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भारतीय संविदा अधिनियम के अंतर्गत भुगतान के नियम

भारतीय संविदा अधिनियम में भुगतान के नियम

भारतीय संविदा अधिनियम में भुगतान के नियम

जहाँ ऋणी को ऋणदाता के लिए केवल एक ही ऋण का भुगतान करना है, तब तो भुगतान के नियोजन के सम्बन्ध में कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती, लेकिन जहाँ ऋणी ऋणदाता को एक ऐसी रकम का भुगतान करता है, जो सम्पूर्ण ऋणों के भुगतान के रूप में अपर्याप्त है, तो वहाँ यह समस्या सामने आती है कि ऐसी रकम का भुगतान कौन से ऋण के सम्बन्ध में नियोजित किया जाये।

उदाहरण के लिए- ‘अ’ ‘ब’ को 100 रुपये, 200 रुपये और 500 रुपये तीन ऋणों के लिए ऋणी है। वह ‘ब’ को 150 रुपये का भुगतान करता है। यहाँ यह समस्या आयेगी कि ‘ब’ इस भुगतान को किस ऋण के सम्बन्ध में समझे।

भुगतान के नियोजन के बारे में भारतीय संविदा अधिनियम की धाराएँ 59 से 61 तक हैं-

  1. जहाँ किसी व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न कई ऋण चुकाने हैं और वह किसी रकम का भुगतान करते समय ऋणदाता को यह स्पष्ट रूप से सूचना दे देता है कि वह उस रकम का नियोजन किसी एक विशेष ऋण के सम्बन्ध में करे। ऐसी स्थिति में उस रकम के भुगतान को स्वीकार करने पर ऋणदाता को यह चाहिए कि वह उस भुगतान का नियोजन केवल उसी विशेष कहे (धारा 59) गये ऋण के सम्बन्ध में करे।

यदि ऋणी इस प्रकार की कोई सूचना नहीं देता है तो ऋणदाता को उस रकम के भुगतान का नियोजन उस विशेष ऋण के सम्बन्ध में करना चाहिए जो कि व्यापार की सामान्य परिस्थितियों से ज्ञात हो ।

उदाहरण– ‘अ’ ‘ब’ का 1,500 रुपये और 2,000 रुपये का ऋणी है, जो क्रमश: 31 जनवरी और 15 फरवरी को 1,200 रुपये का भुगतान करता है और कहता है कि ‘ब’ इसका नियोजन 1,500 रुपये के ऋण के सम्बन्ध करे, ‘ब’ इस भुगतान को स्वीकार कर लेता है। इस दशा में ‘ब’ का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह उस ऋण के सम्बन्ध में ही उस रकम के भुगतान का नियोजन करे।

अन्य उदाहरण- ‘अ”ब’ का 2,000 रुपये और 3,500 रुपये देने का ऋणी है, जो 31 जुलाई और 10 अगस्त को देय है। ‘अ’ 31 जुलाई को ‘ब’ के लिए 2,000 रुपये का भुगतान करता है। ‘ब’ को चाहिए कि वह इस भुगतान का नियोजन 2,000 रुपये के सम्बन्ध में ही करे। क्योंकि विद्यमान परिस्थितियों से यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘अ’ ने 2,000 रुपये के ऋण के लिए ही भुगतान किया है।

  1. जब किसी व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति के लिए कई ऋण चुकाने हैं और वह एक ऐसी स्कम का भुगतान करता है जो सम्पूर्ण के निपटारे के लिए अपर्याप्त है तथा ऐसा भुगतान करते समय वह ऋणदाता को कोई ऐसी स्पष्ट सूचना भी नहीं देता है कि वह उस भुगतान का नियोजन किस ऋण के सम्बन्ध में करे और न ही व्यापार की परिस्थितियों से ऐसा ज्ञात होता है कि वह उस भुगतान का नियोजन किस ऋण के सम्बन्ध में करे तब ऐसी दशा में ऋणदाता के लिए यह विकल्प रहता है कि वह उस भुगतान का नियोजन अपनी इच्छानुसार किसी भी ऋण के सम्बन्ध में कर ले। भले ही वह उसका नियोजन किसी ऐसे ऋण के सम्बन्ध में करे जो अवधि अधिनियम के अन्तर्गत अवधि वर्जित है तब भी ऐसा नियोजन मान्य होगा। (धारा 60)
  2. जब ऋणी अथवा ऋणदाता दोनों में से कोई भी भुगतान का नियोजन नहीं करता है तब किसी ऋण का भुगतान ऋणों की देय तिथि के क्रम के अनुसार नियोजित किया जायेगा भले ही उस क्रम में कोई ऐसा ऋण हो जो अवधि अधिनियम के अनुसार अवधि वर्जित हो चुका हो। (धारा 61)

यदि सभी ऋणों का भुगतान एक ही तिथि पर होना है तब किसी भी रकम के भुगतान का नियोजन सभी ऋणों में आनुपातिक रूप से किया जायेगा। एम. रामनाथ बनाम चिरंजीलाल के मामले में यही निश्चित किया गया था कि जहाँ ऋणी अथवा ऋणदाता दोनों में से कोई नियोजन नहीं करता वहाँ अधिनियम की धारा 61 का पालन होगा जिसके अन्तर्गत भुगतान का नियोजन क्रमानुसार किया जायेगा और एक ही तिथि पर सभी ऋणों के देय होने की दशा में आनुपातिक आधार पर नियोजन होगा।

धारा 61 के सम्बन्ध में यह महत्वपूर्ण बात है कि ऋणी अथवा ऋणदाता दोनों में से किसी के द्वारा भी नियोजन न करने पर, नियोजन स्वयं न्यायालय द्वारा किया जायेगा।

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