विशेष शिक्षा की आवश्यकता  | Need for Special Education

विशेष शिक्षा की आवश्यकता  | Need for Special Education

विशिष्ट बालकों के लिए विशेष शिक्षा की आवश्यकता होती है। विशिष्ट बालकों में शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक और व्यवहारपरक कुछ विशेषताएँ अवश्य होती हैं। ऐसे भी विशिष्ट बालक होते हैं, जिनका बुद्धि लब्धांक उच्च स्तर का होता है। अतः विशिष्ट बालक अपनी विशेषताओं के कारण ही सामान्य रूप से दी जाने वाली शिक्षा का लाभ नहीं उठा पाते। सामान्य कक्षा में सामान्य बालकों के साथ दी जाने वाली सामान्य शिक्षा उनके लिए उपयोगी सम्भव नहीं होती। उन्हें अपनी क्षमताओं और आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा की आवश्यकता होती है। ऐसा तभी संभव हो सकता हैं, जब उनके लिए विशेष शिक्षा की व्यवस्था की जाये। विशिष्ट बालकों को भी विकास का अवसर मिलना चाहिए। उनमें भी प्रकृति प्रदत्त शक्तियाँ होती हैं, जो समुचित वातावरण में विकसित होती है। विशिष्ट बालक हमारे समाज के अभिन्न अंग हैं। सामाजिक सुविधा का उपयोग करना उनका अधिकार है।

राष्ट्रीय विकास एवं उत्पादन में भी योगदान होना चाहिए। ऐसा तभी सम्भव है, जब उनके लिए विशेष शिक्षा की व्यवस्था की जाये। शिक्षा प्राप्त करना उनका मौलिक अधिकार है। इस अधिकार से इन्हें वंचित नहीं किया जा सकता। कहने का आशय यह है कि मानवीय दृष्टिकोण से उचित शिक्षा की व्यवस्था करने की आवश्यकता है, तभी हम अपने आदर्श उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं।

  1. सम्पूर्ण मानवीय शक्ति का दृष्टिकोण-

    मानवीय शक्ति राष्ट्र की सम्पत्ति है। राष्ट्रीय उत्पादन बढ़ाने एवं राष्ट्र का विकास करने में उसका अमूल्य योगदान होता है। शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं के कारण व्यक्ति की कुशलताएँ प्रस्फुटित नहीं हो पाती। और इस प्रकार समाज उनकी कुशलताओं का उपभोग करने से वंचित रह पाता है तथा राष्ट्र अपनी सम्पूर्ण मानवीय शक्ति के सदुपयोग नहीं कर पाता। परिणामतः राष्ट्रीय विकास में बाँधा उत्पन्न हो जाती है। आधुनिक समाजों में सम्पूर्ण मानवीय शक्ति के सदुपयोग पर बल दिया जाता है। अतः आवश्यक है कि अपवादी बालकों के लिए विशेष शिक्षा की व्यवस्था की जाये।

  2. मानवतावादी दृष्टिकोण-

    विशिष्ट बालकों का कोई अलग समाज, परिवार या जाति नहीं होती। वे हमारे अपने परिवार के सदस्य ही होते हैं, उन्हें भी ज्ञानार्जन करने, अपनी प्रतिभाओं का विकास करने, रोजी-रोटी कमाने और सामान्य नागरिक की भाँति जीवन-यापन करने का अधिकार है। यही मानवतावादी दृष्टिकोण है और लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है। शारीरिक एवं मानसिक अक्षमताओं के कारण तथा व्यवहार विकास के कारण किसी बालक या व्यक्ति की उपेक्षा करना न तो न्याय-संगत है और न ही मानवीय दृष्टिकोण से उचित है।

  3. समायोजन का दृष्टिकोण-

    विशिष्ट बालकों के सामने समायोजन की समस्या जन्मजात होती है। परिवार, विद्यालय, समाज तथा मित्रमंडली में उनका सामान्य बालकों के साथ समायोजन नहीं हो पाता है। विशिष्ट बालक अपने को उपेक्षित अनुभव करते हैं और उदासीन दिखाई पड़ते हैं। कुसमायोजन की स्थिति धीरे-धीरे जटिल समस्या बनकर हमारे सामने आ जाती है। विशिष्ट बालकों के कुसमायोजन के अंकुर उत्पन्न न हों, इसके लिए विशेष शिक्षा एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।

  4. वैशिष्ट्य का आधार-

    कुछ अपवादी बालकों में विशिष्टताओं का स्तर इतना अधिक होता है कि सामान्य बालकों से वे भिन्न दिखाई पड़ते हैं। सामान्य शिक्षण प्रशिक्षण इनके लिए व्यर्थ होता है। उदाहरण के लिए, गम्भीर रूप से मानसमन्द बालक, अंधे, गूंगे व बहरे बालक या उच्च प्रतिभा सम्पन्न बालक इसी श्रेणी में आते हैं। इस प्रकार के बालक सामान्य शिक्षा कार्यक्रम से लाभान्वित नहीं होते हैं। सामान्य शिक्षक तथा सामान्य शिक्षण पद्धतियाँ एवं अनुशासन उनके लिए व्यर्थ होती है। ऐसे बालकों के लिए विद्यालयों, विशेष कक्षाओं, उपकरणों एंव शिक्षण प्रविधियों की आवश्यकता होती है।

  5. समुचित विकास के लिए-

    शायद ही कोई विशिष्ट बालक समाज के लिए अनुपयोगी या व्यर्थ साबित हो। इनमें भी क्षमताएँ, कुशलताएँ और योग्यताएं होती हैं। यह समाज का उत्तरदायित्व होता है कि उन्हें विकास करने का अवसर प्रदान करें, तभी विशिष्ट बालक की समाज के उपयोगी सदस्य बन सकते हैं और राष्ट्रीय एकता एवं गौरव को बढ़ाने मैं अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं। ऐसे बालकों में कुशलताएँ और क्षमताएँ उत्पन्न करने के लिए उनके अनुरूप शिक्षा व्यवस्था करना आवश्यक होता है।

  6. मानसिक ग्रन्थियों, कुण्ठाओं तथा नैराध्य को कम करने के लिए-

    प्रायः अपवादी बालकों में हीन-भावना का भाव छिपा होता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है, अपवादी बालक की निर्योग्यताएँ उसे सामान्य बालक से पीछे कर देती हैं। वह सामान्य शैक्षिक कार्यक्रमों का लाभ नहीं उठा पाते, खेलों में अपना प्रदर्शन नहीं कर पाते, उनकी मित्र मण्डली सीमित होती है तथा शैक्षिक उपलब्धि भी निराशापूर्ण रहती है। इन सब बातों का प्रभाव बालक मस्तिष्क पर पड़ता है।

अन्त में हम कह सकते हैं कि कुण्ठाएँ और मानसिक ग्रन्थियाँ के कारण इन बालकों में निराशा बढ़ने लगती हैं तथा वे अपने को अकेला अनुभव करने लगते हैं। बालकों का मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है, निराशा और हीन-भावना उनके जीवन का एक हिस्सा बन जाती है।

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