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वसीयती संरक्षक (Testamentary Guardian)

वसीयती संरक्षक

वे संरक्षक जो अवयस्क के प्राकृतिक संरक्षक की इच्छा से नियुक्त किये जाते हैं, वसीयती संरक्षक कहलाते हैं। ये संरक्षक प्राकृतिक संरक्षकों की मृत्यु के बाद ही क्रियाशील हो सकते हैं।

संरक्षक कौन नियुक्त कर सकता है?

अधिनियम के अनुसार निम्नलिखित प्रकार के व्यक्ति किसी को अवयस्क के शरीर तथा सम्पत्ति के लिए संरक्षक नियुक्त कर सकते हैं-

  • पिता, नैसर्गिक अथवा दत्तकग्रहीता।
  • विधवा माता, नैसर्गिक अथवा दत्तकग्रहीता।
  1. पिता-

    कोई भी हिन्दू पिता जो नैसर्गिक संरक्षक के रूप में कार्य करने का अधिकारी है तथा जो अधिनियम द्वारा अवयस्क का नैसर्गिक संरक्षक होने के अयोग्य नहीं हो गया है, अपनी इच्छा द्वारा अवयस्क के शरीर अथवा उसकी विभक्त सम्पदा अथवा दोनों के लिए संरक्षक नियुक्त कर सकता है। अवयस्क का संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में अविभक्त हक कर्ता के हाथ में रहता है, अतः अविभक्त सम्पत्ति के लिए संरक्षक नहीं नियुक्त किया जा सकता।

पिता वसीयती संरक्षक को नियुक्त करके माता के नैसर्गिक संरक्षक होने के अधिकार को अतिक्रमित नहीं कर सकता। किन्तु यदि माता स्वयं बिना संरक्षक नियुक्त किये हुए मर जाती है तो उस दशा में पिता द्वारा नियुक्त वसीयती संरक्षक ही मान्य समझा जायेगा। इस प्रकार यदि पिता अपनी पत्नी के जीवन काल में किसी वसीयती संरक्षक की नियुक्ति करके मर जाता है तो वह नियुक्ति प्रभावशून्य होगी तथा माता अधिनियम की धारा 6 के प्रावधानों के अनुसार प्राकृतिक संरक्षक बन जायगी।

  1. माता

    कोई भी हिन्दू माता जो अवयस्क का प्राकृतिक संरक्षक होने की अधिकारिणीहै तथा किसी भी कारणवश (जैसे हिन्दू न रह गई हो, संन्यासी अथवा यति हो गई हो अथवा स्वयं अवयस्क हो) अयोग्य नहीं हो गई है, इच्छा-पत्र द्वारा अवयस्क के शरीर अथवा सम्पत्ति के लिए अथवा दोनों के लिये संरक्षक नियुक्त कर सकती है।

इसी प्रकार कोई हिन्दू माता जो अपने अवैध पुत्रों के प्राकृतिक संरक्षक के रूप में कार्य करने की अधिकारिणी है, अवयस्क की सम्पत्ति अथवा शरीर के लिए अथवा दोनों के लिए संरक्षक नियुक्त कर सकती है। इस प्रकार के मामलों में यह आवश्यक नहीं है कि पिता प्राकृतिक संरक्षक के रूप में कार्य करने के अयोग्य हो, क्योंकि अवैध पुत्रों की माता के जीवन-काल में पिता को संरक्षक होने का अधिकार नहीं रहता तथा माता स्वयं कोई संरक्षक नियुक्त कर सकती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि माता को अपने पुत्रों के लिये संरक्षक नियुक्त करने का अधिकार पिता के अधिकार से प्रबल है।

  1. विधवा

    कोई हिन्दू विधवा अपने वैध पुत्रों का प्राकृतिक संरक्षक होने की अधिकारिणी है। इच्छा-पत्र द्वारा अवयस्क के शरीर अथवा सम्पत्ति अथवा दोनों के लिए एक संरक्षक नियुक्त कर सकती है। उसके पति द्वारा नियुक्त किया गया कोई संरक्षक उसके द्वारा नियुक्त किये गये संरक्षक के समकक्ष प्रभावहीन होगा। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि अधिनियम ने अवैध पुत्रों के लिए विधवा के संरक्षक नियुक्त करने का अधिकार के विषय में कोई उल्लेख नहीं किसा है, जिसका कारण यह था कि अवैध पुत्रों का संरक्षक उसकी माता ही मानी जाती है और पति के जीवन-काल में भी उन अवैध पुत्रों के लिये संरक्षक नियुक्त करने का अधिकार माता को ही होता है। अतः पति की मृत्यु से विधवा माता को अपने अवैध पुत्रों के लिये संरक्षक नियुक्त करने के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसी दशा में पिता को कोई संरक्षक नियुक्त करने का अधिकार नहीं होता।

वसीयती संरक्षक के अधिकार

यदि वसीयत द्वारा संरक्षक के अधिकारों एवं शक्तियों को सीमित नहीं किया गया हो तो वसीयती संरक्षक को भी वह समसत शक्तियाँ प्राप्त हो जाती है, जो प्राकृतिक संरक्षक को प्राप्त हो। इस प्रकार वसीयती संरक्षक के अधिकार इच्छापत्र की सीमाओं से सन्नियन्त्रित होने के कारण उस क्षेत्र में वे प्राकृतिक संरक्षक से भिन्न है। यदि वसीयती संरक्षक किसी अवयस्क बालिका के लिये नियुक्त किया गया है तो उसके अधिकार बालिका के विवाह हो जाने पर समाप्त हो जाते हैं [धारा 9(6) अधिनियम ।]

पूर्व हिन्दू विधि के अन्तर्गत वसीयती संरक्षक को वे सभी शक्तियाँ प्राप्त थीं जो एक नैसर्गिक संरक्षक को प्रदान की गई थीं। किन्तु इच्छापत्र में विहित शर्तों से उसके अधिकार नियन्त्रित किये जा सकते थे। आधुनिक विधि में भी वसीयती संरक्षक को नियन्त्रणों के साथ वही अधिकार प्रदान किये गये हैं जो नैसर्गिक संरक्षक को प्राप्त हैं। इच्छापत्र में दी गई शर्तों से वसीयती संरक्षक बाध्य होता है। टी. बी. दुरईस्वामी बनाम ई. बाला सुब्रह्मण्यम् में मद्रास उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अधिनियम की धारा 9 (5) के अधीन वसीयती संरक्षक को जो अधिकार प्रदान किये गये हैं उससे यह स्पष्ट है कि वह अवयस्क के पिता-माता की मृत्यु के बाद ही इस प्रकार के अधिकार का प्रयोग उन्हीं नियन्त्रणों के साथ कर सकता है जो अधिनियम में नैसर्गिक माता-पिता के अधिकारों पर आरोपित किया गया है। यदि वसीयती संरक्षक अवयस्क की सम्पत्ति बेचना चाहता है तो उसे न्यायालय की सूर्व अनुज्ञा प्राप्त करनी होगी। पिता के द्वारा निर्धारित किया हुआ वसीयती संरक्षक माता के जीवन काल में संरक्षकता का पद नहीं धारण कर सकता। पिता के इच्छापत्र की शर्तों के अनुसार वसीयती संरक्षक अवयस्क की सम्पत्ति एवं जीवन की अभिरक्षा का भार लेता है। यदि इच्छापत्र में वसीयती संरक्षक के अधिकारों पर किसी प्रकार का नियन्त्रण विहित कर दिया जाता है तो उन नियन्त्रणों के साथ वह अवयस्क की सम्पत्ति के अन्य संक्रामण के सम्बन्ध में उन सभी आभारों का प्रयोग कर सकता है जो एक नैसर्गिक संरक्षक को प्राप्त हैं।

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