प्रवाल एवं प्रवाल भित्ति (Coral & Coral Reefs)

प्रवाल एवं प्रवाल भित्ति- उत्पत्ति एवं वितरण

प्रवाल एवं प्रवाल भित्ति

जलराशि अनेक अल्पाकार जीवों में हरा, लाल, पीला आदि रंग का मूँगा भी एक कोट है। इसमें चूने का अंश अधिक होता है और ये अपने शरीर को सुरक्षित रखने के लिए चूने का घोल बनाते हैं। इनमें आपस में मिलने की प्रवृत्ति होती है, ये झुंड में रहते हैं। जब ये कीड़े मृत हो जाते हैं तो इनके अवशेष समुद्र तल पर एकत्र होते रहते हैं। अन्य समुद्री जीवों के अवशेष भी एकत्र होते रहते हैं। इनका प्रसार मक्खियों के छत्ते या वृक्ष की तरह हो जाता है और कालान्तर में शैलें पानी की सतह पर आ जाती हैं। ऊपरी भार के कारण जीवांश पत्थर की भाँति कठोर हो जाते हैं। इन मूँगें के अवशेषों के आधिक्य से एक श्रेणी बन जाती है। जिसको प्रवाल भित्ति कहते हैं। इन प्रवाल रचनाओं पर चूना- प्रधान, फोरैमिनीफेरा (Forminifera), मोलस्का (Mollusca), तथा नलीपोर (Nullipore) आदि द्वारा चूना तथा समुद्री लहरों द्वारा बालू एवं बजरी का भी निक्षेप होता है। इस प्रकार टापू या चबूतरे की भाँति प्रवाल-शैलों की आकृति बन जाती है। इन पर वायु द्वारा रेत तथा वनस्पति के बीज भी पड़ जाते हैं।

प्रवाल भित्तियाँ कदाचित् ही समुद्र-जल के ऊपर निकलती हैं। ये प्रायः जल की सतह से तनिक नीचे ही रहती हैं और भाटे के समय दृष्टिगोचर होती हैं। ये शैलें ऊँचाई की अपेक्षा चौड़ाई में अधिक बढ़ती हैं, क्योंकि चौड़ाई में उन्हें अधिक भोज्य पदार्थ उपलब्ध हो जाते हैं।

  1. तापमान की अनुकूलता-

    भौगोलिक अवस्थाएँ-प्रवाल भित्तियाँ गर्म समुद्रों में पनपती हैं। इसके लिए कम से कम 20 अंश सेग्रे0 का तापमान चाहिए। इसी कारण उष्ण एवं उपोष्ण समुद्री भागों में 30 अंश दक्षिण अक्षांशों के मध्य इनकी अधिकता रहती है।

  2. स्वच्छ जल की आवश्यकता-

    ये छिछले जल में बढ़ती हैं। ये 45 मीटर से अधिक गहरे जल में नहीं पनपती हैं। इनकी वृद्धि के लिए पानी स्वच्छ होना आवश्यक होता है। कीड़ों के विकास के निमित्त नदियों का निक्षेप वर्जित है। मटमैले जल में ये कीड़े नहीं पनप पाते हैं। अटलांटिक महासागर में अधिक नदियों के मतानुसार महासागरीय तल की नीचे की ओर अवतलन की प्रवृत्ति प्रवाल भित्तियों की रचना का मुख्य आधार है। उनका विश्वास है कि सभी प्रवाल भित्तियों की उत्पत्ति द्वीपों के समूह से किसी न किसी रूप में हुई। निमज्जन क्रिया के फलस्वरूप तटीय भित्ति परिवर्तित होकर अवरोधक प्रवाल भित्ति बन गई। तदनन्तर स्थल भाग या ज्वालामुखी द्वीप के धंसते जाने पर प्रवाल भित्तियां बाहर की ओर ऊपर उठती गयीं, क्योंकि इनके बनाने वाले जीव अपना कार्य करते रहे, अन्त में वलयाकार भित्ति बन गयी और टापू बिल्कुल निमज्जित हो गया और एक झील की रचना हो गयी।

इस परिकल्पना से प्रवाल चलयों से सम्बन्धित दृश्यों की व्याख्या हो जाती है। समुद्र तल के निमज्जन की संभावना भी ठीक है, क्योंकि पृथ्वी के इतिहास में निमज्जन क्रियाओं की चर्चा आती है। डार्विन के मत के प्रमुख समर्थक तथ्य निम्न प्रकार हैं-

  1. गहराई से प्राप्त मूंगे के कीड़ों के अवशेषों से ज्ञात होता है कि जब इनकी भित्ति का विकास हो रहा था उसी समय इनका अन्त हो गया। इसलिए धरातल अवश्य धँस गया होगा। हवाई द्वीप, मालदीव तथा हिन्देशियाई द्वीप समूह में डूबी हुई प्रवाल भित्तियों के उदाहरणों से इसका स्पष्टीकरण हो जाता है।
  2. प्रवाल भित्तियों की मोटाई से प्रतीत होता है कि उनका श्रीगणेश धँसती हुई सतह पर हुआ है, क्योंकि इतनी गहराई पर जीव पनप नहीं सकते हैं।
  3. वलयाकर भित्तियों से इन द्वीपों में घर्षण द्वारा बनी हुई बन्द ढालें नहीं मिलती हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ये जल निमग्न पर्वत शिखरों के अवशेष हैं।
  4. स्थल तथा प्रवाल भित्ति के संगम स्थान पर विषम-विन्यास मिलता है। सामान्य दशा में घर्षित थल के ढाल नीचे की ओर होते हैं, किन्तु मूंगे की भित्ति के ढाल ऊपर की ओर जाते हैं।
  5. स्थल के जिन भागों में निकट प्रवाल भित्तियां मिलती हैं वहां समुद्र में अनेक आघात होते हैं। ये नदियों की डूबी हुई घाटियां हैं।
  6. जो द्वीप जल के ऊपर उठे हुए होते हैं उसमें मूंगे की भित्ति नहीं होती है। यद्यपि उनकी उत्पत्ति के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं।
  7. हिन्देशिया के किनारे जलमग्न घाटियों का प्रमाण मिलता है।
  8. भृगुओं की अनुपस्थिति भी अवतलन दके पक्ष में है। केवल स्थाई स्थल भागों के किनारे भृगु पाये जाते हैं।
  9. वेधन क्रिय द्वारा परीक्षाफल भी इस सिद्धान्त के पक्ष में है।
  10. स्थला जात अवसाद के निक्षेप के बावजूद अनूप कम छिछला रहता है।
आपत्तियां-

यह तथ्य अग्राह्य प्रतीत होता है कि समुद्रतल की धंसान के साथ प्रवाल भित्तियां ऊपर उठीं। इस परिकल्पना से अनूपों के चौरस होने की व्याख्या भी नहीं मिलती है। परिकल्पना का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें समुद्रतल के विस्तृत रूप में धंसने का कैसे एवं क्यों का करण ठीक रूप समझा में नहीं आता है, डार्विन के मतानुसार प्रवाल द्वीप वलय का आधार 60 मीटर या इससे अधिक गहराई पर होना चाहिए। किन्तु सोलोमन द्वीप में सान्ता आना तथा हिन्देशिया के दक्षिण स्थित क्रिस्टमस द्वीप में ऐसे प्रमाण मिलते हैं जहां उत्थापन हुआ है, अवतलन की क्रिया नहीं हुई और प्रवाल निक्षप की गहराई भी कम है।

फीजो द्वीप के निकट तराई द्वीप के किनारे तटीय ‘भत्तियां तथा प्रवाल रोधिकाएं साथ-साथ पायी जाती हैं। जो डार्विन की कल्पनाओं के विपरीत हैं।

कुल प्रवाल द्वीप अन्तः समुद्री ज्वालामुखी पर निर्मित है जहां अवतलन का प्रश्न ही नहीं उठता है।

मुरे महोदय ने भी वेधन क्रिया द्वारा उपलब्ध प्रमाणों के विरूद्ध में कहा है। मुरे के मतानुसार 60 मीटर से अधिक गहराई में प्रवाल भित्ति नहीं है, बल्कि चूर्णो का जमाव है।

इस सिद्धान्त के अनुसार प्रशान्त महासागर में असंख्य प्रवाल भित्तियों के प्रमाण नहीं मिलते है।

मुरे की घोल परिकल्पना

ब्रिटिश भूगोलवेत्ता सर जॉन मुरे महोदय ने डार्विन की परिकल्पना से मतभेद व्यक्त करते हुए कहा है कि वलयाकार प्रवाल भित्ति वहाँ भी मिलती है जहाँ भू-तल के निमज्जन के चिह्न नहीं मिलते हैं। इनके विचार में प्रवाल भित्ति का निर्माण समुद्र में डूबे हुए ज्वालामुखी की चोटियों, जलमग्न चबूतरों तथा ज्वालामुखी के शंकु के ऊपर होता हैं। इस उत्पत्ति की व्याख्या करते हुए मुरे ने बताया है कि तटीय प्रवाल भित्ति स्थलोन्मुख भाग के सड़कर घुलने के कारण अवरोध श्रेणी बन गयी हैं। और चूना एवं डोलोमाइट के जल में घुल जाने से अनूप बन गये हैं। इस प्रकार तटीय प्रवाल भित्ति का परिवर्तन प्रवाल रोधिका के रूप में हो गया। मुरे के अनुसार प्रवाल भित्तियाँ समुद्र की ओर बढ़ती हैं, क्योंकि खुले समुद्रों से प्रवाल जीवों को प्रर्याप्त मात्रा में खाद्य पदार्थ मिल जाते हैं। इस ओर ढाल भी तीव्र होता है।

मुरे के अनुसार शैलों की रचना

समुद्री चबूतरों पर बाह्य प्रवाल सुगमता से बढ़ते हैं जिससे वृत्ताकार प्रवाल भित्ति धरातल पर सर्वप्रथम आ जाती है। ऐसी दशा में जीवित प्रवाल समुद्री भाग की ओर होते हैं और तीसरी भाग में मृत । मत प्रवालों के घुलनशील होने से अनूप गहरे तथा बड़े होते हैं और वृत्ताकार प्रवाल-भित्ति का आकार बढ़ता जाता है। मुरे महोदय ने जल की सतह से ऊपर निकले चबूतरों के अपरदन तथा अधिक गहरे चबूतरों पर निक्षेप को भी मान्यता दी है।

मुरे की यह उपपत्ति पूर्ववर्ती वेदिका परिकल्पना (Antecedent Platform Theory) कहलाता है। मुरे ने भी यही मत व्यक्त किया है कि स्थल के अन्तः समुद्री चबूतरों पर सर्वप्रथम अवसादी एवं समुद्री जीवों का निक्षेप होता है, तत्पश्चात् प्रवाल की उत्पत्ति होती है, किन्तु अनूप की रचना के सम्बन्ध में वे मौन हैं। अमेरिकी विद्वान ए0 आगासीज ने भी मुरे के अनुरूप ही विचार व्यक्त किये हैं, किन्तु उनकामत है कि अन्तःसागरीय चबूतरे समुद्री तरंगों के अपरदन से बने। ये चबूतरे 30 से 50 फैदम तक गहराई पर होते हैं। इन पर प्रवाल जीवों का निवास प्रारम्भ हुआ है और प्रवाल भित्ति का निर्माण होता गया। कालान्तर में प्रवाल भित्ति जल-तल से ऊपर निकल आयी। इसका मध्य भाग समुद्री तरंगों के घर्षण से नीचा हो गया। इस प्रकार वलयाकार प्रवाल बनी। अमेरिकी विद्वान हार्टन तथा गार्डिनर के भी ये ही विचार हैं। गार्डिनर महोदय ने स्थिर स्थल सिद्धान्त (Standstill or non-subsidence theory) में आस्था रखकर 140 फैदम में 180 फैदम की गहराई के चबूतरों का उपयोग किया। इनके विचार में सागरीय जीवों के निक्षेप पश्चात् चबूतरे आवश्यक गहराई पर आये और जब सागर की गहराई 30. फैदम रह गयी तब प्रवाल भित्ति का निर्माण प्रारम्भ होता है। चबूतरों के मध्यवर्ती भाग में प्रवाल मर हो जाते हैं और घुलने लगते हैं जिससे अनूप की रचना होती है।

मुरे के सिद्धान्त के विपक्ष में निम्न तथ्य प्रस्तुत किये जाते हैं-

  1. बाहर की ओर प्रवाल भित्ति के विकसित होने से केवल 30 फैदम तक तीव्र ढाल सम्भव है जैसा मरे की कल्पना है, किन्तु अधिक गहराई पर प्रवाल भित्ति का आधार प्रवालपूर्ण तथा जैव सामग्री होती है। इन वस्तुओं का निक्षेप तीव्र ढाल पर नहीं होता है।
  2. यदि भूमि का अवतलन नहीं होता है तो अनूप की गहराइ अधिक से अधिक 52 फैदम होगी, किन्तु कुछ अनूपों की गहराई 50 फैदम से अधिक मिलती है। फीजी द्वीप तथा सुलावेसा के तट पर अधिक गहराई मिलती है।
  3. अपरदन एवं निक्षेप की सम्भावनाएँ साथ-साथ नहीं की जा सकती हैं। सिद्धान्त में कई शिखरों पर निक्षेप और कहीं अपरदन की कल्पना की गयी है। 30 फैदम की गहराई पर समुद्र या निक्षेप का कार्य भौतिक परिस्थितियों के विपरीत है।

डैली की हिमानी नियंत्रण परिकल्पना

अमेरिकी विद्वान् डैली ने बताया कि हिम युग में जब समुद्र का जल हिमरूप में हिम क्षेत्रों में आबाद हो गया हो तो समुद्री जल-तल लगभग 60 मीटर नीचा हो गया। इस प्रकार अनेक जलमग्न थल भाग समुद्र तल पर आ गये और जलमग्न मंचों का आविर्भाव हुआ। डैली के विचार से उस सतह पर इतनी ठण्डक थी कि मूँगें के कीड़े पैदा नहीं हो सकते थे। उनके मतानुसार इस सिद्धान्त का आधार हिमयुग तथा हिमयुग के उपरान्त जलतल में आया अन्तर है। तटीय स्थल रहे और हिमनद नियंत्रण जल-तल में परिवर्तन हुआ।

उष्णता बढ़ी और हिम पिघल गयी और समुद्र का तल ऊपर उठने लगा। इसी प्रवाल जीवों का भी जन्म हुआ और क्रमिक विकास होने लगा। जैसे-जैसे समुद्र तल ऊँचा उठता गया प्रवाली भी ऊँची उठती गयी। सँकरी वेदिकाओं पर तटीय प्रवाल भित्ति और चौड़ी वेदिकाओं पर प्रवाल रोचिकाओं की रचना हो गयी। कालान्तर में प्रवाली के बीच में अनूप का आविर्भाव हुआ जिसका तल चौरस होता था। फलतः वलयाकार प्रवाल भित्ति का निर्माण हुआ। इस प्रकार डैली के मतानुसार वर्तमान प्रवाल भित्तियों की रचना अत्यन्त नूतन युग के पहले की नहीं है। इस सिद्धान्त की निम्न त्रुटियाँ हैं-

  1. इस सिद्धान्त के अनुसार एक महासागर के विभिन्न अनूपों की गहराई एक समान होनी चाहिए, किन्तु डेविस महोदय ने बताया कि एक ही अनूप के विभिन्न भागों में गहराई में अन्तर मिलता है।
  2. वास्तव में अनूपों का चौरस तल अवसाद द्वारा निक्षेपित है, किन्तु इस सिद्धान्त के अनुसार अनूपों का तल चौड़ी वेदिकाओं पर आधारित है जो अपरदन द्वारा निर्मित कल्पित की गयी है।
  3. अपरदित भृगुओं एवं वेदिकाओं के निकट भी मिलते हैं जिनका अपरदन वेदिकाओं के पूर्व हो जाना चाहिए।
  4. तटवर्ती भागों में गहरी अन्तःसमुद्री घाटियाँ एवं कन्दराएँ प्रमाणित करती हैं कि हिमयुग में चौरस वेदिकाएँ सब जगह नहीं बनी।
  5. महासागर के तटवर्ती अस्थिर भागों में अनूपों की गहराई में कम अन्तर है और स्थिर भागों की गहराई में अधिक अन्तर मिलता है जो इस सिद्धान्त के विरुद्ध है।

हिमानी नियंत्रण परिकल्पना के विरूद्ध डेविस की आपत्तियाँ हैं।

डैली के मत की विद्वानों द्वारा आलोचनात्मक टिप्पणियाँ
  1. डैली ने सभी अनूपों की गहराई की समता पर आपत्ति की है तथा प्रवाल भित्ति के क्षेत्रों को स्थायी माना है, किन्तु डेविस ने अस्थायी क्षेत्रों में भी प्रवाल भित्ति की उपस्थिति दिखायी है।
  2. डैली ने 90 मीटर अधिकतम निमज्जन आँकी है, किन्तु डेविस के विचार में यह अधिक है। निमज्जन की क्रिया सदैव जारी रहे तथा प्रवाल भित्ति के बढ़ने की गति सदा समान रहे, आवश्यक तथ्य नहीं है।

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