भारत में बेरोजगारी (Unemployment)

भारत में बेरोजगारी

भारत में बेरोजगारी

बेरोजगारी का अर्थ

(Meaning of Unemployment)

जब कोई व्यक्ति किसी भी कार्य को करने की पूर्ण क्षमता व योग्यता रखता हो तथा कार्य करने का इच्छुक भी हो, किन्तु उसे कोई कार्य न मिले तो यह बेरोजगारी कहलाती है।

भारतीय अर्थव्यस्था में बेरोजगारी की भीषण समस्या व्याप्त है क्योंकि भारत की जनसंख्या जिस अनुपात में बढ़ रही है, उस अनुपात में भारतीय उद्योगों में वृद्धि नहीं हो रही है अतः रोजगार की समस्या उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की समस्या और भी अधिक गम्भीर है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम-शक्ति तो निरन्तर बढ़ रही है किन्तु कृषि जोतों में कोई वृद्धि नहीं होती है और रोजगार के अवसरों में वृद्धि भी न के बराबर होती है। अतः देश की कुल बेरोजगारी का 80% भाग ग्रामीण बेरोजगारी है।

बेरोजगारी के प्रकार

(Kinds of Unemployment )

बेरोजगारी निम्नलिखित दो प्रकार की होती है

  1. ग्रामीण बेरोजगारी (Rural Unemployment) –

    भारत में ग्रामीण बेरोजगारी के निम्नलिखित तीन रूप दिखाई पड़ते हैं –

  • मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment) – जब व्यक्ति को वर्ष में कुछ दिन काम मिले और शेष दिन पूर्ण बेरोजगार रहना पड़े तो ऐसी बेरोजगारी मौसमी बेरोजगारी कहलाती है।
  • अदृश्य बेरोजगारी (Disguised Unemployment) – जब किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक व्यक्ति लगे हुए है कि उन्हें कार्य से हटाने पर कार्य या उत्पादन पर कोई प्रभाव न पड़े, तो ऐसी स्थिति में अदृश्य बेरोजगारी कहलाती है।
  • अल्प रोजगार ( Under Employment) – ग्रामीण क्षेत्रों में एक अन्य प्रकार की बेरोजगारी पायी जाती है जिसे अल्प रोजगार कहते हैं। इसके अन्तर्गत उन श्रमिकों को शामिल किया जाता है जिन्हें अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार काम नहीं मिलता है।
  1. शहरी बेरोजगारी (Urban Unemployment) –

    शहरी बेरोजगारी निम्नलिखित दो प्रकार की होती है

  • शिक्षित बेरोजगारी (Educated Unemployment) – इस बेरोजगारी में वे व्यक्ति शामिल किये जाते हैं जिन्हें विशेष संसाधनों के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाता है तथा जिनकी कार्य करने की क्षमता अन्य श्रमिकों से अधिक होती है।
  • औद्योगिक बेरोजगारी (Industrial Unemployment) – यह बेरोजगारी भी शहरी क्षेत्रों में पायी जाती है। भारत में कार्यशील जनसंख्या तथा शहरीकरण में वृद्धि हो रही है।

भारत में बेरोजगारी के प्रमुख कारण

(Main causes of Unemployment in India)

भारत में बेरोजगारी के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि –

    भारत की जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है जिसके कारण विस्फोटक स्थिति उत्पन्न हो गयी है। यही कारण है कि भारत में श्रम शक्ति निरन्तर बढ़ती रही जिससे बेरोजगारी को जन्म दिया है।

  2. मन्द आर्थिक विकास –

    आर्थिक विकास की दर देश में लक्ष्य के अनुरूप नहीं रही, जिसके कारण बेरोजगारी की समस्या ने विकराल रूप धारण किया है।

  3. नियोजन में दोष –

    भारत में बेरोजगारी की समस्याओं का निदान करने के लिए योजनाओं में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। फलस्वरूप यह समस्या निरन्तर विकराल रूप धारण करती जा रही है।

  4. पूँजीगहन परियोजनाओं पर जोर –

    भारत की पूँजी गहन परियोजनाओं पर विशेष बल दिया गया जिसके कारण विनियोग की मात्रा में तो वृद्धि हुई किन्तु उसके अनुरूप रोजगार के अवसरों में वृद्धि नहीं हुई है। परिणामस्वरूप बेरोजगारी में वृद्धि हुई है।

  5. कृषि का यन्त्रीकरण एवं एक फसली स्वरूप –

    वर्तमान समय में कृषि यन्त्रीकरण प्रोत्साहन हो रही है जिससे बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है तथा कृषि में एक फसल पैदा होने के कारण कृषक वर्ष में लगभग 7 या 8 माह बेरोजगार रहते हैं।

  6. प्राकृतिक आपदायें –

    भारतीय कृषि को मानसून का जुआ तो कहा ही कहा जाता है साथ ही साथ अन्य प्राकृतिक आपदायें जैसे – बाढ़, सूखा एवं अन्य आपदाओं के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता है फलस्वरूप बेरोजगारी में वृद्धि होती है।

  7. कुटीर एवं अल्प उद्योगों का विकास –

    ब्रिटिश शासन की नीति में कुटीर एवं लघु उद्योगों का पतन हुआ। जिसके कारण इन उद्योगों में संलग्न व्यक्तियों को कृषि पर निर्भर रहना पड़ा या बेरोजगार होना पड़ा। स्वतन्त्रता के पश्चात इस दिशा में अनेक प्रयत्न तो किये गये किन्तु ये प्रयास मन्द गति से हुए जिसके कारण बेरोजगारी में निरन्तर वृद्धि होती गयी।

ग्रामीण बेरोजगारी के कारण 

ग्रामीण बेरोजगारी के निम्नलिखित कारण है

  1. औद्योगिक विकास की कमी –

    भारत के शहरी क्षेत्रों में जिस प्रकार से उद्योगों का विकास हुआ इस प्रकार से ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों का विकास नहीं हो पाया फलस्वरूप ग्रामीण बेरोजगारी में वृद्धि हो गयी।

  2. अशिक्षित एवं अकुशल शिक्षा-

    ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा एवं विद्यालय का अभाव के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी है और अगर विद्यालय है भी तो अकुशल शिक्षा है जिससे बेहतर रोजगार सृजन करने की जरूरत पूरी की जा सके।

  3. जनसंख्या में वृद्धि –

    वर्तमान में जनसंख्या एक अरब से ऊपर हो गयी है और इसमें से अधिक जनसंख्या ग्रामीण जनसंख्या है अतः सभी के लिए रोजगार का सृजन करना अधिक कठिन है अतः ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर में वृद्धि हो जाने की संभावना बना जाती है।

  4. कृषि का अवैज्ञानिक परक होना

    भारतीय कृषि पारंपरिक कृषि के आधार पर उत्पादन करती है और उत्पादन में कमी होने के कारण बेरोज़गारी में वृद्धि होती है।

  5. कृषि का मशीनीकरण –

    भारत में कृषि एवं उद्योगों में यंत्रीकरण का प्रभाव बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से 10 व्यक्तियों का काम एक व्यक्ति करता है। फलस्वरूप बेरोजगारी में वृद्धि होती है।

  6. आधुनिक साधनों में वृद्धि –

    परंपरागत साधनों जैसे – बैलों द्वारा हल से खेती की जगह आधुनिक साधनों जैसे- ट्रैक्टर से खेत जोतना, थ्रेसर से कटाई करना आदि के आने के कारण पहले से रोजगार में लगे लोग अब बेरोजगार हो जायेंगे और ग्रामीण बेरोजगारी में वृद्धि होती जायेगी।

  7. कुटीर एवं लघु इद्योगों का अभाव-

    वर्तमान समय मे यंत्रीकरण उद्योगों का महत्व हो गया है और कुटीर एवं लघु उद्योगों का अभाव हो गया है। जिसके कारण किसान अपने खाली समय का उपयोग नहीं कर पाता है और वह बेरोजगार रहता है।

  8. कृषि का मौसमी प्रकृति का होना –

    ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बारहमासी नहीं रहता। वह कुछ ही महीनों तक ही रोजगार में लगा रहता है इसका कारण भारतीय मानसून प्रणाली की अनिरन्तरता का होना। इसके बाद किसान बेरोजगार बैठे रहते हैं।

भारत में बेरोजगारी को दूर करने के उपाय

(Measures to Eradicate Unemployment in India)

भारत में बेरोजगारी को दूर करने के निम्नलिखित उपाय अपनाये गये –

  1. जनशक्ति नियोजन –

    किसी देश के लिए मानव पूँजी अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखती है अतः इसका पूर्ण सदुपयोग किया जाना चाहिए। जनशक्ति के नियोजन के अभाव में कुछ प्रशिक्षित श्रमिक को रोजगार नहीं मिल पाता है तो कहीं विशिष्ट प्रकार के प्रशिक्षित श्रमिक उद्योगों को नहीं मिल पाते है। इस प्रकार बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए जनशक्ति नियोजन आवश्यक है।

  2. जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण –

    बेरोजगारी को दूर करने के लिए जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण आवश्यक है तभी की पूर्ति दर को कम किया जा सकता है। बेरोजगारी दूर करने के लिए एक दीर्घकालीन उपाय है।

  3. भूमि सुधार कार्यक्रमों का क्रियान्वयन –

    भारत में भूमि सुधार कार्यक्रमों जैसे – कृषि जोतों की सीमा बन्दी एवं भूमि की चकबन्दी आदि का शीघ्र क्रियान्वयन किया जाना चाहिए।

  4. बहुफसली कृषि को प्रोत्साहन –

    भारत में श्रमिकों को पूर्ण रोजगार प्रदान करने के लिए बहुफसली कृषि को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए उन्नत बीजों, सिंचाई एवं खाद की व्यवस्था की जानी चाहिए।

  5. ग्रामीण औद्योगीकरण को प्रोत्साहन –

    ग्रामीण क्षेत्रों की बेरोजगारी दूर करने के लिए कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास किया जाना चाहिए। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात, बैंकों एवं विद्युत आपूर्ति आदि सुविधाओं का विकास किया जाना चाहिए।

  6. रोजगार उन्मुख नियोजन-

    देश में नियोजन करते समय रोजगार सृजन को प्राथमिकता प्रदान की जानी चाहिए इस सम्बन्ध में जो नीतियाँ इस दिशा में बाधक दिखलाई देती हैं उन्हें शीघ्र ही हटा देना चाहिए।

बेरोजगारी के दुष्परिणाम

(Evil Effects of Unemployment)

बेरोजगारी के मुख्य दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं-

  1. ग्रामीण बेरोजगारी से निर्धनता की समस्या है वास्तव में कहा जा सकता है कि बेरोजगारी, गरीबी का पर्यायवाची शब्द है।
  2. सामाजिक एवं आर्थिक विषमाताओं में वृद्धि का कारण ग्रामीण बेरोजगारी है।
  3. आर्थिक उत्पादन क्षमता का ह्रास ग्रामीण बेरोजगारी से होता है। इससे श्रमिक की कार्य क्षमता घट जाती है।
  4. आर्थिक विकास की गति को बेरोजागारी धीमा कर देती है।
  5. बेरोजगारी से सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी आती है।
  6. बेरोजगारी से सामाजिक प्रेमभाव का वातावरण नष्ट होता है।
  7. मानव शक्ति का उचित उपयोग न होने के कारण वह व्यर्थ में चली जाती है।
  8. बेरोजगारी से अनेक सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं, जैसे- चोरी, डकैती, शराब, जुआँ व बेईमानी आदि ।
  9. बेरोजगारी के परिणामस्वरूप औद्योगिक संघर्षो में वृद्धि होती है, व्यक्ति के रहन-सहन का स्तर गिर जाता है तथा उनका सामाजिक व नैतिक स्तर गिर जाता है।
  10. बेरोजगारी के परिणामस्वरूप देश में राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है क्योंकि बेरोजगार व्यक्ति प्रत्येक समय राजनैतिक उछाड़-पछाड़ में लगे रहते हैं।
  11. बेरोजगारी के परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति आय में गिरावट आती है। जिससे देश में निर्धनता व ऋणग्रस्तता में वृद्धि होती है।

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