नरौजी के प्रमुख आर्थिक सिद्धान्त

नरौजी के प्रमुख आर्थिक सिद्धान्त

नरौजी के प्रमुख आर्थिक सिद्धान्त

दादाभाई नरौजी के प्रमुख आर्थिक सिद्धान्त निम्नलिखित थे :

  1. निर्धनता की समस्या –

    नरौजी के अनुसार भारत की मुख्य समस्या भारत की निर्धनता थी। विभिन्न बातों से भली-भांति यह सिद्ध हो जाता है कि देश की निम्न आर्थिक आय, निम्न निर्यात-आयात, निम्न, जीवन-स्तर, सरकार की निम्न आय, ऊँची मृत्यु दर और निरन्तर उत्पन्न होने वाले अकाल। उनके अनुसार भारत की निर्धनता का प्रमुख कारण ब्रिटिश साम्राज्य था। उन्होंने हिसाब लगाया था कि ब्रिटिश इण्डिया की कुल प्रति व्यक्ति आय 20 रुपये प्रतिवर्ष थी और सम्पूर्ण देश में प्रति व्यक्ति जीवन-निर्वाह लागत 34 रुपये थी। उन्होंने आवश्यक आँकड़े एकत्र किये और उनके आधार पर लिखा कि, “ऐसे भोजन और कपड़े के लिए भी जो कैदी को दिया जाता है, एक अच्छे मौसम में पर्याप्त उत्पादन नहीं हो पाता, थोड़ा-सा विलास और सभी सामाजिक एवं धार्मिक आवश्कताओं तथा बुरे समय के लिए व्यवस्था करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, भारतीय जनता की ऐसी स्थिति है। उनको जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी प्राप्त नहीं होता।” उनके विचार में भारत की निर्धनता इसी कारण थी कि उसका पिछला धन नष्ट हो चुका था और यूरोपीय सेवाओं तथा राष्ट्रीय ऋण पर भी अधिक खर्च किया जा चुका था। उनके अनुसार यह एक ऐसी नाली थी जो भारतीय अर्थव्यवस्था को खाली कर रही थी। नरौजी ने बताया कि जो भी युद्ध अंग्रेजों ने 1850 के बाद भारत की भौगोलिक सीमा के बाहर लड़ा, उसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन के हितों को सुरक्षित रखना था। इसलिए भारत में ब्रिटिश फौज तथा अन्य सेवाओं पर जो व्यय, जाता है, उसमें ब्रिटेन को अपना उपयुक्त हिस्सा देना चाहिए। भारत में रेल की स्थापना का उदाहरण लेते हुए उन्होंने बताया कि जब इंग्लैण्ड में रेलमार्ग स्थापित किये गये थे तो उनसे प्राप्त सम्पूर्ण आय ब्रिटिश खजानों में जमा होती थी। रेलों के संचालन के लिए जो कर्मचारी नियुक्त किये गये थे वे अंग्रेज थे और इस प्रकार रेलों पर किया गया व्यय ब्रिटिश जनता को ही वापस मिल जाता था, किन्तु भारत में स्थिति बिल्कुल उल्टी थी। भारतीय रेलों के स्थापना के सम्बन्ध में जो उच्च अधिकारी नियुक्त गये, वे इंग्लैण्ड में रहते थे और उनका सारा खर्चा भारतीय रुपये से पूरा किया जाता था। इसके अतिरिक्त अन्य कर्मचारियों के वेतनों तथा भत्तों का भुगतान भी भारतीय रुपये में से किया जाता था। केवल थोड़े से भारतीय ही निम्न पदों पर नियुक्त किये गये थे। इस प्रकार रेलों से भारत को बहुत कम लाभ प्राप्त हुआ जबकि विदेशी ऋणों का सम्पूर्ण भार भारत को सहन करना पड़ा।

  2. निष्कासन सिद्धान्त (The Drain Theory) –

    नरौजी का मानना था कि भारत में ब्रिटिश शासन प्रणाली भारतीयों के लिए विनाशकारी तथा ब्रिटेन के लिए हितकारी था। इसी को ‘निष्कासन सिद्धान्त’ कहते हैं। इस सिद्धान्त का मुख्य सार यह है कि भारतीय जनता की निर्धनता मुख्यतः ब्रिटिश साम्राज्य के कारण है क्योंकि व्यक्तियों पर भारी कर लगा दिये गये। यदि करों से प्राप्त होने वाली आय को उसी देश में खर्च कर दिया जाय जिसमें वह एकत्र की गयी है तो धन उसी देश के व्यक्तियों के हाथों में घूमता रहता है, आर्थिक क्रियाओं को बढ़ावा मिलता है और व्यक्तियों की सम्पन्नता में वृद्धि होती है। यदि यह आय किसी अन्य देश को भेज दी जाये तो वह उस देश के लिए सदैव ही नष्ट हो जाता है जिसमें इसको एकत्र किया गया था। इससे करदाता देश में उद्योग तथा व्यापार भी प्रोत्साहित नहीं होते। उनका अनुमान था कि वर्ष 1900 ई0 तक 200 लाख पाउण्ड से अधिक धन भारत से बाहर जा चुका था। परिणामतः देश में पूँजी का निर्माण नहीं हो सका था। यही नहीं, उस पूँजी को वापस लाकर अंग्रेजों ने महत्त्वपूर्ण उद्योगों तथा सम्पूर्ण व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया था। इसलिए नरौजी का विचार था कि यदि देश का सम्पूर्ण उत्पादन देश में नहीं, लगाया जाता तो पुनरुत्पादन कठिन हो जायेगा और उत्पादन की प्रचलित दर पर वार्षिक उत्पादन में से कुछ-न-कुछ अवश्य ही कम होता चला जायेगा। यह एक प्रकार से दोधारी तलवार के समान थी अर्थात् एक और तो पूँजी का ह्रास होता चला जाता था तो दूसरी ओर उत्पादन की दर कम होती जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि नरौजी विदेशी पूँजी के उपयोग के विरुद्ध थे; किन्तु यह सत्य नहीं है। वे विदेशी पूँजी का उपयोग कुछ सीमाओं के अन्तर्गत करना चाहते थे। उन्होंने बताया कि अन्य देशों में अंग्रेज पूँजीपतियों ने केवल अपना धन ही उधार दिया है। ऋणी देश के निवासियों ने उस पूँजी का उपयोग किया और उससे लाभ प्राप्त किये और पूँजीपतियों को लाभ अथवा ब्याज का भुगतान किया जबकि भारत की स्थिति बिल्कुल भिन्न थी। अंग्रेज पूँजीपतियों ने केवल धन ही उधार नहीं दिया बल्कि पूँजी के साथ-साथ देश पर आक्रमण भी किया।

  3. ब्रिटिश शासन व्यवस्था की आलोचना –

    नरौजी ने ब्रिटिश शासन व्यवस्था की कटु आलोचना की। ब्रिटिश संसद में अपने भाषणों द्वारा उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन-व्यवस्था के दोषों पर प्रकाश डाला और बताया कि कम्पनी देश के अन्दर व्यापार को नष्ट कर रही है। इसके अतिरिक्त अंग्रेज देश के विभिन्न मामलों की व्यवस्था अंग्रेज कर्मचारियों द्वारा कर रहे और भारतीयों को उचित स्थान नहीं दिया जा रहा था। नरौजी ने स्पष्ट शब्दों में बताया कि ब्रिटिश शासन संकट की कटुता को तीव्र कर रहा था। उसके अनुसार भारत के शरीर पर पिछले आक्रमणकारियों ने जो घाव लगाये थे। वे ब्रिटिश शासन व्यवस्था से और भी गहरे हो गये थे। उन्होंने बताया कि अंग्रेजों का यह दावा करत ने उसके शासन काल में उन्नति की थी। उचित नहीं था। इसी प्रकार उन्होंने कहा कि यह समझना कि भारत की निर्धनता प्रकृति के प्रकोप के कारण थी, गलत था । वास्तव में, यदि प्रकृति के नियम संचालित होते तो भारत दूसरा इंग्लैण्ड बन गया होता। इस निर्धनता की समस्या को सुलझाने के लिए नरौजी ने निम्न सुझाव दिये थे :

  • भारत और इंग्लैण्ड को अपने-अपने देशों में काम करने वाले देशवासियों के वेतनों का भुगतान करना चाहिए। जो अंग्रेज भारत में नौकर हैं और जो भारतीय इंग्लैण्ड में नौकर हैं, उनके सम्बन्ध में दोनों देशों के बीच उचित अनुपात निर्धारित होना चाहिए।
  • चूँकि अंग्रेजों को अच्छे वेतन दिये जा रहे थे, इसलिए उनको पेंशन नहीं मिलना चाहिए।
  • चूँकि कोई भी देश भारत पर समुद्र से आक्रमण नहीं कर सकता इसलिए भारत को इण्डियन नेवी पर किये गये व्यय में कोई योगदान नहीं देना चाहिए।
  1. भारत की राष्ट्रीय आय –

    नरौजी पहले भारतीय थे जिन्होंने भारत की राष्ट्रीय आय की गणना की और उसमें विभिन्न समूहों हिस्सों को निर्धारित किया। उन दिनों राष्ट्रीय आय सम्बन्ध आँकड़े अपूर्ण थे। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश इण्डिया से सम्बन्धित प्रति व्यक्ति आय सम्बन्धी अनुमान प्रत्येक वर्ष प्रकाशित होने चाहिए। उनके अनुसार सही स्थिति वह होती जब कुल वास्तविक वार्षिक आय, प्रति व्यक्ति आय और अच्छे प्रकार से काम करने की स्थिति में रहने के लिए श्रमिकों की आवश्यकताओं की वास्तविक गणना की जाती। औपचारिक आँकड़ो के अनुसार उन्होंने 1867-70 के वर्षों में बम्बई में प्रेसीडेंसी में प्रति व्यक्ति आय को 20 रुपये बताया था। उन्होंने यह भी बताया कि साधारण भारतीयों की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 34 रुपये की आवश्यकता था। इन आँकड़ों के आधार पर उन्होंने यह सिद्ध किया कि धनी तथा मध्यम वर्ग को राष्ट्रीय आय का बहुत बड़ा भाग प्राप्त रहा था और निर्धन जनता को आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भर के लिए भी पर्याप्त आय प्राप्त नहीं हो रहा थी। अपनी गणना में नरौजी ने कृषि उत्पादन तथा उद्योगों के उत्पादन के मूल्य को सभी व्यक्तियों में बराबर-बराबर अनुपात में विभाजित किया और इस बात की ओर कोई ध्यान नहीं दिया कि कृषि उद्योगों तथा अन्य व्यवसायों में जो व्यक्ति काम कर रहे थे उनकी वास्तविक संख्या भिन्न-भिन्न थी। नरौजी ने देश के कुल उत्पादन की गणना में सेवाओं के मूल्य को सम्मिलित नहीं किया। डॉ राव ने नरौजी की इस विधि की आलोचना की है। नरौजी का विश्वास था कि किसी भी देश का आर्थिक विकास उत्पत्ति के साधनों पर निर्भर है, अतः राष्ट्रीय आय बढ़ाना आवश्यक है। उनके अनुसार राष्ट्रीय आय की गणना करते समय तीन बातों को ध्यान में रखना चाहिए। प्रथम, भारत की कुल वास्तविक भौतिक वार्षिक आय कितनी है, दूसरे, सभी प्रकार के व्यक्तियों की न्यूनतम आवश्यकताएँ और साधारण आवश्यकताएँ क्या हैं, और तीसरे, भारत की आय इन आवश्यकताओं के बराबर है या उससे कम अथवा अधिक है।

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