गाँधीजी के प्रमुख आर्थिक विचार

गाँधीजी के आर्थिक विचार

गाँधीजी के प्रमुख आर्थिक विचार

गाँधीजी आर्थिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए उनके आर्थिक विचार उनकी रचनाओं तथा भाषणों में इधर-उधर बिखरे हुए मिलते हैं। वे अर्थशास्त्र को जीवन का एक अंग समझते थे इसलिए उनके आर्थिक विचार उनके सामान्य जीवन दर्शन का ही एक भाग है। गाँधीजी के आर्थिक विचार विशेष रूप से चार सिद्धान्तों पर आधारित थे अर्थात् सत्य, अहिंसा, श्रम की महानता और सादगी। प्रो० हक्सले के शब्दों में, “गांधी के सामाजिक एवं आर्थिक विचार मनुष्य के स्वभाव तथा इस ब्रह्माण्ड में उसके अस्तित्व के स्वभाव के वास्तविक मूल्यांकन पर आधारित हैं।” गाँधीजी ने आर्थिक क्षेत्र में व्यक्तियों एवं संस्थानों के पथ-प्रदर्शन के लिए कुछ मौलिक सिद्धान्त प्रतिपादित किये थे। ये सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:

  1. थातेदारी सिद्धान्त (The Trusteeship Doctrine) –

    गाँधीजी के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को उत्तराधिकार में बड़ी सम्पत्ति प्राप्त हुई है या किसी ने उद्योग या व्यापार के लाभ से बड़ी मात्रा में धन एकत्र किया है तो सम्पूर्ण सम्पत्ति उसकी नहीं, वरन् सारे समाज की है। वास्तव जिस व्यक्ति ने उस सम्पत्ति का संचय किया है वह केवल उतने ही ही हिस्से का अधिकारी हैं, जो उसको सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिए आवश्यक है। उस संचित धन का शेष भाग सम्पूर्ण राष्ट्र का है और सभी के कल्याण पर खर्च होना चाहिए। उन्होंने पूँजीपति की तुलना एक चोर से की है, किन्तु वह शक्ति द्वारा (बलात्) धनी व्यक्तियों के विध्वंस के पक्ष में नहीं थे क्योंकि उनका विश्वास था कि समाज में धनी व्यक्तियों का भी महत्त्व है। गाँधीजी का वास्तविक उद्देश्य पूँजीपतियों को सुधारना था और उनको यह बताना था कि जिस धन को उन्होंने एकत्र किया है वे उसके अधिकारी नहीं हैं वरन् उसके थातेदार (Trustee) हैं। वे चाहते थे कि पूँजीपति धन के संचय के दोष को समझे और स्वयं उतना ही प्राप्त करें जो उनकी सेवाओं के लिए उपयुक्त है और शेष धन समाज को लौटा दें। उनको थातेदारी सिद्धान्त में इतना विश्वास था कि वे समझते थे कि इसकी सहायता से संसार में समानता की स्थिति स्थापित हो जायेगी।

  2. औद्योगीकरण (Industrialisation) –

    गाँधीजी बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के कट्टर विरोधी थे। उनका पूरा विश्वास था कि बड़े पैमाने के उत्पादन से ही सामाजिक एवं आर्थिक दोष उत्पन्न हुए थे। मनुष्य के मस्तिष्क शरीर एवं चरित्र के पूर्ण विश्वास के लिए आवश्यक है कि व्यक्तिगत शक्तियों के संचालन के लिए पूरी स्वतन्त्रता हो। मनुष्य मशीनों के उपयोग से आलसी हो जाता है और उसको अपने परिश्रम में कोई रुचि नहीं रहती। वे औद्योगिक अर्थव्यवस्था के विरुद्ध इसलिए थे कि मिल उद्योग तथा यन्त्रों के उपयोग से हिंसा का विस्सार होता है। अतः वे विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था के पक्ष में थे- एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें श्रमिक स्वयं अपना स्वामी हो। ऐसी अर्थव्यवस्था में श्रमिक के शोषण तथा हिंसा के कोई अवसर नहीं होंगे। भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले तथा गरीब देश के लिए मशीनों का प्रयोग लाभप्रद नहीं होगा। अधिक जनसंख्या को काम पर लगाने की दृष्टि से उत्पादन की ऐसी प्रणालियाँ काम में लानी होंगी जिनमें अधिकाधिक श्रमिकों की खपत हो। इसका अभिप्राय यह नहीं कि गाँधीजी मशीनों के उपयोग के विरुद्ध थे। गाँधीजी केवल उसी मशीन के विरुद्ध थे जिनके उपयोग से परिश्रम को बचाने की चेष्टा की जाती है। गाँधीजी भारत के कपड़े के एकमात्र कुटीर उद्योग के नष्ट होने के विरुद्ध थे क्योंकि उनका विश्वास था कि इस उद्योग के फलीभूत होने से हजारों परिवारों को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। अनेक व्यक्तियों ने गाँधीजी को भावुक बताया किन्तु खादी योजना ही उनका धर्म था। गाँधीजी की इस योजना में निम्नलिखित कार्यक्रम सम्मिलित थे –

  • सभी प्राइमरी एवं सेकण्डरी स्कूलों में अनिवार्य रूप से कताई की शिक्षा देना,
  • उन क्षेत्रों में कपास की खेती करना जहाँ कपास अब तक नहीं हो रही है।
  • बहुद्देश्यीय सहकारी समितियों द्वारा कपड़े की बुनाई की व्यवस्था ।
  • सहकारी तथा शिक्षा विभाग, नगर पालिकाओं एवं जिला-बोर्डों और ग्राम पंचायतों के सभी कर्मचारियों को सूत- कताई की परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहिए वरना उनको अयोग्य घोषित कर दिया जाय।
  • मिल द्वारा बनाये हुए सूते से हथकरघे पर बुने हुए कपड़े के मूल्यों को नियन्त्रित किया जाये।
  • जिन क्षेत्रों में हथकरघे पर बुना कपड़ा बहुतायत में है, वहाँ पर मिल के कपड़े के उपयोग पर रोक लगा दी जाये।
  • सभी सरकारी विभागों में हाथ से बने हुए कपड़े का उपयोग किया जाये।
  • पुराने कपड़ों के मिलों के विस्तार को रोक दिया जाये और नये कारखानों को स्थापित न किया जाये।
  • विदेशी सूत अथवा कपड़े के आयात पर प्रतिबन्ध लगा दिये जायें।
  1. विकेन्द्रीकरण (Decentralisation) –

    गाँधीजी एक केन्द्रिक अर्थव्यवस्था के विरुद्ध थे क्योंकि वे समझते थे कि इसकी नींव हिंसा पर रखी गयी थी। अतः उन्होंने विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था का समर्थन किया था। उन्होंने कहा कि उत्पादन को अनेक स्थानों पर छोटे पैमाने पर चालू किया जाये अर्थात् घरों में छोटी-छोटी इकाइयाँ स्थापित की जायें। गाँधीजी कुटीर तथा ग्रामीण उद्योगों के विकास के पक्ष में थे। इसीलिए उनका सुझाव था कि उत्पादन का विकेन्द्रीकरण किया जाये। गाँधीजी विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था को प्रजातन्त्र का जीवन-रक्त समझते थे। भारत में स्वशासन ग्रामीण व्यवस्था जो ब्रिटिश राज्यकाल में समाप्त हो गयी थी, उतनी ही प्राचीन थी जितना हिन्दू दर्शन। गाँधीजी उसी परम्परा को पुनः स्थापित करना चाहते थे क्योंकि उनका विचार था कि उसमें उपभोग एवं वितरण के साथ-साथ ही उत्पादन होता था और उसमें मौद्रिक अर्थव्यवस्था का कुचक्र भी नहीं था। उत्पादन विदेशी बाजारों के लिए न होकर तुरन्त उपभोग के लिए किया जाता था। वास्तव में गाँधीजी का विचार था कि भारी उद्योगों का केन्द्रीकरण इस प्रकार होना चाहिए कि कुटीर उद्योगों को क्षति न पहुँचे और वह राष्ट्रीय-कलापों का एक छोटा अंश बना रहे। उनका विचार था कि ग्रामीण उद्योगों में मशीन का उपयोग धीरे-धीरे बढ़ाया जाये। उन्होंने यह स्वीकार किया था कि बिजली और मोटर यातायात से ग्रामीण उद्योगों के विकास को क्षति नहीं पहुँचती थी।

  2. ग्रामीण सर्वोदय (Rural Sarvodaya) –

    ग्रामीण सर्वोदय गाँधीजी का महान आदर्श था। उनके अनुसार वास्तविक भारत शहरों में न बसकर ग्रामों में था और वे इस वाक्यांश से पूर्णतः सहमत थे कि भारतीय ग्राम गोबर के ढेर पर बने हुए अस्वच्छ मकानों के समूह के समान हैं। ग्रामीण सर्वोदय से उनका अभिप्राय एक आदर्श ग्राम से था जिसमें निम्न बातों का होना आवश्यक है-

  • ग्राम का ढाँचा व्यवस्थित होना चाहिए।
  • वहाँ पर फलों के पेड़ होने चाहिए।
  • एक धर्मशाला एवं एक छोटा अस्पताल होना चाहिए।
  • उसको भोजन एवं कपड़े में स्वावलम्बी होना चाहिए।
  • सड़को तथा गलियों को स्वच्छ रखना चाहिए।
  • पूजा घरों को स्वच्छ तथा सुन्दर होना चाहिए।
  • हर गली में पानी की निकास का प्रबन्ध होना चाहिए।
  • ग्रामों में जंगली पशुओं तथा डाकुओं से सुरक्षा का पूर्ण प्रतिबन्ध होना चाहिए।
  • एक सार्वजनिक भवन, स्कूल, तथा थियेटर के लिए बड़ा कमरा होना चाहिए।
  • पानी की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।
  • खेल के मैदानों, पशुधरों इत्यादि की व्यवस्था होनी चाहिए,
  • यदि भूमि अधिक हो तो तम्बाकू, अफीम जैसी तम्बाकू, अफीम जैसी व्यापारिक फसले की जायें।
  • ग्रामीण गतिविधियों को सहकारी आधार पर संगठित किया जाये।
  • ग्रामीण-व्यवस्था एवं प्रशासन पंचायत द्वारा की जाये।
  • ग्रामीण पंचायतों को न्यायिक, कार्यकारी एवं निधान सम्बन्धी अधिकार होने चाहिए।
  • जाति-प्रथा का अन्त होना चाहिए।

विभिन्न समाजों के कल्याण की तुलना करने में एक समस्या यह है कि जिन सूचकों का साधारणतया उपयोग किया है, उनमें से अनेक मात्र औसत अवस्थाओं को हिसाब से लेते हैं – जैसे कि प्रति व्यक्ति आय। प्रो. सेन ने ऐसे विकल्प तैयार किये हैं जो आय वितरण को भी हिसाब में लेते हैं। प्रो. सेन ने इस बात पर बल दिया है कि वस्तुओं से कल्याण उत्पन्न नहीं होता वरन् उन क्रियाओं से उत्पन्न होता है जिनके लिए उन वस्तुओं को प्राप्त किया जाता है। इस मत के अनुसार, आय का महत्त्व उन अवसरों के करण है जिनको वह उत्पन्न करती है। प्रो. सेन अवसरों की योग्यताएँ भी करा है- ये अनेक कारकों, जैसे, स्वास्थ्य पर निर्भर करती है- इनको भी कल्याण के मापन के समय ध्यान में रखना चाहिए। कल्याण के वैकल्पिक सूचक संयुक्त राष्ट्र का मानव विकास सूचक, इसी को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं।

अमर्त्य सेन के अनुसार खूब सोच-समझकर निर्मित सभी नैतिक सिद्धान्तों की यह कल्पना होती है कि व्यक्तियों में कुछ अर्थ में समानता होती है। किन्तु क्योंकि व्यक्तियों में समान अवसर का उपयोग करने की क्षमता भिन्न-भिन्न होती है, वितरण की समस्या को पूर्णरूपण कभी भी नहीं सुझाया जा सकता। किसी बात में समानता का अर्थ यह है कि अन्य बातों में असमानता अवश्य होनी चाहिए।

हम किस बात में समाननता का समर्थन करते हैं और किन बातों में असमानता को स्वीकार करते हैं, स्पष्ट रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि हम कल्याण के विभिन्न आयामों का मूल्यांकन किस प्रकार करते हैं। कल्याण मापन के अपने दृष्टिकोण के अनुसार सेन का मत है कि व्यक्तियों की क्षमता ही वह प्रमुख आयाम हैं जिसमें समानता के लिए हमें प्रास करना चाहिए। इस नैतिक सिद्धान्त की एक समस्या यह है कि व्यक्ति जो निर्णय लेते हैं, उन्हीं से बाद में चलकर उनकी योग्यता निर्धारित होती है।

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