शुम्पीटर का आर्थिक विकास सिद्धान्त (Schumpeter’s Theory of Development)

शुम्पीटर का विकास सिद्धान्त

शुम्पीटर का विकास सिद्धान्त

(Schumpeter’s Theory of Development)

शुम्पीटर के आर्थिक विकास सिद्धान्त की प्रमुख विशेषताएँ

शुम्पीटर के सिद्धांत की विशेषताएं निम्लिखित रूप में वर्णित की जा सकती हैं –

  1. आर्थिक विकास का आशय-

    “आर्थिक जीवन में आकस्मिक तथा असतत्” परिवर्तनों के कारण होती है, जो कि अर्थव्यवस्था में उसके उपक्रमों (Initiative) के उसके भीतर स्वयं घटित होते हैं। इन परिवर्तनों के लिये कोई बाहरी तत्व उत्तरदायी नहीं होते।’ शुम्पीटर के शब्दों में, “विकास वित्तीय प्रवाह की दिशाओं में आकस्मिक तथा असतत् परिवर्तन अथवा सन्तुलन की हलचल है, जो पहले से विद्यमान सन्तुलन की स्थिति को सदा के लिये परिवर्तित तथा विस्थापित कर देते हैं।

शुम्पीटर के अनुसार, “हमारे अर्थ में विकास एक विशेष धारणा है जो चक्रीय क्रम में समझे जाने वाले या साम्यावस्था की दिशा में बिल्कुल अपरिचित है। यह प्रवाह क्रम में विशेष और असतत् परिवर्तन व साम्यावस्था में व्यवधान है जो पहले से उपस्थित साम्यावस्था को परिवर्तित और स्थानान्तरित कर देता है।”

शुम्पीटर के अनुसार, “आर्थिक विकास से आशय जीवन में घटित होने वाले केवल उन परिवर्तनों से है जो ऊपर से थोपे नहीं जाते बल्कि आन्तरिक रूप से स्वतः ही विकसित होते रहते हैं।”

  1. नव प्रवर्तन –

    शुम्पीटर के अनुसार, “नव प्रवर्तनों से मेरा अभिप्राय उत्पत्ति के साधनों के अनुपातों में होने वाले उन परिवर्तनों से है जो धीरे-धीरे न होकर तीव्र गति से घटित होते हैं। वे आगे कहते हैं, “विकास एक स्थिर व्यवस्था में एक अविछिन्न एवं स्वतः परिवर्तन है जो पहले स्थापित साम्य की अवस्था को सदैव के लिये पूरी तरह से बदल देता है, जबकि वृद्धि दीर्घकाल में होने वाला एक क्रमिक तथा स्थिर गति वाला परिवर्तन है जो बचत और जनसंख्या की दर में होने वाली सामान्य वृद्धि का परिणाम होता है।”

शुम्पीटर हेतु “वृत्तीय प्रवाह एक सरिता है जो कि श्रम-शक्ति और भूमि के निरन्तर प्रवाह हो रहे झरनों से भरती है तथा प्रत्येक आर्थिक अबोध में तालाब, जिसे हम आय कहते हैं, में प्रवाहित होती है ताकि उसे आवश्यकताओं की संतुष्टि के रूपान्तरण किया जाए।

शुम्पीटर के अनुसार, “विकास, वृत्तीय प्रवाह की दिशाओं में आकस्मिक तथा अनिरन्तर परिवर्तन, संतुलन की गड़बड़ है, जो पहले की विद्यमान संतुलन स्थिति को सदा के लिए परिवर्तित तथा विस्थापित कर देती है।”

  1. साख का महत्व-

    शुम्पीटर ने साख, पूँजी व बचतों को महत्व दिया। वे विकास व पूँजी को एक-दूसरे का पूरक मानते थे।

  2. साहसी या उद्यमी का कार्य –

    शुम्पीटर के अनुसार, “साहसी विकास का मुख्य प्रेरक स्रोत है। वह नवीनताओं का सृजनकर्त्ता है, इत्पादन की तकनीक में क्रान्ति का अधिष्ठाता है और बाजारों के विस्तार का श्रेय भी उसे ही दिया जाता है स्थिर अर्थव्यवस्था में साहसी बहाव के साथ तैरता है, और गतिशील व्यवस्था में उसे बहाव के विपरीत तैयार होता है। साहसी विकास मंच का नेता है, अन्य पिछलग्गू होते हैं। वह अत्यधिक स्वाभिमानी तथा विवेकी होता है। वह केवल लाभ के लिए ही जोखिम नहीं उठाता बल्कि सफलता प्राप्त करना भी उसका एक लक्ष्य होता है।’

चक्रीय प्रकृति (Cyclical Nature)

शुम्पीटर के ही शब्दों में, “पूँजीवादी प्रक्रिया किसी आकस्मिक घटना के कारण नहीं बल्कि अपनी संरचना की श्रेष्ठता के कारण जनता के जीवन स्तर में बढ़ती हुई दर से वृद्धि करती है।

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शुम्पीटर के अनुसार, “बड़े पैमाने पर उत्पादनका अर्थ है जनसाधारण के लिए उत्पादन। जब एक बार तेजी की प्रक्रिया समाप्त होती है तो नीचे की ओर दीर्घ लहर प्रारंभ हो जाती है और पुराने संतुलन के आस-पास के बिन्दु की ओर पुनः समायोजन की कष्टप्रद प्रक्रिया शुरू हो जाती है।’

उपभोक्ताओं की क्रय-शक्ति बढ़ने पर वस्तुओं की माँग पूर्ति की अपेक्षा अधिक बढ़ जाती है। मूल्य, लाभ व बैंक साख में वृद्धि होती है तथा नवप्रवर्तन को बल मिलता है।

शुम्पीटर ने लिखा था, “क्या पूँजीवाद बचा रहेगा ? नहीं, मैं समझता हूँ कि वह वच नहीं पाएगा।’ शुम्पीटर के अनुसार, “पूँजीवाद की सफलता ही इन सामाजिक संस्थाओं की जड़ खोदती है जो उसकी रक्षा करती है और अनिवार्य रूप से ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है जिनमें पूँजीवाद नहीं जी सकेगा और प्रबलता से समाजवाद के स्पष्ट वारिस होने का संकेत करती है।”

पूँजीवाद का नाश अथवा पतन

शुम्पीटर ने पूँजीवाद के विनाश के पक्ष में अग्रांकित तर्क दिये हैं।

  1. उद्यमी के कार्य की महत्ता की समाप्ति –

    शुम्पीटर के अनुसार, “साहसियों को कुछ भी करने को नहीं रह जाएगा । लाभ तथा उसके साथ ब्याज शून्य हो जायेगा। उद्योग और व्यापार का प्रबन्ध एक सामान्य दैनिक प्रशासन हो जाएगा, और प्रबन्धक आवश्यक रूप से नौकरशाही का रूप धारण कर लेंगे। बहुत ही अच्छी प्रकार का समाजवाद लगभग अपने आप ही स्थापित हो जायेगा।”

  2. पूँजीवादी समाज के संस्थागत ढांचे का गिरना –

    “अभौतिक निष्क्रिय और अनुपस्थित स्वामित्व न तो लोगों को प्रभावित ही करता है और न ही नैतिक निष्ठा पैदा कर पाता है, जैसाकि सम्पत्ति के ठोस व प्रत्यक्ष स्वामित्व द्वारा किया जाता है।”

शुम्पीटर के आर्थिक विकास सिद्धांत की आलोचनाएं

इसकी प्रमुख आलेचनायें अग्रवत हैं :

  1. नवप्रवर्तन पर अत्यन्त बल देना,
  2. बैंक साख पर अत्यन्त बल देना,
  3. नवप्रवर्तन साहसी का कार्य नहीं,
  4. शून्य लाभ की अनुचित धारणा होना,
  5. पूँजीवाद से समाजवाद की औचित्यहीन प्रक्रिया,
  6. आर्थिक विकास मात्र चक्रीय नहीं होता।

मायर एवं बाल्डविन के शब्दों में, “शुम्पीटर ने आर्थिक विकास का जो वृहत् आर्थिक, सामाजिक विश्लेषण किया है, निःसन्देह यह अपने में मौलिकता लिए हुए है और उसकी सर्वत्र प्रशंसा की जाती है। परन्तु विडम्बना तो यह है कि बहुत कम लोग उसके निष्कर्षो को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। उसका विश्लेषण उद्दीपक है, उसका तर्क उत्तेजक है और वह पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है। उसका विश्लेषण एकतरफा है और उसने अनेक बातों पर आवश्यकता से अधिक बल दिया है।”

मायर व बाल्डिवन के अनुसार, “शुम्पीटर के सिद्धान्त को एक ऐसा प्रमुख कार्य कहना होगा जिसे स्मिथ, रिकार्डो, मिल, मार्क्स, मार्शल तथा कीन्स जैसे अर्थशास्त्रियों के योग्य तथा समकक्ष माना जा सकता है।”

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