ज्वारों की उत्पत्ति, समय एवं प्रकार 

ज्वारों की विशेषताएं- ज्वारों की उत्पत्ति, समय एवं प्रकार 

ज्वारों की विशेषताएं

महासागरीय गतियों में लहरें, तरंगें, धाराएं तथा ज्वार-भाटा अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। इनमें ज्वार-भाटा का महत्व सर्वाधिक होता है, क्योंकि इसके कारण सागरतल से सागरतली तक का जल प्रभावित होता है। सूर्य तथा चन्द्रमा की आकर्षण शक्तियों के कारण सागरीय जल के ऊपर उठने तथा गिरने को ज्वार-भाटा कहा जाता है। इससे उत्पन्न तरंगों को ‘ज्वारीय तरंग’ कहते हैं। सागरीय जल के ऊपर उठकर आगे (तट की ओर) बढ़ने को ‘ज्वार’ (tide) तथा उस समय निर्मित उच्च जलतल को उच्च ज्वार (high tide) तथा सागरीय जल के नीचे गिरकर (सागर की ओर) पीछे लौटने को भाटा (ebb) तथा उससे निर्मित निम्न जल को निम्न ज्वार (low tide) कहते हैं। औसत सागर जल तल (mean see level) इन दो तलों के बीच रहता है। विभिन्न स्थानों पर ज्वार-भांटा की ऊंचाई में पर्याप्त भिन्नता होती है। यह भिन्नता सागर में जल की गहराई, सागरीय तट की रूपरेखा तथा सागर के खुले होने या बन्द होने पर आधारित होती है।

ज्वार की उत्पत्ति

पृथ्वी के महासागरीय जल के ज्वार की उत्पत्ति चन्द्रमा तथा सूर्य के आकर्षण बलों द्वारा होती है। पृथ्वी की व्यास 12,800 किमी0 (8,000 मील) है, परिणामस्वरूप पृथ्वी की सतह केन्द्र की अपेक्षा चन्द्रमा से 6,400 किमी0 (4000 मील) नजदीक है। चन्द्रमा को केन्द्र पृथ्वी के केन्द्र से 3,84,800 किमी0 (2,40,000 मील) दूर है तथा पृथ्वी की सतह चन्द्रमा की सतह से 3,77,600 किमी0 (2,36,000 मील) दूर है। स्पष्ट है कि चन्द्रमा के सामने पृथ्वी की सतह वाले भाग के पीछे स्थित भाग चन्द्रमा की सतह से 3,90,400 किमी0 दूर स्थित होगा। अतः चन्द्रमा के सामने स्थित भाग (पृथ्वी का सबसे नजदीक स्थित भाग) पर चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति का सर्वाधिक प्रभाव होता हैं तथा उसके पीछे स्थित भाग पर न्यूनतम परिणामस्वरूप चन्द्रमा के सामने स्थित पृथ्वी का जल ऊपर खिंच जाता है, जिस कारण उच्च ज्वार अनुभव किया जाता है। इस स्थान के ठीक पीछे भी निम्न ज्वार का अनुभव किया जाता है, क्योंकि चन्द्रमा के केन्द्रोमुख (Centripetal) गुरूत्वाकर्षण बल की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न केन्द्रापसारित (centrifugal) बल के कारण जल का बाहर की ओर उभार हो जाता है। इस कारण 24 घण्टे में प्रत्येक स्थान पर दो बार ज्वार तथा दो बार भाटा आता है। जब सूर्य तथा चन्द्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं, तो दोनों की आकर्षण शक्ति मिलकर एक साथ कार्य करती है तथा उच्च ज्वार अनुभव किया जाता है। यह स्थिति पूर्णमांसी तथा अमावस्या को होती है। इसके विपरीत जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा मिलकर समकोण बनाते हैं। तो सूर्य तथा चन्द्रमा के आकर्षण बल एक दूसरे के विपरीत कार्य करते हैं, जिस कारण निम्न ज्वार अनुभव किया जाता है। यह स्थिति प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष की अष्टमी को होती है।

ज्वार का समय

प्रत्येक स्थान पर सामान्य तौर पर दिन में दो बार ज्वार आता है। चूँकि पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 24 घण्टे में एक पूर्ण चक्कर लगा देती है, अतः प्रत्येक स्थान पर 12 घण्टे के बाद ज्वार आना चाहिए अर्थात् प्रत्येक दिन ज्वार एक ही समय पर आना चाहिए, परन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं है। प्रति दिन ज्वार लगभग 26 मिनट की देर से आता है। इसका कारण चन्द्रमा का भी अपनी धुरी पर चक्कर लगाते हुए पृथ्वी की परिक्रमा करना है। पृथ्वी प. से पू. दिशा में चक्कर लगाती है। परिणामस्वरूप ज्वार केन्द्र पू. से.प. दिशा की ओर अग्रसर होते हैं। ज्वार केन्द्र जब अपना एक पूरा चक्कर लगा लेता है, तो चन्द्रमा उसके कुछ आगे निकल गया रहता है, क्योंकि वह भी पृथ्वी की परिक्रमा करता है, परिणामस्वरूप ज्वार केन्द्र को चन्द्रमा के नीचे पहुँचने के लिए लगभग 52 मिनट की और यात्रा करनी पड़ती है। इस तरह एक ज्वार केन्द्र को चन्द्रमा के सामने आने में 24 घण्टे 52 मिनट खर्च करने पड़ते है, परन्तु इसी समय ज्वार केन्द्र के विपरीत स्थित भाग में ज्वार 26 मिनट देरी (12 घण्टे 26 मिनट) से आयेगा। इस तरह यदि ‘प’ स्थान पर प्रथम ज्वार 4 बजे सायंकाल आता है तो दूसरा ज्वार 4 बजकर 26 मिनट प्रातः आयेगा और फिर. अगला ज्वार 4 बजकर 26 मिनट प्रातः आयेगा और फिर अगला ज्वार सायंकाल 4 बजकर 52 मिनट पर आयेगा। चित्र 28.4 में चन्द्रमा की स्थिति ‘क’ स्थान पर उसके नीचे स्थित ‘प’ स्थान 24 घण्टे मे पूरा चक्कर लगा कर पुनः अपनी पहली स्थिति पर आ जाता है, परन्तु इस बीच चन्द्रमा आगे बढ़कर ‘ख’ स्थान पर पहुँच जाता है, जिसके नीचे ‘फ’ स्थान है। अब ‘प’ स्थान को ‘प’-‘फ’ की अतिरिक्त दूरी तय करके ‘ख’ के नीचे पहुँचना होगा ताकि ‘प’ पर दुबारा ज्वार आये। ‘प’-‘फ’ की दूरी तय करने में पृथ्वी का 52 मिनट लग जाता है। चन्द्रमा पृथ्वी का 24 दिन, 7 घण्टे, 43 मिनट तथा 17.5 सेकेण्ड (लगभग 27.5 दिन) में एक चक्कर लगाता है, अतः ‘प’ – ‘फ’ भाग चन्द्रमा के परिक्रमा वृत्त का 2/55 भाग है, ‘प’ स्थान को इस 2/55 भाग को पूरा करने में 24x60x2/55 = 52 मिनट लगेगा। अतः ‘प’ स्थान पर दुबारा ज्वार 4 बजकर 52 मिनट (सायंकाल) पर आयेगा। इस तरह प्रत्येक स्थान पर प्रतिदिन 12 घण्टे 26 मिनट बाद ज्वार तथा ज्वार के बाद 6 1/4 घण्टे (6 घण्टे, 13 मिनट) बाद भाटा आता है।

ज्वार के प्रकार

पृथ्वी पर सागरीय जल में ज्वार का प्रत्यक्ष सम्बन्ध चन्द्रमा तथा सूर्य की आकर्षण शक्ति से है। चन्द्रमा अपनी धुरी पर चक्कर लगाता हुआ (प. से पू. दिशा में) पृथ्वी की प्ररिक्रमा करता है, जब कि पृथ्वी अपनी धुरी पर चक्कर लगाती हुई सूर्य की प्ररिक्रमा करती है। इस दौरान पृथ्वी, सूर्य तथा चन्द्रमा के बीच कई प्रकार की स्थितियाँ हो जाती हैं, जिस कारण ज्वारोत्पादक बलों में अन्तर आ जाने से ज्वार को कई प्रकारों में विभक्त किया जाता है। ज्वार के कुछ प्रमुख प्रकार निम्न हैं:

  1. पूर्ण अथवा दीर्घ ज्वार (Spring Tide)-

    सूर्य तथा चन्द्रमा की सापेक्ष स्थितियों में परिवर्तन होता रहता है। जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा एक सरल रेखा में होते हैं तो इस स्थिति को युति-वियुति या सिजिगी (syzygy) कहते हैं। इनमें से जब सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी क्रम से एक सीध में होते हैं, अर्थात् जब सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों पृथ्वी के एक ओर होते हैं, तो उसे युति (conjunction, सूर्यग्रहण की स्थिति) कहते हैं और जब सूर्य तथा चन्द्रमा के बीच पृथ्वी की स्थिति होती है तो उसे वियुति (opposition) कहते हैं। इसके विपरीत जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा समकोण की स्थिति में होते हैं, तो उसे समकोणिक स्थिति (quadrature) कहते हैं। युति की स्थिति अमावस्या (new moon) तथा वियुति की स्थिति पूर्णमासी (full moon) को होती है। इन दो स्थितियों में सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा की एक सीधी रेखा में स्थिति के कारण चन्द्रमा तथा सूर्य के आकर्षण बल साथ मिलकर कार्य करते हैं, जिस कारण उच्च ज्वार अनुभव किया जाता है। इस ज्वार की ऊँचाई सामान्य ज्वार से 20 प्रतिशत अधिक होती है। इस तरह के दीर्घ ज्वार महीने में दो बार (अमावस्या तथा पूर्णमांसी को) आते हैं तथा इनका समय निश्चित होता है। दीर्घ ज्वार के समय भाटा को निचाई सर्वाधिक होती है।

  2. लघु ज्वार (Neap Tide)-

    प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष तथा कृष्णपक्ष की सप्तमी और अष्टमी को सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा समकोणिक स्थिति (quadrature) में होते हैं, अर्थात् ये मिलकर समकोण बनाते हैं (चित्र), परिणामस्वरूप सूर्य तथा चन्द्रमा के ज्वारोत्पादक बल एक दूसरे के विपरीत कार्य करते हैं, जिस कारण सामान्य ज्वार से भी नीचा ज्वार आता है। इसे लघु ज्वार कहा जाता है। यह सामान्य ज्वार से 20 प्रतिशत नीचा होता है। इस समय भाटा की निचाई सामान्य भाटा से कम होती है, परिणामस्वरूप ज्वार तथा भाटे की जल की ऊँचाई का अन्तर बहुत कम रहता है।

  3. अयन वृत्तीय तथा भूमध्यरेखी ज्वार-

    सूर्य के समान चन्द्रमा की भूमध्यरेखा के संदर्भ में उत्तरायण तथा दक्षिणायन स्थितियाँ होती हैं। यदि सूर्य की ये स्थितियाँ एक वर्ष में पूर्ण होती हैं, तो चन्द्रमा इसे 27.5 दि के संयुति मास (synodic month) में पूरा कर लेता है। जब चन्द्रमा का उत्तर की ओर अधिकतम (दूरतम) झुकाव होता है, तो चन्द्रमा की किरणें ज्वार केन्द्र पर (कर्क रेखा के पास) लम्बवत् पड़ती हैं, जिस कारण उच्च ज्वार आता है तथा वह कर्क रेखा के सहारे पश्चिम दिशा की ओर अग्रसर होता है। कर्क रेखा के ज्वार केन्द्र के विपरीत स्थित मकरं रेखा के सहारे भी उच्च ज्वार आता है। इस प्रकार कर्क तथा मकर रेखाओं के समीप आनेवाला क्रमिक ज्वार तथा भाटा (successive high and low tide waters) आसमान ऊँचाई वाले होते है। इस तरह के ज्वार-भाटे सामान्य ज्वार-भाटे से क्रमशः अधिक ऊँचाई तथा नीचे होते हैं। परन्तु दूसरे दिन के ज्वार में अन्तर नहीं होता है। इस तरह की ज्वार की घटना की दैनिक असमानता कहते है। यह स्थिति महीने में दो बार होती है, जब कि चन्द्रमा का अधिकतम झुकाव (उत्तरायण-कर्क रेखा के पास तथा दक्षिणायन मकर रेखा के पास की स्थितियों के समय) होता है। इन स्थितियों में कर्क तथा मकर रेखाओं के पास आने वाले ज्वार को अयनवृत्तीय ज्वार (tropical tides) कहते है। प्रत्येक महीने में चन्द्रमा भूमध्यरेखा पर लम्बवत् होता है, जिस कारण दैनिक असमानता लुप्त हो जाती है, क्योंकि दो उच्च ज्वारों की ऊँचाई तथा दो निम्न ज्वारों की ऊँचाई समान होती है। इसे भूमध्यरेखीय ज्वार (equatorial tide) कहते हैं।

  4. अपभू तथा उपभूज्वार-

    चन्द्रमा अपने अण्डाकार कक्ष के सहारे पृथ्वी की परिक्रमा करता है। जब चन्द्रमा पृथ्वी के निकटतम (पृथ्वी के केन्द्र से चन्द्रमा के केन्द्र दूरी 3,56,000 किमी0 या 2,21,500 मील) होता है, तो उसे चन्द्रमा का ज्वारोत्पादक बल सर्वाधिक होता है, जिस कारण उच्च ज्वार उत्पन्न होता है, जो कि सामान्य ज्वार से 15 से 20 प्रतिशत तक बड़ा होता है। इसे उपभू या भूमि नीच ज्वार (perigee) कहते हैं। इसके विपरीत जब चन्द्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी (पृथ्वी के केन्द्र से चन्द्रमा के केन्द्र के बीच की दूरी 4,07,000 किमी. या 2,53,000 मील होती है) पर स्थित होता है तो उसे अपभू स्थिति (apogee) कहते हैं। इस समय चन्द्रमा का ज्वारोत्पादक बल न्यूनतम होता है, जिस कारण लघु ज्वार उत्पन्न होता है, जो कि सामान्य ज्वार से 20 प्रतिशत छोटा होता है। इसे अपभू या भूमि उच्च ज्वार (apogean tide) कहते हैं। जब कभी भी दीर्घ ज्वार (spring tide) तथा उपभू ज्वार आते हैं, जो ज्वार की ऊँचाई असामान्य हो जाती है। इसी तरह जब लघु ज्वार (neapo tide) तथा उपभू ज्वार एक साथ आते हैं तो ज्वार तथा भाटा का जल-तल अत्यन्त कम हो जाता है।

  5. दैनिक ज्वार (Daily Tide)-

    किसी स्थान पर एक दिन में आनेवाले एक ज्वार तथा एक भाटा को ‘दैनिक ज्वार-भाटा कहते हैं। यह ज्वार प्रतिदिन 52 मिनट की देरी से आता है। इस तरह का ज्वार चन्द्रमा के झुकाव के कारण आता है।

  6. उर्द्धदैनिक ज्वार (Semi-Daily Tides)-

    किसी स्थान पर प्रत्येक दिन दो बार आने वाले ज्वार को अर्द्ध दैनिक ज्वार कहते हैं। प्रत्येक ज्वार 12 घण्टे 26 मिनट बाद आता है। यह ज्वार, ज्वार के दो केन्द्रों के कारण आता है। ज्वारों की ऊँचाई तथा दोनों भाटा की निचाई समान होती है।

  7. मिश्रित ज्वार (Mixed Tide)-

    किसी स्थान में आने वाले असमान अर्द्धदैनिक ज्वार को ‘मिश्रित ज्वार’ कहते हैं। अर्थात् दिन में दो ज्वार तो आते हैं, परन्तु एक ज्वार की ऊँचाई, दूसरे ज्वार की अपेक्षा कम तथा एक भाटा की निचाई दूसरे की अपेक्षा कम होती है।

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