भारत में सूखे की समस्या

भारत में सूखे की समस्या

भारत में सूखे की समस्या

सूखा

वर्षा की परिवर्तनशीलता से वर्षा की कमी तथा अधिकता की दोहरी समस्याएँ पैदा होती हैं जो क्रमशः सूखा (drought) तथा बाढ़ों के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं। वर्षा की कम की होने पर जल की कमी से सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। मानसून की अनियमित प्रकृति, लंबे शुष्क काल तथा उच्च तापमानों सहित, भारत में सूखे की स्थिति उत्पन्न करने के लिये उत्तरदायी हैं। औसत रूप से पाँच वर्षों में से एक वर्ष सूखे का होता है। इसकी तीव्रता वर्ष दर वर्ष भिन्न होती है। यह स्थिति निम्न (60 सेमी) तथा परिवर्तनशील (40% से अधिक) वर्षा वाले क्षेत्रों में प्रयाः देखी जाती है। जहाँ सिंचाई की सुविधाएँ विकसित नहीं हैं। ऐसे क्षेत्र देश के 35 प्रतिशत क्षेत्र पर स्थित हैं तथा सूखा प्रवण क्षेत्र कहलाते हैं। भारत में निम्नलिखित क्षेत्र सूखा प्रवण क्षेत्र कहलाते हैं-

  • DPAP (1070-71) द्वारा सीमांकित तथा सिंचाई आयोग (172) द्वारा पहचाने गये सूखाग्रस्त क्षेत्र ।
  • DPAP द्वारा सीमांकित क्षेत्र, जिनकी पहचान सिंचाई आयोग द्वारा नहीं की गयी।
  • सिंचाई आयोग द्वारा-पहचाने गये सूखा प्रवण क्षेत्र, किंतु DPAP में सम्मिलित नहीं।
  1. शुष्क एवं अर्द्ध शुष्क प्रदेश

    इसके अंतर्गत राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, दक्षिण पश्चिम उत्तर प्रदेश, पंजाब एवं हरियाणा के 6 लाख वर्ग किमी पर विस्तृत क्षेत्र सम्मिलित हैं, सूखे की तीव्रता उन क्षेत्रों में अधिक कहै जहाँ सिंचाई की सुविधाएँ सुविकतिस नहीं हैं। राजस्थान में इंदिरा गाँधी नहर परियोजना तथा गुजरात में नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बाँध परियोजना सूखे के प्रभाव को कम करने में लाभदायक सिद्ध हुई है।

  2. पश्चिमी घाट के वृष्ट छाया प्रदेश

    सह्याद्रि के विमुख ढालों पर जलगाँव (महाराष्ट्र) से चित्तूर (आंध्र प्रदेश) तक विस्तृत 300 किमी चौड़ी, पेटी, जिसका क्षेत्रफल7 लाख वर्ग किमी है।

  3. अन्य क्षेत्र

    देश के विभिन्न भागों में बिखरे क्षेत्र, जिनमें कालाहांडी (उड़ीसा), पुरूलिया (पश्चिम बंगाल), मिर्जापुर पठार (उत्तर प्रदेश), पलामू (झारखंड, कोयम्बंटूर तथा तिरूनेलवली (तमिलनाडु) आदि लगभग 1 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर विस्तृत हैं।

सिंचाई आयोग (1972) ने देश में दो प्रकार के सूखे क्षेत्र की पहचान की है- (1) सूखा प्रवण क्षेत्र तथा (2) प्रायः बाढ़ग्रस्त क्षेत्र । प्रथम प्रकार के क्षेत्र वे हैं जहाँ वर्षो की परिवर्तनशीलता 25 प्रतिशत मिलती हैं, जबकि द्वितीय प्रकार के क्षेत्रों में 25 प्रतिशत – 40 प्रतिशत वर्षा की परिवर्तनशीलता पायी जाती है।

सूखा प्रवण (droughts prone) क्षेत्रों- (1) गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी मध्य प्रदेश, (2) मध्यवर्ती महाराष्ट्र, आंतरिक कर्नाटक, रायलसीमा, दक्षिणी तेलंगाना तथा तमिलनाडु के कुछ भाग, (3) उत्तर पूर्वी बिहार, दक्षिणी पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा (4) पश्चिमी बंगाल का पुरूलिया जिला सम्मिलित हैं।

निरंतर सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में कच्छ (गुजरात) तथा पश्चिमी राजस्थान सम्मिलित हैं।

कुल मिलाकर देश का लगभग 10 लाख वर्ग किमी क्षेत्र सूखे तथा अपर्याप्त वर्षा से प्रभावित है। इसमें देश का 56 मिलिसन हैक्टेयर कृषित क्षेत्र भी सम्मिलित है।

लंबे समय तक तीक्ष्ण सूखे की दशाएँ रहने पर अकाल या दुर्भिक्ष की स्थिति आती है। निकट ऐतिहासिक काल में बंगाल (1770), उत्तर प्रदेश (1836), उड़ीसा (1865-66), प्रायद्वीपीय भारत (1876-78), महाराष्ट्र (1965-66), बिहार (1966-68) तथा उड़ीसा (1996-97) के अकाल उल्लेखनीय हैं। बंगाल दुर्भिक्ष (1770) में 10 मिलियन लोग काल कवलित हुए, जबकि उत्तर प्रदेश (8 लाख), उड़ीसा (10 लाख) तथा प्रायद्वीप भारत (55 लाख) के दुर्भिक्षों में लाखों लोग मृत्यु का ग्रास बने ।

आधुनिक समय में परिवहन एवं संचार के आधुनिक साधनों के विस्तार तथा सिंचाई की सुविधाओं के विकास के कारण सूखे तथा अकाल की तीक्ष्णता कम हो गयी है, किंतु फिर भी इनका देश की अर्थव्यवस्था तथा जन-जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP) 1971 में प्रारंभ किया गया था, जो अब देश के 90 जिलों के 615 खंडों को सेवित करता है। यह कृषि क्षेत्र में एक समेकित विकास कार्यक्रम है। जिसका उद्देश्य निरंतर सूखाग्रस्त क्षेत्रों में भूमि, जल एवं पशु संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग, पारिथतिक संतुलन की पुनर्स्थापना तथा लोगों की (विशेषतः समाज के कमजोर वर्गों की) आय में स्थिरीकरण है।

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