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संयुक्त परिवार की सम्पत्ति अथवा सहदायिकी सम्पत्ति

सहदायिकी सम्पत्ति

संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में सभी सहदायिकों के स्वामित्व की एकता एवं हकों की सामूहिकता होती है। सहदायिकी सम्पत्ति में निम्नलिखित सम्मिलित हैं-

  1. पैतृक सम्पत्ति।
  2. संयुक्त परिवार के सदस्यों के द्वारा संयुक्त रूप से अर्जित सम्पत्ति।
  3. सदस्यों की पृथक् सम्पत्ति जो सम्मिलित कोश में डाल दी गई है।
  4. वह सम्पत्ति जो सभी सदस्यों द्वारा अथवा किसी सहदायिक द्वारा संयुक्त परिवार के कोश की सहायता से अर्जित की गई है।

भगवन्त पी. सुलाखे बनाम दिगम्बर गोपाल सुलाखे के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि संयुक्त परिवार की प्रास्थिति में विघटन हो जाने से किसी संयुक्त परिवार की सम्पत्ति की प्रकृति नहीं बदल जाती। संयुक्त परिवार की सम्पत्ति संयुक्त बनी रहती है जब तक कि संयुक्त परिवार की सम्पत्ति अस्तित्व में रहती है, और विभाजित नहीं की जाती, कोई एक सदस्य अपने अकेले कृत्य द्वारा संयुक्त परिवार की सम्पत्ति को व्यक्तिगत सम्पत्ति में नहीं बदल सकता। शेर सिंह बनाम गम्दूर सिंह के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि संयुक्त परिवार की सम्पत्ति तब तक संयुक्त बनी रहती है, जब तक वह अस्तित्व में रहती है; और विभाजित नहीं की जाती। संयुक्त परिवार की प्रास्थिति में विघटन हो जाने से उस पर कोई असर नहीं पड़ता।

संयुक्त परिवार के सदस्यों द्वारा धारण की गई सम्पत्ति के सम्बन्ध में यह उपधारणा की जाती है कि वह संयुक्त सम्पत्ति होगी यदि उसका केन्द्र बिन्दू मौजूद है। इस बात को साबित करने का दायित्व कर्ता या प्रबन्धक पर अथवा परिवार की व्यवस्था देखने वाले सदस्य पर होता है।

  1. पैतृक सम्पत्ति

    वह सम्पत्ति जो सभी सदस्यों की संयुक्त उपभोग के लिये है, पैतृक सम्पत्ति कहलाती है। यह सहदायिकी सम्पत्ति अथवा संयुक्त सम्पत्ति का एक प्रकार है। पैतृक सम्पत्ति का तात्पर्य उस सम्पत्ति से है जो पुरुष-वंशानुक्रम से पुरुष-क्रम में आती है। इस सम्पत्ति में पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र जन्म से ही हक प्राप्त करते हैं। (याज्ञवल्क्य)

‘निम्नलिखित प्रकार की सम्पत्तियाँ अपने प्रासंगिक लक्षणों के कारण पैतृक सम्पत्ति निर्मित करती हैं

  • इस प्रकार की सम्पत्ति उत्तरजीविका से न कि उत्तराधिकार से न्यागत होगी।
  • यह ऐसी सम्पत्ति होती है जिसमें सहदायिक की पुरुष सन्तान जन्म से हक प्राप्त करती है।
  1. संयुक्त परिवार के सदस्यों द्वारा संयुक्त रूप से अर्जित सम्पत्ति

    ऐसी सम्पत्ति जो संयुक्त परिवार के सदस्यों द्वारा उनके संयुक्त परिश्रम से संयुक्त परिवार की सम्पत्ति की सहायता से अर्जित की जाती है, वह संयुक्त परिवार की सम्पत्ति अथवा सहदायिकी सम्पत्ति होती है। बम्बई उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि सम्पत्ति संयुक्त परिवार के सदस्यों के संयुक्त श्रम से अर्जित की गई है, चाहे उसमें संयुक्त कोष की सहायता न ली गई हो तो भी वह किसी विपरीत उद्देश्य के अभाब में, संयुक्त परिवार की सम्पत्ति मानी जाती है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि विधि का यह दूसरा सिद्धान्त है कि संयुक्त परिवार के सदस्यों द्वारा संयुक्त रूप से अर्जित की गई सम्पत्ति, जो कि संयुक्त परिवार की किसी सहायता के बिना प्राप्त हुई है, संयुक्त परिवार की सम्पत्ति मानी जायेगी। जहाँ दो भाई कोई सम्पत्ति संयुक्त परिवार में अपने संयुक्त परिश्रम से अर्जित करते हैं, वहाँ विरुद्ध आशय के अभाव में यह उपधारणा होगी कि वे लोग उसे संयुक्त रूप से धारण कर रहे थे। उसकी पुरुष सन्तान उस सम्पत्ति में आवश्यक रूप से जन्मतः अधिकार प्राप्त कर लेगी।

  1. सम्पत्ति जो समान कोश में डाल दी गई है

    यदि कोई स्वार्जित सम्पत्ति समान कोश में इस उद्देश्य से डाल दी गई है कि अपने हक का परित्याग कर दे तो वह संयुक्त परिवार की सम्पत्ति हो जाती है, जो परिवार के सभी सदस्यों में विभाज्य है। इसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि उस उद्देश्य से कोई विचार अभिव्यक्त किया जाय। उसको समान कोश में डाल देना तथा उसमें एवं अन्य संयुक्त सम्पत्ति में कोई अन्तर न मानना इस बात को स्पष्ट कर देते हैं कि वह संयुक्त सम्पत्ति-जैसी मान ली जाय।

के. अवेबुल रेड्डी बनाम वी. वेन्कट नारायन के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि एक बार यदि मान लिया जाता है कि परिवार संयुक्त है और संयुक्त सम्पत्ति धारण करता है तो विधिक उपधारणा यह होगी कि किसी सदस्य अथवा सभी सदस्यों द्वारा धारण की गई सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति है। इस उपधारणा के सन्दर्भ में यदि परिवार का कोई सदस्य उस सम्पत्ति के किसी भाग पर अपना पृथक् दावा करता है तो सबूत का भार उसके ऊपर होगा कि वह उसको अपनी पृथक् सम्पत्ति साबित करे।

  1. वह सम्पत्ति जो परिवार की संयुक्त सम्पत्ति की सहायता से प्राप्त की गई थी

    संयुक्त परिवार की सम्पत्ति की सहायता से अर्जित की गई सम्पत्ति भी संयुक्त परिवार की सम्पत्ति कहलाती है। इस प्रकार संयुक्त परिवार की सम्पत्ति से प्राप्त आय, अर्जित आय से नयी सम्पत्ति का खरीदना, किसी सम्पत्ति के बेचने अथवा बन्धक रख कर धनराशि का अर्जित करना अथवा उससे कोई नयी सम्पत्ति का खरीदना, संयुक्त परिवार की सम्पत्ति कहलाती है।

यदि संयुक्त परिवार में उसके किसी सदस्य के नाम से कोई सम्पत्ति खरीदी जाती है तो वह संयुक्त सम्पत्ति ही कहलायेगी न कि स्वार्जित अथवा पृथक् सम्पत्ति। यदि उसने संयुक्त परिवार की सम्पत्ति के बिना किसी सहायता के कोई सम्पत्ति खरीदी है अथवा अर्जित की हैं तो वह उसकी पृथक् सम्पत्ति मानी जा सकती है। जहाँ कोई संयुक्त परिवार का सदस्य अपनी स्वार्जित सम्पत्ति को सामूहिक अथवा संयुक्त सम्पत्ति में मिला देता है अथवा समान कोष में डाल देता है तो वह सब मिलकर संयुक्त सम्पत्ति हो जाती है।

श्रीमती परबतिया देवी बनाम मु. शकुन्तला देवी के मुकदमें में न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संयुक्त परिवार के किसी एक सदस्य के नाम में खरीदी गई कोई सम्पत्ति संयुक्त सम्पत्ति समझी जायेगी। संयुक्तता का प्रमाण-भार उस पर होगा जो उसे संयुक्त सम्पत्ति होने का दावा करता है। जब यह साबित हो जाता है कि परिवार के केन्द्र-बिन्दु में से लगाई गई

सम्पत्ति से सम्पत्ति का अर्जन किया गया था तो विधि में यह उपधारणा होती है। सम्पत्ति संयुक्त होगी की नहीं यह प्रमाणभार उस व्यक्ति पर हो जाता है जो कि यह कहता है कि सम्पत्ति उसकी पृथक् है और उसने उस सम्पत्ति को परिवार की बिना किसी सहायता के अर्जित की थी।

दाय भाग शाखा के अन्तर्गत किसी सहदायिक द्वारा पृथक् रूप से संयुक्त परिवार की सम्पत्ति लगा कर जहाँ कोई व्यवसाय प्रारम्भ किया गया है, वह व्यवसाय संयुक्त परिवार का व्यवसाय नहीं माना जायेगा। जहाँ एक दायभाग सहदायिक ने अपने नाम किसी सिनेमा लाइसेन्स को प्राप्त कर संयुक्त परिवार की सम्पत्ति लगा कर सिनेमा का व्यवसाय प्रारम्भ करता है वहाँ वह सिनेमा का व्यवसाय संयुक्त सम्पत्ति नहीं मानी जायेगी।

पृथक् सम्पत्ति

वह सम्पत्ति जो संयुक्त नहीं है, पृथक् सम्पत्ति कहलाती है। ‘पृथक्’ शब्द से यह बोध होता है कि परिवार पहले संयुक्त था, किन्तु अब पृथक् हो चुका है। जब कोई व्यक्ति अपने भाइयों से अलग हो जाता है तो वह सम्पत्ति, जिसका वह उपयोग स्वयं करता है, भाइयों के प्रसंग में पृथक् सम्पत्ति कहलाती है। किन्तु जहाँ तक उसके पुत्रों का सम्बन्ध है, उस सन्दर्भ में वह संयुक्त सम्पत्ति होगी। जहाँ तक ‘स्वार्जित’ शब्द का अर्थ है, वह यह इंगित करता है कि सम्पत्ति उसमें इस ढंग से न्यागत हुई कि इस संसार में उसके अतिरिक्त उसमें किसी का हक नहीं हो सकता।

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