प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली की असफलता के कारण

द्वैध शासन की असफलता के कारण

द्वैध शासन की असफलता के कारण

द्वैध शासन प्रणाली की असफलता में हम निम्नलिखित कारणों को महत्वपूर्ण मान सकते है :-

  1. दोषपूर्ण सिद्धान्त-

    द्वैध शासन एक गलत पद्धति थी। प्रशासन को दो अलग भागों में विभाजित कर देना ही गलत है। प्रशासन एक प्रकार संगठन है जिसके दो भागों को अग नहीं अधिक बुरा विभाजन संभव नहीं है। के.वी. रेड्डी (जो मद्रास के मंत्री रह चुके थे) का कहना था, मैं एक विकास मंत्री था किंतु वन-विभाग मेरे अधीन नहीं था। मैं कृषि मंत्री था किन्तु सिंचाई विभाग मेरे अधीन नहीं था। कृषि मंत्री के रूप में मद्रास के जिम्मेदारों के ऋण अधिनियम अथवा मद्रास भूमि सुधार के प्रशासन कार्यों के संबंध में मेरा कोई कार्य नहीं था। इससे यह स्पष्ट कि इतने अस्वाभाविक और अव्यावहारिक विभाजन से शासन को सुचारू रूप से नहीं चलाया जा सकता था। हाँ, यदि कार्यकारिणी परिषद् के सदस्यों और मंत्रियों में सहयोग होता तो शायद द्वैध शासन का प्रयोग सफलता प्राप्त कर पाता। परन्तु सहयोग की अपेक्षा असंभव थी क्योंकि ब्रिटिश नौकरशाही के अफ़सर और लोकप्रिय मंत्रियों के दृष्टिकोणों में मौलिक विरोध था।

  2. कार्यकारिणी का सदस्य मंत्री से श्रेष्ठ-

    कार्यकारिणी परिषद् के सदस्यों को मंत्रियों से अधिक महत्त्व और प्रतिष्ठा प्राप्त थी। लॉर्ड लिटन के मतानुसार सरकार की आरक्षित माँग को यद्यपि कोई पंसद नहीं करता था, उसे आदर सब देते थे, जबकि हस्तातरित माँग को न केवल नापसंद किया जाता था अपितु तुच्छ भी समझ जाता था। खसमिति के सदस्यों को प्रत्येक कार्य में प्राथमिकता प्राप्त होती थी। ङ्ग कार्यकारिणी का नवीनतम सदस्य अनुभवी मंत्री से ज्येष्ठ समझा जाता था। स्वयं अधिनियम में ऐसी व्यवस्था थी कि उप-सभापति और अर्थविभाग का अध्यक्ष कार्यकारिणी समिति का सदस्य ही होता था। किसी भी मंत्री को इन पदों पर सुशोभित नहीं किया जाता था।

  3. राज्यपालों की शक्तियाँ-

    इस अधिनियम ने गवर्नरों को हस्तांतरति विभागों के क्षेत्र में इतने व्यापक अधिकार प्रदान किए कि वे मंत्रियों के परामर्श की अवहेलना कर स्वेच्छापूर्वक कार्य करते थे। इस प्रकार शासन की वास्तविक शक्ति मंत्रियों के हाथ में न होकर गवर्नर के हाथ में थी, यद्यपि मंत्री व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी थे। इस प्रकार मंत्रियों को व्यवस्थापिका को भी प्रसन्न रखना पड़ता था तथा गवर्नर को भी। इसके अतिरिक्त मंत्री सरकारी गुट पर अधिक निर्भर करते थे और वे सच्चे मायनों में व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरादायी न रहे सके। कारण यह था कि सरकारी मनोनीत सदस्यों तथा गैर सरकारी मनोनीत सदस्यों को सांप्रदायिक तथा विशेष हितों का प्रतिनिधित्व करने वालों का सदा ही सहयोग मिल जाता था। इस प्रकार उनका प्रभुत्व कायम हो जाता था। फलतः मंत्री व्यवस्थापिका के प्रति बिलकुल ही उत्तरदायी न थे। 1919 के सरकारी कानून में एक व्यवस्था यह थी कि मंत्रीस गवर्नर की इच्छा के अनुसार अपने पद पर रह सकता था। इस व्यवस्था के कारण मंत्रियों का अधिकतर ध्यान गवर्नरों को ही प्रसन्न करने में रहता था। चूँकि उस समय पर परिपाटी नहीं थी कि विधान सभा में अविश्वास प्रस्ताव पास होने अथवा विरोध मत का बहुमत होने पर मंत्रियों को त्यागपत्र देना पड़े, अतः इन परिस्थितियों में यह स्वभाविक ही था कि द्वैध शासन की सांविधानिक प्रकृति को बनाए रखने के लिए एक ऐसे गवर्नर की आवश्यकता थी जो मंत्रियों की मंत्रणा से शासन करे। परन्तु 1919 के कानून ने इस प्रकार की व्यवस्था नहीं की अपितु उसे विस्तृत नियंत्रण की शक्तियाँ प्रदान की गई। कानून ने उसे यह शक्ति प्रदान की थी कि वह मंत्रियों की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं। कार्यपालिका परिषद् और मंत्रिमंडल के बीच झगड़े में केवल गवर्नर का ही मत मान्य होता था। आर्थिक विषयों में गवर्नर को यह अधिकार था कि वह अनुदान की राशि में कटौती करें अथवा उसे बढ़ाए। यहाँ तक कि दैनिक छोटे-छोटे प्रशासकीय विषयों में भी गवर्नर हस्तक्षेप करता था। मंत्रियों तथा जन-सेवा से संबंधित अफ़सरों के बीच झगड़ों में गवर्नर का ही निर्णय अंतिम निर्णय होता था। ऐसे विषयों में गवर्नर अधिकतम विभागीय सचिवों का ही पक्षपात करता था। इस प्रकार भारतीय सेवा आयोग के अफ़सर भी मंत्रिमंडल के सदस्यों से स्वतंत्र होते थे, इससे गवर्नर की स्थिति और भी शक्तिशाली होती थी। विशेष उत्तरादायित्व की शक्तियों के अधीन बहुत से विषय केवल गवर्नर जनरल अथवा भारत सचिव के विचार के लिए रखे जा सकते थे।

  4. मंत्रियों और कर्मचारी वर्ग में ताल-मेल का अभाव-

    मंत्रियों और कर्मचारियों के बीच संबंध आम तौर पर मधुर नहीं होते थे। मंत्रिगण कर्मचारी वर्ग से यह आशा रखते थे कि वे उनके आज्ञाकारी हों और दूसरी ओर कर्मचारी वर्ग मंत्रियों को नौसिखिया समझते थे और यह आशा करते थे कि उनके अनुभव और सलाह पर कार्य करें। यदि किसी मंत्री का किसी विभाग के अध्यक्ष से या मंडल के कमश्निर से या स्थायी सचिव से मतभेद हो जाए तो अंतिम निर्णय के लिए मामला राज्य के सामने पेश किया जाना चाहिए था। विभाग के अध्यक्ष और स्थायी सचिव की सीधी पहुँच राज्यपाल तक थी। आम तौर पर सचिव राज्यपाल से साप्ताहिक भेंट किया करते थे और अपने विभाग से संबंधित सभी मामलों पर चर्चा करते थे। चूँकि राज्यपाल, विभागों का अध्यक्ष और सचिव एक ही वर्ग के होते थे, इसलिए राज्यपाल मंत्रियों की अपेक्षा इनके अधिक समीप होता था। इसलिए साधारणतया मंत्रियों की बजाय विभागाध्यक्षों और सचिवों का पक्ष लेता था। पुनिया के शब्दों में एक मंत्री के लिए इससे अधिक क्षोभकारी और अपमानजनक बात और क्या हो सकती थी कि वह अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अपने निर्णयों के विरुद्ध राज्यपाल के पास अपील करते देखे और वे उसके फैसले को उलटवा दें। इस प्रकार मंत्रियों की स्थिति बहुत ही शोचनीय थी।

  5. काँग्रेस और लीग का रूख-

    द्वैध शासन की असफल का एक और कारण था यह भी था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग का रूख असहयोग का था। महात्मा गाँधी तथा अन्य राष्ट्रीय नेताओं को ब्रिटेन की नेकनीयती पर भरोसा न रहा । 1926 से 1932 तक उनका सारा ध्यान इन सुधारों को क्रियान्वित करने की बजाय पूरी भारतीय जनता के लिए स्वाधीनता प्राप्त करने पर ही केन्द्रित रहा। स्वराज दल- जो एकमात्र संगठित दल था और जिसके नेता श्री चितरंजनदास और पंडित मोती लाल नेहरू थे—इस संविधान को कार्यान्वित करने के लिए नहीं अपितु उसे तोड़ने के लिए कटिबद्ध थे। उन्होंने परिषदों में प्रवेश ही इसीलिए किया था कि वे रोड़े अटकाने की नीति अपना यह सिद्ध कर दें कि सुधार निकम्मे थें।

1919 के कानून ने गवर्नर को कानून निर्माण में व्यापक शक्तियाँ प्रदान की। कोई भी कानून गवर्नर की स्वीकृति के बिना पास नहीं हो सकता था। बहुत से विषय गवर्नर की पूर्व अनुमति के बिना विधान सभा से कानून निर्माण के लिए प्रस्तुत नहीं किए जा सकते थे। कई बिल जो कि विधान सभा द्वारा अस्वीकार कर दिए जाते थे, गवर्नर के द्वारा प्रमाणित कर दिए जाने पर कानून बन जाया करते थे। गवर्नर जनरल की अनुमति से उसे अध्यादेश भी जारी करने का अधिकार था। विस्तृत आर्थिक शक्तियों के आधार पर विधान सभा के द्वारा अस्वीकृत अथवा काटौती की गई अनुदान राशि को गवर्नर पुनः बहाल कर सकता था। बशर्ते कि वह समझता कि प्रांत की शक्ति एवं सुरक्षा के लिए हय आवश्यक है। इन विस्तृत शक्तियों के कारण मंत्रियों को सांविधानिक ढाँचे में उचित और पर्याप्त स्थान नहीं मिला। सी. वाई. चिंतामणि के शब्दों में एक प्रांत में कोई पद्धति किस प्रकार कार्य करती है, यह इस पर निर्भर करता है कि उसको गवर्नर किस प्रकार चलाता है।

द्वैध शासन के अधीन किसी भी ऐसे सिद्धान्त को विकास न हो सकता जिससे पाश्चात्य राजनीतिक आधार पर राजनीतिक दलों का निर्माण हो सके। मंत्रिगण विधान सभा में बहुमत प्राप्त राजनीतिक दलों से संबंधित नहीं थे। प्रारंभ में जो भी दल थे वे स्थान, जाति तथा धर्म के आधार पर गङ्गित थे। उनमें राजनीतिक सिद्धान्तों अथवा दल अनुशासन का अभाव था। ‘स्वराज दल’ वह प्रथम आधुनिक, संगङ्गित राजनीतिक दल था जिसने परिषद् की सदस्यों के लिए चुनाव (1923) में लड़े तथा विजय प्राप्त की। परन्तु ये चुनाव संविधान को नष्ट करने के लिए लड़े गए थे, इसे बनाए रखने के लिए नहीं । द्वैध शासन की सफलता के लिए आवश्यक था कि जनता के नेताओं से सरकार चलाने के लिए पूर्ण सहयोग प्राप्त किया जाए। कानून की अपर्याप्त तथा अस्पष्ट व्यवस्थाओं ने जनता के बीच ऐसी विरोधी भावना पैदा की कि जिससे द्वैध-शासन को सफलतापूर्वक कार्य करना लगभग असंभव हो गया था।

  1. संयुक्त उत्तरदायित्त्व का अभाव-

    इन परिस्थतियों में मंत्रिमंडल प्रणाली की उस महत्त्वपूर्ण विशेषता का विकास न हो सके जिसे संयुक्त उत्तरदायित्त्व का नाम दिया जाता है। संयुक्त चयन समिति का यह विचार था कि मंत्रियों के संयुक्त उत्तरदायित्त्व के सिद्धान्त को स्थापित किया जाए। परन्तु कानून की जिस धारा ने मंत्रियों की कार्यविधि गवर्नर की इच्छा के अधीन रखी थी उसने संयुक्त उत्तरदायित्त्व के सिद्धान्त को विकसित होने से रोक दिया। बहुत से गवर्नरों ने इस सिद्धान्त के स्थापित होने से बाधाएँ पैदा की।

द्वैध शासन की असफलता का एक और बहुत ही बड़ा कारण उस समय की राजनीतिक स्थिति थी। जैसा कि एक समीक्षक का कथन है, इसका जन्म अशुभ नक्षत्रों में हुआ था। चूंकि यह काल राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियों का था, देश का राजनीतिक वातावरण संदेह तथा अविश्वास से भरा हुआ था। यह आर्थिक झंझटो का समय था। साधारण जनता द्वैध शासन को ही अपने कष्टों का उत्तरादायी समझती थी। जैसा कि सर बटलर ने लिखा है, द्वैध शासन भारत में एक गाली बन गई थी। मैंने एक व्यक्ति को यह चिल्लाते हुए सुना, अबे द्वैध शासन! या मैं तुम्हें द्वैध शासन से मारूंगा। पूछने पर कि यह क्या चीज़ है, लड़के ने बताया या एक नए प्रकार का बल्ला है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि द्वैध शासन की पद्धति व्यावहारिक तौर पर असफल रही। इसकी असफलता स्वाभाविक ही थी, क्योंकि यह भारतीय राजनीतिज्ञों के प्रति अविश्वास के सिद्धान्त पर आधारित था। सरकार के कार्यों को दो भिन्न भागों में विभाजित करके उत्तरदायित्व को दो भागों में विभाजित कर दिया गया था। किसी भी मंत्री को उसकी त्रुटियों के लिए उत्तरदायी लहराना अत्यंत ही कठिन था। इस प्रणाली ने कार्य अकुशलता तथा निर्बलता की स्थिति पैदा करके टकराव की असंख्य स्थितियों को जन्म दिया। इसकी सफलता संस्थाओं पर नहीं बल्कि व्यक्तियों पर निर्भर करती थी तथा जो व्यक्ति इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण थे, उन्होंने इसे डीक तरह से नहीं चलाया। द्वैध शासन प्रणाली ने इस व्यवस्था के जन्मदाताओं के उद्देश्य की पूर्ति नहीं की। जैसा कि कूपलैंड ने कहा है कि इसके द्वारा उत्तरदायी शासन के क्षेत्र में वास्तविक प्रशिक्षण नहीं मिला। यद्यपि पहले की अपेक्षा मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हुई थी तथापि एक व्यवस्थित दल-प्रणाली की अनुपस्थिति में मतदाताओं तथा उनके प्रतिनिधियों के बीच एक वास्तविक तथा अटूट संबंध स्थापित न हो सका। विधान सभा के सदस्य, जो कि सांप्रदायिक, स्थानीय अथवा धार्मिक विषयों के आधार पर बँटे हुए थे, सरकार के सहायोगी अथवा अलोचक के रूप में स्वस्थ परिपाटियाँ विकसित न कर सके। हस्तांतरित विषयों के विभागों में वे परिपाटियाँ विकसित न हो सकी जो कि ब्रिटिश प्रणाली की सांविधानिक प्रशिक्षण के उस चरण से न गुजर सके जो भविष्य में उन्हें बड़े राजनीतिक उत्तरदायित्वों के लिए तैयार कर सकता।

द्वैध शासन का परीक्षण हमारे देश में सोलह वर्ष चला। 1920 के चुनावों के बाद इसे प्रांतों में शुरू किया गया। 1935 के अधिनियम के अनुसार प्रांतों में द्वैध शासन की बजाय स्वायत्तता स्थापित कर दी गई। 1937 में जो चुनाव हुए उनसे इस शासन का अंत करके प्रांतीय स्वायत्तता का परीक्षण आरंभ कर दिया गया जो स्वतंत्रता-प्राप्ति तक चलता रहा। चाहे यह शासन असफल रहा और बाद में इसका समाप्त भी कर दिया गया परंतु यह बिलकुल लाभहीन रहा हो, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, भारतीय जनता को स्वशासन में कुछ प्रशिक्षण मिला। उन्हें पता चला कि स्वशासन के मार्ग में कौन-कौन सी कठिनाईयाँ आ सकती हैं और उनका समाधान किस प्रकार किया जा सकता है। मंत्रियों तथा जनता को स्वशासन की ओर ब्रिटिश सरकार के रवैये का भली भाँति ज्ञात हुआ। स्वराज दल ने चुनावों के समय सरकार की विधान मंडलों में कड़ी आलोचना की जिससे एक ओर जहाँ सरकार की वास्तविकता तथा लोगों की मांगों की ओर आँखें खुलीं, वहाँ दूसरी ओर जनता में जागृति उत्पन्न हुई और उसे पता चला कि सुधारों के मायाजाल में फँसकर स्वतंत्रता के उद्देश्य को भुलाना नहीं है। इसी द्वैध शासन के कारण विधान मंडलों के विस्तार और उनके लोकतंत्रीकरण से भारतीयों को अपने निजी मामलों का प्रबंध करने और सुधारों की परियोजनाओं को प्रारंभ करने तथा अपने देशवासियों की स्थिति सुधारने के लिए उपयोगी योजनाओं को शुरू करने का सुयोग मिला। नौकरियों में भारतीयकरण की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला क्योंकि कुछ विभागों के अध्यक्ष अब बन गए थे। इस प्रकार विधान मंडल में और प्रशासन में भारतीयों के अधिकाधिक सम्मिलित होने से उनमें जिम्मेदारी की भावना का और स्वायत-शासन की प्रेरणा का विकास हुआ। इसके अतिरिक्त जनता स्वायत्त-शासन के चाहे यह कितना ही कटा-फटा क्योंकि न था – वरदानों का अनुभव करने लगी। इसलिए अपनी त्रुटियों के बावजूद द्वैध शासन का महत्त्व कम न था क्योंकि यह अंतिम लक्ष्य (स्वराज्य) की ओर जाने वाले मार्ग का पहला पड़ाव था।

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