ज्वालामुखी उद्भव (Volcanism)- उत्पत्ति, प्रकार, विशेषताएं, ज्वालामुखी शंकु

ज्वालामुखी (Volcano)

ज्वालामुखी (Volcano)- उत्पत्ति, प्रकार, विशेषताएं, ज्वालामुखी शंकु

 

ज्वालामुखी (Volcano)

जो क्रियाएं भू-गर्भ से भू-पटल की ओर प्रवाहित होने वाले लावा की गति से सम्बन्धित ज्वालामुखी उद्भव (Volcanism) कही जाती हैं। इस आधार पर ये दो वर्गों में विभक्त की जाती हैं-

(1) अन्तर्वेधी (Intrusive), (2) बर्हिवेधी (Extrusive)।

अन्तर्वेधी क्रिया में भू-गर्भ का लावा धरातल तक नहीं पहुँचता, बल्कि धरातल के नीचे ही रुककर ठण्डा हो जाता है और ठोस बन जाता है। इस क्रिया के फलस्वरूप भू-पृष्ठ से भिन्न-भिन्न रूप बन जाते हैं, जिसमें महास्कंध, छत्रक, समूर शैल, न्यूटुब्ज शेल, स्कंध एवं वृत स्कंध, लावा पट्ट आदि प्रमुख हैं।

बर्हिवेधी क्रिया में भू-गर्भ के पदार्थ धरातल निकल आते हैं और शंकुओं की रचना करते हैं। भू-गर्भ से विभिन्न पदार्थों का बाहर निकलना ज्वालामुखी उद्भेदन कहलाता है। इस क्रिया के अन्तर्गत गरम सोते उष्णोच्छालिका, वाष्पमुख तथा दरार-उद्गार आते हैं।

ज्वालामुखी के उद्भेदि पदार्थ

ज्वालामुखी से बाहर निकलने वाले पदार्थ प्रायः तीन प्रकार के होते हैं।

  1. वाष्प तथा गैसें-

    ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों में जल-वाष्प मुख्य होती हैं। इसकी मात्रा 90 प्रतिशत होती है। गन्धक तथा कार्बन के विधि गैस-रूप भी बाहर निकलते हैं। इनमें अनेक ज्वलनशील गैसें हैं। दहनशील गैसों में कार्बन डाई आक्साइड तथा सल्फर ऑक्साइड मुख्य है।

दबाव के कम होने पर गैसों की स्थिति में परिवर्तन होता है। भू-गर्भ में भीषण गरमी तथा दबाव के कारण गैसें लावा में घुली हुई रहती हैं, किन्तु गरमी तथा दबाव के कम होते हीं गैसें लावा से अलग हो जाती हैं।

  1. विखण्डित पदार्थ-

    विस्फोट के साथ लावा से गैसों के अलग हो जाने पर छोटे-बड़े शिलाखण्ड़ों का निर्माण होता है। ये शिलाखण्ड उद्भेदन में सैकड़ों मीटर ऊँचे उछल पड़ते हैं। इनके विभिन्न आकार एवं प्रकार होते हैं, कुछ गोल होते हैं तो कुछ अंडाकार, कुछ लम्बे होते हैं तो कुछ बेलनाकार। ये ठोस पदार्थ तीन प्रकार से बनते हैं-
  • ज्वालामुखी की दीवालों के टूटकर वायु में उड़ने से,
  • ज्वालामुखी की लावा की डाट ने नष्ट हो जाने से,
  • लावा के पिंडों के ठण्डा हो जाने से।

उपर्युक्त तीन विधियों से ठोस पदार्थों में ज्वालामुखी धूलि तथा राख (Volcanic dustand ashes), पिंड (Blocks), बम (Bomb), अंगार या सिंडर (Cinders), झाँवा (Pumice), ज्वालामुखी अश्मक (Lapilli) तथा ज्वालामुखी पंक (Volcanic mud) उल्लेखनीय हैं। इन ठोस पिंडों में सूक्ष्म कण वाली धूल से लेकर टनों भारी शिलाखण्ड तक होते हैं। सबसे महीन कण को ज्वालामुखीय धूलि कहते हैं। बाजरा या मटर के बराबर कणों को ज्वालामुखी राख कहते हैं। सुपारी के आकार के टुकड़ों को लैपिली कहते हैं। बड़े कोणात्मक शैलों के टुकड़े जो एक इन्च से लेकर कई मीटर व्यास के होते हैं, ज्वालामुखी पिंड कहलाते हैं। जब पिघले हुए लावा का टुकड़ा चक्कर काटते हुए वायु में जाता है तो परिभ्रमण के साथ गोलाकार एवं अण्डाकार रूप धारण कर लेता हैं। साथ-ही-साथ वह कठोर भी हो जाता है। जब ये भूमि पर गिरते हैं तो इन्हें ज्वालामुखी बम कहते हैं। इनके गोल, अंडाकार, लम्बे तथा नाना प्रकार के विशिष्ट आकार होते हैं। ये भी कुछ सेण्टीमीटर से लेकर 1 मीटर व्यास के होते है। ये प्रायः खोखले होते हैं।

ज्वालामुखी से बाहर फेंका गया खुरखुरा कोणिक तथा लाल पदार्थ अंगार कहलाता है। यह एक हल्का तथा संरन्ध्र पदार्थ है। कभी-कभी ज्वालामुखी के उद्भेदन के पश्चात् घनघोर वर्षा होती है, जिससे ज्वालामुखी धूलि तथा राख पंक के रूप में प्रवाहित होने लगती है। इसको ज्वालामुखी पंक कहते हैं। घिसूवियस के उद्भेदन से हरकुलेनियम नामक नगर पूर्णतः नष्ट हो गया था।

  1. उत्तप्त लावा-

    लावा ज्वालामुखी से द्रव-रूप में बाहर निकलता है। इसकों मैग्मा कहा जाता है। इसमें विभिन्न गैसों तथा खनिज मिले रहते हैं। सैकता के आधार पर (अधिसिलिक लावा तथा अल्पसिलिक) लावा दो वर्ग होते हैं। अधिसिलिक लावा पीले रंग का होता है, इसका भार हल्का होता है। यह अधिक ताप पर पिघलता है। यह गाढ़ा होता है और बहुत धीरे-धीरे प्रवाहित होता है। हल्के गुलावी रंगवाली रायोलाइट नामक शैल का निर्माण अधिसिलिक मैग्मा के ठण्डे होने से होता है। इसमें सैकता की मात्रा 77 प्रतिशत होती है।

अल्पसिलिक लावा गहरे रंग का होत है। यह अपेक्षाकृत भारी तथा काले रंग का होता है। यह कम ताप पर पिघल जाता है। पतला होने से यह तीव्र गति से प्रवाहित होता है। इसमें गैसें में मिली रहती हैं किन्तु धरातल पर ठण्डा होकर यह शीघ्र जमने लगता है। ठोस बनने पर वह लाव शीशे की भाँति परतों में जमता है, किन्तु अधिसिलिक लावा का सर्वोत्तम उदाहरण बेसाल्ट शैल है।

लावा की प्रवाह गति धरातल के ढाल तथा लावा की चलनशीलता पर निर्भर करती है। यह गति प्रायः 16 किलोमीटर प्रति घण्टे से कम होती है।

ज्वालामुखीय उद्भेदन के कारण (Causes of Volcanic eruption)

  1. ऊष्मा की उत्पत्ति-

    भू-गर्भ में ऊष्मा की वृद्धि से पदार्थों का आयतन बढ़ जाता है जिससे वे बाहर निकलने का प्रयास करते हैं। इस ऊष्मा की उत्पत्ति का आधार भू-तापीय (Geo-thermal) एवं रासायनिक (Chemical) प्रतिक्रियाएँ तथा विघटनाभिकता (Radio-activity) मुख्य हैं। पृथ्वी का आभ्यान्तर स्वयं उष्ण है। इस आद्यताप का ह्रास पृथ्वी की शैलों के पिघलने में होता है। आन्तरिक भाग में घटित रासायनिक परिवर्तन यथा तेजोद्गार पदार्थों का वियोजन भी विशाल ताप राशि को जन्म देता है।
  2. तरल लावा-

    पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी की शैलों के दाव से पृथ्वी के अन्तरंग की शैलें तरल अवस्था में नहीं रह सकती हैं। जबकभी भ्रंशन तथा अपरदन से ऊपरी पपड़ी का दबाव कम हो जाता है तो शैलों का गलनांक कम हो जाता है। फलस्वरूप भू-गर्भ की शैलों तीव्र ताप के कारण तरल हो जाती हैं। तरल होने के साथ ही इनका आयतन बढ़ जाता है और वे बाहर निकलने का प्रयास करती हैं जिससे ज्वालामुखी का उद्भेदन होता है।
  3. लावा का ऊर्ध्वगमन-

    भू-गर्भ का लावा दो कारणों से ऊपर उठता है- प्रथम, धरातल में होने वाली हलचल तथा द्वीतीय, लावा पर गैसों एवं वाष्प का दबाव। पपड़ी की हलचल के कारण दबाव घट जाता है और लावा में उपस्थित वाष्प तथा गैसें भी फैलती हैं और लावा को ऊपर फेंकती हैं।
  4. गैस तथा वाष्प-

    भूमिगत जल प्रवाह से अधिक मात्रा में वाष्प बनती हैं। समुद्र के निकट यह क्रिया अधिक होती है। इन गैसों के कारण ज्वालामुखी का उद्भेदन होता है। साथ ही ऊपरी शैल का दबाव कम हो जाने से तरल बेसाल्ट का बहाव होता है जो आकर्षण शक्ति का प्रतिफल है।

उपर्युक्त कारणों में लावा, वाष्प तथा गैसे पपड़ी को जहाँ भी कमजोर पाती हैं, वहीं से तोड़कर बाहर निकलने का प्रयास करती है। पपड़ी प्रायः वलन, भ्रंशन तथा हलचल के क्षेत्रों में कमजोर रहती है।

ज्वालामुखी शंकु (Volcanic cone)

ज्वालमुखी से बाहर निकला हुआ पदार्थ मुख के आसपास जम जाता है जो शंकु के आघा रूप धारण कर लेता है इसको ज्वालामुखी-शंकु  कहते हैं।

शंकु अपने आकार, विस्तार तथा रचना के आधार के पर अनेक प्रकार के होते हैं जिनमें निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं-

  1. लावा शंकु-

    ये शंकु निर्वापित ज्वालामुखी के उद्भेदन से बनते हैं। इनकी रचना लावा-प्रवाह से होती है। इनमें शिलाखण्ड नहीं होते हैं। रचना के अनुसार इनकी आकृति भी भिन्न-भिन्न होती है, जिनमें कुछ प्रसिद्ध हैं।

अम्ल लावा शंकु अधिक सैकता मिश्रित लावा से बनते हैं। इनका रूप तीव्र ढाल वाले गुम्बद का होता है। अधिसिलिक लावा शंकु कम सैकता मिश्रित लावा से बनते हैं। यह लावा बहुत तरल एवं पतला होता है, अतः एक बड़े क्षेत्र में फैल जाता है। इसमें शंकु का ढाल मन्द होता है।

  1. सिंडर शंकु-

    ये विस्फोटीय ज्वालामुखी के उद्भेदन से बनते हैं। इनमें शिलाखण्डों की मात्रा अधिक होती है। इनमें राख की मात्रा भी अधिक होती है।

इनकी आकृति पूर्ण शंकु की होती है। इनके किनारे उत्तल ढाल वाले होते हैं। राख तथा अंगार के अनुसार इनका घर्षण कोण होता है। 30° पर राख और 45° पर अंगार विश्राम करते हैं। ज्वालामुखी के विस्फोट की भीषणता एवं अवधि के अनुसार शंकु विस्तार में छोटे या बड़े होते हैं। यदि विस्फोट द्वारा उद्गार थोड़ी देर तक होता है तो शंकु नीचे किन्तु चौड़े बनते हैं। किन्तु यदि तक भीषण उद्भेदन होता है तो शंकु संकरे किन्तु ऊंचे बनते हैं।

सिंडर-शंकु की रचना में वायु का प्रभाव महत्वपूर्ण होता है। यदि उद्भेदन के समय तीव्र वायु रहती है तो प्रतिवावी ढाल पर अधिक निक्षेप होता है, किन्तु शान्त वायुमंडल में चतुर्दिक ढाल पर समान निक्षेप होता है। इस प्रकार तीव्र वायु में विषम शंकु और शान्त वायु में सम शंकुओं की रचना होती हैं।

एक तीसरे प्रकार के शंकु की भी रचना होती है। कभी-कभी लावा शंकु टूट जाते हैं, इन्हें नालरूप शंकु (Horse-shoe type cone) कहते हैं। लेसेन ज्वालामुखीय राष्ट्रीय पार्क में सिंडर-शंकु मिलता है। सिसली तथा हवाई द्वीप पर भी सिंडर शंकु हैं। फिलीपाइन के लुजोन द्वीप के कैमरिवन ज्वालामुखी में सिंडर शंकु निर्मित है।

  1. मिश्रित शंकु-

    इसका निर्माण विस्फोटीय एवं शान्त उद्भेदनों से होता है। इनसे राका, शिलाखण्डों तथा लावा की एक के पश्चात् दूसरी तह बन जाती है। इसलिए इसको स्तर शंकु भी, कहते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण फिलिपाइन द्वीप का मेयान तथा जापान का फ्यूजीयामा है।
  2. ढाल शंकु-

    इनकी रचना तीव्रगामी लावा के निक्षेप से होती है। लावा के तीव्र प्रवाह से शंकु के क्षेत्र विस्तृत हो जाते हैं और मुख के चारों ओर समानान्तर तहें बन जाती हैं। इनकी ऊँचाई कम होती है और ये साधारण ढाल वाले पठारों की भाँति दिखाई पड़ते हैं। इसलिए इनकों पठारी शंकु भी कहते हैं। हवाई टापू पर मोनालोआ ढाल शंकु के आधार के निकट का ढाल 20° है ऊँचाई पर 109 तक हो गया है, किन्तु 3,100 मीटर के ऊपर यह एक चपटे तथा कम ढालवाले गुम्बदे के आकार में परिवर्तित हो गया है। इसके चपटे भाग पर फलाउआ स्थित है जो समुद्र की सतह से 1,200 मीटर ऊँचा है। टेना एक दूसरा ढाल शंकु है, किन्तु इसकी चोटी का शंकु टूटे हुए पदार्थों से बना हुआ है।
  3. डाट गुम्बद शंकु-

    ज्वालामुखी के पास लसदार अधिसिलिक मैग्मा के एकत्र होने से यह शंकु बनता है। इनमें मैग्मा, पहले के एकत्रित मैग्मा पर चढ़ता है और गुम्बद बढ़ता जाता है। इसमें बाहर का कड़ा भाग टुकड़ों में विभक्त हो जाता है और गुम्बद के चारों ओर सैल-मलवा (Talus) बन जाता है। संयुक्त राज्य अमरीका के लेसेन ज्वालामुखी (कैलिफोर्निया) के पचास वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 13 गुम्बद हैं, जिनमें सबसे बड़ी लेसेन घाटी (Lassen Peak) है। मारटीनीक टापू के पेली पर्वत की रीढ़ इसका दूसरा उत्तर उदाहरण है।

ज्वालामुखी प्लग (डाट) भू-रचना की विलोमता का वास्तविक उदाहरण है क्योंकि ऊप आने के पूर्व यह विवर के निर्माण करने वाले खड्ड के तल में था।

  1. आश्रित शंकु –

    मिश्रित शंकु की शंकु दीवारें बहुधा विस्फोट में टूट जाती हैं और इनके पार्थों पर अनेक छिद्र बन जाते हैं। इस दरारों में चारों ओर किनारे-किनारें छोटे-छोटे राख शंकु एक रेखा में बन जाते हैं। इससे शंकु की एक विचित्र आकृति बन जाती है। ये आश्रित शंकु कहलाते हैं। एटना पर्वत पर ऐसे कई परजीवी या आश्रित शंकु बने हुए हैं। कभी-कभी ये उद्भेदन द्वारा नष्ट भी हो जाते हैं। संयुक्त राज्य अमरीका के माउण्ट शास्ता का शास्तिना शंकु आश्रित शंकु है।
  2. लावालव शंकु-

    आश्रित शंकुओं से होकर लावा की संकरी गैस धाराएँ प्रवाहित होती रहती हैं। यदि धीरे-धीरे उद्भेदन होता है तो उससे निकला हुआ लावा अल्पसिलिक होता है। लावा के गैस के बुलबुलों के टूटने से तीव्र ढाल वाली श्रृंग आकृति बनती है। इस शंक्वाकार आकृति को लावालव शंकु कहते हैं।

ज्वालामुखी को प्रसुप्त अवस्था प्राप्त होने अथवा निर्वापित हो जाने पर शंकु की रचना बन्द हो जाती है और शंकु के मुलायम अंशों का क्षय होने लगता है। कलान्तर में शंकु का छोटा रूप शेष रह जाता है। इसके उदाहरण इडाहों राज्य (सं. रा. अमरीका) में मिलते हैं।

ज्वालामुखी के प्रकार (Types of Volcano)

ज्वालामुखी अनेक प्रकार के होते हैं। इनका वर्गीकरण उद्भेदन विधि तथा निःसृत पदार्थों के आधार पर किया जाता है। अनेक विद्वानों ने ज्वालामुखी शंकुओं के आधार पर भी इनके भेद बतायें हैं। उपर्युक्त सभी आधारों की सहायता से ज्वालामुखी के निम्न भेद बताये जाते हैं-

  1. उद्भेदन के आधार पर ज्वालामुखी

  • सक्रिया ज्वालामुखी-
    इस ज्वालामुखी में प्रायः उद्भेदन होता रहता है। इनका मुख सर्वदा खुला रहता है और मुख के निकट वनस्पति का अभाव रहता है। नवीन ठण्डे लावा द्वारा शंकु का निर्माण होता है। इनमें नाली की दीवारें लम्बरूप रहती हैं। ये समय-समय पर लावा, धुआं उगलते रहते हैं। विभिन्न ज्वालामुखियों का जागरण काल भिन्न-भिन्न होता है। एटना ज्वालामुखी ढाई हजार वर्षों से सक्रिय है। भारत भूमि पर कोई भी सक्रिय ज्वालामुखी नहीं हैं। केवल बंगाल की इक्वेडर का कोटोपैक्सी सबसे ऊंचा (600मीटर) सक्रिय ज्वालामुखी है।

खाड़ी में बैरेन द्वीप में एक सक्रिय ज्वालामुखी है। सारे विश्व में लगभग 500 सक्रिय ज्वालामुखी है

  • निर्वापित ज्वालामुखी –
    इनमें उद्भेदन-क्रिया नहीं होती है। इनकी नली में लावा तथा अन्य भू-गर्भीय पदार्थों का जमाव हो जाता है और मुख बन्द हो जाता है। कालान्तर में मुख झील के रूप में बदल जाता है जिसके ऊपर पेड़-पौधे उग जाते हैं। इस प्रकार के ज्वालामुखी बहुत कम पाये जाते हैं। बहुत से ज्वालामुखी दीर्घकाल तक शान्त रहने के पश्चात् अचानक सक्रिय हो जाते हैं। बर्मा का पोपा ज्वालामुखी इसी प्रकार का है।
  • प्रसुप्त ज्वालामुखी-
    इनमें दीर्घकाल से उद्भेदन नहीं हुआ होता है, किन्तु इसकी संभावनाएँ बनी रहती हैं। इनके मुख से गैसें तथा वाष्प निकला करती हैं। ये जब अचानक क्रियाशील हो जाते हैं तो धन जन की अपार क्षति होती है। इटली का विसूवियत ज्वालामुखी कई वर्ष तक प्रसुप्त रहने के पश्चात् सन् 1931 में अचानक फूट पड़ा। इक्वेडर का चिम्बोरीजी 6200 मीटर ऊँचा तथा चिली का एकाकांगुआ 7,000 मीटर ऊँचा-इसके उदाहरण हैं।
  • विस्फोटीय ज्वालामुखी-
    इस प्रकार के ज्वालामुखी में धड़ाके से उद्भेदन होता है और मुख से टूटे-फूटे शिलाखण्ड तथा गैसें बाहर निकलती हैं।
  • निःसृत ज्वालामुखी-
    इस प्रकार के ज्वालामुखी से लावा एवं गैसें बिना किसी प्रकार की ध्वनि के बाहर निकलती हैं। इनमें धड़ाके की अवाज नहीं होती।
  • मिश्रित ज्वालामुखी-
    ये विस्फोटीय तथा निःसृत ज्वालामुखी के मिश्रित रूप हैं। इनमें लावा का उद्गार कभी शान्तिपूर्वक होता है तो कभी विस्फोट से। विसूवियस, एटना, केनिया तथा रेनियर सभी मिश्रित ज्वालामुखी हैं।
  1. शंकुओं के आकार, प्रकार एवं रचना के आधार पर ज्वालामुखी-

  • सिंडर शंकु ज्वालामुखी-
    इनके मुख पर लावा के ठण्डे हो जाने से शंकुओं की रचना होती है। इसी प्रकार राख शंकु ज्वालामुखी के मुख पर राख निर्मित शंकु मिलते हैं।
  • मिश्रित शंकु ज्वालामुखी-
    इस श्रेणी में वे ज्वालामुखी हैं जिनमें लावा और राख की तहों का जमाव बारी-बारी से हुआ है। इनमें शंकुओं का जमाव विस्फोटीय उद्गार से चट्टानी टुकडों तथा राख के स्तर का जमाव होता है। इस प्रकार एक के बाद दूसरे प्रकार के कई स्तरों का जमाव होने से मिश्रित शंकुओं का निर्माण होता है।
  • ढाल ज्वालामुखी-
    अधिक तरल लावा के विस्तृत क्षेत्र में फैल जाने से ढाल शंकुओं की रचना होती है। इनमें लावा समानान्तर तहों में जमा होता रहता है। इस प्रकार के ज्वालामुखी के शंकुओं का विस्तार बहुत अधिक होता है, किन्तु इनकी ऊँचाई बहुत कम होती है। इनकों पठारी ज्वालामुखी भी कहा जाता है। हवाई द्वीप में ऐसे ज्वालामुखी पाये जाते हैं। संसार का सबसे बड़ा शील्ड ज्वालामुखी मोनालोआ है। यह 4,170 मीटर ऊँचा है।
  • कुण्ड ज्वालामुखी-
    कुछ ऐसे भी ज्वालामुखी होते हैं जिनका मुख ‘ला कैलडेरा’ के विस्तृत कड़ाहनुमा चौकोर गड्ढे के आधार पर विस्तृत होता है। यह बहुत कड़ी कटी हुई चोटीवाले शंकु की भाँति दिखलाई देती है। इसके भीतर गड्ढा मुख की दीवारों से चारों ओर घिरा रहता है। इसकी दीवारों के भीतर छोटे आकार के नये ज्वालामुखी भी पाये जाते हैं, जिनकी रचना ज्वालामुखी के निर्माण के बाद कम मात्रा में पुनः उद्गार के कारण हुई होती है। कुण्ड निम्न दो प्रकार के होते हैं-

(क) विस्फोटी ज्वालामुखी कुण्ड (Explosive Caldera)

(ख) निमज्जित ज्वालामुखी कुण्ड (Subsidence Caldera)

  1. उद्भेदन के पदार्थों के आधार पर ज्वालामुखी

  • गैसमोची ज्वालामुखी-
    जब ज्वालामुखी की शक्ति कम हो जाती है, तो यह गैसमोची अवस्था में आ जाता है। ये ज्वालामुखी दरारों एवं संधियों से बनते हैं, जिससे विभिन्न प्रकार की वाष्प एवं धुँए बाहर निकलते हैं। वाष्पों में गन्धक (Sulphur), सोडियम क्लोराइड, क्षारीय सल्फेट (Alkaline sulphates), तथा अन्य पदार्थ भी बाहर निकलते हैं, जो मुख के किनारों पर एकत्र होते रहते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जाता है कि गन्धकीय ज्वालामुखी वे ज्वालामुखी हैं, जिनकी शक्ति कम हो जाती है। उनमें लावा एवं राख का उद्गार अधिक होता रहता है। यह ज्वालामुखी के पूर्ण शान्त होने से पूर्व की अवस्था है। बंगाल की खाड़ी के बैरेनी में ऐसा ज्वालामुखी है।
  • पंक ज्वालामुखी-
    इस ज्वालामुखी से गैस के साथ जल का उद्गार इतना अधिक होता है कि उसके मिश्रण में पंक बन जाता है और ज्वालामुखी से पंक का उद्गार होता है। विभिन्न खनिजों के मिश्रण से अनेक रंग का कीचड़ होता है। इस कीचड़ के जम जाने से शंकु का निर्माण होता है। इनकी ऊँचाई मुख के समीप 10 मीटर से अधिक नहीं हो पाती। इन ज्वालामुखियों में पहले पानी का स्त्रोत कम हो जाने से नीचे का गन्दा पानी आता है, जिसमें शैलों का चूर्ण मिला होता है। धीरे-धीरे कीचड़ अधिक गाढ़ा आने लगता है। जब कभी इस कीचड़ के सूख जाने पर पंक ज्वालामुखी का मुख बन्द हो जाता है तो उसके नीचे पानी से भाप बनती है। यह भाप कीचड़ को उछाल देती है।

ट्रीनीडाड द्वीप में पंक ज्वालामुखियों का समूह पाया जाता है। कोकेशस पर्वत के आसपास के ज्वालामुखियों से जल की जगह पेट्रोलियम का उद्गार होता है जो सख के साथ मिलकर पंक बनाते हैं। बर्मा तथा बलूचिस्तान में भी पंक ज्वालामुखी पाये गये हैं। पाकिस्तान में पंक शंकु मिलते हैं जो विस्तृत भूमि को घेरे हुए है।

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