हिन्द महासागर की धाराएँ (Current of Indian Ocean)

हिन्द महासागर की धाराएँ (Current of Indian Ocean)

हिन्द महासागर की धाराएँ (Current of Indian Ocean)

हिन्द महासागर की धाराएँ प्रशान्त व अटलांटिक महासागर की धाराओं से भिन्न हैं। हिन्दू महासागर की धाराओं पर स्थल से चलने वाली पवनों का गहरा प्रभाव पड़ता है। ये पवनें मानसूनी पवनें होती हैं जो वर्ष में 6 माह तक एक दिशा में तथा 6 माह तक दूसरी दिशा में अपनी स्थिति को परिवर्तित करती रहती हैं। हिन्द महासागर की धाराओं पर जितना प्रभाव हवाओं का पड़ता है उतना अन्य किसी समुद्र में नहीं मिलता। हिन्द महासागर में निम्न दो प्रकार की धाराएँ मिलती हैं-

  • परिवर्तनशील धाराएँ (Variable currents)
  • अपरिवर्तनशील धाराएँ (Invariable Currents)
  1. परिवर्तनशील धाराएँ (Variable Currents) –

    विषुवतीय रेखा के उत्तर में हिन्द महासागर की समस्त धाराएँ मानसून के प्रभाव से अपनी दिशा एवं क्रम बदल लेती हैं, इसी कारण इन धाराओं को ‘परिवर्तनशील धाराएँ’ कहा जाता है। मानसूनी पवनों से प्रभावित इन्हें मानसूनी प्रवाह (Monsoon drift) कहते हैं। हिन्द’ महासागर की निम्न धाराएँ परिवर्तनशील हैं-

  1. ग्रीष्म मानसूनं धारा (Summer Monsoon Current)-

    ग्रीष्म ऋतु में हिन्द महासागर में दक्षिण-पश्चिमी मानसून हवाओं के प्रभाव से धाराएँ घड़ी की सुइयों के अनुकूल (Clockwise direction) चलती हैं। यह अफ्रीका के पूर्वी तट के सहारे बहती हुई अरब सागर में प्रवेश करती हैं और अरब प्रायद्वीप के दक्षिण पूर्वी तट, पाकिस्तान और भारत के पश्चिमी तट का चक्कर लगाकर बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करती हैं। बंगाल की खाड़ी में भारत के पूर्वी तट के सहारे बहती हुई म्यांमार, सुमात्रा के पश्चिमी तट पर पहुँचती हैं और वहाँ भूमध्य रेखीय धारा से मिल जाती हैं। यह एक धीमी समुद्री धारा है जो मई से अक्टूबर तक इस क्रम प्रवाहित रहती है। इसे दक्षिणी पश्चिमी मानसून प्रवाह (South West Monsoon Drift) भी कहते हैं।

  2. शीत मानसून धारा (Winter Monsoon Current) –

    शीत ऋतु में उत्तरी पूर्वी मानसून के प्रभाव में एशिया महाद्वीप के दक्षिणी तटों के सहारे एक धारा प्रवाहित होती है। इसकी दिशा पूर्व से पश्चिम को रहती है। यह धारा पूर्वी अफ्रीका के तट पर उत्तर से दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। विषुवत रेखा के उत्तर में यह पूर्व की ओर मुड़कर पूर्वी द्वीप समूहों तक जाती है। इस सम्पूर्ण चक्र को उत्तरी-पूर्वी मानसून प्रवाह (N-E monsoon drift) कहते हैं। यह एक मन्द समुद्री धारा है।

  1. अपरिवर्तनशील धाराएँ (Invariable Current)-

    हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग में समुद्री धाराओं का क्रम पाया जाता है, वे सभी वर्ष भर एक ही दिशा में प्रवाहित रहती हैं। इसलिए इन्हें स्थायी या अपरिवर्तनशील धाराएँ कहते हैं। ये निम्न हैं-

  1. दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा (South Equatorial Current)-

    यह धारा हिन्द महासागर में 10 अंश से 15 अंश दक्षिण की अक्षांश के बीच आस्ट्रेलिया और अफ्रीका के बीच पूर्व से पश्चिम की ओर दक्षिण पूर्वी सनातन पवनों के द्वारा उत्पन्न होती है। 10 अंश अक्षांश के निकट ही यह मालागासी द्वीप के उत्तर में दो शाखाओं में विभाजित होकर दक्षिण की ओर बहने लगती है।

  2. मोजाम्बिक धारा (Mozambique Current)-

    दक्षिण भूमध्य रेखीय धारा की शाखा की दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है। मालागासी या मेडागास्कर द्वीप के उत्तर में इस धारा के दो भाग हो जाते हैं। इस धारा का पश्चिमी भाग मोजाम्बिक धारा कहलाता है। यह शाखा अफ्रीका महाद्वीप और मालागासी द्वीप के बीच होकर बहती है। यह गर्म जल की धारा है।

  3. अगुलहास धारा (Agulhaus Current)-

    मेडागास्कर द्वीप के दक्षिण में ये जाम्बिक व मालागासी धारा का सम्मिलित जल प्रवाह अगुलास धारा के नाम से दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट पर प्रवाहित होता हुआ दक्षिण अफ्रीका के दक्षिणी सिरे अगुलहास अन्तरीप पर पहुँचने पर अण्टार्कटिका ड्रिफ्ट के प्रवाह से पूर्व की ओर प्रवाहित होता है।

  4. पश्चिमी ऑस्ट्रेलियन धारा (West Australian Current)-

    अण्टार्कटिका ड्रिफ्ट की एक शाखा ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी-पश्चिमी तट से उत्तर की ओर ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के सहारे प्रवाहित होती है। यह ठंडे जल की धारा है।

  5. अण्टार्कटिका प्रवाह (Antarctica Drift)-

    हिन्द महासागर के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में अगुलहास धारा जब पहुआ पवनों के प्रभाव में आती है तो वह पश्चिम से पूर्व की ओर मुड़कर अण्टार्कटिक प्रवाह के साथ मिलकर बढ़ने लगती है। अण्टार्कटिक प्रवाह में ध्रुव महासागर का उण्डा जल बहता है।

  6. मालागासी या मेडागास्कर धारा (Madagascar Current)-

    मालागासी या मेडागास्कर धारा मेडागास्कर द्वीप के पूर्वी तट पर प्रवाहित होती है। इसकी दिशा उत्तर से दक्षिण की ओर है। यह द० भूमध्यरेखीय गर्म धारा का एक अंश है। दक्षिण में यह मोजाम्बिक धारा मिलकर समाप्त हो जाती है।

हिन्द महासागर की धाराओं एवं पवनों में संम्बन्ध तथा ऋत्विक भिन्नता (Relationship and Seasonal Variationin Currents and Winds of Indian Ocean) – हिन्द महासागर की धाराओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यहाँ उत्तरी महासागर में प्रवाहित होने वाली धाराएँ अस्थायी तथा शीत एवं ग्रीष्म काल की पवनों की दिशा के अनुरूप हैं, जबकि दक्षिणी हिन्द महासागर में चलने वाली धाराएँ स्थायी तो हैं, पर उनकी गति व दिशा पर भी पवनों का प्रभाव दिखायी पड़ता है। पवनों व धाराओं का जितना स्पष्ट सम्बन्ध हिन्द महासागर में दिखाई पड़ता है उतना किसी भी महासागर में प्रतीत नहीं होता। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी की मौसमी पवनों तथा धाराओं का अध्ययन किया गया। 1857 ई० से 1952 ई0 तक हिन्द महासागर की मौसमी पवनों के 6 माह एक तरफ तथा वर्ष के दूसरे 6 माह दूसरी दिशा में प्रवाहित होने के कारणों का पता लगाने के लिये इस क्षेत्र में 16 बार समुद्री खोज की गई।

1686 ई0 में हैले (Halley) यह स्पष्ट किया था कि मानसून पवनें दक्षिणी गालार्द्ध में व्यापाकि पवनों की पेटी से उत्पन्न होती हैं तथा पृथ्वी की गति से विक्षेपक बल (Deflective Force) के कारण ये पवनें पश्चिमी भारत के वर्षा क्रम के अन्तर्गत आ जाती हैं।

पीसारोटी ने अन्तर्राष्ट्रीय भारतीय समुद्री खोज के समय सिद्ध किया कि जितने जल की मात्रा भूमध्य रेखा को पार करके अरब सागर पहुँचती है। लाईट हिल ने 1969 ई0 में यह स्पष्ट किया है कि हिन्द महासागर में सोमालीलैंड के निकट सोमाली धारा केवल स्थानीय क्षेत्र की मानसून पवनों के प्रवाह एवं आयतन को प्रभावित नहीं करती, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र की पवनों एवं समुद्र की गति को प्रभावित करती है। इन्होंने भूमध्यरेखीय भागों में स्थित होने के कारण हिन्द महासागर में पवनों की गति का प्रभाव वहाँ की लहरों पर आँका है।

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