वणिकवाद / वाणिज्यवाद के उदय के मूल कारक

वणिकवाद के उदय के मूल कारक

वणिकवाद के उदय के मूल कारक

कीन्स के अनुसार कोई भी लेखक अपने आपको पूर्ण रूप से अपने युग और देश की परिस्थितियों के प्रभावों से मुक्त नहीं कर सकता और न ही यह वांछनीय है कि वह ऐसा करें। अतः भूतकाल में प्रतिपादित किये गये सिद्धान्तों को उस समय तक न तो भली प्रकार समझा ही जा सकता है और न उसकी उपयुक्तता भली-भाँति जाँची जा सकती है जब तक उन तात्कालिक घटनाओं को ध्यान में न रखा जाय जिन्होंने व्यक्तियों की दृष्टि को आकर्षित किया था और उनके विचारों को प्रभावित किया था।

वणिकवादियों के सिद्धान्तों को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम पहले उन सामाजिक, राजनीतिक, कृषि और विज्ञान सम्बन्धी परिस्थितियों को समझ लें जो यूरोप में 13वीं और 14वीं शताब्दियों में हो रहे थे।

  1. आर्थिक कारक (Economic Factors) –

    15वीं शताब्दी के अन्त में समाज के आर्थिक ढाँचे में काफी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे। घरेलू अर्थव्यवस्था के स्थान पर विनिमय अर्थव्यवस्था की स्थापना हो रही थी। कृषि के स्थान पर निर्माण उद्योगों का जोर बढ़ता जा रहा था। उस समय विनिमय का क्षेत्र विस्तृत हो रहा था और आन्तरिक एवं विदेशी विनिमय तेजी से बढ़ रहा था। मुद्रा के उपयोग में भी दिन-दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही थी। कृषि उत्पादन की सामान्तवादी जड़ खोखली होती जा रही थी जिसके परिणामस्वरूप सामन्तवादियों की व्यक्तिगत अर्थव्यवस्था को बहुत आघात पहुँचा था। उनकी आय कम हो गयी थी और उनको व्यापार तथा निर्माण उद्योगों में भाग लेने के लिए विवश होना पड़ा था। स्थानीय एकाधिकार और गिल्ड प्रणाली भी छिन्न-भिन्न हो गयी थी।

अर्थव्यवस्था में निर्माण उद्योगों का महत्त्व बढ़ जाने के कारण नये वर्ग अर्थात् श्रमिक वर्ग को जन्म मिला था। इस वर्ग की भी अपनी समस्याएँ थीं। औद्योगिक उत्पादन का आकार अब अधिकतर उपयोगिता के आधार पर निश्चित किया जाने लगा था। ऐसे वातावरण में विशेषज्ञों की अधिकाधिक आवश्यकता अनुभव होने लगी थी। विनिमय तथा व्यापार क्षेत्रों में प्रगति के कारण मुद्रा की आवश्यकता भी बढ़ गयी थी और उसकी पूर्ति नये संसार के अवतार के फलस्वरूप स्वर्ण और चाँदी के प्राप्त होने से भली-भाँति हो गयी थी। मूल्य बढ़ते जा रहे थे। जिसके कारण सरकारों तथा श्रमिकों की आवश्यकताएँ इस सीमा तक बढ़ गयी थी कि उनको आय प्राप्त करने के लिए अधिकाधिक करारोपण का सहारा लेना पड़ा। निःसन्देह ही उद्योगों एवं वाणिज्य प्रगति ने सरकार को इस दिशा मे बड़ी सहायता प्रदान की थी। इन्हीं सब बातों के कारण मुद्रा का महत्त्व और भी अधिक हो गया था। इन्हीं परिवर्तनों के साथ-साथ जनसंख्या में भी वृद्धि हुई। परिवहन के सस्ते साधन भी उपलब्ध हुए और कृषि की उन्नत विधियों का भी उपयोग हुआ। वणिकवादी विचारधारा अधिकांशतया इन्हीं सब परिवर्तनों का परिणाम थी।

  1. राजनीतिक कारक (Political Factors) –

    राजनीति के क्षेत्र में सर्वप्रथम सामन्तवाद को स्थान राष्ट्रवाद ने ले लिया और उसके बाद निरंकुश साम्राज्य की स्थापना हुई। सामन्तवाद एक कमजोर केन्द्रीय सरकार की आवश्यकता है। जबकि कृषि प्रधान सभ्यता एक ऐसी स्थिति है जिसमें सैनिक कार्यकलापों का असाधारण महत्त्व होता है। क्षेत्रों तथा व्यक्तियों का आर्थिक विशिष्टीकरण जो मुद्रा प्रधान है, अपेक्षाकृत कम ही होता है। परिणामतः मध्यकालीन युग में सैनिकों एवं पादरियों का बोलबाला था और निर्धनता अपनी चरम सीमा पर थी। बोनर के अनुसार, “आधुनिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था का उदय करारोपण के आरम्भ के साथ हुआ, जो राज्य के निर्वाह का एक साधन था और करारोपण निरंकुश साम्राज्य की स्थापना के साथ आरम्भ हुआ था।” विचारों के इन परिवर्तनों ने दो समस्याओं को जन्म दिया था। राष्ट्रीय स्तर पर स्थानीय इकाइयाँ और केन्द्रीय सरकार की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से टकरा रही थी, जिसके कारण वणिकवाद लेखकों ने जीवन में मुद्रा, आर्थिक प्रयत्नों तथा मितव्ययता के महत्त्व को दर्शाया क्योंकि कैथोलिकवाद का उद्देश्य था कि मनुष्य को सभी भौतिक वस्तुओं से दूर रहना चाहिए। प्रोटेस्टेण्टवाद में व्यक्तिगत और वैयक्तिक स्वतन्त्रता के विचार निहित थे। इसका परिणाम यह हुआ कि यूरोप में राजा और व्यापारी वर्ग ने प्रोटेस्टेण्ट धर्म अपनाया और रोमन चर्च से नाता तोड़कर अपने अलग चर्च स्थापित किये। रोम चर्च के सत्ता की जड़ें खोखली हो गयी और राजा का प्रतिद्वन्द्विता नष्ट हो गयी। यह एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था। मध्यकालीन युग में चर्च सबसे बड़ा भू-स्वामी था किन्तु राजा को आय या तो सामन्तवादियों स्वामियों से प्राप्त होती है या अपनी रियासतों से। अब राजा ने कर लगाना आरम्भ कर दिया था और वेतनभोगी सैनिक नियुक्त किये थे। इसके अतिरिक्त वाणिज्य तथा व्यापार से प्राप्त होने वाली आय केवल राजा को ही मिलती थी और उसके प्रतिद्वन्द्रियों को इससे कोई लाभ नहीं होता था। इन सब धार्मिक परिवर्तनों के कारण भी वणिकवादी विचारधारा का प्रादुर्भाव हुआ।

  2. सांस्कृतिक परिवर्तन (Changes in Cultural Aspects) –

    सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी यूरोप में तेजी से परिवर्तन हो रहे थे। कला-कौशल तथा विद्या सम्बन्धी जागृति ने भी व्यक्तियों को नयी रोशनी तथा नयी जानकारी प्रदान की थी। मध्यकालीन युग के धार्मिक उपदेशों का सार था कि मनुष्यों को सांसारिक दुःख के लिए चिन्तित नहीं होना चाहिए क्योंकि इनकी क्षतिपूर्ति तो स्वर्गिक आनन्दों से हो जायेगी। परन्तु कला-कौशल सम्बन्धी जागृति और यूरोप के धार्मिक विप्लव ने लोगों को इस बात की जानकारी करायी थी कि मनुष्य का जीवन स्वर्ग के जीवन की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है। कलाकारों, दार्शनिकों और विचारकों ने इन नये विचारों को अनन्त जीवन प्रदान करने की चेष्टा की। इरेसमस बैकन और रेबलेस जैसे दार्शनिक, लियोनार्डो द विंसी और माइकल ऐंजिलो जैसे कलाकार अपने-अपने क्षेत्र में मार्गदर्शन कर रहे थे। टामस मोरे ने ‘Utopia’ में एक आदर्श समाज का चित्रण किया था। परिणामतः मुद्रा की स्थिति और निरंकुश साम्राज्य की स्थापना पर बल दिया था। उस युग के विचारों का स्पष्ट वर्णन हमें मैकियावेली की पुस्तक ‘The Prince’ जीन बोडिन की पुस्तक `Six Livres de la Republic’ में मिलता है। इन लेखकों ने इस बात को भली प्रकार समझ लिया था कि आर्थिक एकता के बिना राजनीतिक एकता सम्भव न थी। इनके अनुसार निरंकुशता ही इन गड़बड़ियो को दूर कर सकती थी। आर्थिक परिवर्तनों के कारण समाज में व्यापारी वर्ग का भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान हो गया था और ऐसा होना स्वाभाविक भी था। राजाओं ने सोना और चाँदी प्राप्त करने के लिए अन्य राष्ट्रों तक अपना व्यापार बढ़ाना आरम्भ कर दिया। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के अतिरिक्त विभिन्न राज्यों में इस बात की होड़ सी लगी हुई थी कि कौन ज्यादा शक्तिशाली था। इसके लिए विभिन्न राज्यों ने बड़े-बड़े जहाजी बेड़ों की स्थापना की। शुल्क तथा जहाजी-बेड़ों के कार्य संचालन सम्बन्धी नियमों का बड़ी स्वतन्त्रता से उपयोग किया जाने लगा। सेनाओं की व्यवस्था तथा पोषण के लिए राजा को धन की आवश्यकता थी जो केवल अनुकूल व्यापार सन्तुलन द्वारा ही प्राप्त हो सकता था। राजनीतिक दृष्टिकोण से यूरोप एक संकटकालीन स्थिति से गुजर रहा था और यह स्थिति न केवल सरकार के स्वरूप से ही सम्बन्धित थी बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में भी विद्यमान थी। अनेक वणिकवादी लेख इन्हीं बदलती परिस्थितियों के परिणाम भी थे और कारण भी।

  3. धार्मिक कारण (Religious Factors)-

    16वीं शताब्दी में धार्मिक विप्लव (The Reformation Movement) ने रोमन चर्च के प्रभुत्व के विरुद्ध आवाज उठायी और राजनीतिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में पोप की अन्तर्राष्ट्रीय सत्ता को चुनौती दी। प्रोटेस्टेण्टवाद ने ईसाई धर्म की अधिक तर्कसंगत व्याख्या की और मानवीय सम्बन्धों में उसने एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था। साथ ही भौतिकवादी शक्तियों को भी बढ़ावा मिला।

  4. वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक परिवर्तन (Changes in Science and Technology)-

    विज्ञान तथा तकनीकी के क्षेत्र में भी तीव्र परिवर्तन हुए थे और नये-नये आविष्कारों को जन्म मिला। इन परिवर्तनों ने वणिकवादी विचारों तथा नीतियों को और भी बल प्रदान किया गया। नये आविष्कारों में कम्पास तथा छापाखाना का आविष्कार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। अब जहाजरानी अधिक सुविधाजनक हो गयी और नये-नये महाद्वीपों की खोज हुई। परिणामस्वरूप व्यापार का क्षेत्र विस्तृत हुआ और क्षेत्रीय विशिष्टीकरण को भी बढ़ावा मिला। कनिंघम के अनुसार व्यापार का विस्तार आधुनिक दिशाओं में होने लगा था और व्यापारियों को अपनी पूँजी का उपयोग करने की स्वतन्त्रता अधिक थी। पूँजी का उपयोग अधिक लाभप्रद क्षेत्र में किया जाने लगा। नक्शों, चार्टों, तालिकाओं इत्यादि में निरन्तर सुधार किये गये। रोशनीघर स्थापित किये गये और नये-नये बन्दरगाहों का विकास हुआ। इन सबका परिणाम यह हुआ कि एक ओर यातायात व्यय कम हो गया और दूसरी ओर विदेशी व्यापार का क्षेत्र विस्तृत हो गया। उपर्युक्त कारणों ने वणिकवादी विचारधारा को फलीभूत होने के लिए अनुकूल था।

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