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हिंदू विधि का स्वरूप एवं प्रकृति

हिंदू विधि- स्वरूप एवं प्रकृति

प्राचीन हिंदू विधि शास्त्र में विधि का धर्म और दर्शन से अत्यन्त निकटवर्ती सम्बन्ध रहा है। विधि के स्वरूप के निर्धारण में प्राचीन हिन्दू सामाजिक ढाँचे का महत्वपूर्ण योगदान था, क्योंकि सामाजिक ढांचा आचार, धर्म तथा दर्शन पर आधारित था। यही कारण है कि हिन्दू विधिशास्त्रियों ने विधि की व्याख्या समाज, धर्म और दर्शन के सन्दर्भ में की है। हिन्दू शास्त्रों में विधि को अधिराट् का आदेश नहीं माना गया है। विधि की रचना किसी अधिराट् ने नहीं की, न ही किसी विधानमण्डल ने। यह उन भारतीय मनीषियों द्वारा निर्मित की गयी थी जो कि मूलतः समाजशास्त्री थे और एक अनुशासित समाज में व्यक्तियों के आचरण को नियमबद्ध करके लोक- कल्याण के उद्देश्य की पूर्ति करना चाहते थे। अधिराट् का यह कर्त्तव्य माना जाता था कि वह • विधि को लागू करे और विधि-विरुद्ध चलने वाले व्यक्तियों को दण्ड दे। विधि न केवल उसकी प्रजा के आचरण को अनुशासित करती है वरन् अधिराट् के लिए भी नियम विहित करती है। इस प्रकार यहाँ विधि को अधिराट् के आदेश से भिन्न माना गया है। विधि को “धर्म” का एक भाग माना गया है और धर्म अधिराट् से नहीं उत्पन्न होता। अधिराट् (Sovereign) अथवा राजा स्वयं धर्म से अनुशासित होता है। उसके कर्तव्यों का स्पष्ट उल्लेख स्मृतियों में मौजूद है। वह धर्मशास्त्र में विहित विधियों एवं नियमों के पालन के लिए बाध्य थी। विधिशास्त्रियों ने धर्म अर्थात् विधि को सर्वोपरि माना है, और यह घोषणा की है कि प्रजा पर अधिराट् शासन नहीं करता वरन् विधि शासन करती है। समस्त सृष्टि ही विधि के अधीन है- ‘धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा’।

धर्म शब्द ‘श्रृञ्’ धातु से उद्भूत हुआ है जिसका अर्थ होता है-धारण करना, अर्थात् धर्म से तात्पर्य “धारण करने योग्य से हैं। जो गुण अथवा वस्तु अथवा कार्य धारण करने योग्य होता है, उसे धर्म की कोटि में रखा जाता है। धर्म की परिभाषा इस प्रकार भी की गई है- “वेद में पारंगत उन विद्वानों तथा गुणवान् व्यक्तियों के द्वारा मान्य नियम धर्म है जो घृणा, स्पृहा आदि अवगुणों से रहित है।” ‘मनु के अनुसार, “वेद, स्मृति, सदाचार और जो अपने को तुष्टकर हों, ये चार धर्म के साक्षात् स्रोत हैं।” धर्म के अन्तर्गत मनुष्य के सभी धार्मिक, नैतिक, सामाजिक तथा विधिक कर्त्तव्य सम्मिलित हैं। मेधातिथि जो मनुस्मृति के आदि भाष्यकार थे, धर्म का आशय कर्त्तव्यों से बताते हैं। सम्पूर्ण हिन्दू धर्मशास्त्र की रचना कर्तव्यों की नींव पर की गई थी।

इस प्रकार हिन्दू विधिशास्त्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता धर्म के साथ उसके (विधि) घनिष्ठ सम्बन्ध की है क्योंकि विधि के अनेक नियम धार्मिक नियमों से प्रेरित होते है या निर्मित होते हैं। धर्म के विरोध में कोई विधि नहीं हो सकती। हिन्दू धर्म का इतिहास यह प्रमाणित करता है कि राजशासन विधि-रचना का अलग एवं स्वतन्त्र स्रोत नहीं हो सकता। प्रो. डेरेट ने लिखा है कि धार्मिक परम्परायें सभी प्राचीन रीति-रिवाजों एवं रूढ़ियों के साथ लगी हैं। नैतिकता के सामान्य सिद्धान्त, जो समाज के सभी वर्गों के लिए लागू होते हैं, उनके आपसी व्यवहारों को संयमित करते हैं और यह हिन्दुओं की परम्परा का विशेष अंग है। विधि जिसका सम्बन्ध शान्ति, व्यवस्था एवं सुशासन से है, नैतिकता के सिद्धान्तों से जुड़ी हुई है। प्रारम्भ से ही विधि नीतिपरायणता की शिक्षा का एक अंग माना जाता था।

वैदिक ऋषियों ने विधि को विधिक प्रावधानों के ही सन्दर्भ में नहीं बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में में समझा था। उन्होंने विधि की तादात्म्यता ऋत (समस्त ब्रह्माण्ड की व्यवस्था) से की है। ऋत का सम्बन्ध एक ऐसी सार्वभौमिक व्यवस्था से है जो इस पृथ्वी के न को संचालित तथा सन्नियमित करता है। मनुष्य का जीवन इस पृथ्वी पर अलग नहीं है। भी जीवन को इसका सम्बन्ध समस्त ब्रह्माण्ड से है। अतः यह आवश्यक है कि समस्त ब्रह्माण्ड को सुव्यवस्थित तथा संतुलित रखने के लिये इस पृथ्वी पर रहने वाले व्यक्तियों के जीवन को भी व्यवस्थित एवं सन्नियमित रखा जाय। इस प्रकार इन ऋषियों का विधि सम्बन्धी विचार एक व्यापक तथा श्रृंखलाबद्ध जीवन से ओत-प्रोत था। इसी कारणवश विधि की पूरी अवधारणा नैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक नियमों से आच्छादित है।

हिन्दू विधिकारों ने कानून के नियमों तथा नीति एवं धर्म के नियमों में कोई विशेष भेद नहीं माना है। इनके ग्रंथों में नैतिकता, धर्म एवं कानून के नियमों में अन्योन्य मिश्रण है। वे एक- दूसरे से इतनी घनिष्ठता से जुड़े हैं तथा अन्योन्याश्रित हैं कि उन्हें अलग-अलग समझना कठिन हो जाता है। सभी विधिक नियमों की पृष्ठभूमि में धार्मिक अनुशास्त्रियों को प्रधानता दी जाती थी। किन्तु धार्मिक तथा विधिक नियमों के पारस्परिक सम्बन्धों के बावजूद विधिक नियमों का स्वतन्व अस्तित्व माना जाता था, क्योंकि उनकी उत्पत्ति सामाजिक परिस्थियों की आवश्यकता के परिणामस्वरूप हुई। शास्त्रों में आज्ञापक (Mandatory) तथा अनुदेशात्मक (Recommendatory) विधियों में स्पष्ट अन्तर विहित किया गया है। विधि के स्पष्ट स्वरूप की व्याख्या तथा इनको लागू करने की स्पष्ट घोषणा धर्मशास्त्र की एक विशेषता है।

वस्तुतः हिंदू विधि-शास्त्र के अनुसार विधि धर्म का एक अंग है। हिंदू विधि मनुष्य के आचरणों एवं सामाजिक सम्बन्धों ही समावेश नहीं करती वरन् उसके पारलौकिक जीवन से का सम्बन्धित नियमों की भी व्याख्या करती है। विधि की अनुशास्तियों को दोहरी मान्यता प्रदान की गई थी। प्रथम, यह कि जो व्यक्ति उसके विपरीत आचरण करता था, वह राजदण्ड का भागी होता था। दूसरा यह कि धर्म के नियमों के विपरीत आचरण करने वाला पाप का भागी होता था जिसके कारण (प्रायश्चित के न करने पर) वह परलोक के नरक-यातना को भोगता था। इस प्रकार हिन्दू विधि की अनुशास्तियाँ आधुनिक विधि की अनुशास्तियों से भिन्न थीं। आधुनिक विधिशास्त्र में अनुशास्तियाँ (Sanctions) केवल राज्य द्वारा ही आरोपित की जाती हैं जबकि हिन्दू विधिशास्त्र में राज्य द्वारा आरोपित अनुशास्तियों के अतिरिक्त धार्मिक तथा सामाजिक अनुशास्तियाँ भी प्रदान की गई हैं। व्यक्ति को विधि की अवहेलना करने पर राज्य-दण्ड का भय तो था ही, किन्तु साथ-साथ उसे पाप का भागी होना पड़ता था और वह समाज से भी बहिष्कृत कर दिया जाता था। हिन्दू विधिशास्त्र में अनुशास्तियों को उसी प्रकार विशिष्ट स्थान प्रदान किया गया था जिस प्रकार आधुनिक युग में आस्टिन के आज्ञापक विधि (Positive Law) के सम्बन्ध में उनको स्थान प्रदान किया गया है। आज्ञापक विधि की तादात्म्यता हिन्दू विधिशास्त्र में दण्ड से की गई। मनु ने इस सम्बन्ध में यह लिखा है कि “दण्ड ही सारी प्रजा पर शासन करता है तथा सभी की रक्षा करता है। दण्ड मनुष्यों के सो जाने पर भी जागता रहता है, अतः विद्वानों ने दण्ड को ही धर्म बताया है।” राजा का यह परम कर्तव्य माना जाता था कि वह दण्ड के भागी को, अर्थात् विधि की अवहेलना करने वालों को दण्ड दे तथा दण्ड के जो भागी न हों, उनकी रक्षा करे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो नरक का भागी माना जाता था। इस प्रकार विधि-विरुद्ध आचरण करना राज्य के प्रति अपराध माना जाता था, जिसको रोकना राज्य का दायित्व समझा जाता था।

हिंदू विधिशास्त्र के अनुसार विधि की एक दूसरी विशेषता उसकी विकासशीलता है। स्मृतिकारों के मतानुसार विधि समय-समय पर बदलती रहती है। उसमें संशोधन एवं परिवर्द्धन प्र आवश्यक हो जाता है। यदि उसमें समय के अनुरूप परिवर्तन नहीं लाये जाते तो विधि की उपयोगिता ही समाप्त हो जाती है। पराशर ने इस बात की पुष्टि इस प्रकार की है-“सतयुग, वि त्रेतायुग एवं द्वापरयुग में विधियाँ भिन्न-भिन्न थीं। इसी प्रकार कलियुग में विधि भिन्न होगी। विधि प को तत्कालीन समय के अनुसार होना चाहिये।” इस प्रकार विधि समय की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तित होती रहती है।

इस प्रकार हिंदू विधि-शास्त्र में विधि को सर्वोच्च स्थान दिया गया था। विधि का पालन मान न करने वाला व्यक्ति चाहे वह सामान्य व्यक्ति हो अथवा अधिराट् (राजा) अथवा प्रशासक हो ? द्वास केवल दण्ड का भागी होता है बल्कि सांसारिक जीवन में सुखों एवं सफलताओं से भी वंचित हो जाता है।

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