भारत छोड़ो आन्दोलन एवं सरकार द्वारा इसका दमन

भारत छोड़ो आन्दोलन एवं सरकार द्वारा इसका दमन

1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के उत्तरदायी तत्व

द्वितीय महायुद्ध में मित्र राष्ट्रों ही हालत प्रारम्भिक हारों के कारण अत्यन्त शोचनीय हो गया थी। ब्रिटेन के महारथियों को यह विश्वास हो चला था कि शायद ब्रिटेन के सिद्धान्त जिन्हें अपने युद्ध के अन्तर्गत रखा है वे वास्तविक न होने के कारण विश्व के अन्य राज्यों का पश्चात् अमेरिका के राष्ट्रपति को यही समर्थन उन्हें युद्ध के अन्तर्गत नहीं मिल रहा है। च्यांग-काई-शेक ने अपनी भारत यात्रा के लिखा था। ब्रिटिन भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दे दे। राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने भी इस आशय को चर्चिल से बातचीत की। ब्रिटेन की सरकार को न चाहते हुए भी भारत में उत्पन्न संवैधानिक गत्यावरोध को समाप्त करने के लिए सर क्रिप्स को भेजना पड़ा। क्रिप्स का प्रयास भी असफल रहा ऐसी परिस्थिति में संपूर्ण भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में भारी तनाव उत्पन्न हो गया। कांग्रेस दल जो अभी तक ब्रिटेन के साथ सहानुभूति रखे हुये था उसे ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध महान् संघर्ष भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ करना पड़ा। संक्षेप में भारत छोड़ो आन्दोलन के निम्नलिखित कारण था-

  1. 30 मार्च, सन् 1942 ई० को सर स्ट्रेट फोर्ड क्रिप्स ने संकेत किया था कि अगर उनके प्रस्तावों को नहीं माना गया तो ब्रिटिश सरकार भारत में उत्पन्न गत्यावरोध को समाप्त करने के लिये कुछ भी नहीं करेगी। चूँकि क्रिप्स के प्रस्ताव अपर्याप्त थे इसलिए उनके स्वीकार होने का कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता वार्तालाप की असफलता का सारा दोष कांग्रेस के ऊपर थोप दिया गया। ब्रिटेन की सरकार का भारत को स्वतंत्र करने को कोई इरादा नहीं था। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी पुस्तक ङ्खइण्डिया विन्स फ्रीडमङ्ग में लिखा है। ‘भारत और क्रिप्स में जो लम्बी बातचीत चली, वह संसार को यह सिद्ध करने के लिए थी कि कांग्रेस भारत को सभी प्रतिनिधि संस्था नहीं है और भारतीयों की फूट वास्तविक कारण था जिससे अंग्रेज इनको कोई भी शक्ति देने में असमर्थ हैं।
  2. जापान द्वारा भारत पर आक्रमण की सम्भावनायें दिन पर दिन बढ़ती चली जा रही थी। अंग्रेज ऐसी परिस्थितियों में पूर्वी क्षेत्र को खाली कर देने का विचार कर रहे थे। यह भारतीयों के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात था। 5 जुलाई, 1942 ई. के समाचार पत्र पर हरिजन में गाँधी जी ने लिखा था कि अंग्रेजों भारत को जापानी आक्रमण के लिए मत छोड़ो बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ। भारतीय नेताओं का पूर्ण विश्वास था कि अगर अंग्रेज भारत से चले जाये तो जापान भारत पर कभी आक्रमण नहीं करेगा।
  3. जापानी हवाई आक्रमणों से भयभीत होकर अंग्रेजों ने वर्मा खाली करना प्रारम्भ कर दिया। बहुत बड़ी संख्या में भारतीय शरणार्थी भारत लौटे। भारतीय और यूरोपीय शरणार्थियों को भारत लाने के लिए अलग-अलग मार्ग चले थे। जो मार्ग भारतीयों के लिये था वह अत्यधिक असुरक्षित था।
  4. जापानी आक्रमण की सम्भावना को देखते हुए सरकार ने पूर्वी बंगाल में सैनिक स्थिति सुदृढ़ करनी चाहती। बहुत से किसानों की भूमि बलात् छीन ली गई और वहाँ के निवासियों की नावों को नष्ट कर दिया। सरकार ने प्रभावित व्यक्तियों को कोई मुआवजा नहीं दिया जिससे पूर्वी बंगालियों को आर्थिक स्थिति अत्यधिक शोचनीय हो गई।
  5. युद्ध में अपार व्यय का बोझ निर्दोष भारतीय जनता को बहुत करना पड़ रहा था। सरकार ने इस स्थिति में काराज के नोटों को अत्यधिक मात्रा में छापना प्रारम्भ कर दिया। वस्तओं के दाम बए. गये और कागजी मुद्रा पर व्यक्तियों का विश्वास जाता रहा। माध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति इससे और बिगड़ गई।
  6. गाँधी जी को पक्का विश्वास हो गया था कि अंग्रेज भारत की रक्षा जापान आक्रमण के समक्ष नहीं कर सकते हैं। उनका विश्वास और भी दृढ़ हो गया जब अंग्रेजों ने जापानियों के लिये मलाया, सिंगापुर और वर्मा खाली कर दिया। गाँधी जी को यह भी विश्वास था कि अगर अंग्रेज जापानी आक्रमण से पहले ही भारत छोड़ दें तो जापान भारत आक्रमण के विचार को त्याग देगा।

भारत छोड़ो प्रस्ताव 8 अगस्त 1942, क्रिप्स मिशन असफल हो गया था। यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटेन सरकार भारतीयों को प्रशासनिक शक्ति नहीं देना चाहती। कांग्रेस भी यह विश्वास करती थी कि बिना जनप्रिय सरकार की स्थापना के जापानी आक्रमण का समाना नहीं किया जा सकता है। व्यक्तिगत सत्याग्रह को सरकार ने निर्दयता से दबाकर असफल कर दिया था। कांग्रेस के समक्ष इस उग्र आन्दोलन के अलावा कोई अन्य चारा नहीं रहा। गाँधी जी ने ही सर्वप्रथम अपने समाचार-पत्र हरिजन में भारत छोड़ो को जन्म दिया। जुलाई सन् 1942 ई0 को बरधा में कांग्रेस कार्यकारिणी परिषद् ने भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रस्ताव अपने समाचार पत्र हरिजन में भारत छोड़ो विचार आन्दोलन का प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव को 8 अगस्त, 1942 ई० की अखिल भारतीय कांगेस समिति ने स्वीकार कर दिया। 8 अगस्त, 1942 ई० के निर्णय में कहा गया कि भारत से ब्रिटिश राज्य का अन्त होना भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ की सफलता के लिये अत्यन्त आवश्यक है। भारत में ब्रिटिश शासन का लागू रहना भारत को पतित और दुर्बल बताने वाला तत्व है जिससे भारत अपनी सुरक्षा व विश्व स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रभावशाली नहीं हो सकता। भारत पर ब्रिटेन का आधिपत्य एक अभिशाम है। भारत आधुनिक साम्राज्यवाद का उदाहरण है। विश्व के लोग, विशेषकर एशिया और अफ्रीका के निवास भारतीय स्वतंत्रता से इतने अधिक उत्साहित और प्रभावित होंगे कि विश्व की प्रकृति ही पूर्णत: बदल जायेगी। इसलिए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति अत्धयाक जोरदार शब्दों में भारत से ब्रिटिश सत्ता के हट जाने की मांग को दोहराती है। यह माँग न मानी जाने पर महात्मा गाँधी के नेतृत्व में अहिंसात्मक संघर्ष चलाने की आज्ञा देती है। यह आन्दोलन अत्यधिक व्यापक और अहिंसात्मक होगा जब भी सत्ता भारत को प्राप्त होगीवह सारी जनता की होगी।

भारत छोड़ो आन्दोलन का दमन

8 अगस्त, 1942 ई. को यह विख्यात प्रस्ताव कांग्रेस समिति ने स्वीकार कर लिया। 9 अगस्त को कांगस के शीर्षस्थ नेता बन्दी बना लिये गये। महात्मा गाँधी को पूना से आगा खाँ पैलेस में बदी बना रखा गया तथा अन्य नेताओं को अहमद नगर के किले में भेज दिया गया। कांग्रेस के सभी कार्यालय सील कर दिये गय। इसे अवैध संख्या घोषित कर दिया गया।

सरकार का यह क्रूर दमन चक्र था। वास्तव में कांग्रेस समिति ने आन्दोलन चलाने के लिए गाँधी जी को कार्यभारत मात्र सौंपा था। गाँधी जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वे आन्दोलन चलाने के पहले वायसराय और अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों से बातचीत करेंगे तथा उन्हें समझायेंगे। लेकिन स्पष्ट था कि सरकार ने कांग्रेस के इस आन्दोलन को प्रारम्भ होने से पहले ही समाप्त कर देने की योजना बना रखी थी। सरकार ने कांग्रेस के अन्य सदस्यों को भी इसी प्रकार 2, 4 दिन में बन्दी बना लिया जनता नेताहीन हो गई। जनता ने अपने रोष प्रकट करने के लिये हड़ताले, जुलूस और सभाये की सरकार ने इन्हें दबाने के लिये लाङ्गी चार्ज किया। सरकार ने अत्यन्त सखती से इसे दबाना प्रारम्भ किया। करीब 940 व्यक्ति मारे गये 16 सौ से अधिक घायल हुये। जनता ने भी कई रेलवे स्टेशनों को नष्ट कर दिया। टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार काट दिये गये व पूर्वी यू०पी० के एक बड़ी संख्या में हड़ताल में सम्मिलित हुए। ब्रिटिश सरकार ने जनता के अधिकांश भाग का अत्यन्त निर्दयतापूर्वक दमन किया कई ऐसे उदाहरण हैं जिनमें जनता के साथ अमानवीय व्यवहार भी किया गया। करीब 3 महीने तक यह दमन-चक्र चला और कठिनाई से ही विद्रोह को नियन्त्रित किया।

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