भारत में ‘गरीबी रेखा’ एवं गरीबी निवारण कार्यक्रम

भारत में गरीबी रेखा

भारत में ‘गरीबी रेखा’

तेन्दुलकर समिति ने कहा है, गरीबी की रेखा की अवधारणा मूल मानवीय आवश्यकताओं को पूरा कर पाने की असमर्थता से जुड़ी हुई है। ये मूल मानवीय आवश्यकताएँ है पर्याप्त पौष्टिक आहार प्राप्त करना, पहनने के लिए उपयुक्त वस्त्र तथा रहने के लिए उपयुक्त स्थान होना, परिहार्य बीमारियों से बचने की क्षमता कुछ न्यूनतम स्तर तक शिक्षित होना तथा सामाजिक पारस्परिक क्रिया के लिए स्वयं आर्थिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए गत्यात्मकता।” इससे स्पष्ट है कि गरीबी की अवधारणा बहु-आयामी है। परन्तु इस बहु-आयामी संकल्पना को आधार बना कर गरीबी रेखा को एक न्यूनतम आय स्तर के रूप में परिभाषित करना सम्भव नहीं है क्योंकि इस संकल्पना में कुछ ऐसी बातें शामिल की गयी है, जिन्हें मापा नहीं जा सकता। इसलिए गरीबी रेखा को परिभाषित करते समय केवल भौतिक आयामों को ही शामिल किया जाता है।

दूसरे शब्दों में गरीबी रेखा को एक ऐसे न्यूनतम उपभोग स्तर के रूप में परिभाषित किया जाता है जो जीवन का एक निम्नतम स्तर प्राप्त करने के लिए व मूल मानव आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति या परिवार को ऊपलब्ध होना चाहिए। इसे भारत में योजना आयोग ने ग्रामीण क्षेत्र में 2,400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन और शहरी क्षेत्रों में 2,100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन स्वीकार किया है। 1973-74 में यह आधार प्राप्त करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में 49.63 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति मास तथा शहरी क्षेत्रों में 56.64 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति मास की आवश्यकता थी। इसलिए 1973-74 में ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा को 49.63 रु. प्रति व्यक्ति प्रति मास तथा शहरी क्षेत्रों में 56.64 रु. प्रति व्यक्ति प्रति मास परिभाषित किया गया। समय के साथ मुद्रास्फीति के कारण इस रेखा को कीमतों में परिवर्तन के अनुसार पुनः परिभाषित किया जाता रहा है। 2004-05 में पूरे देश के लिए गरीबी रेखा को ग्रामीण क्षेत्रों में 356.30 रुपया प्रति व्यक्ति प्रति मास तथा शहरी क्षेत्रों में 538.60 रुपया प्रति व्यक्ति प्रति मास माना गया है।

गरीबी निवारण के कार्यक्रम

ग्रामीण विकास व ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों के माध्यम से गरीबी पर सीधा प्रहार करने की नीति हाल के वर्षों में अपनाई गयी। वास्तव में गरीबी निवारण की आर्थिक आयोजन का एक मुख्य लक्ष्य पाँचवीं योजना से ही माना जाता है। 1970 के दशक के दौरान ग्रामीण गरीब जनता के लिए बहुत से विशेष कार्यक्रम तैयार किये गये जिनमें से प्रमुख थे – लंघु किसान विकास एजेंसी, सीमांत किसान व खेतिहर मजदूर विकास एजेंसी, सूखा संभाव्यता क्षेत्र कार्यक्रम, ग्रामीण रोजगार का पुरजोर कार्यक्रम तथा काम के बदले अनाज कार्यक्रम। इनमें से कोई भी कार्यक्रम ऐसा नहीं था जो व्यापक हो और पूरे देश में चल रहा हो। इसलिए ऐसे कार्यक्रमों को आवश्यकता महसूस की गयी जो न केवल देशव्यापी हो बल्कि ग्रामीण गरीबी पर सीधा प्रहार कर सके। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम तथा ग्रामीण खेतिहर मजदूर रोजगार गारंटी कार्यक्रम चालू किये गये। 1989 में सरकार ने एक वृहद रोजगार योजना जवाहर रोजगार योजना के नाम से शुरू की। ग्रामीण खेतिहर मजदूर रोजगार गारण्टी योजना कार्यक्रम 15 अगस्त 1988 को शुरू किया गया।

समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम 2 अक्टूबर, 1980 को शुरू की गयी। इसका मुख्य उद्देश्य छोटे व सीमांत किसानों, खेतिहर मजदूरों तथा ग्रामीण दस्तकारी की सहायता करना था। इसके अलावा भी सरकार ने गरीबी दूर करने के लिए निम्नलिखित कार्यक्रम चलाया –

  1. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम
  2. प्रधानमंत्री रोजगार कार्यक्रम
  3. ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम
  4. रोजगार आश्वासन कार्यक्रम
  5. स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना
  6. जवाहर ग्राम समृद्धि योजना
  7. काम के बदले अनाज कार्यक्रम
  8. महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारन्टी एक्ट
  9. अन्नपूर्णा योजना
  10. अन्त्योदय अन्नयोजना
  11. सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम

उपरोक्त के अतिरिक्त सरकार ने कुछ और योजनाएं चलायी जो गरीबी निवारण में सहायक सद्ध हुआ है। जैसे-

  1. आम आदमी बीमा योजना –

    2 अक्टूबर, 2007 से लागू इस योजना के तहत देश में ग्रामीण भूमिहीन परिवार के मुखिया या आय अर्जित करने वाले किसी एक सदस्य की स्वाभाविक मृत्यु एवं दुर्घटना से हुई क्षति को बीमा सुरक्षा प्रदान करता है।

  2. खेतहर मजदूर बीमा योजना –

    भूमिहीन कृषि श्रमिकों को जनश्री बीमा योजना की तर लाभ पहुँचाने तथा 60 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद 100 रुपये प्रतिमाह पेंशन देने के लिए 2001-02 बजट से लागू योजना है।

  3. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना-

    यह योजना 1 अक्टूबर, 2007 को असंगठित क्षेत्र में बी.पी.एल. परिवारों एक यूनिट में 5 से अधिक परिवार नहीं, के लिए शुरू की गयी।

  4. अन्नपूर्णा योजना –

    2 अक्टूबर 2000 को गाजियाबाद के सिखोड़ा ग्राम से हुआ। सभी वृद्ध नागरिक 10 किलो अनाज बिना मूल्य के प्रतिमाह पाने के हकदार है।

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