वणिकवाद / वाणिज्यवाद (Mercantilism)

वणिकवाद (Mercantilism)

वणिकवाद क्या है ?

15वीं शताब्दी के आरम्भ में हमको कुछ ऐसे निश्चित चिन्ह दिखाई देते हैं जिनके आधार पर कह सकते हैं कि अर्थशास्त्र का जन्म एक उमड़ते हुए विज्ञान के रूप में हो चुका था। उस समय तक लोगों ने अपनी आर्थिक समस्याओं के आर्थिक पहलुओं को समझना आरम्भ कर दिया था और वे आर्थिक सिद्धान्तों के निर्माण में भी रुचि लेने लगे थे। इन तीन शताब्दियों (15वीं, 16वीं तथा 17वीं) में अर्थशास्त्र की एक धुँधली-सी रूपरेखा निर्धारित हो चुकी थी। इस समयावधि के दौरान राज्य की नीतियों एवं राजनीति में आर्थिक मुद्दों को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। इस काल में जो आर्थिक विचार प्रचलित थे, उनको सामूहिक रूप से ‘वणिकवाद’ का नाम दिया गया है। वणिकवाद मध्यकालीन जीवन के विरोध में एक क्रान्ति था। लैकचमैन के अनुसार, “रोड़े अटकाने वाले मध्यकालीन विचार और व्यवहार के विरुद्ध एक युद्ध था।’

वणिकवाद उन सिद्धान्तों, नीतियों और रीति-रिवाजों की ओर संकेत करता है जो तात्कालिक परिस्थितियों के कारण उत्पन्न हुए थे और जिनके द्वारा राष्ट्रीय राज्य आर्थिक क्षेत्र में अपनी शक्ति, धन और समृद्धि बढ़ाने का प्रयत्न कर रहा था। आर्थिक क्षेत्र में व्यापार और वणिज्य का महत्त्व बढ़ता जा रहा था। अब एक नया वर्ग उत्पन्न हो गया था जिसे व्यापारी वर्ग कहा जाता था। व्यापारी तथा राजा दोनों के हित समान थे। राजा को धन और शक्ति की आवश्यकता केवल अपने लिए ही नहीं, वरन् अपने जनता के कल्याण के लिए भी थी। व्यापार को ही इस उद्देश्य की पूर्ति का एक उत्तम स्रोत माना गया था। मध्यकालीन व्यवस्था ने जो व्यापार को स्थानीयता की जंजीरों में जकड़ रखा था, मुक्त हो गयी और मध्यकालीन युग की गतिहीन, आर्थिक एवं सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न कर दिया था। हीमैन के अनुसार, ‘वणिकवाद’ व्यापारिक पूँजीवाद का दूसरा नाम था जिसकी स्थापना आदर्शवादी सिद्धान्तों के अनुसार हुई थी।

वणिकवाद के आर्थिक विचारों की आलोचना

वणिकवाद का विरोध 17वीं शताब्दी के अन्त में ही प्रारम्भ हो चुका था। वास्तव में, इसका पतन उसी समय आरम्भ हो गया था जबकि अधिक उदार विचार वाले वणिकवादियों, फ्रांस में काल्बर्ट और इंग्लैण्ड में पैटी, लॉक और नार्थ ने राजा की नीतियों के विरुद्ध आवाज उठानी आरम्भ कर दी थी। पैटी ने व्यापार की स्वतन्त्रता की वकालत की और रूढ़िवादी वणिकवादियों के मुद्रा तथा मूल्य-सम्बन्धी सिद्धान्तों के सम्पूर्ण ढाँचों को तहस-नहस कर दिया। लॉक ने व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लाभ को दर्शाया और वणिकवाद की मौलिक अवधारणा को चुनौती दी। नार्थ सबसे अधिक कट्टर तथा तीखा आलोचक था। उसने घरेलू व्यापार, कृषि तथा उद्योगों को महत्त्व दिया। उसका कहना था कि केवल सोना व चाँदी ही धन नहीं होते। वह इसके पक्ष में भी न था कि व्यापारियों के विशेष समूह को विशेष अधिकार दिया जाय। संक्षेप में, वह एक स्वतन्त्र विचारक था।

रोजर कोक, निकोलस बरबॉन और चार्ल्स देवना ने भी वणिकवाद की आलोचना की। विदेशी व्यापार पर सरकारी नियन्त्रण के विरुद्ध अशान्ति की जो ज्वाला भड़क रही थी, उसे इन लेखकों ने और भी उत्तेजित कर दिया। वणिकवाद के आलोचक फ्रांस में विशेष रूप से बहुत अधिक थे और इसकी आलोचना भी फ्रांस में ही अधिक हुई थी। वास्तव में काल्बर्ट की नीतियों से कृषि की दशा बिगड़ गयी थी पर बहुत अधिक बढ़ गयी और राजदरबार का पतन हो गया था। 17वीं शताब्दी में फ्रांस में प्रकृतिवादियों ने वणिकवाद की आलोचना थी और नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया। 18वीं शताब्दी के अन्त में एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘Wealth of Nations’ के एक-चौथाई भाग में केवल वणिकवाद की ही आलोचना की। उसने वणिकवादी नेताओं और सिद्धान्तों के विरुद्ध निम्नलिखित आरोप लगाये –

  1. अन्य वस्तुओं के महत्त्व को गिराकर केवल सोने व चाँदी को ही महत्त्व दिया गया।
  2. कृषि तथा मानव श्रम के अन्य रूपों की अपेक्षा केवल व्यापार एवं उद्योग पर ही जोर दिया गया। उनका यह सोचना भ्रमपूर्ण था कि अनुकूल व्यापार-सन्तुलन ही देश की सम्पन्नता का एकमात्र साधन होता है।
  3. यह विश्वास भी गलत था कि व्यापार एक राष्ट्र के लाभ से आवश्यक रूप से दूसरे राष्ट्र की हानि होती है।
  4. मूल्य तथा उद्योग सम्बन्धी विचार उलझे हुए थे।
  5. पूँजी तथा ब्याज सम्बन्धी विचार भी अपूर्ण थे।
  6. यह विचार कि व्यक्ति और राज्य दोनों के हित एक-दूसरे के विपरीत होते हैं, संकीर्ण दृष्टिकोण का परिचायक है।

रोशर के अनुसार वणिकवादियों ने इन बातों को अत्यधिक महत्त्व देकर ठीक नहीं किया था:

  1. एक बड़ी और घनी जनसंख्या,
  2. देश में मुद्रा की मात्रा,
  3. विदेशी व्यापार,
  4. निर्माण उद्योग,
  5. राज्य।

अतः स्पष्ट है कि वणिकवादी प्रणाली के अपने ही दोष थे। आर्थिक नीति के रूप में उसमें सर्वव्यापकता की कमी थी और सिद्धान्त के रूप में यह तात्कालिक राजनीतिज्ञों का सही मार्गदर्शन नहीं कर पाया था। इसलिए कुछ आलोचनाएँ अवश्य ही न्यायपूर्ण थी। उन्होंने बहुमूल्य धातुओं की अत्यधिक महत्त्व देकर उद्देश्यों तथा साधनों के बीच गड़बड़ी सी उत्पन्न कर दी थी। राष्ट्र की उत्पादकता को बढ़ाने के जोश में उन्होंने यह समझा कि सम्पदा और उसको उत्पन्न करने वाला श्रम ही मानव-अस्तित्व का अन्तिम लक्ष्य होना चाहिए। इसके अतिरिक्त उनका यह समझना कि व्यापार में केवल एक देश का ही लाभ होता है, स्पष्ट रूप से इस बात का परिचायक है कि उनको यह तनिक भी ज्ञान नहीं था कि व्यापार से सभी देशों को लाभ पहुँचता है।

प्रो0 ग्रे ने ठीक ही कहा है कि ये आलोचनाएँ दो गलतफहमियों के कारण हुई थी :

प्रथम, आलोचकों ने यह समझा था कि उनके सिद्धान्तों का एकमात्र उद्देश्य व्यापार सन्तुलन सम्बन्धी सिद्धान्त में ही निहित था।

द्वितीय, उन्होंने यह समझकर भी गलती की थी कि वणिकवादियों के लिए केवल सोना और चाँदी महत्त्वपूर्ण थे, अपेक्षाकृत उन वस्तुओं के जो उनके द्वारा खरीदी जा सकती थी। उस समय की परिस्थिति को देखते हुए उन्होंने जो कुछ कहा, वह ठीक ही था और उनको केवल उतना ही कहना था कि सोने और चाँदी द्वारा शक्ति प्राप्त की जा सकती थी। वे निर्यातों पर अधिक बल देते थे क्योंकि वे चाहते थे कि प्रत्येक देश स्वावलम्बी बने ।

सारांश में उन्होंने जो कुछ कहा, उस युग की समस्याओं को देखकर उचित ही था और प्रो0 ग्रेने जैसा कि कहा है कि “वणिकवादी निश्चित रूप से ऐसे मूर्ख नहीं थे जैसे कि 19वीं शताब्दी के मध्यकाल में समझे जाते थे। वणिकवादी व्यावहारिक व्यक्ति थे, वे अर्थशास्त्रियों का एक सम्प्रदाय नहीं थे।”

वणिकवादी केवल व्यावहारिक प्रबन्धक और व्यापारी ही नहीं थे, उन्होंने कुछ ऐसे व्यवहार भी प्रस्तुत किये जिनके द्वारा आधुनिक काल में विभिन्न आर्थिक सिद्धान्तों की रचना हुई है।

कीन्स ने वणिकवादियों की एक जगह प्रशंसा करते हुए लिखा है कि “निवेश के प्रलोभन की अपेक्षा बचत करने की प्रवृत्ति सदैव ही मानव जाति के इतिहास में अधिक शक्तिशाली रही है। इस बात को ध्यान में रखे बगैर वणिकवादी सिद्धान्तों का अध्ययन करना असम्भव है क्योंकि उनके सिद्धान्त व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित थे। मानव व्यवहार की इसी कमजोरी ने सभी युगों में आर्थिक समस्याओं को जन्म दिया था।” कीन्स ने वणिकवादी सिद्धान्तों में कुछ मौलिक सच्चाइयों को मालूम किया था, उदाहरणार्थ, मुद्रा केवल निवेश का माध्यम ही नहीं, वरन् मूल्य के संचय का माध्यम इसीलिए कीन्स ने कहा था कि “राज्य शासन की कला, जिसका सम्बन्ध सम्पूर्ण आर्थिक प्रणाली तथा समस्त साधनों के आदर्शतम उपयोग से होता है, के योगदान के रूप में 16वीं शताब्दी में प्रारम्भिक आर्थिक विचारकों ने जो विधियाँ अपनायी थीं, वे व्यावहारिक बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण थी जिनको रिकार्डो की अव्यावहारिकता ने भूला दिया था।”

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