक निर्देशन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है-

  1. विद्यालयों में व्यवसाय से सम्बन्धित सूचनाओं को विश्लेषण करने की योग्यता एवं क्षमता विकसित करना।
  2. सत्यनिष्ठा से किया गया कार्य सदैव सर्वोत्तम होता है कि भावना का छात्रों में विकास करना।
  3. व्यक्ति के व्यवसाय चयन के पश्चात उसकी अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में सहायता प्रदान करना।
  4. छात्रों को विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों से अवगत कराना।
  5. गरीब विद्यार्थियों को अर्थ के अतिरिक्त अन्य प्रकार की सहायता प्रदान कर, उनकी व्यवसाय से सम्बन्धित योजना को सफल बनाना।
  6. छात्रों को भिन्न-भिन्न व्यवसायों का निरीक्षण करने हेतु सुविधाएँ उपलब्ध कराना।

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