सूर्यातप के वितरण पर वायुमंडल के प्रभाव

सूर्यातप के वितरण पर वायुमंडल के प्रभाव

सूर्यातप के वितरण पर वायुमंडल के प्रभाव

हमारा सूर्य ऊष्मा का भण्डार है। इससे सर्वदा ऊष्मा का विकिरण होता रहता है। सूर्य के केन्द्र का तापमान 28 करोड़ अंश सेण्टीग्रेड अनुमानित हैं। सूर्य के विशाल पिण्ड से निकलने वाली ताप-तरंगों के विशाल पुंज का ही नाम सूर्याताप है। ऊष्मा की यह प्रचण्ड शक्ति प्रति मिनट डेढ़ करोड़ किलोमीटर से भी अधिक तीव्र है और 9 मिनट में पृथ्वी तल पर पहुंच जाती है। ऊष्मा की मात्रा सर्वत्र स्थिर है। इसीलिए इसको सौर्यिक ऊष्मांक (Solar Constant) कहते हैं।

  1. सूर्यातप की मात्रा-

    सूर्य पृथ्वी से 1,488 लाख किलोमीटर दूर है। इसके धरातल का तापमान 6,700 सेग्रे. है। वैज्ञानिक किम्बल के अनुसार 5 प्रतिशत सूर्यातप मार्ग में ही नष्ट हो जाता है, जिसमें 42 प्रतिशत आतम ऊपर तल की गैसें लौटा देती हैं। 15 प्रतिशत आतप जलवाष्प, धूलिकण तथा निचली अन्य गैसों से रोक लिया जाता है। केवल 42 प्रतिशत आतप पृथ्वी तल पर पहुंचता है। यही सूर्यातप कहलाता है।

मौसम के परिवर्तन के साथ धरातल पर सूर्यातप के वितरण में भी परिवर्तन होता जाता है। इस पर भूमि की ऊंचाई, सूर्य की किरणें, जल-थल का वितरण, दिन-राशि की अवधि, भूतल का स्वभाव, वायुमण्डल की मोटाई एवं पादर्शकता, सौर कलंक की संख्या आदि का प्रभाव पड़ता है।

  1. भूमि की ऊंचाई-

    पर्वतों के ऊपरी भाग कम तापमान प्राप्त करते हैं और नीचे के भागों में अधिक तापमान रहता है, क्योकि सूर्य के साथ पृथ्वी का धरातल भी ऊष्मा प्रदान करता है।

सूर्य की किरणें- सूर्य की किरणें धरातल पर एक समान नहीं पड़ती। कहीं किरणें लम्बवत् पड़ती है तो कहीं तिरछी । भूमध्य रेखा के भागों में सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं और ध्रुवों की तरफ तिरछी पड़ती हैं।

लम्बवत् किरणें वायुमण्डल में कम दूरी तय करके पृथ्वी तल पर पहुंच जाती है, परन्तु तिरछी किरणें को वायुमण्डल की आधिक दूरी पार करनी पड़ती है। अतः वायुमण्डल की कुछ गर्मी के नष्ट हो जाती है और धरातल पर कम गर्मी पहुंच पाती है। अतः भूमध्यरेखीय भाग में धरातल को अधिक सूर्यातप प्राप्त हो जाता है और ध्रुवों की ओर क्रमशः सूर्यातप कम मिलता है।

  1. जल-थल का वितरण-

    स्थल के भाग जल की अपेक्षा शीघ्रता से गर्म तथा शीघ्रता से ठण्डे हो जाते हैं। इसका कारण स्थल भाग का खुरदुरा तल तथा पानी का चिकना तल है। खुरदुरी वस्तुएं सूर्य की गर्मी को शीघ्र सोख लेती हैं और शीघ्र उष्णता को नियुक्त कर देती है, किन्तु चिकनी एवं चमकदार वस्तुएं सूर्यातप का परिवर्तन कर देती हैं। स्थल पर सूर्य की किरणें गहराई तक नहीं पहुंच पाती। किन्तु जल भाग में ये किरणें गहराई तक पहुंच कर अधिक भाग को गर्म कर देती हैं। स्थल भाग ठोस होता है और जल भाग तरल होता है। अतः जल भाग की गर्मी को अधिक भाग को गर्म करना पड़ता है। जल भाग को गर्म करने के लिए थल भाग की अपेक्षा पांच गुनी गर्मी की आवश्यकता पड़ती है। जल भाग के ऊपर जलवाष्प तथा बादलों के आवरण सूर्य तथा पृथ्वी से ऊष्मा विकिरण में बाधक सिद्ध होते हैं।

  2. धरातल का स्वभाव-

    धरातल के स्वभाव एवं रंग का प्रभाव भी सूर्यातप पर पड़ता है। मिट्टी के रंग का भी प्रभाव पड़ता है। काली मिट्टी अधिक सूर्यातप सोखती है। साधारण मिट्टी वाले भाग पथरीले तथा बर्फीले भागों की अपेक्षा, शीघ्र विकिरण में बाधक सिद्ध होते हैं।

  3. वायुमण्डल की मोटाई तथा पारदर्शिता-

    जहां वायुमण्डल की मोटाई. अधिक होती है, उस स्थान पर सूर्यातप कम आता है। यदि आकाश में धूलि के कण तथा बादल अधिक होते हैं तो सूर्यातप का विकिरण कम होता है।

  4. सौरकलंकों की संख्या-

    जब सूर्य पर सौरकलंकों की संख्या अधिक होती है तो पृथ्वी तल पर कम सूर्यातप आता है, क्योंकि अधिक सौर शक्ति निकलने से अधिक वाष्प बनती है। और अधिक बादल बनते हैं जिनमें पृथ्वी तल तक कम सूर्यातप पहुंचता है।

अधिक सौर शक्ति आने से वायुमण्डल में ओजोन गैस की कमी पड़ जाती है। साधारणतः यह गैस पृथ्वी की उष्मा को सुरक्षित रखती है। इस गैस की कमी से पृथ्वी की उष्मा कम हो जाती है। जब और कलंक होते हैं तो इस गैस की ऊष्मा ऊंची रहती है।

सौर शक्ति से जल में भी उथल-पुथल मच जाती है। समुद्र की तली का शीतल जल ऊपर आ जाता है जिससे तापमान कम हो जाता है।

आधुनिक अनुसंधानों के अनुसार सौर कलंक प्रकाश मण्डल के शीतलतर क्षेत्र हैं जिनसे सूर्यातप का विकिरण सामान्य विकिरण की अपेक्षा कम होता है, किन्तु इनके पास फैकुली (Faculae) मिलते हैं जो इनके विकिरण की कमी की पूर्ति कर देते हैं।

  1. पृथ्वी से सूर्य की दूरी-

    सूर्य से पृथ्वी की दूरी सदा एक सी नहीं रहती। उपसौर में सूर्य से पृथ्वी की दूरी अधिक होती है और अपसौर (Aphelian) में कम।

अपसौर दशा में पृथ्वीतल पर सूर्यातप की मात्रा अधिक आती है। दिसम्बर में सूर्य पृथ्वी से सबसे निकट रहता है और जून में सबसे अधिक दूर होता है। इसलिए दक्षिणी गोलार्द्ध ग्रीष्म ऋतु में, उत्तर गोलार्द्ध की ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा अधिक सूर्यातप प्राप्त करता है। उत्तरी गोलार्द्ध की ग्रीष्म ऋतु अधिक लम्बी होने के कारण दोनों गोलाद्धों में एक वर्ष में प्राप्त सूर्यातप समान होता है।

सूर्यातप तथा अक्षांश- सूर्यातप का वितरण अक्षांशों से सम्बन्धित होता है। भूमध्यरेखा ध्रुवों की ओर सूर्यातप क्रमशः कम होता जाता है और ध्रुवों पर शून्य हो जाता है। इसका प्रमुख कारण विकिरण परावर्तन है।

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