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भारतीय हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत विवाह-विच्छेद (तलाक)

हिन्दू विवाह अधिनियम में विवाह-विच्छेद

प्राचीन भारतीय समाज में विवाह को एक धार्मिक संस्कार माना जाता था परन्तु आधुनिक भारतीय समाज में विवाह को एक अनुष्ठान स्वीकार किया गया है। अतः यह तर्कसंगत ही था कि विवाह विच्छेद को मान्यता दी जाये। इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय हिन्दू विवाह अधिनियम में विवाह-विच्छेद की व्यवस्था की गई। इस अधिनियम की धारा 13 में उन परिस्थितियों का वर्णन किया गया है जिनके आधार पर विवाह विच्छेद हो सकता है। इन आधारों को तीन भागों में बाँट सकते हैं-

  • वे आधार जो पति एवं पत्नी दोनों को समान रूप से प्राप्त हैं।
  • वे आधार जो केवल पत्नी को प्राप्त हैं।
  • पारस्परिक सहमति से विवाह-विच्छेद।

A. आधार जो पति पत्नी दोनों को समान रूप से प्राप्त हैं

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के लागू होने के पहले या इसके बाद सम्पन्न हुए विवाह में पति या पत्नी निम्नलिखित आधारों पर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं-

  1. जारता-

    विवाह के पश्चात् अपनी पत्नी या अपने पति से भिन्न किसी भी व्यक्तिके संग स्वेच्छा से संभोग किया जाना जारता कहलाती है जो कि विवाह विच्छेद का पर्याप्त कारण हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण संभव नहीं है अतः परिस्थितिजन्य साक्ष्य से साबित किया जाना चाहिए।

  2. क्रूरता-

    हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा ‘13’ में क्रूरता को भी विवाह- विच्छेद के लिए प्रमुख आधार माना गया है। इस धारा के अनुसार मानसिक एवं शारीरिक दोनों प्रकार की क्रूरताओं के आधार पर विवाह-विच्छेद किया जा सकता है। विधिक क्रूरता होने के लिए शरीर के किसी अंग को, जीवन को, स्वास्थ्य को, शारीरिक या मानसिक खतरा हो या होने की युक्तियुक्त आशंका को, आवश्यक माना गया है। जे.एल. नन्दा बनाम श्रीमती बीना के मामले में अभिनिर्धारित किया गया कि पत्नी में मन-मुटाव एवं छोटे-छोटे झगड़े की उत्पत्ति को क्रूरता नहीं कहा जा सकता है। जे. भगत बनाम डी. भगत के मामले में उच्चतम न्यायालय नै अभिनिर्धारित किया कि मानसिक क्रूरता इस प्रकार की होनी चाहिए कि दूसरे पक्षकार के साथ रहना नामुमकिन हो जाये तथा उसके असामान्य व्यवहार के बारे में वह सोच सोच भी न सके कि किस क्षण उसके साथ क्या होने वाला है रमाकान्त बनाम मोहिन्दर लक्ष्मी के मामले में पत्नी द्वारा पति को सार्वजनिक स्थान पर गालियाँ देना तथा उसको अपमानित करना क्रूरता की श्रेणी में आता है।

  3. अभित्याग-

    अभित्यजन से तात्पर्य है विवाह के एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार को बिना उसकी सहमति के और बिना उचित कारण स्थायी रूप से छोड़ देना या त्याग देना है।

  4. धर्म परिवर्तन-

    हिन्दू विवाह अधिनियम में धर्म परिवर्तन को भी विवाह विच्छेद का एक आधार माना गया है। परन्तु अधिनियम में यह व्यवस्था भी दी गई है कि विवाह के एक पक्षकार द्वारा हिन्दू धर्म से पृथक् धर्म स्वीकार कर लेना विवाह-विच्छेद का आधीर है परन्तु इस कारण से विवाह स्वतः समाप्त नहीं होता है जब तक कि दोनों पक्षकारों में से कोई एक विवाह विच्छेद न चाहता हो।

  5. मस्तिष्क विकृतता

    यदि विवाह का एक पक्षकार असाध्य रूप से विकृतचित रहा या लगातार या रुक-रुक कर मानसिक रोग से पीड़ित रहा है तो वह विवाह-विच्छेद हेतु आवेदन दे सकता है। मानसिक विकार का तात्पर्य मानसिक बीमारी, मस्तिष्क का पूर्ण तथा बाधित विकास, मनोविक्षेप अथवा अन्य विकार से है।

  6. कोढ़-

    जहाँ विवाह का एक पक्षकार याचिका प्रस्तुत किये जाने के समय कोढ़ से पीड़ित रहा हो तो यह आधार विवाह-विच्छेद का अधिकार प्रदान करता है।

  7. संसार परित्याग

    संसार से परित्याग करना सिविल मृत्यु मानी जाती है अतः संन्यास ग्रहण करना हिन्दुओं में विवाह विच्छेद का एक आधार है।

  8. यौन विकार

    जहाँ विवाह का दूसरा पक्षकार संचारी यौन रोग से पीड़ित रहा हो याची को विवाह-विच्छेद का अधिकार प्राप्त होता है।

  9. प्रकल्पित मृत्यु

    जहाँ विवाह के एक पक्षकार के बारे में सात वर्ष या उससे अधिक समय से उसके या उसके परिवार द्वारा या सम्बन्धियों द्वारा कुछ सुना नहीं गया हो तो दूसरे पक्षकार को विवाह विच्छेद का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

  10. न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति (संभोग का पुनः आरम्भ होना)-

    यदि कोई पक्षकार अपने विरुद्ध न्यायिक पृथक्करण का आज्ञप्ति पारित होने के पश्चात् एक वर्ष तक या उससे अधिक समय तक सहवास का पुनः आरम्भ नहीं करता तो दूसरे पक्षकार को इस आधार पर विवाह विच्छेद का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

  11. दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यस्थापन की डिक्री

    एक कार्यवाही में जिसमें दोनों पक्ष पक्षकार थे, दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यस्थापना के लिए आज्ञप्ति पारित होने के पश्चात् एक वर्ष या उससे अधिक अवधि तक पक्षकारों के बीच दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यस्थापन नहीं हुआ है।

सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार के मामले में दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापनासमझौता डिक्री होने के एक वर्ष तक पति एवं पत्नी में सहवास नहीं हुआ। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति की बदमाशी के कारण ऐसा नहीं हो सका। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि पति विवाह विच्छेद का अधिकारी है।

B. केवल पत्नी को प्राप्त होने वाले आधार

हिन्दू विवाह अधिनियम में पत्नी को के पृथक अधिकार भी दिये गये हैं, जो अग्रलिखित हैं-

  1. बहु विवाह

    यदि पति ने अधिनियम के लागू होने के पूर्व विवाह कर लिया था अथवा विवाह के पूर्व पति द्वारा विवाह की गई कोई पत्नी विवाह के समय जीवित थी तो प्रथम पत्नी को विवाह-विच्छेद का अधिकार प्राप्त है। परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि दूसरी पत्नी याचिका प्रस्तुत करते समय जीवित हो।

  2. पति द्वारा बलात्कार तथा अप्राकृतिक मैथुन का अपराध

    पति द्वारा विवाह पश्चात् बलात्कार, गुदा मैथुन या पशुगमन का अपराध किया जाता है तो मत्नी विवाह- विच्छेद कराने की अधिकारिणी है।

  3. भरणपोषण की डिक्री

    हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 या दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत पति के विरुद्ध आदेश पारित किया गया है तथा ऐसे आदेश या डिक्री के । वर्ष या उससे अधिक समय तक दोनों ने सहवास प्रारम्भ नहीं किया है तो पत्नी ऐसी स्थिति में विवाह-विच्छेद करा सकती है।

  4. यौवन का विकल्प

    जहाँ किसी स्त्री का विवाह 15 वर्ष की आयु पूरी होने के पूर्व हो गया है और उस आयु को पूरा करने के बाद किन्तु 18 वर्ष की आयु के पूर्व विवाह को निराकृत कर दिया गया है तो विवाह-विच्छेद करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

C. पारस्परिक सहमति से विवाह विच्छेद

हिन्दू विवाह विधि (संशोधन) अधनियम, 1976 की धारा 13 (ख) यह व्यवस्था दी( गयी है कि विवाह के दोनों पक्षकार आपसी सहमति से विवाह विच्छेद कर सकते हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि विवाह के दोनों पक्षकारों एक विवाह के विघटन के लिए याचिका जिला न्यायालय में इस आधार पर प्रस्तुत करें कि वे 1 वर्ष या उससे अधिक समय से अलग रह रहे हैं, तथा वे अब एक साथ नहीं रह सकते हैं तथा आपस में यह निश्चित कर चुके हैं कि विवाह विघटित कर दिया जाय। ऐसी याचिका प्रस्तुत किये जाने की तिथि से छः माह के पश्चात् 18 माह के भीतर दोनों पक्षकारों को सुनने के पश्चात् और ऐसी जाँच जैसा वह ठीक समझे, करने के पश्चात् अपना यह समाधान कर लेने पर कि विवाह सम्पन्न हुआ है और याचिका में वर्णित तथ्य सत्य हैं, यदि इस बीच याचिका वापस नहीं ली गई है तो वह घोषणा कर विवाह-विच्छेद का आज्ञप्ति प्रदान कर सकेगा।

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