शुम्पीटर के आर्थिक विकास सिद्धान्त की मान्यताएं एवं प्रमुख बातें

शुम्पीटर के सिद्धान्त की मान्यताएं

जोसेफ शुम्पीटर महोदय ने अपनी आर्थिक विकास के सिद्धान्त को Theory of Economic Development’ में प्रकाशित किया तथा इसके बाद भी पूंजीवादी विकास का विश्लेषण करते रहे और उन्होंने अपनी दूसरी पुस्तक ‘Business Cycles’ के द्वारा विकास से संबंधित विचार को पूर्ण किया।

शुम्पीटर के सिद्धान्त की मान्यताएं

शुम्पीटर द्वारा प्रतिपादित आर्थिक विकास के सिद्धान्त की निम्नलिखित मान्यताएं हैं-

  1. आर्थिक विकास का अर्थ-

    शुम्पीटर के अनुसार आर्थिक विकास से हमारा अभिप्राय आर्थिक जीवन में घटित होने वाली केवल उन्हीं परिवर्तनों से है जिनको ऊपर से लादा नहीं जाता बल्कि वे स्वयंभूत प्रेरणाओं से भीतर से ही प्रकट होते हैं।

  2. विकास और वृद्धि में अन्तर-

    प्रो० शुम्पीटर की एक महत्त्वपूर्ण देन यह रही है कि उन्होंने विकास और वृद्धि के भेद को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार आर्थिक वृद्धि का सिद्धान्त यह बतलाता है कि आर्थिक जीवन प्रत्येक वर्ष उन्हीं धाराओं से इस प्रकार बहाता चला जाता है जिस प्रकार प्राणी में रक्त का संचालन होता रहता है।

तात्पर्य यह है कि आर्थिक वृद्धि के अन्तर्गत हम नवीन सृजन की बात नहीं करते। जो कुछ भी उत्पादन होता है वह परंपरागत व नियमित पद्धति के अनुसार होता चला जाता है और किसी प्रकार की नवीनता का सृजन नहीं होता है।

जबकि आर्थिक विकास का केवल यही अर्थ नहीं निकलता कि समरूपी वस्तुओं की भौतिक उत्पत्ति में वृद्धि हो जाये। विकास का यह अर्थ होता है कि पूर्णतया नयी वस्तुओं को चालू किया जाय और प्रचलित वस्तुओं में निरंतर सुधार किया जाय। इस प्रकार आर्थिक विकास के अन्तर्गत सृजनात्मक शक्तियों का जन्म होता है और नवीन उत्पादन होते हैं। शुम्पीटर का मत है कि अर्द्धविकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए आर्थिक विकास का अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व है। क्योंकि इससे तीव्र विकास के लक्ष्य को गति प्राप्त होती है और अर्थव्यवस्था के स्वरूप में आमूल परिवर्तन हो जाता है।

  1. आर्थिक जीवन का चक्रीय उच्चावचन-

    शुम्पीटर, आर्थिक विकास की प्रक्रिया की व्याख्या चक्रीय प्रवाह से प्रारंभ करते हैं। चक्रीय प्रवाह एक ऐसी सतत् प्रक्रिया है जो बिना विनाश के निरंतर चलती रहती है। शुम्पीटर के अनुसार अर्थव्यवस्था स्थिर संतुलन में रहती है तथा स्थिर संतुलन में अर्थव्यवस्था पूर्ण प्रतियोगिता मूलक संतुलन में रहती है अर्थात् निम्नलिखित स्थितियां पायी जाती हैं –

उत्पादन की मांग = उत्पादन की पूर्ति (D = S)

कीमत = औसत लागत (P= AC)

लाभ = शून्य (I = 0)

ब्याज की दर = लगभग शून्य (R1 = Just 0)

बेरोजगारी = नहीं के बराबर (N = Just 0)

स्थिर संतुलन की प्रमुख विशेषता चक्रीय प्रवाह है। चक्रीय प्रवाह में कोई तकनीकी परिवर्तन नहीं होता न शुद्ध बचत होती है न शुद्ध संचयन होता है और न ही लाभ होता है अर्थात् ऐसी स्थिति में एक लाभ रहित अर्थव्यवस्था पायी जाती है। मनुष्य के शरीर में प्रतिपल के रक्त प्रवाह के तरह आर्थिक जीवन चलता रहता है।

  1. आर्थिक विकास – एक असतत् प्रक्रिया-

    शुम्पीटर ने आर्थिक विकास को वित्तीय प्रवाह का असतत् विचलन माना है। उनका कहना है कि “आर्थिक विकास इस वित्तीय प्रवाह में होने वाला एक आकस्मिक तथा असतत् परिवर्तन है। अर्थात् संतुलन की एक ऐसी हलचल है जो पूर्व स्थापित साम्य की स्थिति को सदा के लिए बदल देती है।” उल्लेखनीय बात यह है कि आर्थिक जीवन में घटित होने वाले ये आकस्मिक तथा असतत् परिवर्तन अर्थव्यवस्था पर बाहर से थोपे नहीं जाते बल्कि उसके अपने प्रयास या उपक्रम से उसके अंदर से ही उत्पन्न होते हैं।

  2. साख का महत्त्व –

    शुम्पीटर का मानना था कि “पूंजी के बिना विकास नहीं होता और विकास के बिना पूँजी निर्माण नहीं होता।” हां प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने जहाँ अपने सिद्धान्त में पूँजी के लिए चालू आय में से बचत करने पर जोर दिया था, वहीं शुम्पीटर अपने मॉडल में वित्तीय प्रवाह तोड़ने के लिए बैंक साख पर अत्यधिक महत्व देते हैं। उन्होंने बैंक-साख अर्थात् मुद्रा बाजार को ‘पूंजीवाद का मुख्यालय माना है।

शुम्पीटर की यह मान्यता थी कि चालू बचतें नव-प्रवर्तन योजनाओं के लिए पर्याप्त नहीं होतीं इसलिए विकास वित्त की पूर्ति बैंकों द्वारा निर्मित साख द्वारा की जानी चाहिए। यद्यपि बैंक साख द्वारा पूँजी संचयन की प्रक्रिया अल्पकाल में स्फीतिक होती है किन्तु नव-प्रवर्तन की सफलता के बाद जब नयी मौद्रिक आय उत्पन्न हो जाती है तो ऋणों की वापसी के साथ-साथ स्फीतिक प्रभाव कम होने लगता है: शुम्पीटर ने अनिवार्य बचतों को भी पूँजी संचयन का एक प्रभावी स्रोत माना है।

  1. लाभ व ब्याज –

    पूँजी उत्पादन में साधनों को नये प्रयोगों में मोड़ने का साधन है। साहसी लाभ को लागतों के ऊपर आधिक्य मानता है अर्थात्

लाभ = कुल प्राप्ति – कुल लागत

P = IR – IC

जहाँ IR- Total Revenue (कुल प्राप्ति)

IC – Total Cost (कुल लागत)

P- Profit (लाभ)

शुम्पीटर ब्याज को विकास की देन मानते हैं। चक्रीय प्रवाह वाली अर्थव्यवस्था में ब्याज का अस्तित्व नहीं होता। ब्याज पूँजी की राष्ट्रीय आय बढ़ाने की क्षमता की प्रीमियम है। ऊंची मजदूरी तथा ब्याज दर विकास को बाधा पहुँचाते हैं। मजदूरी वृद्धि लाभों पर प्रभाव डालती है। लाभ विकास की संतान है। मजदूरी हमेशा धनात्मक होती है परन्तु लाभ धनात्मक, शून्य व ऋणात्मक भी हो सकते हैं।

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