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हिंदू विवाह अधिनियम 155 के अंतरगत हिंदू विवाह की प्रकृति

हिंदू विवाह की प्रकृति

हिंदू विवाह की प्रकृति

भारतीय हिंदू समाज में विवाह को एक महत्चूपर्ण संस्कार माना जाता है। इसके महत्व को देखते हुए हिन्दू विधि में विवाह को विशेष दर्जा दिया गया है। हिन्दू विधि में पुरुष पत्नी के बिना अधूरा समझा जाता है। पत्नी को पुरुष की अर्धांगिनी माना जाता है जैसा कि महाभारत के आदि पर्व में बताया गया है कि वही व्यक्ति कौटुम्बिक जीवन बिताते हैं जिनके पत्नियाँ होती हैं। जिनके पत्नियाँ होती है वही व्यक्ति सुखी रह सकते हैं, जिनके पत्नियाँ है वही पूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं और वही व्यक्ति सम्यक् रूपेण अपने दायित्वों को पूरा कर सकते हैं जिनके पलियाँ हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने मनमोहिनी V. बसन्त कुमार के मामले में हिन्दू विवाह को मांस से मांस तथा हड्डी से हड्डी का मिलन बताया है और इसे एक संस्कार से भी बढ़कर माना है। हिन्दू विधि में विवाह को हिन्दुओं के 16 संस्कारों में एक प्रमुख संस्कार माना जाता है। निम्नलिखित कारणों से हिन्दू विधि में विवाह को एक संस्कार माना जाता है-

  1. पितृ ऋण की मुक्ति के लिए विवाह

    भारतीय समाज में पितृ ऋण से मुक्ति प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को विवाह कर पुत्र उत्पन्न करने की व्यवस्था की की गयी है। वस्तुतः प्रत्येक हिन्दू तीन ऋणों देव ऋण, ग्रऋषि और पितृ ऋण के लिए दायी होता है। यज्ञ करके देवऋण से, वेदाध्ययन करके ऋषि ऋण से और पुत्र उत्पन्न करके पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। चूँकि पितृऋण से मुक्ति के लिए पुत्र उत्पन्न करना आवश्यक है और पुत्र की प्राप्ति पत्नी से होतीहै और पत्नी विवाह से मिलती है, इसलिए प्रत्येक हिन्दू के लिए विवाह अनिवार्य हो जाता है।

  2. स्वर्ग की प्राप्ति के लिए विवाह

    स्वर्ग की प्राप्ति और नरकलोक से बचने के लिए व्यक्ति विवाह करता था। प्राचीन भारतीय हिन्दू समाज में यह माना जाता था कि शुद्ध वंश में पुत्र के उत्पन्न होने पर पिता को नरक में नहीं जाना पड़ता और स्वर्ग की प्राप्ति होती है इसीलिए हिन्दू विवाह का प्रमुख उद्देश्य पुत्र की प्राप्ति होती है है क्योंकि व पुत्र श्राद्ध आदि कमाँ द्वारा पिता को नरक से बचाता है। जैसा कि मनुस्मृति में कहा गया है कि वहीं व्यक्ति पूर्ण पुरुष है जो पत्नी और सन्तानयुक्त है।

  3. धार्मिक अनुष्ठानों को पूर्ण करने के लिए विवाह

    हिन्दू विधि पत्नी को धर्म पत्नी और पति की अर्धांगिनी मानती है। हिन्दू विधि के अनुसार बिना पत्नी के पुरुष अधूरा होता है पत्नी पुरुष के अधूरे व्यक्तित्व को पूरा कर देती है। धार्मिक अनुष्ठान बिना पत्नी के पूरे नहीं किए जा सकते हैं। अधिकतर धार्मिक अनुष्ठान पति-पत्नी गाँठ जोड़कर पूरा करते हैं।

  4. वंश वृद्धि के लिए विवाह-

    अपने वंश को आगे बढ़ाने हेतु हेतु पुत्र का उत्पन्न होना आवश्यक होता है और पुत्र की प्राप्ति विवाह के बाद ही होती है। जैसा कि याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि स्त्री माता बनने के लिए एवं पुरुष पिता बनने के लिए उत्पन्न किए गये हैं।

  5. विवाह टूटने वाला एक बन्धन

    भारतीय हिन्दू समाज में विवाह को सात जन्मों या कई जन्मों का साथ स्वीकार किया जाता है। कतिपय स्मृतिकार तो विवाह को इतना पवित्र बन्धन मानते हैं कि उनके अनुसार विवाह का बन्धन मृत्यु के बाद भी नहीं टूटता। मनु के अनुसार कन्या का एक बार विवाह करने के बाद जीवन पर्यन्त वह उसी व्यक्ति की पत्नी बनी रहती है। यद्यपि नारद और पराशर निम्नलिखित विशेष परिस्थितियों में स्त्री को दूसरा विवाह करने की अनुमति देते हैं,जब पति-

    • लापता या खो गया हो;
    • मर गया हो;
    • सन्यासी हो गया हो;
    • नपुंसक हो गया हो;
    • जाति से निकाल दिया गया हो।

परन्तु उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त प्रावधान केवल अमान्य विवाह पद्धतियों के लिए विवाह पद्धितियों के लिए नहीं।

  1. धार्मिक रीति से विवाह का किया जाना

    हिन्दू विधि में धार्मिक रीति-रिवाज से विवाह सम्पन्न कराने का प्रावधान है। प्राचीन काल में भी हिन्दू समाज में विवाह को धार्मिक अनुष्ठान मान कर सम्पन्न कराया जाता था। इस अनुष्ठान द्वारा पिता अपनी पुत्री का कन्यादान करता है पुरोहित (द्विज) विवाह को सम्पन्न कराता है कन्या और वर गांठ जोड़कर पवित्र अग्नि के एक साथ सात फेरे के लिए जब घूमते हैं तब विवाह पूर्ण माना जाता है। हिन्दू विवाह धार्मिक रीति से सम्पन्न न होने पर अपूर्ण माना जाता है।

  2. हिन्दू विवाह का संविदात्मक स्वरूप का होना

    भारतीय हिन्दू समाज में विवाह को एक धार्मिक संस्कार माना जाता है। इसलिए हिन्दू विवाह संविदा की प्रकृति का नहीं होता क्योंकि संविदा के लिए जिन तीन अनिवार्य तत्वों-प्रस्ताव, स्वीकृति और प्रतिफल की आवश्यकता होती है हिन्दू विवाह में इन तीनों का अभाव है अर्थात् हिन्दू विवाह में विवाह के पक्षकारों में मुस्लिम विवाह की तरह प्रस्ताव और स्वीकृति जैसी बात नहीं होती और न ही वर को दूल्हन प्राप्त करने के बदले में कोई प्रतिफल देना पड़ता है। कन्या का पिता स्वेच्छा से वर को कन्यादान में देता है। वह कन्यादान करने के बदले में कोई प्रतिफल नहीं लेता। इसके अतिरिक्त हिन्दू विवाह को इस कारण से भी संविदा नहीं कहा जा सकता क्योंकि संविदा के लिए पक्षकारों का वयस्क एवं स्वस्थ मस्तिष्क का होना आवश्यक होता हैं जबकि हिन्दू विवाह के पक्षकार अवयस्क एवं विकृतचित्र (Unsound mind) किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। इसलिए हिन्दूविवाह को किसी भी दशा में संविदा तो कहा ही नहीं जा सकता।

क्या विवाह का आधुनिक स्वरूप संविदात्मक है?

निम्नलिखित कारणों से यह कहा जा सकता है कि विवाह का आधुनिक स्वरूप संविदात्मक हो गया है-

  1. सहमति से विवाहविच्छेद की सुविधा

    हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 में ही विवाह विच्छेद, न्यायिक पृथक्करण और विवाह को शून्य घोषित कराने की सुविधा प्रदान की गई थी परन्तु इस अधिनियम के अन्तर्गत विवाह विच्छेद कराना आसान नहीं था। इसके अतिरिक्त विवाह विच्छेद की याचिका विवाह के 3 वर्ष पश्चात् ही की जा सकती थी। ऐसा उपबन्ध इसलिए किया गया था कि 3 वर्ष में विवाह के पक्षकार ठीक से एक-दूसरे को समझ लें, यदि कोई गलतफहमी हो गई हो तो दूर कर लें। परन्तु संशोधन अधिनियम 1976 ने यह उपवन्ध करके कि विवाह के पक्षकार आपसी सहमति (Mutual Consent) से विवाह के सांस्कारिक स्वरूप को चकनाचूर करके हिन्दू विवाह के स्वरूप को संविदात्मक स्वरूप प्रदान करने में सहायता प्रदान की है।

  2. न्यायिकपृथक्करण और विवाहविच्छेद के आधारों का एकीकरण-

    विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 ने न्यायिक पृथक्करण और विवाह विच्छेद के आधारों को एक कर दिया है। जिससे न्यायिक पृथक्करण की उपयोगिता समाप्त हो गई है क्योंकि अब कोई पक्षकार न्यायिक पृथक्करण की याचिका दायर करना इसलिए पसन्द नहीं करता क्योंकि उसे उन्हीं आधारों पर विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि न्यायिक पृथक्करण और विवाह-विच्छेद के आधारों के एकीकरण के उपबन्ध में हिन्दू विवाह के स्वरूप को संविदात्मक स्वरूप प्रदान करने में सहायता प्रदान की है।

  3. यौन सम्बन्धी बीमारी एवं मस्तिष्क विकृतता के आधार पर विवाहविच्छेद

    पहले यौन सम्बन्धी बीमारी और दिमागी विकृतता के आधार पर विवाह-विच्छेद की डिक्री तभी पारित की जाती थी जब कोई पक्षकार एक निश्चित अवधि (3 वर्ष) से उपरोक्त बीमारियों से ग्रस्त होता था। परन्तु संशोधन अधिनियम 1976 ने अवधि सम्बन्धी शर्त समाप्त करके विवाह-विच्छेद को और आसान बना दिया है।

  4. जारता के आधार पर विवाहविच्छेद

    पहले जारता के आधार पर विवाह- विच्छेद की डिक्री पक्षकार के लगातार जारता में रहने पर मिलती थी। इसके अतिरिक्त जारता को साबित करना बहुत कठिन था परन्तु संशोधन अधिनियम, 1976 के ही कृत्य पर विवाह-विच्छेद की डिक्री प्रदान की जा सकती है।

  5. विवाह पक्षकारों की आयु में परिवर्तनबाल

    विवाह अवरोध अधिनियम, 1978 ने वर और वधू की आयु सीमा क्रमशः 21 व 18 वर्ष कर दिया है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि उपरोक्त अधिनियमों ने विवाह-विच्छेद को आसान बनाकर हिन्दू विर्वाह के उस प्राचीन सांस्कारिक स्वरूप को नष्ट कर डाला जिसे पति- पत्नी का जन्म-जन्मान्तर का कभी न समाप्त होने वाला रिश्ता माना जाता था। वस्तुतः वर्तमान – प्रचलित अधिनियमों ने विवाह को संविदात्मक स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया है और काफी हद तक अपने प्रयत्न में सफल भी हुए हैं परन्तु फिर भी हिन्दू विवाह को मुस्लिम विवाह की तरह संविदा नहीं कहा जा सकता। हिन्दू विवाह को एक ऐसा विवाह कहा जा सकता है जो न तो पूर्ण रूप से सांस्कारिक है और न ही पूर्ण रूप से संविदात्मक ।

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