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भरण-पोषण अधिनियम, 1956

भरण-पोषण अधिनियम, 1956

हिन्दू विधि के तहत परिवार का सदस्य, पूर्वज की सम्पत्ति में या तो भागीदार होता है या सम्पत्ति की आय से पोषण का अधिकार रखता है। हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम,1956 के अन्तर्गत निम्नलिखित व्यक्तियों को पोषण का अधिकार प्राप्त है-

  1. पत्नी,
  2. विधवा पुत्रवधू
  • बच्चे तथा वृद्ध माता-पिता,
  • (ब) पुत्रियाँ,
  • (स) अवैध पुत्र,
  • (द) अवैध पुत्रियाँ,
  • (य) वृद्ध तथा कमजोर माता-पिता।
  1. मृतकों के आश्रित-
  • उसके (मृतक के) पिता,
  • उसकी माता,
  • उसकी विधवा स्त्री,
  • उसके पुत्र, मृत पुत्र के पुत्र, मृत पुत्र के पौत्र,
  • उसकी अविवाहिता लड़कियाँ, मृत पुत्र की नवविवाहिता लड़कियाँ, मृत पुत्र के पुत्र की अविवाहिता लड़कियाँ,
  • उसकी विधवा लड़कियाँ,
  • उसके पुत्र की विधवा स्त्री अथवा मृत पुत्र के पुत्र की स्त्री,
  • उसके अवयस्क अवैध पुत्र,
  • उसकी अविवाहिता अवैध पुत्रियाँ।
  1. पत्नी-

    अधिनियम की धारा 18 के तहत पत्नियों को दो प्रकार के अधिकार दिये गये हैं- (अ) भरण-पोषण, (ब) पृथक निवास का अधिकार। इस अधिनियम के पूर्व भी हिन्दू विवाहिता स्त्रियों के पृथक निवास का अधिकार था तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1946 लागू थ था जिसे अब हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 29 के अन्तर्गत समाप्त कर दिया गया है। रघुबीर सिंह बनाम गुलाब सिंह के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह संप्रेक्षित किया कि पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार का जन्म सामाजिक एवं सांसारिक बन्धन के परिणामस्वरूप हुआ है

  2. विधवा पुत्रवधू

    प्राचीन विधि के तहत विधवा पुत्र-वधू को भरण-पोषण देना श्वसुर का न विधिक दायित्व है और न व्यक्तिगत। यह केवल एक नैतिक दायित्व है। हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 19 में पुत्र-वधू के भरण-पोषण के बारे मैं कहा गया है कि यह श्वसुर का केवल नैतिक दायित्व है कि वह विधवा पुत्र-वधू को भरण-पोषण प्रदान करे, किन्तु श्वसुर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जो उसकी स्वार्जित सम्पत्ति को प्राप्त करता है, वह कानूनी रूप से विधवा पुत्र-वधू को भरण-पोषण देने के लिए बाध्य रहता है।

अधिनियम की धारा 19 के अनुसार कोई हिन्दू पत्नी, चाहे उसका विवाह इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के पूर्व हुआ हो या पश्चात्, अपने पति की मृत्यु के पश्चात् अपने श्वसुर द्वारा भरण-पोषण पाने के लिये हकदार होगी, किन्तु उसका यह हक तब और उस सीमा तक होगा जब और जहाँ तक-

  • वह अपने अर्जन अथवा अन्य सम्पत्ति से अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है और उसकी अपनी स्वयं की कोई सम्पत्ति न हो।
  • अपने पति की सम्पदा से भरण-पोषण प्राप्त करने में असमर्थ है,
  • अपने पिता की सम्पदा से भरण-पोषण प्राप्त करने में असमर्थ है,
  • अपने माता की सम्पदा से भरण-पोषण प्राप्त करने में असमर्थ है,
  • अपने पुत्र से, यदि कोई हो, भरण-पोषम प्राप्त करने में असमर्थ है,
  • अपने पुत्री से, यदि कोई हो, भरण-पोषण प्राप्त करने में असमर्थ है,
  • अपने पुत्र या पुत्री (यदि कोई हो) की सम्पदा से भरण-पोषण प्राप्त करने मेंअसमर्थ है।
  1. वृद्ध मातापिता तथा सन्तान

    अधिनियम की धारा 20 के अन्तर्गत वृद्ध तथा निर्बल माता-पिता तथा औरस एवं जारज सन्तान को भरण-पोषण करने का दायित्व प्रदान किया गया है। यहाँ ‘सन्तान’ शब्द पौत्र तथा पौत्री को सम्मिलित नहीं करता। इन उपर्युक्त कोटि के व्यक्तियों का भरण-पोषण व्यक्तिगत है तथा यह दायित्व जीवन काल तक ही रहता है। इस धारा का उपबन्ध पूर्व-पक्षीय हैं। औरस अथवा जारज सन्तानें अपने माता-पिता से भरण-पोषण प्राप्त करने की अधिकारिणी उसी समय तक हैं जबकि वे अवयस्क होती हैं। इसके पीछे धारणा यह है कि वे अपने को सम्हालने योग्य नहीं होते हैं वहाँ उसको अंतरिम ‘भरण-पोषण भी दिया जा सकता है क्योंकि इस प्रकार का अन्तरिम भरण-पोषण अधिनियम द्वारा वर्जित नहीं है। किसी व्यक्ति का अपने वृद्ध माता-पिता अथवा अविवाहिता पुत्री का भरण-पोषण करने का दायित्व उसी सीमा तक है जहाँ तक कि वे अपने सम्पत्ति से भरण-पोषण प्राप्त करने में असमर्थ है। इस धारा में माता-पिता शब्द सौतेली माँ को भी सम्मिलित करता है। दत्तक ग्रहण में लिया गया पुत्र भी भरण-पोषण का अधिकारी होता है।

  2. आश्रित (Dependants)-

    इस अधिनियम में प्रथम बार ‘आश्रित’ (Dependants) शब्द का प्रयोग हुआ है। धारा 18 से 21 में पोषित किये जाने वाले लोगों के नामों का उल्लेख किया गया है जिनके अतिरिक्त अन्य कोई भी पोषण पाने के अधिकारी हैं। धारा 21 में उन व्यक्तियों की सूची दी गई है जो मृतक के उत्तराधिकारी द्वारा पोषण पाने का अधिकारी नहीं है। मिताक्षरा विधि के अन्तर्गत कर्ता वयस्क पुत्रों के पोषण के लिए बाध्य है, यदि परिवार संयुक्त है। कोई भी हिन्दू पत्नी बिना पोषणं का अधिकार खोये हुए अपने पति से पृथक् निवास की अधिकारिणी होगी-धारा 18(2) के अनुसार

  • यदि पति पत्नी के अभित्याग का अपराधी है, अर्थात् वह (पति) युक्तियुक्त कारण के बिना या बिना पत्नी की राय के या उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे त्यागता है या इच्छापूर्वक उसकी अवहेलना करता है।
  • यदि पति ने इस प्रकार की निर्दयता का व्यवहार किया है जिससे उसकी पत्नी के मस्तिष्क में यह युक्तियुक्त सन्देह उत्पन्न हो जाय कि उसका पति के साथ रहना हानिकर या घातक है।
  • यदि वह उग्र कुष्ठ रोग से पीड़ित है।
  • यदि उसकी कोई दूसरी जीवित पत्नी है।
  • यदि वह उस घर में, जिसमें उसकी पत्नी रहती है (उसी में), रखैल स्त्री रखता है या अन्य कहीं उस रखैल के साथ प्रायः रहता है।
  • यदि वह हिन्दू धर्म त्याग कर कोई दूसरा धर्म अपना लेता है।
  • यदि कोई अन्य कारण है जो उसके पृथक् निवास को न्यायोचित ठहराता है।

अभित्याग तथा क्रूरता की स्थिति का निर्वचन उसी अर्थ में किया जायेगा जिस अर्थ में हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 10 वा 13 के अन्तर्गत किया गया है। जैसा कि उच्चतम तथा उच्च न्यायालय के निर्णय से स्पष्ट है कि अभित्याग के लिये पृथक् निवास तथा वैवाहिक सम्बन्ध समाप्त करने का स्थायी आशय (Animus deserendi) आवश्यक तत्व है और क्रूरता शारीरिक एवं मानसिक दोनों हो सकती है। केरल उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने एक बाद में सामाजिक दृष्टिकोण को अपनाते हुये यह महत्वपूर्ण निर्णय दे दिया कि जहाँ पति अभित्याग का दोषी है वहां यह साबित करना ही पर्याप्त होगा कि वह अलग रह रहा है। वैवाहिक सम्बन्ध को समाप्त करने का स्थायी आशय (Animus deserendi) इस धारा के अन्तर्गत साबित किया जाना आवश्यक नहीं है। यह प्रावधान हिन्दू पत्नी को मदद करने के लिये बनाया गया है। सामाजिक न्याय का दृष्टिकोण इस बात की अपेक्षा करता है कि इस धारा के अधीन भरण-पोषण पाने के लिये पृथक् निवास करती हुई पत्नी केवल पति के द्वारा अभित्याग किये जाने के दोष को साबित करे। उसके लिए अभित्याग के स्थायी आशय का साबित किया जाना आवश्यक नहीं होना चाहिये।

कोई भी हिन्दू स्त्री अपना धर्म त्याग कर दूसरा धर्म जब अपना लेती है या उसका सतीत्व भंग हो जाता है तो न वह पृथक् निवास का दावा कर सकती है और न पोषण का ही। हिन्दू दत्तक-ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम ने पत्नी के पृथक् निवास और भरण- पोषण के अधिकार को विस्तृत कर दिया है। धारा 18(2) में ऐसी दशाओं का वर्णन किया गया है जिनके अनुसार एक हिन्दू पत्नी अपने पति से पृथक् रहते हुए भी भरण-पोषण प्राप्त करने का दावा कर सकती है।

पोषण का अधिकार एक व्यक्तिगत अधिकार है इसलिए पत्नी अपने पति के जीवन- काल में उसके किसी अन्य सम्बन्धी के पोषण के लिए दावा नहीं कर सकती, भले ही वह पति के द्वारा त्याग दी गई हो। किन्तु यदि सम्बन्धी उसके पति की सम्पत्ति पर काबिज है तो वह उससे पोषण की माँग कर सकती है। यदि सम्पत्ति किसी व्यक्ति को हस्तान्तरित कर दी जाती है या पति के किसी अपराध के कारण दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 87 और 88 (नयी दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुसार धारा 82 एवं 83) में कुर्क कर ली जाती हैं तो पत्नी को कोई भी अधिकार उस सम्पत्ति से पोषण पाने का नहीं रह जाता।

पत्नी कब पृथक् निवास तथा भरण-पोषण की अधिकारिणी नहीं रह जाती-

निम्नलिखित परिस्थितियों में पत्नी को पृथक् निवास तथा भरण-पोषण का अधिकार नहीं रह जाता-

  • जब वह धर्म-परिवर्तन करके हिन्दू नहीं रह जाती।
  • जब वह असाध्वी हो जाती है।
  • जब वह किसी औचित्यपूर्ण कारण के बिना पृथक् निवास करती है।
  • जब पति-पत्नी में आपर्सा समझते के परिणामस्वरूप पत्नी अलग रहती है और अपने भरण-पोषण का दावा त्याग देती है

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