स्वराज्य पार्टी की स्थापना के कारण

स्वराज्य पार्टी की स्थापना के कारण

स्वराज्य पार्टी की स्थापना

असहयोग आन्दोलन के समय कांग्रेस तथा भारतीय जनता ने अभूतपूर्व के साथ ब्रिटिश शासन से संघर्ष किया था लेकिन 1922 में अहसयोग आन्दोलन के अकास्मिक स्थगन के साथ भारतीय जन मानस एवं कांग्रेस दल में निराशा छा गयी। सभी बड़े नेताओं को बंदी बना लिये जाने के कारण अब ऐसा कोई नहीं था जो जनता का नेतृत्व कर सकता।

इस परिवर्तित स्थिति के मूल्यांकन और भविष्य मार्ग निर्धारण के लिए ‘असहयोग समिति’ ने देश भर का दौरा किया। इस दौरे के बाद समिति के सदस्यों द्वारा जो सिफारिश प्रस्तुत की गयीं, उन सिफारिशों में 1919 के अधिनियम के आधार पर निर्मित परिषदों में प्रवेश के संबंध में समिति के सदस्यों का तीव्र मतभेद सामने आया। डॉ. एम.ए, अन्सारी, राजगोपालचारी तथा एस० कस्तूरी रंगा अय्यर की सिफारिश थी कि कांग्रेस के सदस्य परिषदों की सदस्यता प्राप्त न करें और परिषदों का बहिष्कार जारी रखा जाय। इसके विरुद्ध हकीम अजमल खाँ, पं० मोती लाल नेहरू और विट्ठल भाई पटेल का मत था कि असहयोग आन्दोलन विफल हो गया है तथा इस परिवर्तित स्थिति में सत्याग्रही पंजाब तथा खिलाफत सम्बन्धी सरकार की भूलों को सुधारने हेतु तुरन्त स्वराज्य की माँग के आधार पर निर्वाचनों में भाग लें। यदि ये परिषदों में बहुमत प्राप्त कर लें तो सरकार के प्रत्येक कार्य में विरोध करें और वहाँ स्वराज की माँग के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करें, यदि उन्हें परिषदों की किसी भी कार्यवाही में भाग नहीं लेना चाहिए। हकीम अजमल खाँ, पं० मोती लाल नेहरू तथा विठ्ठल भाई पटेल के इस विचार का मूल रूप में असहयोग आन्दोलन के स्थान के तत्काल बाद देशबन्धु चित्तरंजन दास द्वारा प्रतिपादन किया गया था। देशबन्धु चित्तरंजन दास ने कारावास अवधि में ही स्वराज्य दल की स्थापना की एक योजना बना ली थी तथा जुलाई 1922 में जेल से मुक्त होने पर उन्होंने ‘कौंसिल प्रवेश’ के पक्ष में प्रचार प्रारम्भ कर दिया।

नया अधिवेशन (1922)

1922 में ही कांग्रेस में दो वर्गों का निर्माण हो गया था एक ओर चक्रवर्ती राजगोपालचारी, डॉ. अंसारी, तथा कस्तूरी रंगा अय्यर थे, जो गाँधीजी की नीतियों के समर्थक व कौंसिल प्रवेश के विरोधी थे। इनका विचार था कि वर्तमान परिस्थिति में कांग्रेस के द्वारा सुझाये गये रचनात्मक कार्य किये जाने चाहिए। दूसरी ओर देशबन्धु चित्तरंजनदास, मोतीलाल नेहरू, हकीम अजमल खाँ और विट्ठल भाई पटेल थे, जिनका विचार था कि परिषदों में प्रवेश कर स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

नवम्बर 1922 में कलकत्ता में कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति की बैठक हुई। समिति की इस बैठक में कौंसिल प्रवेश का प्रस्ताव रखा गया। बैठक में देशबन्धु के कौंसिल प्रवेश’ के प्रस्ताव को, जिसका समर्थन मोतीलाल कर रहे थे, दो तिहाई प्रतिनिधियों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। परन्तु इसी बीच मुहर्रम के दंगे हो गये और कांग्रेस कौंसिल प्रवेश की ओर झुकती दिखायी दी। 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन के सभापति श्री चित्तरंजनदास चुने गये। सभापति ने कहा कि व्यवस्थापिका सभाओं में घुसकर विरोध द्वारा सरकार से असहयोग करना असहयोग कार्यक्रम का ही एक अंग है। इसका विरोध श्री राजगोपालचार्य ने किया और जब कौंसिल प्रवेश का प्रस्ताव मतदान के लिए रख गया; तो इसे विपक्ष में 1,748 मत पड़े, जबकि पक्ष के केवल 890 मत पड़े। इस प्रकार अपरिवर्तनवादियों की विजय हुई। श्री चित्तरंजनदास ने अधिवेशन के अन्दर ही कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के सभापतित्व से त्याग-पत्र दे दिया। कांग्रेस के महामन्त्री श्री मोती लाल नेहरू ने भी त्याग-पत्र दे दिया श्री चित्तरंजनदास ने उस समय यह भी घोषणा की बहुमत उनके कार्यक्रम को अपनायेगा।

स्वराज्य दल की स्थापना

1 जनवरी, 1923 को देशबन्धु तथा मोती लाल नेहरू ने स्वराज्य की स्थापना की और इस दल के सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिए देशव्यापी दौरा प्रारम्भ कर दिया। इस दौरे के प्रत्येक स्थान पर उनका भव्य स्वागत हुआ और उनकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती गयी। चित्तरंजनदास ने मद्रास में भाषण देते हुए कहा-क्या मैं विद्रोही हूँ? हाँ मैं कांग्रेस या अन्य किसी संस्था के विरूद्ध विद्रोह अवश्य करूंगा, यदि मुझे यह मालूम हो जाय कि स्वराज्य प्राप्ति के लिए ऐसा करना आवश्यक है। मैं स्वराज्य चाहता हूँ। मैं स्वतंत्रता चाहता हूँ। मैं संघर्ष करने को तैयार हूँ। मैं अपने जीवन में कभी कायर नहीं रहा हूँ। मैं अपना जीवन बलिदान करने के लिए प्रस्तुत हूँ एक प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा – ‘मैं विश्वास दिलाता हूँ कि कांग्रेस से भी पवित्र एक और वस्तु है और वह है भरतीयों की स्वतंत्रता।’

समझौते के प्रयास 

कुछ समय पश्चात् मौलाना आजाद जेल से मुक्त हुए और उन्होंने कांग्रेस व स्वराज्य दल में समझौते के प्रयत्न प्रारम्भ कर दिये। उनके प्रयत्न से कांग्रेस और स्वराज्य दल में यह समझौता हो गया कि 30 अप्रैल, 1923 तक कोई भी दल कौंसिल प्रवेश के विषय पर किसी प्रकार की वाद विवाद न करेगा। इसके बाद देश की राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए सितम्बर में दिल्ली में मौलाना आजाद की अध्यक्षता में कांग्रेस का एक विशेष अधिवेशन बुलाया गया। इस अधिवेशन में कौंसिल प्रवेश के समर्थन बिना किसी विशेष कठिनाई के यह प्रस्ताव स्वीकार कराने में सफल हो गये कि कांग्रेस के सदस्य आगामी नवम्बर मास में होने वाले निर्वाचनों में भाग ले सकते हैं। यह प्रस्ताव इस प्रकार था – कांग्रेस सदस्य, जिन्हें कौसिलों में प्रवेश करने के विरूद्ध किसी प्रकार की धार्मिक तथा नैतिक आपत्ति न हो, आगामी चुनावों में प्रत्याशी के रूप में खड़े हो सकते हैं तथा अपने मत देने के अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। इस प्रकार अब कांग्रेस दो क्षेत्रों में कार्य करने लगी – रचनात्मक कार्य और कौसिल प्रवेश।

गाँधी जी और स्वराज्यवादी

सन् 1923 के निर्वाचनों में स्वराज्यवादियों को पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई। फरवरी 1924 में शोचनीय स्वास्थ्य के कारण कारावास की अवधि पूरी होने के पूर्व ही गाँधी जी को जेल से मुक्त कर दिया गया। सन् 1924 में गाँधी जी बेलगाँध अधिवेशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। यद्यपि गाँधीजी स्वराज्य दल के कार्यक्रम के पक्ष में न थे, लेकिन वे इस स्थिति में भी नहीं थे कि असहयोग आन्दोलन को पुनः चला सकें, क्योंकि न तो जनता और न ही नेता इसके लिए तैयार थे। अतः उन्होंने कौंसिल प्रवेश पर अपनी मौन अनुमति दे दी। अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा – ‘मैं स्वराज्यवादियों के मार्ग में अवरोध अथवा उनके विरुद्ध प्रचार में भाग नहीं ले सकता; यद्यपि मैं ऐसी योजना की सक्रिय सहायता नहीं रोक सकता, जिसमें मुझे स्वयं विश्वास नहीं हैं, उन्होंने विदेश माल बहिष्कार, हाथ में कताई बुनाई तथा अन्य रचनात्मक कार्यक्रमों पर बल दिया। स्वराज्यवादियों ने गाँधी जी के कार्यक्रम के प्रति अपनी निष्ठ व्यक्त की तथा इस प्रकार इन दोनों विचारधाराओं के मध्य समझौता हो गया।

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