गाँधीजी की सर्वोदय अवधारणा

गाँधीजी की ‘सर्वोदय’ अवधारणा

गाँधीजी की ‘सर्वोदय’ अवधारणा

सर्वोदय का अर्थ

‘सर्वोदय’ ‘सर्व’ + ‘उदय’ – दो शब्दों के योग से बना हुआ है, जिसका अर्थ है ‘सबका उदय’ या सबका कल्याण। सर्वोदय का उद्देश्य समाज में ऐसी भावना को जागृत करना है, जात-पाँच एवं ऊँच-नीच की भावना को त्याग कर लोग अपने ही नहीं, वरन् दूसरे के लिए भी जीना सीखें।

गाँधीजी ने सर्वोदय के विचार को भारतीय जनता के लिए मूल-मन्त्र माना था और विनोबा ने इस विचार की व्याख्या की और उसे व्यावहारिक रूप दिया। सर्वोदय के सिद्धान्त मध्यमागी सिद्धान्त है। इसमें पूँजीवाद और समाजवाद के बीच का मार्ग अपनाया गया है। सर्वोदय एक ऐसा विकल्प है, जो केवल भारत के लिए ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व की शान्ति व सुखमय जीवन के लिए हितकर है। इस सिद्धान्त का आधार आध्यात्मिकता है।

सर्वोदय के अन्तर्गत दलितों, पीड़ितों व असहाय लोगों की सहायता करने की भावना निहित है। ‘सर्वोदय’ शब्द बाइबिल के ‘पीड़ित की रक्षा करो’ (Unto this Last) शब्द का ही एक रूप है। इसमें भौतिकवाद की अपेक्षा नैतिकता को प्रमुख स्थान दिया गया है। यह सिद्धान्त मानव कल्याण के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है। कर्म की प्रधानता होने के कारण इस सिद्धान्त में सब धर्मों के लोगों के लिए स्थान सुरक्षित है। सर्वोदय में सत्य, अहिंसा और प्रेम की सबसे अधिक महत्व दिया गया है। ये बातें विश्व-बन्धुत्व की भावनाओं को बढ़ाने में सहायक होती हैं। यहीं कारण हैं कि सर्वोदय के सिद्धान्त को आज भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। गाँधीजी की इच्छा की पूर्ति के लिए स्वतन्त्रता के बाद देश में जन-कल्याण हेतु 1950 में एक रचनात्मक योजना बनायी गयी थी, जिसका नाम: ‘सर्वोदय योजना’ रखा गया था। यह योजना औद्योगीकरण पर आधारित न होकर, ग्रामीण व कुटीर-उद्योगों के विकास पर आधारित होगा। इस दर्शन के आधार पर एक ऐसे समाज की रचना की जा सकेगी, जिसमें सभी लोग गरीबी, बीमारी, अभाव, दासता आदि समस्याओं से मुक्त होंगे। इस प्रकार के नव-निर्मित समाज में गरीब व अमीर, किसान व भू-स्वामी मालिक व नौकर, जनता व राज्य के बीच किसी प्रकार का संघर्ष नहीं होगा। सर्वोदय में विशेष ध्यान इस बात पर दिया है कि इससे छुआछूत की बीमारी दूर करके समाज को एक संगठित इकाई के रूप में गठित किया जायेगा।

सर्वोदय पर विनोबा भावे के विचार

सर्वोदय का उद्देश्य

विनोबा भावे ने सर्वोदय के सम्बन्ध में जो विचार व्यक्त किये हैं, उनके आधार पर सर्वोदय के उद्देश्यों को निम्न प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

  1. सर्वांगीण विकास –

    भारतवर्ष की आर्थिक एवं सामाजिक दशा के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि देश की कुल 10 या 15 प्रतिशत जनसंख्या आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक सम्पन्न हैं, शेष जन दलितों जैसे जीवन व्यतीत करते हैं। दूसरी ओर, देश में जाति-प्रथा की बुराइयाँ भी कम नहीं हैं। इस प्रकार आर्थिक एवं सामाजिक असमानताओं के कारण देश का सामान्य व्यक्ति अपनी उन्नति नहीं कर पा रहा है। अतः इस प्रकार की असमानताओं को दूर करने तथा मानव मात्र का सर्वांगीण विकास करने के लिए सर्वोदय के मार्ग को अपनाया गया था। सर्वोदय लोगों में आत्म-सम्मान की भावना जागृत कर आत्मबल को बढ़ाता है।

  2. शोषण का अन्त –

    पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत प्रमुख रूप से दो वर्ग – (i) पूँजीपति, तथा (ii) श्रमिक होते हैं, जो संघर्ष का जीवन जीते हैं। प्रायः श्रमिकों के द्वारा सदैव यही नारा दिया जाता है कि पूँजीपतियों के द्वारा उनका शोषण किया गया है। वास्तव में, पूँजीपति श्रमिकों से अधिक काम लेकर कम मजदूरी का भुगतान करके अधिक लाभ कमाते हैं। इस प्रकार वे एक ओर श्रमिकों का शोषण करते हैं और दूसरी ओर अधिक लाभ प्राप्त करके आर्थिक असमानताओं को बढ़ाते हैं। सर्वोदय इस शोषण का अन्त करके लोगों के बीच सद्भावना का संचार तो करता ही है, साथ ही उसकी क्रिया वर्ग-संघर्ष को भी समाप्त कर देती है।

  3. जाति प्रथा का अन्त –

    जाति-प्रथा के कारण भारत में सदैव एकता का अभाव रहा है। पूरा देश अलग-अलग शिविरों में बँटता चला गया। जाति-प्रथा के इस घुन ने पूरे देश को अवनति के गड्ढे में धकेल दिया है। भारतवर्ष की एकता के लिए यह आवश्यक समझा जाने लगा था कि देश से जाति-प्रथा को समूल नष्ट कर दिया जाय और पूरे देश को एक सूत्र में बाँध दिया जाय। इस महान उद्देश्य की पूर्ति में ‘सर्वोदय’ एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में कार्य करने लगा था। अतः सर्वोदय के अनेक उद्देश्यों में से जाति-प्रथा का अन्त करना एक प्रमुख उद्देश्य बन गया।

  4. दस्तकारी का विकास करना-

    भारत जैसे निर्धन देश में एक नहीं, अनेक अभाव हैं, जो बीमारी, गरीबी व बेरोजगारी को बढ़ाने वाले हैं। इन प्रमुख समस्याओं को तभी हल किया जा सकता है, जबकि देश में दस्तकारी का विकास किया जाय या देश के कोने-कोने में लघु एवं कुटीर उद्योग-धन्धों का जाल बिछा दिया जाय। इस व्यवस्था से आर्थिक विकेन्द्रीकरण तो होगा ही, साथ ही साथ बेरोजगारों को रोजगार और निर्धनों को धन प्राप्त होगा। अतः सर्वोदय का उद्देश्य देश की दस्तकारी का विकास करना है।

  5. स्थायी शान्ति की स्थापना –

    सर्वोदय का उद्देश्य विश्व भर में स्थायी शान्ति स्थापित करना है। स्थायी शान्ति के बिना जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की स्वतन्त्रता को समाप्त करना चाहता है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण करने पर तुला हुआ है। बिना स्थायी शान्ति के आपसी शत्रुता बढ़ने लगती है और पूरे विश्व में विनाश के बादल मँडराने लगते हैं। अतः सर्वोदय का उद्देश्य विश्व भर में स्थायी शान्ति स्थापित करना है।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि सर्वोदय व्यापक मानव-कल्याण का आन्दोलन है। इसका उद्देश्य किसी राष्ट्र या किसी मानव की भलाई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य महान् है। यह व्यापक मानव कल्याण तथा व्यापक विश्व-कल्याण की भावना से कार्य करता है। सर्वोदय की योजना हृदय परिवर्तन के द्वारा व्यक्ति में ऐसे गुणों का संचार करती है, जिनसे उसमें सत्य, अहिंसा, सदाचार, सद्भावना इत्यादि को प्रोत्साहन मिल सके।

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