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सहदायिक के संपत्ति अधिकार

सहदायिक के सम्पत्ति अधिकार

सहदायिकी – सहदायिकी एक ऐसी संस्था है, जिसमें पिता, ता, पुत्र, प पौत्र एवं प्रपौत्र सम्मिलित होते हैं। इसमें स्त्री सहदायिकी की सदस्यता नहीं होती है। जो सम्पत्ति सहदायिक सदस्यों द्वारा संयुक्त रूप से अर्जित की जाती है उसे सहदायिकी सम्पत्ति कहते हैं। सहदायिकी में स्वामित्व की एकता होती है। सहदायिकी सम्पत्ति में पुत्री को पुत्र के बराबर हक दे दिया गया है।

सहदायिकी सम्पत्ति में सहदायिक के निम्नलिखित अधिकार हैं-

  1. जन्मतः अधिकार-

    सहदायिकी सम्पत्ति में प्रत्येक सहदायिक का जन्म से अधिकार होता है। हिन्दू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत पुत्री भी सहदायिकी सम्पत्ति में जन्मतः अधिकार प्राप्त करती है।

  2. संयुक्त कब्जा या संयुक्त उपभोग का अधिकार-

    सहदायिकी सम्पत्ति में कोई भी व्यक्ति पूर्ण कब्जा का लाभ नहीं प्राप्त कर सकता है। इसमें किसी भी दायभागी का हिस्सा निर्धारित नहीं होता है। समस्त लाभ इकट्ठा जमा होता है और वह संयुक्त परिवार के आय-व्यय में दिखाया जाता है।

किन्तु कर्ता कोई निश्चित अंश को किसी को दे सकता है और इस प्रकार वह व्यक्ति अपना पोषण उस सम्पत्ति से कर सकता है और उसके अलावा जो भी बचेगा वह उसकी पृथक् सम्पत्ति होगी।

  1. सामुदायिक स्वत्व और बचत के अधिकार –

    किसी भी सहदायिक का सहदायिकी सम्पत्ति या उसकी आय में निश्चित भाग नहीं होता है। सम्पूर्ण आय एकत्रित की जाती है और अविभाजित परिवार के सदस्यों द्वारा उपभोग की जाती है। कामता नात्सियार बनाम शिवगंगा के. रजा के मामले में प्रिवी काउन्सिल ने कहा है कि “परिवार के सभी सदस्यों में सामुदायिक लाभ और उपभोग की एकता होती है।“

लेकिन कर्ता जिस आय को स्वयं सुरक्षित रखता है, उसमें से किसी सदस्य को कोई विशेष सम्पत्ति दे सकता है। इस आय और सम्पत्ति से खरीदी गयी सम्पत्ति किसी सदस्य की पृथक् सम्पत्ति हो जाती है। गिरिजा नन्दिनी बनाम ब्रजेन्द्र

  1. संयुक्त कब्जे का अधिकार-

    प्रत्येक दायभागी संयुक्त कब्जे व उपभोग का अधिकारी होता है। बिना किसी प्रकार के विभाजन का दावा किये वह उपभोग कर सकता है।

  2. विभाजन करने का अधिकार

    प्रत्येक सहदायिक को सहदायिकी सम्पत्ति में अपने हित का विभाजन करने का अधिकार है।

  3. अनधिकृत कार्य को रोकने का अधिकार

    दायभागी किसी ऐसे कार्य को किये जाने से रोक सकता है जो उसके उपभोग में किसी प्रकार की रुकावट डाले या जिससे सहदायिकी सम्पत्ति में कुछ गड़बड़ी हो।

  4. हिसाब लेने का अधिकार

    कोई भी दायभागी संयुक्त परिवार के कर्ता से अपना हिसाब माँग सकता है और संयुक्त परिवार का विधि भी जान सकता है।

  5. भरणपोषण एवं निवास का अधिकार

    प्रत्येक सहदायिक को भरण-पोषण एवं आवास का अधिकार है।

  6. उत्तरजीविता का अधिकार

    हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के पूर्व किसी सहदायिक की मृत्यु होने पर उसकी सम्पत्ति उसके उत्तराधिकारियों को न्यागत न होकर, उसके सहदायिकों को प्राप्त होता था।

हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 द्वारा प्रतिस्थापित हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 6 (3) के अनुसार जहाँ हिन्दू की मृत्यु हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ के बाद होती है वहाँ मिताक्षरा विधि द्वारा, यथा निगमित होगा और सहदायिकी सम्पत्ति विभाजित की गई मानी जायेगी मानों विभाजन उसकी मृत्यु से पूर्व हुआ था।

  1. अन्तरण का अधिकार

    कोई भी दायभागी अन्य दायभागियों की सहमति से अपना अविभाजित हिस्से का उपहार, बन्धक का विक्रय द्वारा अन्तरण कर सकता है। बम्बई और मद्रास में तो बिना दायभागियों के सहमति के भी कोई दायभागी अन्तरण कर सकता है। कोई भी दायभागी अब इच्छा-पत्र द्वारा अपने अविभाजित भाग में निस्तारित कर सकता है। (धारा 30) सहदायिक द्वारा संयुक्त परिवार की सम्पत्ति के अन्तरण के सम्बन्ध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शम्भू बनाम रामदेव के वाद में यह अभिनिर्धारित किया है कि सहदायिक द्वारा संयुक्त परिवार की सम्पत्ति तभी अन्तरित की जा सकती है जबकि वह परिवार के लाभ के लिए, अथवा पूर्वकालिक ऋण की अदायगी के लिए अथवा विधिक आवश्यकता के लिए हो, यदि ऐसा नहीं है और इसके खिलाफ अन्तरण किया जाता है तो वह पूर्णरूपेण शून्य होगा।

  2. सहदायिक सम्पत्ति में हित त्याग करने का अधिकार

    एक सहदायिक सहदायिकी में अपना हित किसी अन्य सहदायिक या सभी सहदायिक के पक्ष में त्याग सकता है।

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