सीमान्तवादी क्रांति एवं इसमें कार्ल मेंजर का योगदान

सीमांतवादी क्रांति एवं इसमें कार्ल मेंजर का योगदान

सीमांतवादी क्रांति (Marginalist Revolution)

1870 ई0 के दशक में गणितीय सम्प्रदाय के अर्थशास्त्री जेवन्स मेंजर एवं वालरस ने आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए सीमान्तवादी विश्लेषण का सहारा लिया। इन अर्थशास्त्रियों ने सीमान्त उपयोगिता के विचार को प्रतिपादित किया। इनके अनुसार मूल्य निर्धारण का सार सीमान्त उपयोगिता ही है। जेवन्स के अनुसार प्रत्येक वस्तु का मूल्य उसकी सीमान्त उपयोगिता के आधार पर तय होने के कारण, किन्हीं दो वस्तुओं के मध्य विनिमय अनुपात उन दोनों वस्तुओं की सीमान्त उपयोगिता के अनुपात का उल्टा होता है। वालरा के अनुसार अधिकतम सन्तुष्टि तभी प्राप्त होती है जबकि वस्तु को दिया गया मूल्य वस्तु की सीमान्त उपयोगिता के अनुपात में हो। दूसरे शब्दों में, इन अर्थशास्त्रियों ने सीमान्त विश्लेषण पर अधिक बल दिया है। इस कारण इनके विचारों को सीमान्तवादी क्रान्ति कहा जाता है।

मेंजर के प्रमुख आर्थिक विचार

मेंजर के प्रमुख आर्थिक विचारों की व्याख्या निम्नवत् शीर्षकों में की जा सकती है –

  1. आवश्यकताएँ-

    मेंजर में परम्परावादी अर्थशास्त्रियों वैचारिक दोषों को दूर करके अर्थशास्त्र के कारण तथा परिणाम पर आधारित एक युक्त विज्ञान का रूप प्रदान किया था। मेंजर के धन के स्थान पर अर्थशास्त्र को मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र घोषित किया। मेंजर का कहना था कि वस्तुओं का मूल्य इसलिए होता है और उनमें उपयोगिता होती है, क्योंकि उनके द्वारा आवश्यकताओं की तुष्टि करने की शक्ति होती है।

  2. मूल्य-निर्धारण का सिद्धान्त-

    मेंजर का मूल्य निर्धारण का सिद्धान्त पूर्णतः व्यक्तिपरक है उनके मतानुसार वस्तु की उत्पादन लागत की वस्तु के मूल्य पर प्रत्यक्ष कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अपने इस तर्क को मेंजर ने एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझाया है, यद्यपि नदी के तट पर रेत का ढेर लगाने में मानव श्रम का व्यय होता है परन्तु इसका कुछ भी मूल्य नहीं होता परन्तु इसके विपरीत स्वर्ण की अंगूठी, जो सड़क पर पड़ी हुई पायी जाती है, का मूल्य होता है यद्यपि प्राप्तकर्ता व्यक्ति के लिए इसको प्राप्त करने की उत्पादन लागत शून्य होती है।

  3. वस्तुओं का वर्गीकरण –

    कार्ल मेंजर का दूसरा विशेष योगदान वस्तुओं का वर्गीकरण है। दुर्लभता अथवा प्रचुरता के अनुसार वस्तुएँ आर्थिक तथा अनार्थिक दो प्रकार की होती है। किसी वस्तु की आर्थिक दृष्टि से वस्तु कहलाने के लिए उसमें निम्नलिखित चारों बातों का होना आवश्यक है।

  • वस्तु के लिए मानव आवश्यकता होनी चाहिए।
  • वस्तु में ऐसे गुण होने चाहिए कि उसके द्वारा मानव आवश्यकताओं की तुष्टि हो सके।
  • मनुष्य को यह ज्ञान होना चाहिए कि वस्तु में आवश्यकता की तुष्टि करने का गुण विद्यमान है।
  • वस्तु पर मनुष्य का पर्याप्त अधिकार अथवा नियन्त्रण होना चाहिए जिससे की मानव आवश्यकता की तुष्टि हो सके।
  1. अर्थशास्त्र के अध्ययन की रीतियाँ-

    अर्थशास्त्र के अध्ययन की रीतियों के विषय में मेंजर ने निगमन तथा आगमन दोनों रीतियों के लाभों की विस्तृत व्याख्या की है। मेंजर का कहना था कि आर्थिक घटनाओं का सही प्रकार से अध्ययन करने के लिए दोनों अध्ययन रीतियों का प्रयोग समान रूप से आवश्यक था। इस प्रकार मेंजर ने निगमन रीति की इसकी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्रदान करने में काफी महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करके परम्परावादी सम्प्रदाय तथा इतिहासवादी सम्प्रदाय को परस्पर पूरक बनाकर एक-दूसरे के निकटतम लाने का प्रयास किया।

  2. वितरण का सिद्धान्त –

    वितरण के क्षेत्र में मेंजर ने आकलन सिद्धान्त को अपनाया। उन्होंने बताया कि प्रत्येक उत्पादन साधन का मूल्य उसकी सीमान्त उत्पादकता पर निर्भर करता है।

  3. विनिमय-

    मेंजर के अनुसार विनिमय की क्रिया के द्वारा मनुष्य अपनी आवश्कताओं की अधिकतम सन्तुष्टि सुविधापूर्वक कर सकता है। विनिमय के लिए अनिवार्य बातें निम्नवत् हैं –

  • मनुष्य के पास ऐसी वस्तुएँ होनी चाहिए जिनका मूल्य दूसरे व्यक्ति के पास पायी जाने वाली वस्तुओं की अपेक्षा कम हों, क्योंकि कोई दूसरे व्यक्ति की वस्तु के बदले में अपनी वस्तु विनिमय में वह तभी देगा जब उसे ऐसा करने से लाभ प्राप्त हो। यह विनिमय के लिए अत्यन्त जरूरी है।
  • विनिमय के दोनों पक्षों को इस बात की जानकारी होनी चाहिए।
  • विनिमय करने वाले पक्षों को विनिमय करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त होना चाहिए।
  • विनिमय करने में उठाई जाने वाली असुविधा विनिमय के द्वारा प्राप्त किये जाने वाले लाभ की अपेक्षा कम होना चाहिए। विनिमय की उपर्युक्त शर्तों को बताने के बाद मेंजर कहते हैं कि विनिमय की शर्तें विनिमय कर्त्ताओं की संख्या, बाजार की स्थिति तथा विनिमय की जाने वाली वस्तु की पूर्ति तथा माँग के द्वारा निर्धारित की जाती हैं।

सीमान्तवादी क्रान्ति में मेंजर का स्थान

(Place of Menger in the Marginalist Revolution)

मेंजर द्वारा कुछ मूलभूत आर्थिक शब्दों एवं सिद्धान्तों की अति मौलिक तरीके से व्याख्या की गयी एवं उन्हें कारण व परिणाम के सिद्धान्त से सम्बन्धित किया गया। इनके विचार में आवश्यकता उत्पन्न होने की स्थिति से उसकी संतुष्टि की अवस्था कारण के सिद्धान्त से सम्बन्धित है तथा यही उनके विश्लेषण का मूल विषय है। मैंजर प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के आर्थिक सिद्धान्तों को परिष्कृत रूप में बताने में सफल रहें, हैं। इनके आर्थिक विचारों को सुधार के रूप में देखा जाता है। मेजर द्वारा वस्तुओं के वर्गीकरण, आवश्यकताओं के विवेचन, मूल्य सिद्धान्त, मुद्रा, विनिमय, वितरण, पूँजी आदि के बारे में विचार दिए गए हैं।

मेंजर के आर्थिक विचारों का आलोचनात्मक मूल्याँकन

(Critical Assessment of the Economic Thought of Menger)

कार्ल मेंजर ने अर्थशास्त्र को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है। इसके कारण इनके विचार वैज्ञानिक कहलाते हैं। कार्ल मेंजर ने निगमन विधि का प्रयोग करके आर्थिक अध्ययन की नई विधि विश्लेषित करने में सफलता प्राप्त की है। इन्होंने अर्थशास्त्र के मुख्य विषय जैसे- आवश्यकता, पूँजी, मुद्रा विनिमय, वितरण आदि शब्दों का नई सोच के साथ आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत करने में सफलता प्राप्त की है।

मेंजर को आस्ट्रियन सम्प्रदाय का अग्रणी माना जाता है। इन्होंने जो विचार प्रस्तुत किए उन्हें पूर्ण रूप से मौलिक नहीं माना जा सकता क्योंकि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि राजनीतिक अर्थ विज्ञान में उन्होंने जो भी संशोधन किए हैं वे सामान्य रूप से जर्मन लेखकों के पूर्व विचारों पर आधारित है। परन्तु उन्होंने उन विचारों को दृढ़तापूर्वक, सावधानी से परिपक्व रूप में प्रस्तुत किया। प्रो. हचेसन के अनुसार, “उनके विचारों की आंशिक रूप से स्पष्ट मौलिकता को ध्यान में रखते हुए उन्हें सैद्धान्तिक अर्थशास्त्रियों की श्रेष्ठ उपलब्धियों में रखना चाहिए।”

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