वायुमण्डल की संरचना एवं संघटन

वायुमण्डल की संरचना एवं संघटन

वायुमण्डल की संरचना एवं संघटन

वायुमण्डल पृथ्वी के चारों ओर से परिवेष्ठित करने वाला एक भारी ढक्कन है जिसको फिंच तथा द्विवार्थी महोदयों ने वायुमण्डल की संज्ञा प्रदान की है। यह आकर्षण शक्ति के प्रभाव से पृथ्वी के साथ ही सूर्य की परिक्रमा करता है। यह गैसीय है और पृथ्वी तल से इसकी मोटाई भू-भौतिकी वर्ष (Geo-Physical Year) के आविष्कारों के अनुसार 800 किलोमीटर है, किन्तु अन्य वैज्ञानिक खोजों के अनुसार इसकी मोटाई कई हजार किलोमीटर आँकी गयी है।

वायुमण्डल का संघटन (Composition of Atmosphere)

वायुमण्डल में निहित वायु अनेक गैसों का मिश्रण है। वायुमण्डल मुख्य रूप से तीन पदर्थो से मिलकर बना है-1. गैस (Gases), 2. जल (Water Vapours), 3. धूल-कण (Dust particles)

  1. गैस (Gases) –

    वायुमण्डल की शुष्क वायु में दो गैसें नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन मुख्य रूप से मिलती हैं। इन दोनों गैसों की मात्रा कुल वायुमण्डलीय गैसों में लगभग 99 प्रतिशत रहती है, जबकि आर्गन 0.93 प्रतिशत तथा कार्बन डाई-ऑक्साइड, 0.03 प्रतिशत मिलती है। इसके अलावा अति अल्प मात्रा में नियान, हीलियम, मीथेन, क्रिप्टोन, हाइड्रोजन तथा जीनन गैसें मिलती हैं।

नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, आर्गन तथा हाइड्रोजन भारी गैसें हैं। अतः ये गैसे समान्य रूप से वायुमण्डल के निचले स्तर पर मिलती हैं, जबकि नियान, ओजोन, हीलियम, क्रिप्टोन तथा जीन गैसें हल्की होने के कारण वायुमण्डल के ऊपरी स्तर में मिलती हैं। कार्बन डाई ऑक्साइ वायुमण्डल में 20 किमी. की ऊंचाई तक तथा हाइड्रोजन व ऑक्सीजन वायुमण्डल में लगभग 110 किमी. की ऊंचाई तक मिलती हैं।

  1. जल-वाष्प (Water Vapours)-

    जलीय भागों से जल के वाष्पीकरण द्वारा जल-वाष्प वायुमण्डल में प्रवेश कर जाता हैं। वायुमण्डल में जलं-वाष्प का अनुपात अलग-अलग स्थानों तथा दशाओं में अलग-अलग मिलता है। वायु की शुष्क अवस्था में वायुमण्डल में जल-वाष्प का प्रतिशत अति न्यून रहता है, जबकि अत्यधिक आर्द्र वायुमण्डलीय दशा वायुमण्डल में जल-वाष्प का प्रतिशत 4 तक मिलता है। जल वाष्प वायुमण्डल में केवल 5 की ऊंचाई तक मिलती है। मौसम के बारे में जानने के लिए वायुमण्डल में जल-वाष्प का प्रतिशत जानना आवश्यक होता है, क्योंकि वायुमण्डल में जल वाष्प होने के कारण ही कुहरा, ओस, बादल, वर्षा तथा हिमपात धरातल पर दिखाई देते हैं।

  2. धूल-कुण (Dust Particles)-

    वायुमण्डल के निचले स्तर में लटकी हुई अवस्था में धूल-कण मिलते हैं। धूल-कणों की मात्रा स्थान-स्थान पर परिवर्तित होती रहती है। शुष्क मिट्टी के कण, महासागरीय नमक के कण, जीवाणु, ज्वालामुखी राख, उल्काओं की धूल आदि वायुमण्डल में निहित धूल-कणों के मुख्य स्रोत हैं। साधारणतया आर्द्र प्रदेशों की तुलना में शुष्क एवं गर्म प्रदेशों के वायुमण्डल में धूल-कण अधिक मिलते हैं, साथ ही वायुमण्डल में ऊंचाई के बढ़ते जाने पर धूल-कणों की मात्रा में तेजी से कमी आती जाती है।

वायुमण्डल का लम्बवत् विस्तार

(Vertical Extension of Atmosphere)

कृत्रिम उपग्रहों की सहायता से वैज्ञानिकों ने वायुमण्डल की ऊंचाई 16 हजार से 32 हजार किमी. तक आंकलित की है। वायुमण्डल की निचली परतें सघन होती हैं, जबकि ऊपरी परतें क्रमशः विरल होती चली जाती हैं। धरातल से लगभग 27 किमी. की ऊंचाई तक वायुमण्डल के कुल भार का लगभग 97 प्रतिशत भाग उपस्थित रहता है। इसके ऊपर वायु अत्यन्त विरल मिलती है।

वायुमण्डल की परतें एवं उनकी विशेषताएँ

मेजर फ्राडनी, डॉ. पिकार्ड, कप्तान स्थीनस तथा बेंसकी नामक वैज्ञानिकों के शोधों के आधार पर वायुमण्डल की पांच परतें मानी जाती हैं, जिनके विभाजन का आधार ऊंचाई तथा तापमान में परिवर्तन है।

  1. क्षोभ मण्डल (troposphere)-

    यह परत भूमध्य रेखापर 16 किमी. मध्यवर्ती अक्षांशों पर 11 किमी. तथा ध्रुवों पर 6.5 किमी. मोटी होती है। यह परत पृथ्वी के धरातल के निकट होने के साथ-ही जलवाष्प, जलकण तथा धूलिकण से परिपूरित होती हैं जिससे पार्थिक विकिरण (Terrestrial radiation) को सोखने में सक्षम होती है। इस मण्डल में ऊष्मा के वितरण पर संचालन (Conduction), विकिरण (Radiation) तथा संवहन (Connection) का प्रभाव पड़ता है। इसमें प्रति किलोमीटर ऊंचाई पर 6 डिग्री सेग्रे. तापमान कम होता जाता है। धरातल का औसत तापमान 180 डिग्री सेग्रे0 रहता है। इस परत में आँधी, तूफान, घन गर्जन, तथा विद्युत प्रकाश की घटनाएँ होती हैं। इसके तापमान, वायु वेग, वायु दिशा, बादल, वृष्टि तथा आर्द्रता में बड़ा विभेद मिलता है। इस भाग में संवहन हवाएँ भी चलती हैं। इस प्रदेश को विक्षुब्ध संवहन स्तर (Turbulent Convective Structure) भी कहते हैं। इस परत में मानव के सभी कार्य-कलाप होते हैं, अतः इसका बहुत महत्व है।

  2. क्षोभ सीमा-

    वायुमण्डल की वह पेटी है जिसमें क्षोभ मण्डल की पेटी की विशेषताएं विलीन हो जाती हैं और समतापी मण्डल की परत प्रारम्भ हो जाती है। वास्तव में यह क्षोभ मण्डल तथा समतापी मण्डल की परतों का संक्रमण भाग है। यह पेटी 1.5 किमी. मोटी है। इसमें उष्ण कटिबन्ध में तापमान 80 डिग्री सेग्रे तक गिर जाता है। ध्रुवीय प्रदेशों में इसका तापमान 55 डिग्री सेग्रे. रहता है। यहां वायुमण्डल की दशा शान्त रहती है। इसी कारण वायु विक्षोभ में पड़ने पर वायुयान चालक अपने वायुयानों को इस परत में ले जाते हैं। इस परत में तापमान न्यूनतम पाया जाता है।

  3. समतापी मण्डल (1991)-

    क्षोभ सीमा के ऊपर लगभग 50 किमी. मोटाई की यह परत है। इस परत में तापमान समान रहता है। इसकी खोज का श्रेय यूरापीय विद्वान् तिसरा डिबोर्ट को है। इस परत में ग्रहण की हुई विकिरण भी प्रसृत विकिरण के बराबर होती है। इसमें बादल नहीं होते। धूलिकण तथा जलवायु बहुत कम पाया जाता है। यहां संवहन वायु नहीं चलती। वायुदाब अत्यन्त क्षीण रहता है। अतः इसमें गुब्बारे नहीं उड़ पाते। किन्तु विस्फोटन के द्वारा केवल जेट विमान तथा राकेट पहुंच सके हैं। इस परत में हल्की वायु न्यूनतम परन्तु समतापमान और बादलों का अभाव रहता है। आँधी, तूफान तथा घन गर्जन नहीं होते है। स्थिति तथा ऋतुओं के अनुसार इस परत की ऊंचाई बदलती रहती है। ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा ऊंचाई अधिक होती है। तापमान भी स्थिति पर निर्भर करता है।

  4. ओजोन मण्डल-

    इस परत में ओजोन गैस की बहुलता होती है। यह परत 40 से 50 किमी. ऊंचाई तक है। यह सूर्य की किरणों द्वारा अधिक उष्ण रहता है। यह पराबैंगनी किरणों (Ultra-violet) को सोख लेती है। यह परत सूर्य के हानिकारक प्रभाव से बचने की मुख्य रक्षा पंक्ति हैं। एक किलोमीटर ऊंचाई पर 16 डिग्री सेग्रे. तापमान बढ़ जाता है। इसमें मुक्त-मेघ जननी (Motor of pearl cloud) पाये जाते हैं।

यह परत भी वायुमण्डल के ताप का दूसरा स्रोत है। इसी कारण इस परत से नीचे की ओर तापमान क्रमशः घटता जाता है। अतः ओम सीमा पर तापमान न्यूनतम पाया जाता है।

समतापी मण्डल तथा ओजोन मण्डल की ऊपरी सीमा स्वरित सीमा (Stratopause) कहलाती है। यह अधिकाधिक तापमान की परत है। यहां का तापमान पृथ्वी के तल के तापमान से अधिक होता है। इसके नीचे 99.9 प्रतिशत वायुमण्डल है।

50 से 80 किमी. के मध्य यह मण्डल (Mesophere) पड़ता है। यह भी क्षोभ मण्डल की तरह विक्षुब्ध वायु की परत है। इसका न्यूनतम तापमान 11 डिग्री सेग्रे० मिलता है। इसके नीचे वायुमण्डल का 99.9 प्रतिशत पड़ता है। इसमें निशादीप्ति मेघ हैं। 60 किमी. पर स्थित परत रेडियो तरंगों को दिन के समय सोख लेती है। अतः रात्रि में रेडियो अधिक साफ सुनाई देता है।

  1. आयन मण्डल-

    यह 80 किमी. से ऊपर 320 किमी. तक विस्तृत है। इसमें चार परतें हैं, जिनको D, E, F, तथा F, नाम दिया गया है। इसमें D, E परतों का अध्ययन महत्वपूर्ण हैं। आयन मण्डल का ज्ञान रेडियो तरंगो, ध्वनि तरंगों, उल्का चमक, ध्रुवीय सुमेरू ज्योति, रात्रि में आकाश का वर्णपट तथा अन्तरिक्ष किरण की सहायता से किया जाता है।

इस परत में तापमान का वितरण आसमान तथा अनिश्चित है। प्रायः ऊंचाई के साथ तापमान बढ़ता है किन्तु कभी-कभी तापमान घटता भी है। कूपे महोदय ने इन चारों परतों को D, E, F1, तथा F2 नामों से विभूषित किया है।

D परत 80 से 100 किमी. तक सीमित है। यह सूर्य विकिरण से अधिक प्रभावित है और रात्रि के समय लुप्त हो जाती है। यह परत लम्बी रेडियो तरंगों का शोषण कर लेती है।

100 किमी. पर परत को E स्तर या केनेली हीविसाइड स्तर कहते हैं। इसकी खोज अमेरिकी विद्वान् केनेली तथा ब्रिटिश विद्वान् हीविसाइड ने की है। यह परत भी रात्रि में लुप्त हो जाती है, यह परत भी 120 किमी. पर मध्यम बारम्बारता की लम्बी रेडियो तरंगों को पृथ्वी की ओर परावर्तित कर देती है। यह लम्बी रेडियो तरंगों की परत है । D तथा E परतों के मध्य निशादीप्ति मध्य मिलते हैं जो सूर्यास्त के पश्चात् दिखाई देते हैं। इसमें उल्का अदृश्य हो जाते हैं।

150 किमी. से 480 किमी. की ऊंचाई की पतर को एप्लेटन या F स्तर कहते हैं। यह छोटी रेडियो तरंगों को परावर्तित करते हैं। स्तर ऋतु तथा काल के अनुसार खिसकता रहता है। इस परत को टेलीविजन की तरंगें पार कर जाती हैं। इस मण्डल के ऊपर 480 किमी. ऊंचाई के बाद हाइड्रोजन तथा हीलियम गैसों से पूर्ण बाह्य मण्डल (Exosphere) है। इस परत में अधिक तापमान का अनुमान है। वायमण्डल का प्रभाव मौसम, जलवायु, कृषि उपज तथा परिवहन के साधनों पर पड़ता है। यह जीवन की सृष्टि करता है।

  1. आयतन मण्डल या बहिर्मण्डल (Exosphere)-

    आयत मण्डल के ऊपर धरातल से 640 किमी. से अधिक ऊंचाई पर आयतन मण्डल या बाह्य मण्डल स्थित है। इस मण्डल में हाइड्रोजन तथा हीलियम जैसी हल्की गेसों की प्रधानता रहती है। यहां वायु अत्यधिक विरल होती है तथा वायु का तापमान लगभग 6,000 डिग्री सेग्रे. के आसपास रहता है। वायुमण्डल की बाह्य सीमा पर स्थित इस मण्डल के बारे में अभी पूर्ण जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी है। इस परत का विशेष अध्ययन लाइमेन स्पिट्जर (Lymen Spitzera) नामक विद्वान् ने किया है।

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