नासाउ विलियम सीनियर के आर्थिक विचार  

नासाउ विलियम सीनियर के आर्थिक विचार

व्यक्तिवादी एवं राष्ट्रवादी आलोचकों ने आर्थिक परिदृश्य में परम्परावादियों के विरुद्ध प्रतिक्रिया के कारण भ्रम पैदा हो गया था। अतः क्लासिकी अर्थशास्त्र के संशोधन की आवश्यकता थी और यह विभिन्न देशों में उपस्थित अनेक विद्वानों द्वारा किया गया, उनमें एन. डब्ल्यू. सीनियर प्रमुख थे।

नासाउ विलियम सीनियर के आर्थिक विचार

सीनियर का जन्म 1790 में इंग्लैण्ड में हुआ। उनकी कृतियाँ Efficiency and Social Economy और An outline of Science of Political Economy प्रमुख हैं।

राजनीतिक अर्थव्यवस्था का क्षेत्र

सीनियर के अनुसार, “राजनीतिक अर्थव्यवस्था की विषय-वस्तु धन तक सीमित है और मानव सुख से नहीं।” उन्होंने अध्ययन की निगमन विधि को अपनाया। वह अर्थशास्त्र का अमूर्त तथा निगमन विज्ञान के रूप में व्यवहार करता है। सीनियर ने कहा कि अर्थशास्त्र का विज्ञान निरीक्षण की अपेक्षा तर्कों पर अधिक निर्भर करता है।

मूल्य

सीनियर का कहना है कि मूल्य किसी वस्तु का वह गुण है जो उसे इस योग्य बनाता है कि विनिमय में ली और दी जा सके। उनके अनुसार मूल्य में तीन चीजें योगदान देती हैं वे हैं – हस्तान्तरणता, सापेक्षिक दुलर्भता और उपयोगिता।

वस्तु की दुलर्भता इसकी माँग के सम्बन्ध में निर्धारित होती है। इन्होंने माँग और पूर्ति दोनों का मूल्य निर्धारण में प्रयोग किया।

सीनियर ने मुद्रा के गुणों को टिकाऊपन, स्थिरता, बाह्यता और विभाज्यता के रूप में सुझाया। सिक्के केवल स्वर्ण एवं चांदी से निर्मित होने चाहिए। कागजी मुद्रा पूर्णतः नियमित होनी चाहिए। सीनियर ने रिकार्डो एवं मिल के मुद्रा परिमाण सिद्धान्त की आलोचना की है। उनका कहना था कि मुद्रा का मूल्य न तो परिमाण और न चलन की गति पर निर्भर करता है वरन् उत्पादन लागत पर निर्भर करता है।

संचय और पूँजी निर्माण

सीनियर ने बताया कि उत्पादक साधन श्रम और पूँजी उत्पादन में योगदान देते हैं। ये दो साधन (श्रम और पूँजी) अपर्याप्त हैं इसलिये द्वितीय प्रतिनिधि त्याग की आवश्यकता होती है। सीनियर ने बताया कि पूँजी निर्माण त्याग के कारण स्थान ले सकता है। उनका कहना है, “त्याग एक शब्द है जिसके द्वारा हम एक व्यक्ति के व्यवहार को व्यक्त करते हैं जो या तो अपने नियन्त्रित साधनों के अनुत्पादक उपयोग से अपने आपको वंचित रखता है।”

एकाधिकार का सिद्धान्त

सीनियर का एकाधिकार आगम का विचार आश्चर्यजनक था। उनका कहना था कि व्यवहार में स्वतन्त्र प्रतियोगिता हमेशा नहीं पायी जाती। बाजार में एकाधिकार का तत्व उपस्थित रहता है और यह तभी निश्चित सकता है जब सभी को समान रूप से उत्पादन के साधन प्राप्त होते हैं। उन्होंने माना कि भूमि की स्थिति में सदैव ही एकाधिकार का तत्व विद्यमान रहता है जो वस्तुएँ प्राकृतिक साधनों की सहायता से बनायी जाती हैं वे एकाधिकार वस्तुएँ होती हैं।

सीनियर ने एकाधिकार को चार भागों में विभाजित किया : तुलनात्मक लाभ एकाधिकार, निरपेक्ष एकाधिकार, कापीराइट एकाधिकार और भूमि एकाधिकार।

लगान

उपजाऊ भूमि की कमी के कारण श्रम घटिया भूमि में लगाया जाता है, जिसके फलस्वरूप श्रम एवं पूँजी से ह्रासमान प्रतिफल प्राप्त होगा। अतः उन्नत भूमि के स्वामी लगान की माँग करेंगे। भूमि का मूल्य उन्नत भूमि की दुर्लभता और घटिया भूमि की खेती द्वारा निर्धारित होगा। अगर सबसे अधिक उर्बर भूमि के केवल एक भाग पर खेती की जाती है तो भूमि का मूल्य नहीं होगा। इस तरह जब तक उत्पादन के दुर्लभ साधन का उपयोग होगा तब तक लगान उत्पन्न होगा।

मजदूरी

सीनियर ने मजदूरी-कोष सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार, ‘मजदूरी श्रमिकों के निर्वाह के लिए निश्चित कोष की मात्रा की तुलना में श्रमिकों की संख्या के निर्वाह पर निर्भर करती है।’ मजदूरी कोष के आकार एवं श्रमिकों की संख्या के अनुसार मजदूरी निर्धारित होती है। उन्होंने माना कि श्रमिकों की उत्पादन शक्ति श्रम विभाजन एवं मशीन के प्रारम्भ के साथ बढ़ सकती है।

सीनियर ने माल्थस के जनसंख्या सिद्धान्त एवं एडम स्मिथ के श्रम विभाजन सिद्धान्त का समर्थन किया। श्रम विभाजन का लाभ मुख्यतः पूँजी के उपयोग या त्याग पर निर्भर करता है। वह अबन्ध नीति के विरोध में थे। उन्होंने सामाजिक समस्याओं के समाधान और लोक निर्माण कार्यक्रमों की रचना के लिए राज्य हस्तक्षेप का स्वागत किया। उनका राजनीतिक अर्थव्यवस्था में महान योगदान ब्याज का संयम सिद्धान्त था।

हैने के शब्दों में हम निष्कर्षतः कह सकते हैं कि, “उसने परम्परावादी अर्थशास्त्र की अमूर्त प्रकृति को अत्यधिक महत्व दिया। उत्पादन के साधनों का वर्गीकरण समन्वयरहित था और एकाधिकार की परिभाषा अनुपयुक्त सिद्ध हुयी ।”

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