जनांकिकी एवं जनांकिकी संक्रमण सिद्धान्त (Demographic Transition Theory)

जनांकिकी एवं जनांकिकी संक्रमण सिद्धान्त

जनसांख्यिकी जनसंख्या का सुव्यवस्थित अध्ययन है। (हिन्दी में इसे ‘जनांकिकी’ भी कहा जाता है)। इसका अंग्रेजी पर्याय ‘डेमोग्राफी‘ यूनानी भाषा के दो शब्दों ‘डेमोस’ यानी जन (लोग) और ‘ग्राफीन’ यानी वर्णन से मिलकर बना है, जिसका तात्पर्य है – लोगों का वर्णन। जनसांख्यिकी विषय के अंतर्गत जनसंख्या से संबंधित अनेक रुझानों तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है जैसे – जनसंख्या के आकार में परिवर्तन – जन्म, मृत्यु तथा प्रवसन के स्वरूप और जनसंख्या की संरचना और गठन अर्थात् उसमें स्त्रियों, पुरुषों और विभिन्न आयु वर्ग के लोगों का क्या अनुपात है।

जनांकिकी परिवर्तन सिद्धान्त (Demographic Transition Theory)

इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक अर्थव्यवस्था को जनसंख्या वृद्धि की चार अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है।

प्रथम अवस्था

यह स्थिरता की अवस्था है, जिसमें जन्म और मृत्यु दोनों की दरें अधिक होती हैं। कृषि प्रधान अविकसित सफाई व्यवस्था, घटिया भोजन और प्रभावशाली डॉक्टरों सहायता के अभाव के कारण मृत्यु दर ऊंची होती है। इस अवस्था में व्यापक निरक्षरता, छोटी आयु में विवाह, परिवार नियोजन के तरीकों के विषय में ज्ञान के अभाव इत्यादि के कारण जन्म दर ऊंची होती है। अतः ऐसे समाज में जनसंख्या वृद्धि की दर वास्तव में अधिक ऊंची नहीं होती, क्योंकि उच्च जन्म दर को उच्च मृत्यु दर संतुलित कर देती है।

द्वितीय अवस्था 

यह तीव्र वृद्धि की अवस्था है, जिसमें मृत्यु दर तो घटती है पर जन्म दर बहुत कम घटती है या बिल्कुल नहीं घटती। जैसे ही अर्द्धविकसित अर्थव्यवस्था विकास की ओर अग्रसर होती है जनसंख्या वृद्धि का द्वितीय चरण आरंभ हो जाता है। आर्थिक विकास के साथ-साथ सामग्री नियमित रूप से प्राप्त होने लगती है, तथा निरोधक एवं आरोग्यवर्धक चिकित्सा सुविधाएँ भी अधिक उपलब्ध होने लगती हैं। इन सब कारणों से मृत्यु दर कम हो जाती है, परंतु दूसरी ओर जन्म दर में बिलकुल कमी नहीं होती या फिर बहुत थोड़ी कमी होती है। कारण यह है कि जन्म दर कम करने वाली शक्तियों, जैसे धार्मिक एवं सामाजिक रीति-रिवाजों में शीघ्र ही कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता। इस प्रकार द्वितीय अवस्था में जन्म दर ऊँची रहती है। परंतु मृत्यु दर में तीव्र गिरावट आने लगती है। परिणामतः जनसंख्या वृद्धि की दर बढ़ जाती है इसलिए इसे ‘जनसंख्या विस्फोट’ का काल भी कहा जाता है।

तृतीय अवस्था

इस अवस्था में मृत्युदर और भी कम हो जाती है किंतु साथ ही अन्य दर भी कम होने लगती है। फलतः जनसंख्या तो बढ़ती है, परंतु व्यय दर से आर्थिक विकास के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का स्वरूप ‘कृषिक’ से परिवर्तित होकर औद्योगिक हो जाता है। जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों से औद्योगिक एवं वाणिज्य केंद्रों की ओर स्थानांतरित होने लगती है। रोजगार पाने के लिए जब पारिवारिक संबंध कम महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं, तब स्त्रियाँ घर से बाहर निकलकर आर्थिक कार्यों में हाथ बंटाने लगती हैं। बड़े-बड़े परिवारों की आर्थिक उपयोगिता समाप्त हो जाती है और उनके स्थान पर छोटे परिवार अधिक सुविधाजनक प्रतीत होने लगते हैं। आर्थिक प्रगति का क्रम परंपरागत विश्वासों और रीति-रिवाजों को कमजोर कर देता है। उचित जीवन बनाये रखने की चेतना व्यक्तियों को परिवार छोटा करने की प्रेरणा देती है। वे परिवार नियोजन तथा गर्भनिरोधक साधनों में विश्वास करने लगते हैं तथा उनके औचित्य को स्वीकार कर लेते हैं, अतः परिपक्व विचारधाराओं तथा स्वैच्छिक एवं कृत्रिम उपायों द्वारा इस काल में जन्म दर को नीचे लाना संभव हो जाता है।

चतुर्थ अवस्था

यह अवस्था उस समय रहती है जब देश का आर्थिक विकास बहुत अधिक हो जाता है और जीवन स्तर काफी ऊँचा हो जाता है। बच्चों के संबंध में लोगों की धारणा बन जाती है – एक आनंद है, दो भीड़ है, तीन अव्यवस्थनीय। ऐसी अवस्था में जन्म एवं मृत्यु दोनों की दरें निम्न स्तर पर स्थित हो जाती है। परंतु अधिक आराम विलासिता, सुकुमारिता, कोमलता आदि के कारण उर्वरता शक्ति क्षीण हो जाती है और जनसंख्या में कमी के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगते हैं, जनसंख्या की कमी की यह आरंभिक अवस्था है।

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