कीन्स के ‘अर्थशास्त्र की प्रकृति’

कीन्स के अर्थशास्त्र की प्रकृति

कीन्स के अर्थशास्त्र की प्रकृति

कीन्स का अर्थशास्त्र परम्परावाद और नव-परम्परावाद की त्रुटिपूर्ण विचारधारा के परिणामस्वरूप जन्म लेता है। केंज की विचारधारा ही केंज का अर्थशास्त्र है। इस अर्थशास्त्र की विचित्र बात यह है कि यह लगभग प्रत्येक बात में दोनों वादों से भिन्न विचार रखता है। केंज के अर्थशास्त्र की प्रकृति को समझने के लिए यह आवश्यक है कि उसके अर्थशास्त्र की निम्न विशेषताओं को समझ लिया जाये :

  1. समष्टिभाव का अर्थशास्त्र –

    प्रतिष्ठित विचारधारा का मूलमन्त्र व्यष्टिभाव था। उन्होंने व्यक्तिगत बातों को विशेष महत्व दिया था। प्रतिष्ठित शाखा ने व्यक्तिगत फर्म, व्यक्तिगत मूल्य, एक उद्योग तथा एक इकाई की समस्या तक ही अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया था। परन्तु केंज ने इस विचारधारा के विपरीत समष्टिभाव के अर्थशास्त्र (Macro Economics) को महत्व दिया। उसने कुल राष्ट्रीय आय, कुल व्यय, कुल रोजगार की समस्याओं को अपने अध्ययन का केन्द्र-बिन्दु बनाया। जनरल थ्यौरी नामक ग्रन्थ में उसने इसी विचारधारा को प्रमुख स्थान दिया है।

  2. सन्तुलन की धारणा –

    परम्परावादियों का विचार था कि अर्थ-व्यवस्था में स्वयं सन्तुलन स्थापित हो जाता है। जब कभी असन्तुलन की दशा आती है, यह अस्थायी प्रकृति का होता है और समय के पश्चात स्वयं ठीक हो जाता है। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का विचार था कि अर्थ-व्यवस्था में हस्तक्षेप के बिना ही पूर्ण रोजगार स्थापित हो जाता है। अतः पूर्ण रोजगार की चिन्ता नहीं की जानी चाहिए। केंज ने स्वयं इसको महसूस किया था कि स्वसन्तुलन की धारणा पूर्णतया काल्पनिक है। परम्परावादियों के विपरीत उसका विचार था कि अर्थ-व्यवस्था प्रायः असन्तुलन की स्थिति में रहती है और पूर्ण रोजगार की स्थिति नहीं होती है। केंज के अनुसार, यदि अर्थ-व्यवस्था को स्वतन्त्र रूप से छोड़ दिया जाये, तो वह आवश्यक रूप से व्यापार-चक्रों के जाल में फँस जायेगी। अतः अर्थ व्यवस्था को इस चक्र से बचाने के लिए कारगर हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।

  3. अल्पकालीन विश्लेषण –

    प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री दीर्घकालीन विश्लेषण के पक्ष में थे, जबकि केंज अल्पकालीन विश्लेषण को सर्वाधिक महत्व देता है। केंज के अनुसार व्यक्ति का जीवन ही अल्पकालीन है और उसकी समस्या भी अल्पकालीन होती है। रोजगार के सिद्धान्त में उसने अल्पकालीन तत्वों को सर्वाधिक महत्व दिया है। वह उपभोग तथा विनियोग को बढ़ाकर रोजगार के स्तर को ऊँचा उठाना चाहता था।

  4. उपभोग का महत्व –

    कीन्स के रोजगार सिद्धान्त का आधार प्रभावपूर्ण माँग (Effective Demand) माना जातापरन्तु प्रभावपूर्ण माँग उपभोग पर आश्रित होती है। इस प्रकार, केंज के अध्ययन का आधार उपभोग है, रोजगार स्तर की वृद्धि के लिए केंज उपभोग वस्तुओं को अधिक महत्व देता है।

  5. मौद्रिक तत्वों की सहायता –

    प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के लिए मुद्रा केवल विनिमय का माध्यम तथा मूल्य की मापक थी। केंज से पूर्व मुद्रा के कार्यों व उसके महत्व की व्याख्या सामान्य रूप में की जाती थी। केज प्रथम अर्थशास्त्री था जिसने मौद्रिक नीति की सहायता से रोजगार को प्राप्त करने की बात कही थी। केंज के लगभग सभी विश्लेषण मौद्रिक सिद्धान्तों पर आधारित हैं।

  6. हस्तक्षेप की अर्थ-व्यवस्था –

    प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री मुक्त अर्थ-व्यवस्था के लाभों का गुणगान करते नहीं थकते थे, क्योंकि उनके अर्थशास्त्र का केन्द्र-बिन्दु मुक्त अर्थ-व्यवस्था थी। केंज मुक्त अर्थ-व्यवस्था के दोषों से परिचित था, तथा समझता था कि जे.बी. से का नियम, ‘पूर्ति स्वयं अपनी मांग पैदा करती है’, निराधार है। अतः केंज सरकारी हस्तक्षेप की सहायता से केवल बेरोजगारी को ही दूर नहीं करना चाहता था, बल्कि अति-उत्पादन की समस्या से भी निपट लेना चाहता था। इस प्रकार, केंज एक पत्थर से दो शिकार करता है जो उसके बौद्धिक चातुर्य का ही प्रतीक है। हमें यह नहीं समझ लेना चाहिए, के केंज राज्य-समाजवादी था या उसके विचार समाजवादियों से मेल खाते हैं वरन् यह समाजवाद का कट्टर विरोधी था।

  7. अध्ययन-पद्धति-

    कीन्स का अर्थशास्त्र कल्पनाओं पर आधारित नहीं है। वह वस्तु-स्थिति की सही-सही व्याख्या करता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने आगमन प्रणाली की सहायता ली है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि केंज की विचारधारा न तो प्रतिष्ठित विचारधारा है और न ही वह नव-प्रतिष्ठित विचारधारा है। यह एक ऐसी विचारधारा है जो अपने आप में केंजवादी विचारधारा को जन्म देती है।

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