महासागरीय धाराएँ (Oceanic currents)

महासागरीय धाराएँ

महासागरीय धाराएँ

समुद्री धारा क्या है? (What is an Oceanic Current)

मॉकहाउस (Monkhouse) के शब्दों में, “समुद्री धरातल की विशाल जलराशि की एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने वाली सामान्य गति को महासागरीय धारा कहते हैं।” धाराओं में जल केवल सतह पर ही नहीं, अपितु गहराई में भी चलता है। धाराएँ समुद्री जल में ठीक उसी तर बहती हैं जिस तरह स्थल पर नदियाँ व नाले बहते हैं। अतः धाराएँ एक प्रकार से समुद्री नदियाँ हैं (Currents are sea rivers ) |

धाराएँ ऐसे समुद्री प्रवाह (Flow) हैं जिनके दोनों पाश्र्वों पर स्थिर जल वाले समुद्री भाग पाये जाते हैं अर्थात् इनके किनारे स्थिर जल वाले होते हैं। अनुभवों व विभिन्न प्रयोगों के आधार पर समुद्री धाराओं में जल की निरन्तर गति और उसकी निश्चित दिशा में तथ्य प्रमाणित हो चुके हैं। धाराओं में जल की गति 2 से 10 किमी. प्रति घण्टा तक होती है। इनकी चौड़ाई तथा गहराई भी अधिक होती है। धाराओं में बहने वाले जल की विशेषता, गति व विस्तार के आधार पर धाराओं को कई प्रकारों में रखा जा सकता है-

जल-प्रवाह, गति व सीमा के आधार पर धाराओं के प्रकार

(Types of Currents on the Basic of Speed and Limit of Water Flow)

  1. ड्रिफ्ट (Drift) –

    जब सागरीय जल की गति मन्द होती है तथा प्रवाह उथला व चौड़ा होता है, इसके प्रवाह की सीमा निश्चित नहीं होती, ऐसे सागरीय जल के प्रवाह को ड्रिफ्ट या प्रवाह कहते हैं। ड्रिफ्ट में समुद्री जल केवल ऊपरी सतह पर गतिशीलता रहता है।

  2. धारा (Current)-

    इसकी सीमाएँ निश्चित होती हैं तथा धारा के प्रवाह की गति ड्रिफ्ट की अपेक्षा तीव्र होती है।

4 धारा का वेग 30 से 40 किमी0 प्रतिदिन के बीच होता है।

  1. स्ट्रीम (Stream)-

    इसकी सीमाएँ अधिक सुनिश्चित होती हैं। इसमें विशाल मात्रा में समुद्री जलराशि किसी एक निश्चित दिशा में नदी के समान आगे की ओर अग्रसर होती है। यह अपनी गति में ड्रिफ्ट व धारा से अधिक तेज होती है।

भौतिक गुण के आधार पर धाराओं के प्रकार

(Types of Currents on the Basic of Physical Attributes of Water)

  1. ठण्डी धारा (Cold Current)-

    ठंडा जल ले जाने वाली धारा को ठण्डी धारा कहते हैं। इनकी उत्पत्ति ठंडे ऊँचे अक्षांशों में होती है, जो ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर चलती है। लैब्राडोर व क्युराइल ऐसी ही धाराएँ हैं।

  2. गर्म धारा (Warm Current)-

    गर्म जल प्रवाहित करने वाली धाराएँ गर्म धाराएँ कहलाती हैं। गर्म धाराओ की उत्पत्ति भूमध्य रेखा के निकट होती हैं। ये भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर चलती हैं। गल्फस्ट्रीम व क्यूरोसिवों ऐसी ही धाराएँ हैं।

स्थिति के आधार पर धाराओं के प्रकार (Types of Currents on the Basic of Location)

स्थिति के आधार पर समुद्री धाराएँ दो प्रकार की होती हैं-

  1. सतह की धारा (Surface Current) –

    ध्रुवों व भूमध्य रेखीय भागों के बीच तापक्रम का अधिक अन्तर है। अतः जल के तापक्रम को समान करने के लिए भूमध्य रेखीय क्षेत्रों से सतह पर गर्म धारा बहने लगती है। ध्रुवों की ओर से भी ठण्डी धाराएँ कुछ दूरी तक सतह पर चलती हैं।

  2. अधोवाहिनी भाग (Bottom Current)-

    सतह के नीचे असमान तापक्रम को समान करने के लिए तल से सतह की ओर चलने वाली लम्बवत् धारा ‘अधोवाहिनी धारा’ कहते हैं। तली पर ध्रुवों से भूमध्यरेखा की ओर चलने वाली ठंडी एवं अधिक घनत्व वाली धाराएँ अधोवाहिनी धाराएँ हैं।

धाराओं की उत्पत्ति के कारण

(Causes of the Origin of Currents)

समुद्री धाराओं की उत्पत्ति के निम्न कारक महत्वपूर्ण हैं-

  • अन्तःसांगरीय कारक (Sub-oceanic Factors),
  • बाह्य सागरीय कारक (Ex-oceanic Factors),
  • रूप परिवर्तन कारक (Modifying Factors),
  • भू-परिक्रमा सम्बन्धी कारक (Factors in Relation on the Earth Movement)।
  1. अन्तःसागरीय कारक (Sub-oceanic Factors)-

    अन्तःसागरीय कारकों को निम्न तीन भागों में बाँटा जा सकता है-

  • तापक्रम की भिन्नता (Temperature Difference)- समुद्रों में सभी जगह जल का तापक्रम एक समान नहीं है। इस विभिन्नता का मूल कारण पृथ्वी की परिभ्रमण गति है। उत्तरायण की स्थिति में उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें सीधी तथा दक्षिणायण में दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर रेखा पर सीधी पड़ती है। भूमध्य रेखा के 30 अंश उत्तर व दक्षिणी अक्षांशों के बीच सूर्य की किरणें वर्ष भर सीधी रहती हैं जिससे समुद्री जल में तापक्रम अधिक व घनत्व कम हो जाता है। परिणामतः भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में जल ध्रुवों की ओर और खाली हुए स्थान की जल पूर्ति करने के लिये ध्रुवों की ओर से भूमध्य रेखा की ओर अन्तःसागरीय धाराएँ चलने लगती हैं।
  • खारापन (Salinity)- खारेपन की भिन्नता के कारण समुद्री जल का घनत्व बदल जाता है। यदि ताप समान हो तो अधिक खारे जल का घनत्व अधिक एवं कम खारे जल का घनत्व कम होता है। अतः एक ही ताप वाले क्षेत्रों में खारापन विभिन्न रहने पर भी धाराएँ बहने लगती हैं। कम खारे क्षेत्र में जल हल्का होता है, अतः सतह पर अधिक खारे क्षेत्र की ओर धाराएँ बहने लगती हैं। सतह के नीचे, खारा जल घनत्व एवं भार की अधिकता से कम खारे प्रदेश की ओर बहता है। इस प्रकार की धाराएँ आंशिक रूप से घिरे समुद्रों (Enclosed seas) में स्पष्ट रूप से मिलती हैं। अटलांटिक महासागर से एक कम खारे जल की धारा भूमध्य सागर की ओर सतह पर बहती है और सतह के नीचे अधिक खारे जल की भूमध्य सागर से अटलांटिक की ओर बहती है। इस प्रकार की धाराएं लाल सागर, हिन्द महासागर तथा भूमध्य सागर-कालासागर के बीच चलती हैं। खारेपन का प्रभाव यह पड़ता है कि जल भारी होकर नीचे बैठ जाता है, जबकि हल्का जल सतह पर उतरता रहता है। सतह पर बहने वाली धारा कम खारी तथा तली की धारा अधिक खारी होती है।
  • घनत्व (Density)- तापक्रम व लवणता की भिन्नता के कारण समुद्री जल का घनत्व भी भिन्न पाया जाता है। अधिक घनत्व वाला जल भारी होने के कारण नीचे तली (Bottom) में बैठ जाता है और कम घनत्व वाला जल हल्का होने के कारण सतह पर ही फैला रहता है। भूमध्य रेखीय क्षेत्रों से ध्रुवीय क्षेत्रों के जल का घनत्व भिन्न है। 35 प्रतिशत खारेपन की अवस्था मे जल का घनत्व028 होता है। ज्यों-ज्यों खारापन बढ़ता है, घनत्व भी बढ़ता जाता है और घटने पर कम हो जाता है। आंशिक रूप से घिरे समुद्रों में अधिक वाष्पीकरण के फलस्वरूप खारापन एवं घनत्व बढ़ जाता है, परन्तु ठंडे क्षेत्रों में खारेपन के कम होने पर भी तापक्रम की कमी के कारण घनत्व अधिक है। इन दोनों क्षेत्रों में अधिक घनत्व वाला जल नीचे की ओर तली में बैठ जाता है। ध्रुवीय क्षेत्रों से आने वाली ठण्डी धारा ऊँचे क्षेत्रों में कम घनत्व की होगी, जबकि निम्न अक्षांशों में ताप की अधिकता के कारण ये अधिक घनत्व वाली हो जाती हैं। इससे यह नीचे धँस जाती हैं। निचले अक्षांशों का गम व खारा जल उच्च अक्षांशों के ठण्डे व कम खारे जल से जब मिलता है तो इसका घनत्व बढ़ जाता है। इससे यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि अधिक घनत्व वाला जल सतह पर नहीं दिखाई देता व्यापारिक हवाओं की पेटी में महाद्वीपों के पश्चिमी भाग में समुद्र के नीचे से अधिक घनत्व वाली ठण्डी धाराएँ ऊपरी सतह पर आ जाती हैं।
  1. बाह्य सागरीय कारक (Ex-oceanic Factors) –

    बाह्य सागरीय कारकों में वायुमण्डली दाब, वायु की दिशा, वर्षा, वाष्पीकरण आदि धाराओं की उत्पत्ति में सहायक

  1. वायुमण्डलीय दाब (Atmospheric Pressure) –

    वायुमण्डलीय दाब का धाराओं की उत्पत्ति पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। अधिक वायु दाब के कारण समुद्र का जल-तल नीचा हो जा है, लेकिन उस भाग के जल का घनत्व बढ़ जाता है। जिन क्षेत्रों में वायुमण्डलीय दबाव कम होता है, वहाँ का जल-तल ऊँचा रहता है तथा घनत्व भी कम रहता है। जल-तल व घनत्व में कमी व अधिकता के कारण धाराओं की उत्पत्ति होती है। ऊँचे जल-तल तथा कम घनत्व का जल, नीचे जल-तल तथा अधिक घनत्व की ओर धारा के रूप में प्रसारित होने लगता है। स्वेडन के प्रसिद्ध समुद्र वैज्ञानिक नडसन (Knudson) ने वायुदाब के कारणवश उत्तरी सागर के जल स्तर को बाल्टिक सागर के जल स्तर से नीचा पाया। दोनों सागरों में तापक्रम समान होते हुए भी दबाव की भिन्नता है तथा असमान जल-स्तर के परिणामस्वरूप डेनमार्क स्ट्रेट (Straight) के पास उ0 सागर को बाल्टिक सागर की ओर से धाराएँ गतिशील हुई हैं।

  2. वायु की दिशा (Direction of Wind)-

    धाराओं की उत्पत्ति पर वायु के वेग व दिशा का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। इसकी उत्पत्ति में नियतवाही पवनों (planetary wind) की विशेष भूमिका है। सामयिक हवाओं (Periodic winds) द्वारा भी धाराओं की उत्पत्ति एवं दिशा प्रभावित होती हैं।

हिन्द महासागर में अरब सागर व बंगाल की खाड़ी से सम्बन्धित धाराएँ मानसून पवनों की दिशा से प्रभावित होती हैं। मानसून पवनों की दिशा में परिवर्तन का परिणाम धारा की दिशा में भी दिखायी पड़ता है। नियतवाही पवनों से प्रभावित धाराओं के उदाहरण अटलांटिक महासागर में गल्फस्ट्रीम (पछुआ पवनों के प्रभाव में) तथा प्रशान्त महासागर में क्यूरासियो धारा पश्चिम से पूर्व को चलती हैं। हवाएँ धाराओं की उत्पत्ति में कई प्रकार से कार्य करती हैं। इनमें मुख्य निम्न हैं-

  • घर्षण की क्रिया से जल-राशि की अनेक परतें हवा की दिशा की ओर प्रवाहित हो जाती हैं। 1878 ई0 में सर्वप्रथम कार्ल जापरिट्ज (Karl Zopritz) ने हवाओं की घर्षण क्रिया द्वारा सतह से तली तक के समुद्री जल की गति निर्धारित की थी। हवा के निरन्तर एक ही दिशा में बहने से समस्त धाराओं की उत्पत्ति होती है। फिण्डले (Findlay) के अनुसार, समुद्र की ऊपरी सतह से केवल 10 या 12 मीटर तक ही हवा प्रवाहित होती है। अतः हवा द्वारा समुद्री जल का अल्पांश ही प्रभावित होकर दिशा बदलता है।
  • हवा की दिशा से धारा की दिशा में कुछ अन्तर मिलता है। यह पृथ्वी के केन्द्र बहिर्मुखी शक्ति (Defective force) के कारण होता है। प्रत्येक गतिशील जल कण उत्तरी गोलार्द्ध में अपने दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ता है। एकमैन (Ekman) के अनुसार हवाओं की दिशा एवं धाराओं की दिशा में उ0 गोलार्द्ध में दाहिनी ओर 45 अंश का अन्तर पाया जाता है। ये कोण सतह पर लगभग सब स्थान पर समान हैं, परन्तु गहराई के साथ सतह की वायु का प्रभाव कम होता जाता है। इससे जल की ऊपरी परत का घर्षण प्रभाव पड़ता है। इसके अनुसार नीचे की धाराएँ मुड़ती जाती हैं। तली तक पहुँचते-पहुँचते धाराओं की दिशा का कोण सतह की हवा के साथ बने कोण 45 अंश से अधिक होता जाता है। अन्त में तली पर सतह के विपरीत धारा चलती धाराओं की दिया
  • कुछ अंशों में धाराओं की दिशा पवन की दिशा द्वारा भी निर्धारित होती है। व्यापारिक व पछुआ हवाएँ गल्फस्ट्रीम, क्यूरोसिवो व भूमध्य रेखीय धाराओं को जन्म देती है।
  • वायु की गति से धाराओं की गति भी निर्धारित होती है। स्वेरडुप (Sverdrup) के अनुसार धाराओं पर पड़ने वाली वायु शक्ति, वायु गति की वर्ग (Square) होती है। 100 मील प्रति घण्टा चलने वाली हवा 1.5 मील प्रति घण्टा गति की धारा को जन्म देती है।
  • स्थल से समुद्र की ओर बहने वाली हवा किनारे से गर्म जल को दूर बहा ले जाती है। फलतः समुद्र-तली से ठंडा एवं अधिक घनत्व वाला जल सतह पर उठ जाता है। कैलिफोर्निया की धारा, कनारी की धारा, हम्बोल्ट तथा बैंगुला की धारा इसी प्रकार से उत्पन्न हुई हैं।
  1. वाष्पीकरण एवं वर्षा की मात्रा (Evaporation and Rainfall)-

    वाष्पीकरण एवं वर्षा की मात्रा का भी महासागरीय धाराओं पर काफी प्रभाव पड़ता है। जिन भागों में वाष्पीकरण अधिक होता है, वहाँ वर्षा भी अधिक होती है। वाष्पीकरण की क्रिया निम्न अक्षांशों में अधिक होती है। इसलिए समुद्री जल से अधिक लवणता, अधिक घनत्व तथा तापक्रम अधिक होता है। इसके विपरीत भूमध्य रेखा पर अधिक वर्षा से समुद्र का घनत्व अपेक्षाकृत कम हो जाता है। उच्च अक्षांशों में बर्फ के पिघलने, अधिक वर्षा, कम तापक्रम व कम वाष्पीकरण के कारण समुद्री जल का घनत्व कम पाया जाता है। इससे अधिक घनत्व वाले मध्य अक्षांशों की ओर धाराएँ चलने लगती हैं। आंशिक रूप से घिरे सागरों में वाष्पीकरण की अधिकता से अधिक घनत्व वाला जल समुद्र की तली से बहकर खुले सागरों की सतह पर पहुँच जाता है जिससे धारा की उत्पत्ति होती है।

  2. रूप परिवर्तन कारक (Modifying Factors) –

    धाराओं की दिशा में रूप परिवर्तन लाने वाला मुख्य कारकों में महाद्वीपों के तटों की आकृति एवं उनकी बनावट तथा नितलों की रूपरेखा (Bottom Topography) का महत्वपूर्ण सहयोग होता है।

  • तट की आकृति एवं बनावट (Coastal Shape and Structure)-

    महासागरीय धाराओं की दिशा तट के आकाश व दिशा के अनुरूप पायी जाती है। तटीय आकार से धाराएँ उत्पन्न तो नहीं, बल्कि रूपान्तरित हो जाती हैं। महाद्वीप की स्थिति धाराओं की गति एवं दिशा में बाधा उत्पन्न करती है, वे तट के सहारे मुड़ जाती हैं। महाद्वीप अधिकतर उत्तर-दक्षिण की दिशा में लम्बाई में फैले हैं। इन पर धाराओं की दिशा तट के समान्तर रहती है। ब्राजील के नुकीले तट पर विषुवतीय धारा दो भागों में विभक्त हो जाती है। इसका एक भाग दक्षिण की ओर मुड़कर ब्राजील धारा व दूसरा उत्तर की ओर जाने वाला अंश उत्तरी विषुवतीय धारा से मिलकर मध्य अमेरिका के सहारे उत्तर में चला जाता है। क्यूरोसिवो व गल्फस्ट्रीम धाराएँ भी तटों के आकार का अनुसरण करती हैं।

  • महासागरीय नितलों की आकृतियाँ (Bottom Topography)-

    धाराओं के मार्गों में छिछले व जलमग्न, तट कगार आदि बाधाएँ उपस्थित करते हैं। कगारों (Submerged ridges) को पार करते समय घर्षण के कारण धाराएँ कुछ दाहिनी ओर मुड़ जाती हैं। गल्फस्ट्रीम स्कॉटलैंड के निकट विविले थाम्पसन कगार को पार करते समय दाहिनी ओर अधिक मुड़ जाती है। उत्तरी विषुवतीय धारा मध्य अटलांटिक कगार को पार करते समय सतह को छोड़कर दाहिनी ओर मुड़ जाती है।

  1. भू- परिक्रमा सम्बन्धी कारक (Factors in Relation to the Earth Movement)-

    धाराओं की गति एवं स्वरूप पर पृथ्वी के आवर्तन का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। उत्तरी गोलार्द्ध की धाराएँ अपने दायें घूमती हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध की धाराएँ अपनी बायीं ओर आवर्तित हो जाती है।

अटलांटिक महासागर की धाराएँ

(Currents of Atlantic Ocean)

अटलांटिक महासागर में मन्द व तीव्र दोनों प्रकार की धाराएं प्रवाहित होती हैं। इसके साथ ही गर्म व ठंडी धाराएँ भी चलती हैं। अटलांटिक महासागर की प्रमुख धाराएँ निम्न हैं-

  1. उत्तरी अटलांटिक विषुवतीय धारा (North Atlantic Equatorial Current) –

    अटलांटिक महासागर में विषुवत् रेखीय प्रदेशों में 0 अंश से 10 अंश उत्तरी अक्षांश तक उत्तरी विषुवतीय धारा बहती है। व्यापारिक हवाओं के कारण इस धारा की प्रवाह दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर है। यह अफ्रीका के तट को छोड़ने के बाद अपने गुणों को प्राप्त करती है-गर्म एवं कम घनत्व अटलांटिक की मध्य कगार पार करने पर इस धारा की दिशा परिवर्तित हो जाती है और उत्तर-पश्चिमी की ओर मुड़कर दो धाराओं में बँट जाती है। एक भाग पश्चिमी द्वीप समूह के पूर्व में ‘एंटीलिज’ (Antilles) के नाम से व दूसरा कैरीबियन समुद्र से होता हुआ मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश कर जाता है। इसके प्रभाव के कारण व्यापारिक हवाएँ प० द्वीप समूह व मध्य अमेरिकी देशों में वर्षा करती हैं। यह एक गर्म धारा है।

  2. दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय धारा (South Atlantic Equatorial Current) –

    इस धारा का प्रवाह क्षेत्र 0 अंश से 20 अंश दक्षिणी अक्षांशों के मध्य मिलता है। यह पश्चिमी अफ्रीकी तट से प्रारम्भ होकर दO अमेरिका के पूर्वी तट पर जाकर सैन रॉक (San Raque) नामक टापू से टकरा कर दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा उत्तरी विषुवतीय धारा से तथा दूसरी शाखा ब्राजील तट के पास से दक्षिण की ओर गुजरती है। यह ब्राजील गर्म धारा के नाम से जानी जाती है। दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय धारा की अपेक्षा उत्तरी अटलांटिक विषुवतीय धारा को अधिक जलराशि की प्राप्ति होती है। ये दोनों धाराएँ मौसम के परिवर्तन के साथ गर्मी की ऋतु में उत्तरी गोलार्द्ध में ऊपर खिसक जाती हैं और जोड़े की ऋतु में दक्षिण गोलार्द्ध में नीचे आ जाता है।

  3. विपरीत भूमध्य रेखीय धारा (Equatorial Counter Current)-

    इस धारा की दिशा उत्तरी तथा दक्षिणी विषुवतीय धारा के प्रतिकूल या विपरीत दिशा में होती है। यह पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होती है। यह एक गर्म तथा कम शक्तिशाली धारा है। पश्चिमी भाग में यह धाराओं के बीच में लुप्त हो जाती हैं, जबकि पूर्वी भाग में दिखाई पड़ती है। इस धारा को ‘गिनी धारा’ (Guina current) के नाम से सम्बोधित करते हैं। इसकी सीमा व तीव्रमा मौसम के अनुसार बदलती रहती है। जनवरी में इनकी गति धीमी तथा 2 अंश से 3 अंश उत्तरी अक्षांशों के बीच तथा जुलाई में गति तीव्र व सीमा 7 अंश से उत्तरी अक्षांश तक मिलती है। विद्वानों द्वारा यह धारा दोनों विषुवतीय धाराओं द्वारा अधिक जलराशि के पश्चिम की ओर हट जाने से रिक्त पड़े अंश को सन्तुलित करने के अभिप्राय से दोनों के विपरीत दिशा में चलती है। कुछ लोग विपरीत भूमध्यरेखीय धारा की उत्पत्ति उत्तरी व दक्षिणी विषुवतीय धाराओं के जल को दोनों अमेरिकी महाद्वीपीय तों से टकराकर वापस पीछे लौटे जल (Back water) से मानते हैं।

  4. फ्लोरिडा धारा (Florida Current) –

    यह उत्तरी अटलांटिक विषुवतीय धारा का अग्र भाग है जो यूकाटन चैनल से होती हुई मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है। मैक्सिको की खाड़ी अर्द्ध-चन्द्राकार रूप में है। इसके पूर्वी भाग पर फ्लोरिडा जलडमरूमध्य (Strait) है। वेस्ट (Wust) महोदय के अनुसार यह गर्म धारा औसतन 26 मिलियन m/sec वार्षिक जलराशि फ्लोरिडा जलडमरूमध्यसे होकर अटलांटिक महासागर में लाती है। फ्लोरिडा धारा का प्रवाह क्षेत्र 30 अंश उत्तरी अक्षांश तक रहता है। भूमध्य रेखा से मैक्सिको की खाड़ी तक इस धारा का तापक्रम 75 अंश फारेनहाइट तथा सतह की लवणतां 36 रहती है। फ्लोरिडा जलडमरूमध्य से गुजरने पर सँकरा रास्ता तथा तीव्र ढाल के कारण यह कम चौड़ी व तीव्र गति से बहती है। आगे चलकर इसकी चौड़ाई पुनः बढ़ जाती तथा सेन्ट आगस्टाइन (St. Augustine) तट से स्थान के निकट यह धारा 30 समुद्री मील दूर स्थित है। 15° उत्तरी अक्षांश पर यह 85 मील दूर हो जाती है। आगे बढ़ने पर केपहैटरस के समीप पुनः यह धारा तट के समीप आ जाती हैं। इसकी उत्तर पूर्व की दिशा पछुआ पवनों के कारण है। फ्लोरिडा के समीप इसकी चौड़ाई 30 मील, केप कैनवरेल के पास 60 मील तथा चार्ल्सटन के समीप चौड़ाई 120-150 मील तक हो जाती है। 30° उत्तरी अक्षांश तक इसी धारा को फ्लोरिडा धारा के नाम से जानते हैं। इससे आगे यह एण्टीलीज़ से मिल जाती है।

  5. गल्फस्ट्रीम (Gulf Stream Current)-

    यह एक गर्म धारा है। इसकी खोज 1513 ई0 में (Ponce De Leon) ने की थी। फ्लोरिडा की धारा का जहाँ अन्त होता है वहीं से यह धारा प्रारम्भ होती है। फ्रेंकलिन ने इस धारा की दिशा का पता लगाया। यह धारा पूर्व में सारगैसो (Sargasso) सागर के गर्म व खारे जल तथा पश्चिम के तदीय ठंडे जल से अलग दिखाई पड़ती है। मैक्सिको की खाड़ी में जन्म लेने के कारण इसका नाम गल्फस्ट्रीम पड़ा है। यह सेन्ट लॉरेंस नदी के मुहाने तक निर्विघ्न रूप से चलती है। 40° उत्तरी अक्षांश के पास तक यह उ0 पूर्वी दिशा में बहती है और इसके बाद एकदम पूर्व की ओर मुड़ जाती है। न्यूफाउण्डलैंड तट के पास यह उत्तर से आने वाली लैब्रेडोर ठंडी धारा से मिलकर घना कोहरा उत्पन्न करती है, जिससे इसके अनेक मौलिक गुण भी बदल जाता है। 45° पश्चिमी देशान्तर के बाद गल्फस्ट्रीम कई शाखाओं में बँट जाती है। बिस्के की खाड़ी में बहने वाली धारा रेनेल धारा (Rennel current) कहलाती है। यह इंग्लिश चैनल में भी प्रवेश करती है। इस समूचे क्षेत्र में इस धारा का संयत रूप नजर नहीं आता। सतह पर तापक्रम 16 अंश सेग्रे० तथा गहराई पर और कम हो जाता है। मुख्य गल्फस्ट्रीम धारा विविले थाम्पसन कगार पार करके कई उपधाराओं में बाँटती है। नार्वे के तट को पार कर यह आर्कटिक समुद्र में पहुँच जाती है। जहाँ इसे नार्वेजियन धारा के नाम से जाना जाता है। इसका एक भाग स्पेन तट के पास टकराकर दक्षिण की किनारे ठंडी धारा से मिल जाता है।

गल्फस्ट्रीम की दिशा व प्रवाह-गति पर पछुआ पवनों का विशेष प्रभाव पड़ता है। 40 अंश उत्तरी अक्षांश पर इसकी दिशा पृथ्वी के विक्षेपक बल (Deflective force) के कारण बदलती हैं, जहाँ से गल्फस्ट्रीम धारा अनेक उपधाराओं में विभाजित होती है, उसे गल्फस्ट्रीम का डेल्टा कहते हैं। लेब्रेडोर की ठंडी धारा से टकराने के बाद इसकी गति में कमी आ जाती है और तापक्रम में थोड़ा अन्तर आ जाता है। न्यूफाउण्डलैंड तट के समीप कोहरा उत्पन्न होने के कारण प्लैंकटन (plankton) घास बहुतायत में उगती है तथा कोहरे के प्रभाव में जलयानों का रास्ता कुछ समय के लिये बन्द हो जाता है।

  1. कनारी धारा (Canary Current)-

    उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट जब स्पेनं के तट के निकट पहुँचकर दो धाराओं में विभक्त हो जाती है तो एक शाखा उत्तर की ओर ग्रेट ब्रिटेन के पश्चिमी और उत्तर तट पर बहती हुई उ० ध्रुव सागर की ओर बढ़ जाती है, किन्तु दूसरी शाखा दक्षिण की ओर मुड़कर कनारी द्वीपों के निकट तथा अफ्रीका के पश्चिमी तट पर प्रवाहित होती हुई उ. पूर्वी व्यापारिक पवनों के प्रभाव के कारण उत्तरी विषुवतीय धारा से मिल जाती है। कनारी ठंडे जल की धारा है।

पूर्व में कनारी, प. में गल्फस्ट्रीम और दक्षिण में उ. विषुवतीय धारा से घिरा हुआ एक शान्त सागर है जिसे सारगैसो कहते हैं। इसकी स्थिति 20° से 40° उत्तरी अक्षांश तथा 35-75° पश्चिमी देशान्तर के बीच है। इसकी सतह पर सारगैसम घास तैरती रहती है। कुमेल (Krummel) का मत है कि यह घास पश्चिमी द्वीप समूह के द्वीपों से बहकर आई है। सारगैसो सागर का औसत तापमान 26° सेण्टीग्रेट तथा लवणता 37 प्रतिशत है।

  1. लैब्रेडोर धारा (Labradore Current)-

    उत्तरी अटलांटिक महासागर में लैब्रेडोर तट के सहारे उत्तर पश्चिम में दक्षिण पूर्व की ओर एक ठण्डी धारा प्रवाहित होती है। इसे लैब्रेडोर धारा के नाम से पुकारते हैं। यह उ. ध्रुव महासागर का ठण्डा जल खींचकर ले जाती है। सेन्ट लॉरेन्स नदी के मुहाने पर न्यूफाउण्डलैण्ड द्वीप के समीप यह गल्फस्ट्रीम से मिलती है जिससे घना कोहरा होता है।

  2. ब्राजील की गर्म धारा (Brazilian Warm Current) –

    द० विषुवतीय धारा दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट पर सैन रॉक अन्तरीप से टकराकर दो भागों में विभक्त हो जाती है। एक शाखा तट के सहारे उत्तर की ओर चली जाती है तथा दूसरी ब्राजील तट के सहारे दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है। यह दक्षिण की ओर प्रवाहित होने वाली गर्म जल की धारा ब्राजील धारा कहलाती है। इस धारा का जल 40 अंश दक्षिणी अक्षांश के निकट पहुँचकर फाकलैण्ड की धारा से मिल जाती है तथा प्रवाह के रूप में पश्चिम से पूर्व दिशा में बहने लगता है।

  3. फाकलैण्ड की ठण्डी धारा (Falkland Cold Current)-

    दक्षिणी अटलांटिक महासागर में फाकलैण्ड द्वीप के समीप एक ठण्डी धारा का जन्म होता है जो अर्जेन्टाइना तट के सहारे बहती हुई लाप्लाटा नदी के मुहाने के निकट ब्राजील गर्म धारा से मिलती है। अण्टार्कटिका ड्रिफ्ट का एक अंश होने के कारण यह एक उण्डी धारा है।

  4. बेंगुएला ठंडी धारा (Bengnela cold Current) –

    द० ध्रुव वृत्तीय धारा का कुछ जल पृथ्वी की दैनिक गति के कारण थोड़ा-सा उत्तर की ओर मुड़ जाता है यह धारा द) अफ्रीका के पश्चिमी तट से टकराकर उत्तर की ओर प्रवाहित होती है। उत्तर में गिनी तट के निकट यह धारा पश्चिम की ओर मुड़ जाती है और दक्षिणी विषुवतीय धारा से मिल जाती है।

  5. दक्षिणी अटलांटिक ड्रिफ्ट (South Atlantic Drift) –

    जब 40° दक्षिणी अक्षांश के समीप ब्राजील व फाकलैंड धाराएँ पछुआ पवनों के प्रभाव में आती हैं तो समुद्री धारा का प्रवाह प० से पूर्व की ओर होने लगता है। इसे पश्चिमी वायु प्रवाह (West wind dfirt) भी कहते हैं। यह एक ठण्डी धारा है। अण्टार्कटिका महाद्वीप के समीप प्रवाहित होने वाली इस ठण्डी धारा को अण्टार्कटिका ड्रिफ्ट भी कहते हैं। यह 40° से 60° दक्षिणी अक्षांश के मध्य बहती हैं। तट के निकट ही व्यापारिक हवाओं के प्रवाह से तली का कम खारा एवं ठण्डा जल भी ऊपर आ जाता है और गर्म जल पश्चिम में बढ़ जाता है।

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