वनों का भौगोलिक वितरण

वनों का भौगोलिक वितरण

वनों का भौगोलिक वितरण

देश में वनाच्छादन के नियमित आँकड़े 1901 से उपलब्ध हैं, तब अविभाजित भारत के लगभग 2,40,000 वर्ग किमी (22% क्षेत्र) पर वनों का विस्तार था। आज (2001) वनों के अंतर्गत 6,75,538 वर्ग किमी क्षेत्र है जो देश के कुल क्षेत्रफल का 20.55 प्रतिशत है। इसमें से सघन वन 4, 16,809 वर्ग किमी (12.68% क्षेत्र) तथा खुले वन 2,58,729 वर्ग किमी (7.87 प्रतिशत) क्षेत्र पर विद्यमान हैं। 1999 की तुलना में 2001 में देश में वनों के क्षेत्र में 38,245 वर्ग किमी (6%) की वृद्धि हुई। इनमें से सघन वनों में 34,580 वर्ग किमी तथा खुले वनों में 3,665 वर्ग किमी क्षेत्र की वृद्धि हुई है। इसके बावजूद देश में वनाच्छादित क्षेत्र विश्व के अनेक देशों, जैसे- फिनलैंड (72.8 प्रतिशत), जापाना (61.9%), ब्राजील (56.8%), स्वीडन (55.1%), आस्ट्रेलिया (37.5%), कनाडा (36.6%) तथा संयुक्त राज्य अमेरिका (31.2%) की तुलना में बहुत कम है।

भारत में वनों के अंतर्गत क्षेत्र का वितरण बहुत असमान है। प्रायद्वीपीय पहाड़ियों एवं पठारों पर देश का 57 प्रतिशत वनाच्छादित क्षेत्र मिलता है, जबकि हिमालयी प्रदेश मों 18 प्रतिशत पश्चिमी घाट एवं तटों पर 10 प्रतिशत, पूर्वी घाट एवं तटीय मैदानों में 10 प्रतिशत तथा गंगा-सतलज के मैदान में 5 प्रतिशत वनाच्छादित क्षेत्र का विस्तार हैं।

वनों का वर्गीकरण

भारत में वनों का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया जाता है। प्रशासनिक दृष्टि से ब्रिटिशकाल में वनों को तीन वर्गों में रखा गया था-

  1. सुरक्षित वन (Reserved forests) –

    वनों के अंतर्गत लगभग 53 प्रतिशत क्षेत्र को सुरक्षित वर्ग में रखा गया जहाँ जनता का प्रवेश निषिद्ध था।

  2. संरक्षित वन (Protected forests) –

    इनके अंतर्गत वनों का 29 प्रतिशत क्षेत्र सम्मिलित था, जहाँ स्थानीय लोगों को काष्ठ (timber) तथा जलाऊ लकड़ी एकत्रित करने तथा पशु चराने की आज्ञा प्राप्त थी।

  3. अवर्गीकृत वन (Uncased forests) –

    इन वनों के अंतर्गत 18 प्रतिशत वन-क्षेत्र सम्मिलित था जहाँ वृक्ष काटने तथा पशु चराने पर कोई पाबंदी नहीं थी।

वर्तमान समय में स्वामित्व, प्रशासन तथा प्रबंध की दृष्टि से भारतरीय वनों को तीन वर्गों में रखा गया है-

  1. राजकीय वन (State forests)-

    इन पर सरकार का नियंत्रण है तथा इनके अंतर्गत देश के कुल वनों का8 प्रतिशत क्षेत्र सम्मिलित है।

  2. सामुदायिक वन (Community Forests) –

    इनका स्वामित्व तथा प्रशासन स्थानीय निकायों द्वारा होता है। इनके अंतर्गत देश के कुल वनों का लगभग9 प्रतिशत क्षेत्र सम्मिलित है।

  3. निजी वन (Private forests)-

    निजी स्वामित्व के अंतर्गत ये वन देश के कुल वनों के3 प्रतिशत क्षेत्र पर स्थित हैं।

संघटन के अनुसार भारतीय वनों के दो प्रमुख वर्ग हैं-

  1. शंकुधारी वन (Coniferous forests) –

    ये शीतोष्ण कटिबंधीय वन हैं जो हिमालय में43 प्रतिशत क्षेत्र पर विस्तृत हैं।

  2. चौड़ी पत्ती वाले बन (Bread leaf forests)-

    ये उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय वन हैं जो मैदानों, पठारों तथा पहाड़ियों में, देश के लगभग57 प्रतिशत वनाच्छादित क्षेत्र पर विस्तृत हैं।

भौगोलिक वर्गीकरण

अनेक विद्वानों ने विभिन्न आधारों का प्रयोग करते हुए भारतीय वनों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। चैम्पियन (Champion, 1936) ने देश के वनों का सर्वेक्षण करके एक वैज्ञानिक वर्गीकरण सुझाया, उन्होंने तापमान के आधार पर भारत को चार प्रमुख वानस्पतिक क्षेत्रों में बाँटा तथा पुनः वर्षा एवं आर्द्रता के आधार पर 15 प्रमुख तथा 136 प्रकारों में विभाजित किया। बाद में पूरी (Puri, 1960) ने इस वर्गीकरण में संशोधन करके 5 प्रमुख तथा 16 उप-प्रकारों में विभाजित किया।

आर्द्र उष्ण कटिबंधीय वन (Moist tropical forests)

  1. उष्ण कटिबंधीय आर्द्र सदापणी (Tropical west evergreen forests)-

    ये वन असम, बंगाल, सह्याद्रि, पश्चिमी तट, अन्नामलाई पहाड़ियों, मैसूर के पठार, कुर्ग तथा अंडमान द्वीपों में मिलते हैं। ये बहुमंजिले (multi-storeyed) वन हैं जो सघन वितान (canopy) बनाते हैं। इनमें साल (shorea) तथा होपिया (Hopea) प्रमुख किस्में हैं।

  2. उष्ण कटिबंधीय नम अर्द्धसदापर्णी वन (Tropical moist semi-evergreen forests)-

    ये वन मुख्यतः पश्चिमी घाट, असोम घाटी, बंगाल तथा उड़ीसा तट पर, जहाँ 200-250 सेमी वार्षिक वर्षा होती है, पाये जाते हैं। इन वनों में सदापर्णी तथा पर्णपाती वनों की मिश्रित किस्में मिलती हैं। वनों के नीचे सघन पौधे, झाड़ियाँ तथा लताएँ इन वनों को सदापर्णी स्वरूप प्रदान करती हैं।

  • शुष्क उष्ण कटिबंधीय वन (Dry tropical forests) :

    ये वन 100 सेमी से कम वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं।

  • शुष्क सदापर्णी वन (Dry evergreen forests)-

    ये वन पूर्वी तटीय मैदान में कोरोमंडल तट के सहारे सीमित हैं। खिरनी, जामुन, कोको, रीठा, इमली, नीम, ताड़, गमरी तथा बेंत प्रमुख किस्में हैं।

  • शुष्क पर्णपाती वन (Dry deciduous forests) –

    ये वन मध्यवर्ती प्रायद्वीप शिवालिक तथा पश्चिमी तराई के नम पर्णपाती वनों के मध्य संक्रमण स्पीशीज के रूप में उपस्थित मिलते हैं। इनवनों की प्रमुख किस्में सागौन, तेंदू, साल, बिजसाल, रोज वुड, बेल, पलाश, अमलताश, खैर, सेटिन वुड़ एक्सल वुडद्व अन्जैर आदि हैं। इन वनों के विशाल क्षेत्र कृषि कार्यों के लिये साफ कर दिये गये हैं।

  1. उपोष्ण कटिबंधीय वन (Sub-tropical forests)-

    ये वन समुद्र तल से ऊँचाई तथा इससे उत्पन्न जलवायवीय दशाओं से संबंधित होते हैं।

  • उपोष्ण कटिबंधीय आर्द्र वन (Sub-tropical wet forests)-

    ये वन नीलगिरि, पलनी पहाड़ियों, सह्याद्रि के उच्च भागों, सतपुड़ा, मैकाल, पूर्वी हिमालय के निचले ढालों तथा असम की पहाड़ियों में मिलते हैं, जहाँ 150 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा होती है। पूर्वी हिमालय में ओक, चेस्टनट, एश तथा बीच प्रमुख किस्में हैं। निचले ढालों पर साल भी उगता है।

  • उपोष्ण कटिबंधीय शुष्क सदापर्णी वन (Sub-tropical dry evergreen forests) –

    ये वन हिमालय की तलहटी में जम्मू की पहाड़ियों में 450-1500 मीटर की ऊँचाई पर मिलते हैं जहाँ 50-100 सेमी वार्षिक वर्षा होती है। जैतून, एकेशिया, मोडेस्टया तथा पिस्टेशिया आदि प्रमुख किस्में हैं। वर्षा ऋतु में घासें तथा झाड़ियाँ भी उग आती हैं।

  1. शीतोष्ण कटिबंधीय वन (Temperate forests) :

    ये वन उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में मिलते हैं।

  • आर्द्र शीतोष्ण कटिबंधीय वन (Wet temperate forests)-

    ये वन नीलगिरि, अन्नामलाई, पलनी की पहाड़ियों पर 1500 मीटर तक की ढालों पर पूर्वी हिमालय एवं असम की पहाड़ियों में 1860-2850 मीटर तक की ऊँचाई पर मिलते हैं जहाँ 150 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा प्राप्त होती है। दक्षिणी भारत में ये वन स्थानीय रूप से ‘शोला’ कहलाते हैं। जो घने वन हैं, इनमें नीचे सघन वनस्पति, लताएँ, मांस तथा फर्न मिलते हैं। इन वनों की प्रमुख किस्में- मैगनोलिया, लॉरेल, रोडोडेनड्रोन, एल्म, प्रूनस, प्लम आदि हैं। वैटल तथा युकलिप्टस किस्में बाह्य संसार से यहाँ लायी गयीं। उत्तरी भारत में ओक, चेस्टनट तथा लॉरेल सामान्य किस्में हैं।

  • नम शीतोष्ण कटिबंधीय वन (Moist temperate Forests)-

    ये वन कश्मीर से अरूणाचल प्रदेश तक संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में 1500-3300 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं जहाँ 100-300 सेमी वार्षिक वर्षा होती है। इन वनों में चौड़े पत्तों वाली सदापर्णी तथा शंकुधारी वृक्षों की मिश्रित किस्में पायी जाती हैं, जिनमें ओक, फर, स्प्रूस, देवदार, सेलिटस, चेस्टनट, सीडर, मेपल, कैले तथा बर्च प्रमुख किस्में हैं। इन वनों में झाड़ियाँ, लताएँ तथा फर्न भी मिलते हैं।

पर्वतीय वन :

ये वन हिमालय में 2800-4000 मीटर की ऊँचाई पर मिलते हैं। यहाँ सिलवर, फर, जूनीपर, पाइन, बर्च, रोडोडेनड्रोन, प्लूम आदि के सघन वन 2850-3600 मीटर की ऊँचाई पर मिलते हैं जो हिमालय के दक्षिणी ढालों पर अल्पाइन झाड़ियों में तथा उत्तरी ढालों पर शुष्क मरूदूभिदी वन में परिणत हो जाते हैं। पश्चिमी हिमालय में हिमरेखा के नीचे 2250-2750 मीटर की ऊँचाई पर बौने शंकुधारीक वृक्षों सहित पर्वतीय चरागाह मिलते हैं। ‘ब्रह्म कमल’ तथा ‘कुथ’ सुगंधित अल्पाइन स्पीशीज हैं जो इत्र बनाने में प्रयुक्त होती हैं।

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